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भारतीय संस्कृति की इन्द्रधनुषी उड़ान

भारतीय संस्कृति की इन्द्रधनुषी उड़ान

भारतीय संस्कृति का मूल आधार समन्वय की भावना है। इस समन्वय का दर्शन आचार-विचार, लोक-व्यवहार, मूल्यों, आदशों तथा समस्त विश्व के धरातल पर मानवीय संवेदनाओं और संबंधों में लक्षित होता है। किसी भी देश की संस्कृति में उसकी सच्ची आत्मा के दर्शन होते हैं। उस देश के हृदय की धड़कन संस्कृति के माध्यम से अनुभव की जा सकती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी भी देश की संस्कृति उसकी वैचारिक शक्ति, बौद्धिक चिन्तन और विवेकशील सोच का आईना होती है।

भारतीय संस्कृति का आलोक भी सारे विश्व में फैला है। भारत तो इस मामले में भारत और भारतीय के प्रभामंडल में सारे विश्व को समेट कर उसका गुरु होने का श्रेय प्राप्त कर चुका है। यदि हम विश्व की संस्कृतियों का अध्ययन करें तो निश्चय ही हमें उनमें अंतर दिखाई पड़‌ता है। विदेशों में जहां हम आर्थिक और भौतिक चकाचौंध अधिक देखते हैं वहीं भारत में हमें सादगी और आध्यात्मिक वृत्तियों का प्रकाश दिखाई पड़ता है।

संस्कृति का सीधा संबंध संस्कारों से है। संस्कार ही हमारे जीवन में शाश्वत मूल्यों से, आदर्शों से, मानव के हृदय में समाहित सद्‌वृत्तियों और आत्मा के सच्चे स्वरूप से साक्षात्कार कराते हैं। भारत ने अन्य देशों की भाँति पश्चिमी देशों को भी अपने ज्ञान की गंगा से सींचा है परस्पर सांस्कृतिक आदान-प्रदान, वैचारिक सामंजस्य एवं बौद्धिक चिंतन के माध्यम से मानव को मानव से जोड़ने और मानवीय संवेदनाओं के संरक्षण के लिए भारत ने एक सेतु का कार्य किया है।

जहाँ तक देश में पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक भारतीय संस्कृति के उदात्त स्वरूप का प्रश्न है, हमें विविधता में एकता ने बड़े ही अ‌द्भुत रूप में बुनकर रखा है। हमारे विश्वास अलग हो सकते हैं, धर्म अलग हैं, संप्रदाय हैं, रहन-सहन, खान-पान और प्रथा-परम्परा में थोड़ा बहुत अंतर हो सकती है पर हमारी मूल सोच एक है। अनेकता में एकता का यह इन्द्रधनुषी रूप हमारे देश के सांस्कृतिक ताने-बाने को संजोये हुए है।

अनेक बोलियाँ हैं, भाषायें हैं साहित्य की विधाएँ हैं और मान्यताएँ भी हैं। परन्तु हमारी संस्कृति के धागों की बुनावट ऐसी है कि हम सब भावात्मक रूप से एक सूत्र में बंधे हैं। हमारा मूल स्वर एक है। भारतीय साहित्य, भारतीय संगीत और भारतीय लोक कलाओं के मूल में साम्य की एक सुनहरी रेखा चमकती हुई दिखाई पड़ती है। यह चमक विदेशों तक भी दिखाई पड़ती है।

इस देश की यह सांस्कृतिक विरासत विदेशी संस्कृतियों को भी प्रभावित करती है। सदियों से हमारी इस संस्कृति की अमृतमयी धारा अजस्त्र रूप से प्रवाहित हो रही है। इसके पावन वातावरण में हम आचरण की शुद्धता, विचारों की निर्मलता, हृदय की पवित्रता और उदारता की भावना को आत्मसात किए हुए हैं। हमारे संतों, फकीरों, गुरुओं, धर्माचार्यों, शास्त्र मर्मज्ञों, साहित्याचार्यों और साधकों एवं मनीषियों ने अपनी साधना से, विचारों और आचरण से इस संस्कृति के प्रकाश को विश्व को ज्ञान की संजोवनी प्रदान करती आई है।

