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पर्व विशेष : | तदनुसार 22 अप्रैल 2026

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“ईन्द पर्वः झारखण्ड का विशिष्ट सांस्कृतिक उत्सव”

“ईन्द पर्वः झारखण्ड का विशिष्ट सांस्कृतिक उत्सव”

झारखण्ड में प्रचलित विभिन्न सास्कृतिक धार्मिक उत्सवों में ईन्द पर्व का महत्वपूर्ण पथान है। यह पर्व इस क्षेत्र के विभिन्न स्थानों में प्रत्येक वर्ष एक निश्चित तिथि को मनाया जाता है जिसमें विभिन्न जाति और वर्ग के सदस्य समान रूप से भाग लेते हैं। यह पर्व विभिन्न समुदायों की सहभागिता एवं सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। नागवंशी शासन काल के दौरान इसका आयोजन अत्यंत भव्य तरीके से किया जाता था लेकिन विभिन्न प्रभावों के कारण अब इसके स्वरूप में काफी बदलाव आ गया है।

ईन्द पर्व मुख्य रूप से भादो ( अगस्त - सितम्बर) में मनाया जाता है लेकिन इसकी तिथि विभिन्न स्थानों में एक सामान नहीं होती है। सामान्यतः यह पर्व करमा (प्रसिद्ध जनजातीय उत्सव) के ठीक दूसरे दिन अर्थात भादो द्वादसी को होता है इसलिए इसे ईन्द करम भी कहते हैं।  इस पर्व का आयोजन विभिन्न स्थानों में अलग-अलग तिथि को किया जाता है। परम्परानुसार इसके बाद भी कई स्थानों में ईन्द मनाया जाता है लेकिन किसी भी स्थिति में इसका समय दसई (दशहरा) से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

इस प्रकार आश्विन (सितम्बर अक्तूबर) में दशहरा के अवसर पर आयोजित किये जाने वाले इस उत्सव को "दसई ईन्द" कहते हैं। नियमतः प्रत्येक स्थान पर निर्धारित तिथि को मनाये जाने वाले इस पर्व की तिथि में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता लेकिन विशेष परिस्थिति यथा गांव के प्रमुख संरक्षक के बीमार होने अथवा उनकी मृत्यु हो जाने पर तिथि बदलने का प्रावधान है। इसके साथ-साथ कुछ स्थानों पर विशेष अवसर पर ईन्द मनाने का भी प्रचलन है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :

ईन्द पर्व का इतिहास लगभग दो हजार वर्षों का है। ऐसी मान्यता है कि सर्वप्रथम इसका आयोजन नागवंशी शासन के संस्थापक राजा फणिमुकुट राय की स्मृति में किया गया था। उस समय तत्कालीन शासक की राजधानी रांची (वर्तमान झारखण्ड की राजधानी) से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुतियाम्बेगढ़ में थी।

इस पर्व के अवसर पर यहां प्रतिवर्ष एक साथ दो ईन्द, दो राजाओं कमशः फणिमुकुट राय तथा मदरा मुंडा (प्रचलित धारणा के अनुसार राजा मदरा मुंडा ने ही राजा फणिमुकुट राय को राजग‌द्दी सौंपी थी) के सम्मान में उठाया जाता था। डाल्टन (1872) के अनुसार इसमें से फणिमुकुट के सम्मान में लगाया गया ईन्द तब तक नहीं हटाया जाता था जब तक मदरा मुंडा के नाम पर वहीं ईन्द गड़ा हो।

ऐसा माना जाता है कि सुतियाम्बेगढ़ से ही इस पर्व का विस्तार क्रमश: अन्य क्षेत्रों में हुआ। इसी तरह नागवंशी शासक के वंशजों ने भी इसे अनेक स्थानों में प्रारम्भ करवाया। इसके कई उदाहरण है। नागवंशी शासकों के सतानवी पीढ़ी के महाराजा देवनाथ साहदेव के भाई कुंवर हरिनाथ साहदेव तत्कालीन राजधानी पालकोट से जाकर जरियागढ़ में बसे, जहां उन्होंने इस पर्व को प्रारम्भ करवाया। ऐसे स्थानों में राजा द्वारा इसके लिए आवश्यक सहायता उपलब्ध कराये जाने के कारण इसे "राजा ईन्द" भी कहा गया है।

