बैगा समुदाय में गोदना का महत्व
January 20, 2026
संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

"गोदना कला" छत्तीसगढ़ राज्य के पश्चिमी अंचल कबीरधाम, बिलासपुर, राजनांदगांव तथा मुंगेली क्षेत्र में निवास करने वाले बैगा समुदाय की पहचान बन चुका है। बैगा समुदाय में गोदना को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित है, जो इसे मोक्ष की मान्यता तक ले जाती है। लेकिन आधुनिकता के प्रभाव में विशेषकर युवा पीढ़ी गोदना से दूर होती जा रही है। इसके कारण सदियों से चली आ रही यह परंपरा धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।

बैगा युवती
बैगा समाज में गोदना की शुरुआत सामान्यतः आठ से दस वर्ष की आयु में बालिकाओं के माथे पर गोदना करवाने से होती है। विवाह के बाद शरीर के अन्य अंगों में गोदना कराया जाता है। बैगा समुदाय में गोदना को केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परंपरा माना जाता है।
12 से 20 वर्ष की आयु की बैगा बालिकाओं के लिए गोदना अनिवार्य प्रथा रही है। वर्तमान समय में यह परंपरा बैगा समाज के प्रमुखों के लिए चिंता का विषय बन गई है। आज की युवा पीढ़ी गोदना संस्कृति को भूलती जा रही है, जबकि समाज की पहचान इसी से जुड़ी है।

माथे पर गोदना के साथ बैगा युवती
गोदना संबंधित मान्यताएं
बैगा समाज में यह मान्यता है कि गोदना के दौरान जो बालिका पीड़ा सहन कर लेती है, उसे जीवन की जिम्मेदारियाँ उठाने में सक्षम माना जाता है। गोदना शरीर के विभिन्न अंगों में कराया जाता है और इसे आजीवन संगिनी गहना माना जाता है। विश्वास है कि स्वर्ग में भी पहचान गोदना से ही होती है।
यदि कोई बैगा महिला गोदना नहीं कराती, तो मृत्यु के पश्चात उसे सब्बल से गोदना कराना पड़ता है। इस कारण गोदना को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। गोदना बैगा समाज की सामूहिक पहचान का प्रतीक है।
मान्यताओं के अनुसार, पूर्वकाल में बैगा बालिकाएँ अत्यंत सुंदर और गौरवर्णी हुआ करती थीं। बाहरी लोग उन्हें जबरन उठा ले जाते और उनका धर्मभ्रष्ट करते थे। इससे बचाव हेतु समाज प्रमुखों ने गोदना प्रथा को प्रचलन में लाया।

पारंपरिक आभूषण के साथ बैगा महिला
पिछले कुछ दशकों में गोदना को लेकर सामाजिक दृष्टि में बदलाव आया हो, किंतु यह बैगा समुदाय की अमूल्य धरोहर है। बैगा महिलाओं के लिए गोदना आभूषण के समान है। इसे सहेजकर रखना समाज के अस्तित्व से जुड़ा विषय है।
आधुनिक समय में गोदना ने टैटू का रूप ले लिया है। इसे पछेना या अंकन भी कहा जाता है। गोदना लोक-संस्कृति की एक सजीव कला है, जो जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है।
बैगा समुदाय में यह विश्वास भी है कि गोदना के बिना मोक्ष संभव नहीं। मनुष्य स्वभावतः अपने शरीर को सजाने-संवारने की प्रवृत्ति रखता है। गोदना इसी प्रवृत्ति की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है।

