आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

15 अगस्त: स्वतंत्रता दिवस, स्वच्छंदता दिवस या स्वाधीनता दिवस?

15 अगस्त: स्वतंत्रता दिवस, स्वच्छंदता दिवस या स्वाधीनता दिवस?


देश की आजादी में अपने प्राण न्योछावर करने वाले उन सभी अमर सेनानियों को कोटि-कोटि नमन है। वे जिन कठिन, विकट और अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में रहे और फिर भी देश की रक्षा के लिए सहर्ष अपने प्राणों की बाजी लगा दी, उससे हम भली-भाँति परिचित हैं। यदि नहीं हैं, तो हमें अपने गौरवशाली इतिहास को अवश्य जानना चाहिए। अनेक ऐसे महान वीर स्वतंत्रता सेनानी हुए, जिनके जीवन में कदम-कदम पर परिस्थितियाँ और संघर्ष आए, किंतु उन्होंने सदैव मातृभूमि को ही सर्वोपरि रखा। उन्हीं के अभूतपूर्व त्याग, तपस्या और परिणामस्वरुप आज हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस ले रहे हैं और स्वाधीनता का पावन पर्व मना रहे हैं।


15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस का नाम सुनते ही हमारे मन-मस्तिष्क में स्वाभाविक रूप से यही भाव आता है कि हम कभी अंग्रेजों के गुलाम थे और 1947 में आज ही के दिन आजाद हुए थे। इसीलिए पूरे भारतवर्ष में यह पर्व अपार उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। परंतु जब हम आजादी, स्वतंत्रता और स्वाधीनता जैसे शब्दों पर गहराई से दृष्टिपात करते हैं, तब हमें इनके भीतर छिपा वास्तविक और सही अर्थ समझ आता है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपने प्रसिद्ध निबंध 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' में इन शब्दों के अर्थ पर गहन चिंतन किया है। वे लिखते हैं कि “15 अगस्त को जब अंग्रेजी भाषा के पत्र 'इंडिपेंडेंस डे' (Independence Day) की घोषणा कर रहे थे, उसी समय हमारी देशी भाषाओं के पत्र इसे 'स्वाधीनता दिवस' की चर्चा कर रहे थे। 'इंडिपेंडेंस' का सीधा अर्थ अनधीनता या किसी की अधीनता का अभाव मात्र है, पर 'स्वाधीनता' शब्द का अर्थ है- अपने ही अधीन रहना। यदि इसे अंग्रेजी में कहना हो तो केवल 'इंडिपेंडेंस' नहीं, बल्कि 'सेल्फ-इंडिपेंडेंस' कह सकते हैं।


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी

मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि इतने दिनों तक अंग्रेजी की अनुवर्तिता करने के बाद भी भारतवर्ष 'इंडिपेंडेंस' का अनुवाद 'अनधीनता' क्यों नहीं कह सका? उसने अपनी आजादी के जितने भी नामकरण किए- स्वतंत्रता, स्वराज, स्वाधीनता- उन सब में 'स्व' (स्वयं) का बंधन अवश्य रखा। यह क्या संयोग की बात है या हमारी समूची परंपरा ही अनजान में हमारी भाषा के द्वारा प्रकट होती रही है? मुझे प्राणी विज्ञान की बात फिर याद आती है; सहजात वृत्तियाँ उन अज्ञात स्मृतियों का ही नाम हैं जो हमारी चेतना में संचित रहती हैं। क्या इसी सहज वृत्ति के वश होकर हमारी भाषा में 'स्व' शब्द का समावेश किया गया?

भारतीय चित्त जो आज भी आजादी को 'अनधीनता' के रूप में न सोचकर 'स्वाधीनता' के रूप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का ही फल है। वह 'स्व' के बंधन को आसानी से नहीं छोड़ सकता। अपने आप पर, अपने ही द्वारा लगाया हुआ यह नैतिक बंधन ही हमारी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।”

प्रश्न यह उठता है कि स्वाधीनता और स्वतंत्रता की इतनी क्या जरूरत थी? बंधन में या गुलामी में कैसा अनुभव होता है? कैसा रहा होगा वह समय? निश्चित ही बहुत असहाय और कष्टकारी अनुभव होता होगा। यदि इसे शास्त्रीय रूप से इसका उत्तर जानना चाहें तो तुलसीदास जी की एक चौपाई से जान सकते हैं: 

“पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं”।

अर्थात, दूसरे के अधीन रहने वाले को सपने में भी सुख नहीं मिलता। तात्पर्य यह है कि किसी के अधीन रहने से कोई व्यक्ति या राष्ट्र सुखी नहीं हो सकता। सुख की परिभाषा मैंने जो समझी, उसे सहज रूप में इस प्रकार कह सकते हैं- अपनी कामनाओं और इच्छाओं की पूर्ति होना ही सुख है; मतलब जैसा हम चाहते हैं वैसा ही हो जाए तो सुखी, और न हो तो दुखी।


दिल्ली, 15 अगस्त 1947 का दृश्य

और हमारे मन का सहज स्वभाव है कि मैं अपने हिसाब से चलूँ, किसी का कोई बंधन न रहे, कोई मुझे रोक-टोक न करे। हम सबने अनुभव किया होगा  “ट्रैफिक सिग्नल पर एक-दो मिनट की प्रतीक्षा भी हमारे लिए असह्य हो जाती है। भले ही हम घूमने के लिए जा रहे हों, समय व्यतीत करने के लिए ही जा रहे हों”, लेकिन जब हम बंधन में रहते हैं तो उस समय हमारा मन बेचैन होने लगता है और हम पीड़ा का अनुभव करने लगते हैं; क्योंकि हमें बंधन में रहना पसंद नहीं है। तो सोचकर देखिए, जो हर समय दूसरों के शासन में रहे और अपने मन का कुछ न कर पाए, तो उसे कितनी पीड़ा होती होगी! इसीलिए व्यक्ति और राष्ट्र आजाद, स्वतंत्र व स्वाधीन होना चाहता है।

यहाँ हमें चिंतन करना होगा कि हमें आजादी मिले आज 79 वर्ष हो गए। हम कितना स्वतंत्र हुए, स्वाधीन हुए या स्वच्छंद हुए? इस 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस को कैसे मनाते हैं, कैसे मनाना चाहिए, कैसे देखते हैं और कैसे देखना चाहिए? हम आजाद देश के आजाद नागरिक हैं, हम स्वतंत्र हैं; इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हमें जो अच्छा लगेगा हम वही करेंगे, नीतियों व मर्यादाओं का उल्लंघन करेंगे और हमारे ऊपर किसी का बंधन नहीं है।

गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में: “परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥”

मतलब ऐसा न हो कि हम यह सोचें कि हमारे ऊपर कोई नहीं है, हम परम स्वतंत्र हैं और हमारे मन को जो भाएगा हम वही करेंगे। इसे हम स्वतंत्रता कदापि नहीं कह सकते; हाँ, चाहे तो 'स्वच्छंदता' जरूर कह सकते हैं।


आत्म-अनुशासन

अब प्रश्न उठता है- क्या बंधन इतना ही बुरा होता है? क्या सभी बंधन बुरे होते हैं? श्रीमद्भगवद्गीता में बंधनों की चर्चा की गई है। सात्विक बंधन सुख से बाँधता है, राजसिक बंधन दुख और कर्मों से बाँधता है। लेकिन मुझे लगता है कि सांसारिक दुख के राजसिक बंधन से सात्विक बंधन श्रेष्ठ है। लोक-व्यवहार में समाज व राष्ट्र के लिए सात्विक बंधन श्रेष्ठ है।

इस सात्विक बंधन को हम विवाह जैसे मानवीय और सामाजिक पवित्र रिश्तों में देखते हैं, जहाँ दो अनजान व्यक्ति सात जन्मों के अटूट बंधन में बंधने को सहर्ष तैयार हो जाते हैं। यद्यपि दार्शनिक दृष्टि से हर बंधन दुःख का कारण माना गया है, परंतु सामाजिक और राष्ट्रीय हित में यह आत्म-अनुशासन (अथ योगानुशासनम्) अनिवार्य है; अन्यथा समाज में स्वच्छंदता और पशुता का प्रसार निश्चित है।

"परंतु मानव चेतना का परम लक्ष्य इन बंधनों में बंधना नहीं, बल्कि इनके पार जाना है, क्योंकि अंतिम साध्य तो पूर्ण स्वाधीनता और मोक्ष ही है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने हमारी इसी अज्ञानता पर कहा है “बंध्यों कीर मरकट की नाईं”। जिस प्रकार तोता और बंदर अपनी ही बंद मुट्ठी के कारण कैद रहते हैं, वैसे ही मनुष्य भी सांसारिक मोह की मुट्ठी खोलने को तैयार नहीं है। सात्विक बंधन समाज को पशुता से बचाने की एक आवश्यक सीढ़ी मात्र हैं, मंजिल नहीं। आत्मा की वास्तविक यात्रा इस सीढ़ी पर रुकने के लिए नहीं, बल्कि इससे ऊपर उठकर पूर्ण स्वतंत्र और मुक्त होने के लिए है।"

