आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार

नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार

नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा

डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा

भारत वर्ष ज्ञान भूमि से अलंकृत है। हमारी प्राचीन ज्ञान परम्परा ने व्यक्ति के सर्वागीण विकास पर ध्यान केंदित किया। सम्पूर्ण वैदिक वाग्मय- रामायण, महाभारत, पुराण,स्मृति,दर्शन,साहित्य आदि सुसंस्कृत ज्ञान से संस्कारवान समाज के निर्माण में सहयोगी रहे।  वैदिक वाग्मय में ज्ञान को अप्रतिम माना गया है। भारत में तक्षशिला, नालन्दा, वल्लभी,उज्जयिनी,आदि विश्व प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र थे जहाँ ज्ञानार्जन के लिए शिक्षार्थी आते थे |प्राचीन भारतीय ज्ञान विज्ञान की गौरवशाली परम्परा समस्त जगत को आलोकित करने वाली है। 

डॉ.राधाकृष्णन ने अपने युग की परिस्थियों से प्रभावित होकर कहा था- “ भारत सहित सारे संसार के कष्टों का कारण यह है कि शिक्षा का सम्बन्ध नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की प्राप्ति से न रहकर केवल मस्तिष्क के विकास से रह गया है। ” उन्होनें इस सूत्र से अपनी आस्था व्यक्त की चरित्र ही भाग्य है। उन्होंने चरित्र को व्यक्ति तथा राष्ट्र दोनों के लिए अनिवार्य माना । डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति एवं द्वितीय राष्ट्रपति रहे । वे भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परम्परा के संवाहक,प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और आस्थावान सनातनी विचारक थे। डॉ.राधाकृष्णन का कहना- “ चाहे विज्ञान हो या प्रौद्योगिकी, साहित्य हो या कला,दर्शन हो या धर्म,सम्पूर्ण ज्ञान अविभक्त है। ये सब शाखाएं मनुष्य की आत्मा की भिन्न-भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। 

भारतीय ज्ञान परम्परा के संवाहक डॉ. राधाकृष्णन
भारतीय ज्ञान परम्परा के संवाहक डॉ. राधाकृष्णन

वे एक-दूसरे की विरोधी नही बल्कि पूरक है। यदि विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रकृति के साथ मनुष्य की अंतरात्मा का संवाद है तो साहित्य और कला भी सृष्टि में व्याप्त सर्वोच्च रहस्य के साथ उसका संवाद है। व्यक्ति जब विज्ञान और धर्म के मध्य द्वन्द्व की बात करते है तो वे न तो विज्ञान के आध्यात्मिक चरित्र को समझ पाते है और न धर्म के तर्कपरक चरित्र को। यदि अच्छी तरह समझ जायें तो विज्ञान और धर्म एक-दूसरे के सहयोगी बन मदद करेंगें ।”  

प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा-
प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा विज्ञान,कला, साहित्य, धर्म एवं दर्शन सहित अनेक तत्वों को अपने समेटे हुए है। इस ज्ञान परम्परा की मुख्य विशेषताएँ
• विविधता- यह विभिन्न विचारधाराओं पद्धतियों एवं दर्शन का समावेश करता है,जो की व्यावहारिक अनुभव एवं अवलोकन की महत्ता पर बल देता है। 
• अनुभववाद- यह ज्ञान को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नही रखता,बल्कि व्यावहारिक अनुभव और अवलोकन को भी महत्त्व देता है। 
• जीवन- केन्द्रित- यह जीवन के सभी पहलुओंयथा व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर जीवन जीने की कला सिखाता है। 
• नैतिक मूल्यों पर बल- यह सदाचार, नीतिगत एवं मानवीय मूल्यों पर बल देता है,जो एक आदर्श समाज के निर्माण में मूलाधार है। डॉ राधाकृष्णन का कहना-यदि हम समाज को रुग्णता से बचाना चाहते है तो हमें अपनी शिक्षा को आचार से जोड़ना होगा | हमें मानवता को उन जड़ों तक वापस ले जाना चाहिए जहाँ से अनुशासन और स्वतन्त्रता दोनों का उद्गम हो । 
• सर्वसमावेशी- शिक्षा के द्वार सभी के लिए खुले हो |हमें हर प्रकार की मतान्धता चाहे वह धार्मिक हो,दार्शनिक हो,एवं राजनितिक-उससे बचना होगा। 