इस परम्परा का अनुपालन करते हुए दूसरे राजाओं ने भी अपने-अपने राज्य में इस पर्व का विस्तार किया जिसके फलस्वरूप सरायकेला, घाटशीला जैसे झारखण्ड क्षेत्र के साथ-साथ जशपुर (छत्तीसगढ) चिलकी गढ़, लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) में इसका आयोजन प्रारम्भ हो गया। इस प्रकार यह ईन्द पर्व मात्र एक ऐतिहासिक घटना न रहकर राजवंश के गौरव का प्रतीक बन गया, जो कई स्थानों में अब तक अनवरत रूप से जारी है।

संरचनात्मक विवरण :

प्रचलित मान्यता के अनुसार इस पर्व के आयोजन के अवसर पर दो चौड़े पत्थर अथवा लकड़ी के स्तम्भों की मदद से आठ हाथ लम्बे शाल वृक्ष के एक तने को धरातल के लम्बवत् सीधा खड़ा किया जाता है जिसे ईन्द खूंटा कहा जाता है। डाल्टन (1872) ने इसकी लम्बाई चालीस फीट होने का जिक्र किया है लेकिन अब यह काफी घट गई हैं।

 

 


ईन्द की आकृति का एक रेखा चित्र

इस खूंटे के शीर्ष भाग में बांस तथा सफेद कपड़े से निर्मित एक छाते की आकृति होती है जिसे "टोपर" कहा जाता है। इस पूरी संरचना को गांव के समीप जिस ऊंचे स्थान में स्थापित किया जाता है, उसे ईन्द टांड या ईन्द पीड़ी कहा जाता है। यह पर्व झारखण्ड क्षेत्र के कई गांवों में मनाया जाता है जिनमें पालकोट, लचड़ागढ, बधिमा, चंडाली, जरियागढ़, सांदगांव, जशपुर तथा सुतियाम्बे आदि मुख्य हैं। इसके अलावा तामड़ा, जलडेगा, बोलबा मुडमा तथा रघुनाथपुर में भी यह प्रचलित है।

वर्तमान में विभिन्न कारणों से कई स्थानों में इस पर्व का अस्तित्व समाप्त हो गया है। ईन्द पर्व का आयोजन एक निश्चित स्थान में प्रतिवर्ष एक निर्धारित तिथि पर स्वतंत्र रूप से होता है जिसमें ईन्द खूंटे के ऊपर "टोपर" लगा कर इसे धरातल के क्षितिज में खड़ा किया जाता है। इसके विपरीत कहीं-कहीं इसे एक श्रृंखला के रूप में मनाये जाने का भी प्रचलन है जिसमें एक ही "टोपर" का उपयोग कमशः प्रत्येक स्थान में होता है।

यह' परम्परा पालकोट, बधिमा, लचड़ागढ़ तथा मुड़मा में प्रचलित थी लेकिन अब यह व्यवस्था प्रभावी नहीं है। इसी तरह "झिकिरमा" नामक गांव में एक विशिष्ट प्रथा थी जहां राजा के आगमन पर गांववासियों द्वारा स्वागत ईन्द पर्व का आयोजन किया जाता था लेकिन अब इसकी स्मृति मात्र ही शेष है।

मान्यता :

सामान्यतः "ईन्द" शब्द को "इन्द्र" का अपभ्रंश तथा ईन्द पर्व का तात्पर्य इन्द्रदेव की उपासना से माना जाता है। इन्द्र, वर्षा के अधिष्ठाता (देव) है तथा उनकी कृपा से ही जगत में उत्तम वर्षा होती है, ऐसी मान्यता है। अतः इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिए इस पर्व का आयोजन किया जाता है जिससे अच्छी वर्षा तथा फसल मिल सके। एक अन्य धारणा के अनुसार वस्तुतः ईन्द शब्द मुंडारी भाषा के "इंदी" का अपभ्रंश है जिसका अर्थ एक पर्व होता है।

