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भारतीय संस्कृति और भाषाई विविधता

भारतीय संस्कृति और भाषाई विविधता

भारत को समझने के लिए भारत की भूमि, सीमाओं और राज्यों को जानना पर्याप्त नहीं है। भारत को समझने के लिए उस संस्कृति को समझना आवश्यक है, जो उसके समाज को भीतर से जोड़ती है। यह संस्कृति किसी एक भाषा, एक वेशभूषा या एक रीति तक सीमित नहीं है। वह अनेक रूपों में दिखाई देती है। फिर भी उसका मूल भाव एक रहता है। भारत में भाषाएँ अनेक हैं। बोलियाँ भी बड़ी संख्या में हैं। लोक परम्पराएँ, पहनावे, खानपान और उत्सवों के रूप भी अलग अलग हैं। इन भिन्नताओं के बीच एक्य सांस्कृतिक भाव बना रहता है। यही भाव भारतीय समाज को जोड़ता है। इसी कारण भाषाई विविधता भारत में विभाजन का कारण नहीं बनती। वह भारतीय संस्कृति को और अधिक समृद्ध करती है।


भारत की विशेषता यह है कि भाषा बदलने पर भी जीवन दृष्टि पूरी तरह नहीं बदलती। उत्तर भारत के किसी गांव में बोली जाने वाली भाषा दक्षिणापथ की भाषा से अलग हो सकती है। फिर भी परिवार के प्रति आदर, बड़ों का सम्मान, अतिथि सत्कार, पर्वों का उत्साह, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और अध्यात्म का भाव दोनों स्थानों पर दिखता है। यही सांस्कृतिक एकत्व भारत की बड़ी शक्ति है।


विविधताओं के बीच: भारतीय संस्कृति 

भाषा व्यक्ति की अभिव्यक्ति का माध्यम है। संस्कृति उसके जीवन का आधार है। व्यक्ति अपनी भाषा में सोचता, बोलता और अनुभव करता है। उसी भाषा में वह परिवार, समाज और परम्परा से जुड़ता है। इसलिए भाषा का सम्मान आवश्यक है। साथ ही यह समझना भी आवश्यक है कि भारत की भाषाएँ अलग अलग होकर भी एक ही सभ्यतागत धारा से जुड़ी हैं। भारतीय संस्कृति की यह दृष्टि हजारों वर्षों में बनी है। इस भूमि पर अनेक जनपद बने। अनेक राजसत्ताएँ आईं और गई। अनेक भाषाओं का विकास हुआ। फिर भी समाज की संस्कृति एक बनी रही। रामायण और महाभारत इसके बड़े उदाहरण हैं।

रामकथा संस्कृत और हिंदी में है। तमिल में भी है। असमिया, उड़िया, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली और अनेक लोकभाषाओं में भी है। कथा की भाषा बदलती है। पात्रों की स्थानीय व्याख्या बदलती है। प्रस्तुति का ढंग बदलता है। फिर भी मर्यादा, धर्म, त्याग, कर्तव्य और लोकमंगल का भाव समान रहता है। यही भारतीयता का मूल स्वरूप है।

महाभारत भी केवल संस्कृत ग्रन्थ के रूप में सीमित नहीं रहा। वह भारत की लोक स्मृति का अंग बन गया। देश के अलग अलग क्षेत्रों में इसकी कथाएँ लोकनाट्य, गीत, कथावाचन, मन्दिर परम्परा और उत्सवों के माध्यम से जीवित हैं। कहीं वह पंडवानी के रूप में दिखता है। कहीं यक्षगान में उसका स्वर मिलता है। कहीं कथकली में उसके प्रसंग सामने आते हैं। कहीं लोकगाथाओं में उसका प्रभाव दिखाई देता है।


महाभारत का लोक आख्यान: पंडवानी

महाभारत भारतीय समाज को धर्म, नीति, संघर्ष और जीवन के कठिन प्रश्नों पर विचार करने की प्रेरणा देता है। भाषा अलग हो सकती है। प्रश्न वही रहते हैं। धर्म क्या है। न्याय क्या है। कर्तव्य क्या है। समाज के प्रति मनुष्य की जिम्मेदारी क्या है। भारतीय भाषाएँ इन्हीं प्रश्नों को अपने अपने ढंग से व्यक्त करती हैं।

भारत की भक्ति परम्परा भी भाषाई विविधता में सांस्कृतिक समन्वय का अच्छा उदाहरण है। तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस की रचना की। सूरदास ने ब्रज में भक्ति का माधुर्य व्यक्त किया। कबीर ने लोकभाषा में निर्गुण भाव को स्वर दिया। नामदेव और तुकाराम ने मराठी में भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया। मीराबाई ने राजस्थानी और ब्रज के भावों में कृष्ण प्रेम को गाया। नरसी मेहता ने गुजराती में भक्ति और करुणा का सन्देश दिया। संत त्यागराज ने तेलुगु में रामभक्ति की परम्परा को विस्तार दिया।


भक्ति काल के प्रमुख संत

इन संतों की भाषाएँ भिन्न थीं। उनका मूल भाव समान था। उन्होंने मनुष्य और ईश्वर के सम्बन्ध को प्रेम, समर्पण और साधना से जोड़ा। इस दृष्टि से भारत की भाषाएँ अलग अलग दीपक की तरह हैं। उनमें जलने वाला प्रकाश एक ही सांस्कृतिक ज्योति से जुड़ा है।