भारतीय गुरुकुल की ज्ञान परम्परा
भारतीय गुरुकुल की ज्ञान परम्परा

भारतीय ज्ञान परम्परा जड़ नही प्रवाहमान है –

परिवर्तन समय की आवश्यकता है और निरंतरता अतीत से भविष्य की ओर ले जाने वाली सनातन प्रक्रिया है। दोनों का अपना-अपना महत्त्व है। डॉ.राधाकृष्णन के मतानुसार “हमारा देश सांस्कृतिक रूप में निरन्तरता और परिवर्तन के सिद्धांत का एक जीवन्त उदाहरण है । परिवर्तन न हो और केवल निरन्तरता बनी रहे तो वह निस्तेज और गतिहीन होकर जड़ हो जायेगी | दूसरी ओर केवल परिवर्तन होता रहे और निरन्तरता रुक जाये तो वह बैचेनी और अराजकता को जन्म देने का कारण बन सकती है। सभी महत्वपूर्ण परिवर्तन अतीत से लेकर भविष्य तक के विकास को रेखांकित करते है। यह विकास ही मानव की मुक्त आत्मा की अभिव्यक्ति है। मानव (मनुष्य) एक सम्पूर्ण इकाई है, अत:आवश्यक है कि उसके बौद्धिक एवं कलात्मक पक्षों का साथ-साथ एवं सही और सन्तुलित विकास किया जायें।  सनातन एवं भारतीय संस्कृति के पक्षधर डॉ.राधाकृष्णन ने प्रकृति की शक्तियों को भी दोनों ध्रुवों पर एक साथ चलते रहने के उदाहरण दिये। 

उनके मतानुसार- यदि आप ब्रह्याण्ड के परिदृश्य को देखें तो विकास - पदार्थ से जीवन की ओर, जीवन से मस्तिष्क की ओर,मस्तिष्क से प्रतिभा की ओर तथा प्रतिभा से अंतरात्मा की ओर ।यहाँ निरन्तरता भी है और परिवर्तन भी दृष्टिगोचर है। हमारे नीति शास्त्रों में वर्णित मिलता है कि-“आ नो भद्रा: क्रतवोयंतु विश्वत:” अर्थात सात्विक विचार हर दिशा से आने दो। स्वयं को किसी चीज से वंचित न करो, अच्छी बातों को ग्रहण करो, तभी वास्तविक विकास होगा।   

प्राचीन भारतीय खगोलीय ज्ञान
प्राचीन भारतीय खगोलीय ज्ञान

भारतीय ज्ञान परम्परा जड़ नही बल्कि सतत् प्रवाहमान है, इसमें विवेक के उपयोग की स्वतन्त्रता है। भारतीय सभ्यता- संस्कृति आदि भौतिक ज्ञान परम्परा के साथ आदि वैदिक आध्यात्मिक प्रवृति को भी महत्त्व देती है। डॉ.सर्वपल्ली के अनुसार- शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए,जो ऐतिहासिक परिस्थितियों एवं प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ लड़ सके ।  हमें तकनीकी ज्ञान के अतिरिक्त आत्मा की महानता को प्राप्त करना भी आवश्यक है। 

भारतीय शिक्षा - “हमें सभी जीवन की कला की ओर ले जाता है” और यह कला ही जीवन की कला है। इसमें सबका योगदान होना चाहिए- विज्ञान और प्रौद्योगिकी का, मानविकी और दर्शन का,कला और साहित्य का तथा आपसी विश्वास और समन्वय का। डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय चेतना की सत्यं शिवं सुन्दरम् की सिद्धि को स्पन्दित करने वाले महान दार्शनिक थे। 

लेख -
श्रीमती पुष्पा शर्मा

Follow us on social media and share!