इस पर्व के अवसर पर धरातल के ऊपर शीर्ष भाग में टोपर (छाता) की आकृति बनाना राजगद्दी के अवसर पर सिर पर पगड़ी रखने के प्रतीक चिह्न की तरह लगता है। अतः संभव है प्रथम नागवंशी राजा फणिमुकुट राय के राजतिलक के अवसर पर मुकुट (पगड़ी) धारण करने की इसी घटना को विरस्मरणीय बनाये रखने के लिए इस पर्व का आयोजन प्रारम्भ हुआ जो परम्परागत रूप से अब तक कायम है। डॉ० शरद चन्द्र राय (1912) ने भी इसी तथ्य का समर्थन करते हुए इसे प्रथम नागवंशी राजा की स्मृति में मनाये जाने वाला पर्व कहा है।

सहभागिता :

ईन्द पर्व झारखंड का एक ऐसा उत्सव है जिसमें विभिन्न समुदायों के सदस्य समान रूप से भाग लेते हैं। इसके बावजूद मुंडा जनजाति के सदस्यों का इस पर्व के प्रति विशेष रूझान देखने को मिलता है। संभवतः नागवंशी शासकों के साथ इनकी घनिष्ठता के कारण ऐसा हुआ हो। मुंडा के साथ-साथ उरांव जनजाति के लोगों में भी इस पर्व के प्रति काफी उत्साह होता है, जो इसके आयोजन में सकिय भूमिका निभाते हैं। कई उरांव लोक गीतों में भी ईन्द पर्व का उल्लेख है, यथा-

"ईन्दे बेचा कालके भाई, दसई बेचा अंबके माला हो" अर्थात ईन्द खेलने तुम जाओगे, लेकिन दसई खेलने मत जाना।

ईन्द पर्व में लोगों की सहभागिता के साथ-साथ इस परम्परा का विधिवत पालन होता रहे, इसके लिए तत्कालीन नागवंशी शासकों ने अपनी राजधानी सुतियाम्बेगढ़ में इससे जुड़े विभिन्न कार्यों का बंटवारा किया। इस व्यवस्था के अन्तर्गत टोपर निर्माण का कार्य एक घासी परिवार को, टोपर में लगने वाले कपड़े की सिलाई का काम एक मुस्लिम परिवार को, फूल पत्ती लाने के लिए एक माली तथा धार्मिक कृत्यों के लिए ब्राह्मण तथा पाहन को नियुक्त किया गया।

इसके साथ-साथ टोपर बनाने का स्थान, इसमें प्रयुक्त लकड़ी का चुनाव, टोपर को ईन्द टांड लाने वाले गांव, सबसे पहले ईन्द टांड में पहुंचने वाले गांव तथा इस उत्सव में भाग लेने वाले प्रमुख गांव के निर्धारण के लिए विस्तृत व्यवस्था की गई ताकि इसका संचालन सुगमतापूर्वक सम्पन्न हो सके। परम्परागत रूप से निर्धारित यह व्यवस्था काफी उत्तार चढ़ाव के बाद भी अब तक कायम है।

विवरण :

इस उत्सव के प्रारम्भ होने के पूर्व इसके लिए आवश्यक सामग्रियों जैसे ईन्द खूंटा के लिए लकड़ी, टोपर के लिए बांस, कपड़ा तथा अन्य वस्तुओं की व्यवस्था की जाती है। पूर्व में तत्कालीन नागवंशी राजाओं द्वारा ही इन सभी वस्तुओं की आपूर्ति कर दी जाती थी लेकिन अब सार्वजनिक चंदा तथा सामूहिक सहयोग द्वारा इसका संचालन किया जाता है। इसमें सुतियाम्बेगढ़ ईन्द मेला समिति के सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर भी व्यापक तैयारी की जाती है ताकि कि इस कार्यक्रम के दौरान किसी प्रकार का कोई व्यवधान न हो।
 