यही कारण है कि विश्व में फैलाने की दिशा में समर्पित भाव से कार्य किया और इसके मूल में निहित सुगंध से विश्व संस्कृति भी महक गयी। भारतीय संस्कृति के विशिष्ट तत्व, उदार एवं सात्विक वृत्तियाँ, विशाल हृदय, उदार जीवन दृष्टि, सौजन्य और समन्वय की भावना ने सदैव सभी विदेशी संस्कृतियों को प्रभावित किया है। सत्य का अनुसरण, त्याग का भाव, अहिंसा की वृत्ति, सभी का कल्याण और मन, वचन एवं कर्म की पावनता का संदेश देकर भारतीय संस्कृति ने सारे विश्व को एक ओर "सत्यम्, शिवम् तथा सुन्दरम्" का पाठ पढ़ाया है तो दूसरी ओर "सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया" का भी संदेश दिया है।

यही दया, करुणा, संवेदना तथा शील का भाव भारतीय मानस की निजी विशेषता है और भारतीय संस्कृति का अपना विशिष्ट स्वरूप है जो विदेशी संस्कृतियों के लिए दिशा संकेत भी है। अपनी सामासिक वृत्ति, उदात्त जीवन दर्शन और जीवन के शाश्वत सत्य पर आधारित भारतीय सभ्यता और संस्कृति सारे विश्व की अनेक संस्कृतियां नष्ट हो चुकी हैं और भारतीय संस्कृति जीवित है। कहा भी गया है-

यूनान मिश्र रोम सब मिट गए जहाँ से,
बाकी बचा है अब तक नामो निशां हमारा
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी 
 इस हस्ती की आधार शिला है हमारी संस्कृति जिसे हमारे संरकार ऊर्जा देते हैं।

सांसारिक वृत्तियों में आकंठ डूबी पश्चिमी संस्कृतियों के मूल में भौतिकवाद है। जीवन के सुख हैं। भोग-विलास तथा सांसारिक आनन्द के, सुख-सुविधाओं के मोह में उलझा जीवन है। वहाँ आसक्ति है, मोह-माया का विलासपूर्ण जीवन है। खाओ, पीओ, मौज करो का सिद्धान्त है। मैं, मेरा और अपना का भाव है। जबकि भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक वृत्तियाँ हैं। सादा जीवन और उच्च विचार का भाव है। साधना है, त्याग और तप है। स्वार्थ नहीं परमार्थ है। मेरे और तेरे का अंतर नहीं है।

यहाँ मैं भी तुम बन जाता है। अपने पराये का भेद मिट जाता है। सारी वृत्तियाँ एक तान, एक लय हो जाती हैं। यही वृत्ति है जो सद चित, आनन्द की राह पर ले जाती है। आज पश्चिम भारतीय संस्कृति की इसी आभा पर मुग्ध है, उसे भारतीय संस्कृति के इन्हीं इन्द्रधनुषी रंगों ने आकर्षित किया है। तभी तो पश्चिम में आज अनेक प्रकार के ऐसे आंदोलन चल रहे हैं जो हमारी सांस्कृतिक अस्मिता से प्रभावित हैं। वे हमारा अनुकरण कर रहे हैं।

धर्म और भक्ति के स्वरूप की पहचान की दिशा में वे लोग जीवन के शाश्वत मूल्यों तक पहुंचना चाहते हैं। पश्चिमी देशों को भारतीय संस्कृति में चिन्तन की नई दिशा, जीवन मूल्यों की नई व्याख्या, उच्च आदर्शों तथा नैतिकता की सार्थक परिभाषा, साधना के सच्चे स्वरूप और जीवन तथा जगत के वास्तविक अर्थ एवं लक्ष्य का दिशा संकेत मिला। राजाराम मोहन राय की सुधारवादी वृत्ति, स्वामी दयानन्द, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, अरविन्द, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, डॉ. राधाकृष्णन आदि की वाणी ने जो जादू पश्चिमी देशों पर किया उससे सभी परिचित हैं।