पूरे संसार में सभी बंधन में हैं, ऐसा हमें दृष्टिगत होता है। यहाँ तक कि चांद, सूरज आदि भी बंधन में हैं; सबके आने-जाने का एक निश्चित समय तय है, लगता है वे भी कहीं न कहीं बंधन में हैं। लेकिन मुझे लगता है यह पराधीनता का बंधन नहीं है, यह 'स्व-बंधन' है- जिसकी चर्चा हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने पहले की है। अपने आपके द्वारा अपने आप पर लगाया गया बंधन ही वास्तव में सच्ची स्वाधीनता है। जैसे इसके समानार्थी शब्द 'स्वतंत्रता' और 'स्वराज' में भी 'स्व' का बंधन है; किसी दूसरे के बने बंधन में नहीं, स्वयं के बनाए नियमों के बंधन में बँधना। अगर हम स्वयं के बनाए हुए नियमों में बँधे हैं, तो हम स्वाधीन हैं। अब हमें यह विचार करना होगा कि क्या हम सचमुच स्वतंत्र और स्वाधीन हैं, या स्वाधीनता के नाम पर केवल स्वच्छंदता का ही अनुकरण कर रहे हैं?


प्रकृति में सूर्य और चन्द्रमा भी एक निश्चित व्यवस्था और अनुशासन के अनुसार गतिशील हैं।

इसकी भी जाँच हम बहुत सहज और सरल तरीके से कर सकते हैं। हम कितने स्वाधीन हैं, इसकी जाँच हम स्वयं से प्रश्न करके कर सकते हैं—"मैं किसके-किसके अधीन हूँ?" किसी भी व्यक्ति, वस्तु या स्थान की अधीनता का अर्थ है कि उसकी कमी मेरी मनःस्थिति को प्रभावित करती है और उसके अभाव में मैं सुखी या दुखी अनुभव करता हूँ, तो मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि मैं उसके अधीन हूँ।

हालांकि आज हमें किसी बाहरी व्यक्ति विशेष की आज्ञा मानने के लिए बाध्य नहीं किया जा रहा है, पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम पूर्णतः स्वाधीन हैं। आज हम स्वयं अपने ऊपर या अपने आसपास घटित घटनाओं को ध्यान से देखें, तो पता चलेगा कि व्यक्ति किस तरह नशे के गुलाम हैं, एक भी दिन न मिले तो उनकी स्थिति कैसी हो जाती है! कोई पद व प्रतिष्ठा का गुलाम है, उसे प्राप्त करने के लिए जघन्य अपराध करने में भी उनका मन नहीं हिचकिचाता। कहीं प्रशंसा के गुलाम तो हम नहीं हैं? हम देखते हैं कि कैसे एक प्रेमी-प्रेमिका उनके एक संदेश के लिए छटपटाते रहते हैं; क्या यह गुलामी नहीं है? क्या यह बंधन नहीं है? निश्चित रूप से यह बंधन ही है।

इसीलिए हमारी देशी भाषा में 15 अगस्त को केवल 'इंडिपेंडेंस' या 'अनधीनता' न कहकर 'स्वाधीनता' कहा गया। स्वाधीनता में वह भाव सहज ही सन्निहित है, जो हमारे सनातन वैदिक आर्य धर्म का प्राण तत्व और मूल तत्व है। स्वाधीनता में वह मोक्ष का परम लक्ष्य छिपा हुआ है। यह हमारी भाषा की वह सहज वृत्ति है जो प्राणी विज्ञान के अनुसार पूर्व स्मृतियों की वजह से हमारे भीतर आई है।

अतः यह 15 अगस्त केवल स्थूल, भौतिक व सांसारिक सफलता तक सीमित न रहकर, आध्यात्मिक उन्नति और बंधन से मोक्ष तक के मूल सिद्धांत को चरितार्थ करने वाला है- यही इस 'स्वाधीनता' शब्द का वास्तविक अर्थ है।

जय हिन्द! जय भारत!

लेख-
श्री रमाशंकर सिंह ठाकुर,

Follow us on social media and share!