सुतियाम्बेगढ़ में आयोजित इस पर्व की निर्धारित तिथि को पुसु गांव के सदस्य कोटवार के साथ मिल कर टोपर युक्त खूंटा को ईन्द टांड तक लाते हैं। यहां पहुंचने के पहले इस संरचना को रास्ते में अवस्थित सूर्य मण्डप (प्रसिद्ध धार्मिक स्थल) के चारों ओर तीन बार घुमाया जाता है। इस स्थल के संबंध में प्रचलित कथा के अनुसार राजा मदरा मुंडा ने इसी स्थान पर देवी-देवताओं के समक्ष फणिमुकुट राय को राजगद्दी सौंपी थी) टोपर के ईन्द टांड पहुंचने के बाद वहां शामिल गांव कमशः ईचापीडी, नवाडी, पुसु, कुम्हरिया, नगड़ी कोकदीरो, मरवा तथा कोनकी आदि के सदस्यगण परम्परागत वेशभूषा में सामूहिक नृत्य करते हुए प्रवेश करते हैं।

यहां इन गांवों का समूह बारी-बारी से ईन्द खूंटा की तीन बार परिक्रमा कर अपने अपने खोड़हा में नाच गान करता है, जिसे देखने के लिए काफी संख्या में ग्रामवासी जमा होते हैं। सभी प्रमुख गांवों के सदस्यों के पहुँच जाने के बाद गांव के प्रतीक चिह्न के समक्ष ब्राह्मण तथा पाहन कमशः ईन्द खूंटा की पूजा अर्चना करते हैं।

इस अवसर पर टोपर उठाने के लिए प्रयुक्त रस्सी को नगड़ी तथा ईचापीडी के सदस्यगण परस्पर मिलकर टोपर के समीप लाते हैं जहाँ धार्मिक कृत्यों की समाप्ति पर पाहन की अनुमति से वहां एकत्र सभी लोक मिलकर ईन्द खुंटा को ऊपर उठाते हैं जिसे छाता उठाना भी कहते हैं। सामान्यतः यह समारोह दोपहर से शुरू होकर शाम तक समाप्त हो जाता है। ईन्द टोपर उठाने के एकाथ दिन बाद ही इसे जमीन पर उतार दिया जाता है।

शरद चन्द्र राय (1912) के अनुसार पूर्व में ईन्द उठाने के सात दिनों बाद ही इसे उतारा जाता था ईन्द उठने के समय पाहन द्वारा बकरे की बलि तथा अंतिम दिन अर्थात ईन्द उतारते समय तपावन (हड़िया) ईष्ट देव (चंडी बोगा) को अर्पित किया जाता था। वर्तमान में बलि देने की प्रथा खत्म हो गयी है। इस प्रकार ईन्द टोपर को उतारना पर्व के समापन का सूचक है। पुनः अगले वर्ष इसी प्रकिया को दोहराया जाता है।

बदलाव :

ईन्द पर्व व्यवस्था में समय के साथ काफी बदलाव आ गया है। पूर्व में सभी कार्यक्रम भव्य रूप से आयोजित होते थे लेकिन अब इसकी भव्यता में कमी के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियां भी अत्यंत संक्षिप्त हो गई हैं। इसी तरह पहले इस अवसर पर सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता था जिसमें निकटवर्ती गांवों के सदस्य भी शामिल होते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। इतना ही नहीं ईन्द टांड की प्रकृति में भी काफी बदलाव आया है।

सामान्यतः इस भूमि का प्रयोग सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों के लिए होता है लेकिन अनेक स्थानों में अनाधिकृत निर्माण के कारण इसका क्षेत्रफल सीमित हो गया है जबकि कुछ स्थानों में इसका अस्तित्व ही समाप्त हो गया है, वहीं अब भी ऐसी कुछ जगह शेष हैं जहाँ ईन्द टांड स्थल पूर्णतः सुरक्षित है जिसमें प्रतिवर्ष इस पर्व का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर काफी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं।