इन सभी के संदेशों, उपदेशों, प्रवचनों, भाषणों, वाणी और शिक्षा विश्व को नई जीवन-दृष्टि, चिन्तन की नवीन दिशा और सोच के नए आयाम दिए। हमारे वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों, पौराणिक ग्रंथों, गीता, रामायण, महाभारत आदि में समाहित उदात्त जीवन मूल्यों, उदात्त भावनाओं और सदवृत्तियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनसे मिला ज्ञान का प्रकाश, अहिंसा और शांति का संदेश, भौतिक आसक्ति से मुक्ति तथा आध्यात्मिक वृत्तियों में रुझान।

तभी तो भारतीय संस्कृति में अहंकार के लिए स्थान नहीं है, दम्भ का नाम नहीं है। यदि है तो विनय, नम्रता, शालीनता और आचरण की शुद्धता। यहाँ संकीर्णता और स्वार्थ नहीं, हृदय की विशालता, परमार्थ, दृष्टिकोण और उदारता का प्रकाश है। धर्म की व्यापक और सच्ची अवधारणा भारतीय संस्कृति के मूल में निहित है। यहाँ उदात्त जीवन पद्धति और आध्यात्मिक वृत्तियों का समन्वय है। इस संस्कृति का यहीं चुम्बकीय आकर्षण है जो विदेशियों को अपनी और खींचता है।

यही विश्व बंधुत्व और" वसुधैव कुटुम्बकम" तथा "एक विश्व एक परिवार " के सिद्धान्त का मूल स्त्रोत है। विदेशियों को अब समझ में आने लगा है कि जीवन का सच्चा सुख अर्थवाद, भोगवाद या भौतिक ऐश्वर्य में नहीं अलौकिक वृत्तियों में है। यह गौतम, महाबीर और गांधी का देश है। तभी शांति, अहिंसा, भाईचारे और मैत्री की बात करता है। वैश्वीकरण, ज्ञान-विज्ञान की उन्नति तथा संचार माध्यमों की क्रांतिकारी भूमिका के इस युग में विश्व के देश और निकट आ रहे हैं।

आर्थिक उदारीकरण का युग भी है। परस्पर आदान-प्रदान, संपर्क, और संवाद में भी वृद्धि हो रही है। ऐसे में भारतीय, चिंतन, भारतीय दर्शन, भारत की वैचारिक ऊर्जा और आध्यात्मिक दृष्टि समस्त मानवता के लिए मानव को जोड़ने के लिए, विश्व शांति के लिए और आत्मिक विकास के लिए विशेष महत्व रखती है। इसकी सहायता से निश्चय ही सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकते हैं।

कबीर का ढाई आखर प्रेम, तुलसी की मर्यादा, गौतम, गांधी का शांति अहिंसा का संदेश, पंचशील के सिद्धांत का प्रकाश एक ऐसे वैचारिक और सांस्कृतिक सेतु के लिए आधारभूमि तैयार कर सकते हैं जहाँ विश्व-संस्कृतियाँ एक दूसरे की पोषक और पूरक हो सकती हैं।

हमारा साहित्य, हमारी लोक कलाएँ, हमारा संगीत, हमारी नृत्य कलाएँ, स्थापत्य, हमारी सांस्कृतिक विरासत का भी योगदान कम नहीं है। सभी संस्कृतियों का सम्मान, विविधता में एकता की सुनहरी रेखा की पहचान तथा सर्वधर्म समभाव भारतीय चिन्तन, भारतीय मनीषा और भारतीय सोच की परम्परागत विशेषता है। यही वह तत्व है जो विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रभामंडल का आलोक फैलाता है।

डॉ. नारायणदत्त पालीवाल
भारतीय संस्कृति की इन्द्रधनुषी उड़ान
"संस्कृति-अंक03 "

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