पर्व और त्योहारों में भी यह समन्वय स्पष्ट दिखाई देता है। दीपावली, होली, नवरात्र, मकर संक्रांति, पोंगल, बिहू, ओणम, रथयात्रा, गणेशोत्सव, गुरुपर्व और अनेक क्षेत्रीय उत्सव अपने अपने स्थानीय रूपों में मनाए जाते हैं। इनके नाम अलग हैं। रीति अलग है। भोजन और लोकाचार भी अलग हो सकते हैं। फिर भी इनके भीतर प्रकृति, ऋतुचक्र, परिवार, समाज, देव श्रद्धा और सामूहिक आनन्द का भाव समान रहता है।


भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चैत्र नवरात्र

भारत में पर्व केवल पूजा या अनुष्ठान का विषय नहीं हैं। वे समाज को जोड़ने के अवसर भी हैं। वे परिवार को एकत्र करते हैं। वे पड़ोस और समाज में संवाद बढ़ाते हैं। वे मनुष्य को उसके अतीत, प्रकृति और लोक जीवन से जोड़ते हैं। इसी कारण भारत की विविध भाषाओं में गाए जाने वाले पर्व गीत भी एक बड़े सांस्कृतिक परिवार का अनुभव कराते हैं।

तीर्थयात्रा की परम्परा ने भी भारत को भाषाई सीमाओं से ऊपर उठाकर जोड़ा है। उत्तर का यात्री दक्षिण के मन्दिरों में जाता है। दक्षिण का श्रद्धालु काशी और प्रयाग की यात्रा करता है। पश्चिम का समाज पुरी और कामाख्या से जुड़ता है। पूर्व का भक्त द्वारका और सोमनाथ तक पहुँचता है। यात्राओं में भाषा कभी कठिनाई पैदा करती है। आस्था, सेवा और आत्मीयता उस कठिनाई को कम कर देती है। भारत की तीर्थ परम्परा बताती है कि सांस्कृतिक सम्बन्ध भाषा की सीमाओं से बड़े होते हैं।


भारत में आस्था के केंद्र

तमिल, संस्कृत, हिंदी, मराठी, बंगाली, असमिया, उड़िया, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, गुजराती, पंजाबी और भारत की अन्य भाषाएँ किसी विरोधी खेमे की भाषाएँ नहीं हैं। वे एक ही सांस्कृतिक परिवार की अलग अलग अभिव्यक्तियाँ हैं। प्रत्येक भाषा अपने साथ इतिहास, साहित्य, लोक स्मृति, संगीत और समाज की संवेदना लेकर चलती है। किसी भाषा को श्रेष्ठ और किसी को कमतर मानना भारतीय दृष्टि नहीं है। भारतीय दृष्टि सभी भाषाओं को सम्मान देती है।

समस्या तब पैदा होती है जब भाषा को संवाद के माध्यम के स्थान पर पहचान या अलगाव का साधन बना दिया जाता है। भाषाई अस्मिता स्वाभाविक है। हर व्यक्ति अपनी मातृभाषा से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहता है। उसकी पहली स्मृतियाँ, लोकगीत, कहावतें, पारिवारिक संबोधन और जीवन के संस्कार उसकी भाषा से जुड़े होते हैं। इसलिए मातृभाषा से प्रेम उचित है। इस प्रेम को दूसरी भाषाओं के विरोध में बदलना उचित नहीं है।

भाषाई विविधता को भारतीय संस्कृति के विरोध में देखना भारतीय अनुभव को अधूरा समझना है। भारत में संस्कृति एकरूपता का नाम नहीं है। यहाँ एकता का अर्थ यह नहीं है कि सभी लोग एक जैसा बोलें, पहनें या दिखें। भारत की एकता इस बात में है कि लोग अलग अलग रूपों में रहते हुए भी एक गहरे सांस्कृतिक सम्बन्ध से जुड़े रहते हैं। यही कारण है कि भारत का सांस्कृतिक आदर्श एकरूपता नहीं, एकात्मता है।

भारत का भविष्य भी इसी समन्वय में सुरक्षित है। जब कोई भारतीय अपनी भाषा से प्रेम करते हुए दूसरी भारतीय भाषा का सम्मान करेगा, तब भारतीय समाज में विश्वास और बढ़ेगा। जब वह अपने क्षेत्र-प्रदेश की परम्परा को मानते हुए दूसरे प्रदेश की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति मे भी अपनापन देखेगा, तब राष्ट्रीय एकता और मजबूत होगी। भाषा संवाद का माध्यम है, उसे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता से ऊपर रखना उचित नहीं है।

अन्त में यही कहा जा सकता है कि भारत की भाषाएँ अलग अलग नदियों की तरह हैं। किसी का प्रवाह तेज है। किसी का विस्तार बड़ा है। कोई लोकधारा के रूप में बहती है। कोई साहित्य में व्यक्त होती है। इन सबका सांस्कृतिक प्रवाह एक ही भारतीय संस्कृति रूपी सागर की ओर जाता है। भारत की आत्मा इसी में है, भाषाएँ अनेक हैं लेकिन उनसे होने वाली अभिव्यक्तियाँ एक हैं। हमारी संस्कृति एक है। 

लेख:
वेद प्रकाश सिंह, रायपुर छत्तीसगढ़

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