अत्यधिक भीड़-भाड़ के बावजूद ईन्द पर्व का स्वरूप मेला जैसा नहीं लगता क्योंकि यहां न किसी प्रकार की दुकानें लगती हैं और न ही अन्य सामानों की खरीद बिक्री ही की जाती है। इस तरह इस पर्व का रूप शुद्ध सांस्कृतिक होता है जिसमें भाग लेने वाले सदस्यगण अपने परम्परागत वेशभूषा में गांव के प्रतीक चिह्नों के साथ यहां एकत्र होकर सामूहिक नृत्य एवं गीत में शामिल होते हैं।

"इनसाइक्लोपीडिया मुन्डारिका" में ईन्द पर्व का उल्लेख करते हुए इसे मूलरूप से हिन्दू पर्व कहा गया है जिसे मुण्डा समुदाय ने कुछ गांवों में प्रारम्भ किया जिसमें धार्मिक पूजन तथा बलि के बाद विभिन्न तरह के सामूहिक नृत्य आयोजित किए जाते है। इस पर्व का मौलिक रूप अब भी वैसा ही है जिसमें सांस्कृतिक-धार्मिक गतिविधियों की प्रधानता रहती है लेकिन सुतियाम्बे तथा कई अन्य स्थानों में भी दुकान पंडाल लगाना तथा अन्य आर्थिक गतिविधियां प्रारम्भ हो गई है जो इस पर्व में आ रहे बदलाव का संकेत है।

उपसंहार :

वस्तुत ईन्द पर्व एक जनजातीय सांस्कृतिक उत्सव है जिसमें विभिन्न समुदायों की सहभागिता परस्पर सामाजिक सौहार्द एवं एकता का प्रतीक है। इसका सामाजिक महत्त्व भी कम नहीं है। अनेक स्थानों में यह परम्परा रही है कि ईन्द टोपर उठाने के बाद गांव के सदस्य वापस घर लौट कर नावाखानी अर्थात नई फसल (मडुवा, गोंदली) का अन्न अवश्य खाते हैं। मडुवा को "इन्दी कोदे" कहना इसी सबंध को दर्शाता है। झारखण्ड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का यह पर्व वर्तमान में संक्रमण काल से गुजर रहा है।

नागवंशी शासन के दौरान राजा अथवा उनके वंशजो का झारखण्ड में व्यापक प्रभाव था तथा वे आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध थे, उस समय इस पर्व के आयोजन हेतु इनके द्वारा पर्याप्त आर्थिक सहयोग दिया जाता था। लेकिन जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के साथ ही इस पर्व की व्यवस्था में व्यावधान आ गया। नई व्यवस्था में तत्कालीन जमींदारों से अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के कारण अनेक स्थानों में जहां इस आयोजन के लिए पर्याप्त धन तथा सहयोग नहीं मिल पाया, वहां इस पर्व का आयोजन बंद हो गया जबकि कुछ स्थानों में सामाजिक संगठनों द्वारा इसके मौलिक स्वरूप को बचाने का भरसक प्रयास किया जा रहा है ताकि यह परम्परा पूरी तरह लुप्त न हो जाये।

संदर्भ सूची

डाल्टन, ई.टी.

1872 डिसकिपटव इथनोलोजी ऑफ बंगाल, ऑफिस ऑफ द सुपरिटेन्डेन्ट ऑफ गवर्नमेंट प्रिटिंग, कलकत्ता।

हॉफमन, एस.जे. 1954 इनसाक्लोपीडिया मुण्डारिका, सुपरिटेन्डेन्ट, गवर्नमैट प्रिटिंग, पटना, बिहार।

राय, एस.सी.

1912 द मुण्डा एण्ड द कंट्री, मेन इन इंडिया ऑफिस, रांची।
 

लेख:
-डॉ० सुधांशु शेखर मिश्र

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