गोदना चित्रकारी
गोदना चित्रकारी की परंपरा
बैगा चक क्षेत्र में आठ वर्ष की बालिकाओं के मस्तिष्क पर पहली गोदना की जाती है। यह गोदना प्रायः बुआ या मामी द्वारा की जाती है। यह आयोजन गीत-संगीत और उत्सव के वातावरण में घर पर संपन्न होता है।
बारह वर्ष की आयु के बाद का गोदना घर के बाहर बीहड़ जंगलों में कराया जाता है। यह प्रक्रिया अधिक गोपनीय और परंपरागत मानी जाती है। इसमें विशेष धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है।
कबीरधाम जिले के बोड़ला विकासखंड क्षेत्र में, जहाँ हाफ नदी का उद्गम स्थल है, वहाँ निवास करने वाली बादी जाति की महिलाएँ गोदना गोदने का कार्य करती हैं। इनके औजार, सुई और रंग पूरी तरह परंपरागत होते हैं। छत्तीसगढ़ में देवार जाति की महिलाएँ भी यह कार्य करती हैं।

अपने पीठ पर गोदना के चिन्ह बनवाती युवती
गोदना चित्रकारी में सौंदर्य के साथ धार्मिक आस्था की भी अभिव्यक्ति होती है। इसमें बिंदु, त्रिकोण, सर्प, बिच्छू, सूर्य, चंद्रमा, फूल-पत्ते तथा आराध्य देवी-देवताओं के चित्र बनाए जाते हैं। ये चिन्ह बैगा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान दर्शाते हैं।
गोदना केवल स्थायी अलंकरण नहीं, बल्कि जातीय पहचान और सुरक्षा का माध्यम भी है। इसे रोग-निवारण, विषैले कीड़ों के दंश और नकारात्मक शक्तियों से बचाव से जोड़ा जाता है। बैगा समाज में गोदना को रक्षा-कवच के रूप में देखा जाता है।
मान्यता है कि गोदना को कोई चुरा नहीं सकता और न ही इससे कोई हिस्सा छीना जा सकता है। टोना-टोटका और भूत-प्रेत से रक्षा के लिए भी इसे आवश्यक माना जाता है। विवाह से पूर्व मनचाहे जीवनसाथी की कामना हेतु भी गोदना कराया जाता है।
गोदना के लिए विशेष वृक्ष (भेलवा) से निकाले गए रस को जड़ी-बूटियों के साथ पकाया जाता है। यह रस बादी जाति की महिलाएँ तैयार करती हैं। इसी से गोदना की आकृति बनाई जाती है।

भेलवा वृक्ष (Semecarpus anacardium)
जिस अंग पर गोदना किया जाता है, उस पर पहले लेप लगाया जाता है। इसके बाद सुई को काजल में डुबोकर बार-बार चुभाकर आकृति उकेरी जाती है। गोदना के बाद बन-हल्दी और गोबर का लेप 24 घंटे तक लगाया जाता है।
गोदना के बदले रुपये-पैसे के साथ गाय, बकरी या भैंस भी दी जाती है। गोदना के पश्चात कई बार बैगिनों को ज्वर हो जाता है। इसे जड़ी-बूटियों द्वारा ठीक किया जाता है।
गोदना प्रायः बीहड़ जंगलों में एकांत स्थान पर किया जाता है, ताकि किसी की बुरी नजर न लगे। इसमें बैल मुड़ी, बैल आंख, झुरगा बीज, कोदों दाना, नींबू डाल, मुनगा पत्ती बिछी माला जैसे प्रकृति-प्रेरित चित्र बनाए जाते हैं। यह प्रकृति और जीवन के सामंजस्य का प्रतीक है।

गोदना कला: बैगा महिला
मान्यता है कि गोदना से शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है। यदि किसी बच्चे को चलने में समस्या हो, तो कमर में गोदना कराया जाता है। इसे स्वास्थ्य से भी जोड़ा जाता है। बैगा समुदाय में गोदना पारंपरिक श्रृंगार के रूप में गहराई से रचा-बसा है। यह बैगा समुदाय का अभिन्न अंग बन चुका है। समाज प्रमुखों के अनुसार, केवल सुंदर दिखने की चाह में कुछ लोग अपनी प्राचीन संस्कृति से दूर हो रहे हैं।
पूर्वकाल में बैगा समुदाय की वृद्ध महिलाएँ पूरे शरीर पर गोदना कराती थीं। समय के साथ यह परंपरा सीमित होती गई है। आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी इसे संरक्षित करे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही गोदना परंपरा को जीवित रखना बैगा समाज की पहचान के लिए आवश्यक है। गोदना केवल कला नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन भी है।
लेख:
प्रहलाद पात्रे,
कवर्धा, छत्तीसगढ़
यज्ञोपवीत- एक सूत्र जो है पवित्रता का प्रतीक
February 11, 2026
स्वातंत्र्य समर के दुर्जेय जनजातीय महारथी : तिलका मांझी
February 11, 2026
वेदो के प्रहरी - महर्षि दयानंद सरस्वती
February 11, 2026
जबलपुर का चौसठ योगिनी मन्दिर
February 10, 2026
बैगा समुदाय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति
February 08, 2026
रामगढ़ की रानी अवंती बाई
February 06, 2026
वाद्ययंत्रों की यात्राः सिल्क मार्ग पर सुरों का प्रवास
February 06, 2026
पर्वतराज अमरकंटक
February 05, 2026
खैरागढ़ – एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय
February 04, 2026
सूर्य मंदिर मोढेरा- प्राचीन शिलाओं में परिलक्षित होता भारतीय ज्ञान
February 02, 2026
राजिम गौरव गाथा
February 01, 2026
विश्व के कबीर पंथियों का संत समागम
January 31, 2026
सूर्य मंदिर- कोणार्क, अद्भुत वास्तुकला और आध्यात्मिकता का संगम
January 30, 2026
भोजशाला और पुरातत्व
January 29, 2026
जगन्नाथ मंदिर में सामाजिक सद्भाव के दर्शन
January 27, 2026
सूर्य – भारतीय संस्कृति में आस्था और उपासना का केंद्र
January 27, 2026
प्रजातंत्र की अवधारणा- भारत के इतिहास की नजर से
January 26, 2026
तकनीकी को आधार देती पुरातन ज्ञान परंपरा- ग्रामोद्योग भाग 4
January 25, 2026
बैगा समुदाय की परम्परागत"मड़ई"
January 24, 2026
मदनपुर के गोंड़ राजा ड़ेलनशाह - भाग 01
January 22, 2026
यज्ञोपवीत- एक सूत्र जो है पवित्रता का प्रतीक
February 11, 2026
स्वातंत्र्य समर के दुर्जेय जनजातीय महारथी : तिलका मांझी
February 11, 2026
वेदो के प्रहरी - महर्षि दयानंद सरस्वती
February 11, 2026
जबलपुर का चौसठ योगिनी मन्दिर
February 10, 2026
बैगा समुदाय की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति
February 08, 2026
रामगढ़ की रानी अवंती बाई
February 06, 2026
वाद्ययंत्रों की यात्राः सिल्क मार्ग पर सुरों का प्रवास
February 06, 2026
पर्वतराज अमरकंटक
February 05, 2026
खैरागढ़ – एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय
February 04, 2026
सूर्य मंदिर मोढेरा- प्राचीन शिलाओं में परिलक्षित होता भारतीय ज्ञान
February 02, 2026
राजिम गौरव गाथा
February 01, 2026
विश्व के कबीर पंथियों का संत समागम
January 31, 2026
सूर्य मंदिर- कोणार्क, अद्भुत वास्तुकला और आध्यात्मिकता का संगम
January 30, 2026
भोजशाला और पुरातत्व
January 29, 2026
जगन्नाथ मंदिर में सामाजिक सद्भाव के दर्शन
January 27, 2026
सूर्य – भारतीय संस्कृति में आस्था और उपासना का केंद्र
January 27, 2026
प्रजातंत्र की अवधारणा- भारत के इतिहास की नजर से
January 26, 2026
तकनीकी को आधार देती पुरातन ज्ञान परंपरा- ग्रामोद्योग भाग 4
January 25, 2026
बैगा समुदाय की परम्परागत"मड़ई"
January 24, 2026
मदनपुर के गोंड़ राजा ड़ेलनशाह - भाग 01
January 22, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
बैगा समुदाय की परम्परागत"मड़ई"
January 24, 2026