जनजातीय समाज में महाशिवरात्रि का पर्व
February 14, 2026
संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार
नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

हम दैनिक बोल-चाल की भाषा में अक्सर कहते हैं, रत्ती भर भी परवाह नहीं, रत्ती भर भी शर्म नहीं है।
यह शब्द इतना आम है कि हम शायद ही कभी रुककर सोचते हों कि यह “रत्ती” आई कहाँ से। क्या यह सिर्फ़ बोलचाल का तरीका है, या इसके पीछे कोई ठोस वजह भी है? आइए इस लेख के माध्यम से जानते है।
रत्ती क्या है?
रत्ती एक पौधे का बीज है, जो आमतौर पर पहाड़ी और वन क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी फली मटर जैसी होती है और उसमें लाल रंग के छोटे-छोटे दाने होते हैं, जिनके ऊपरी सिरे पर काला निशान होता है। इन्हीं दानों को रत्ती कहा जाता है। इन बीजों की एक खास बात है। इनका आकार और वजन हमेशा लगभग एक-सा रहता है। बीज चाहे पुराना हो या नया, उसका वजन नहीं बदलता। लगभग 121.5 मिलीग्राम। यही कारण है कि पुराने समय में, जब डिजिटल तराज़ू नहीं थे, तब लोग इन्हीं बीजों से वजन मापा करते थे।

रत्ती के बीज
सोना, चाँदी और गहनों का वजन मापने के लिए सुनार रत्ती का इस्तेमाल करते थे। धीरे-धीरे यह एक मानक माप की इकाई बन गई। उस समय की माप-तौल कुछ इस तरह थी:
8 खसखस = 1 चावल
8 चावल = 1 रत्ती
8 रत्ती = 1 माशा
12 माशा = 1 तोला

प्राचीन भारतीय मापन पद्धति
आज ये माप आम इस्तेमाल में नहीं हैं, लेकिन रत्ती और तोला अब भी सुनारों के दैनिक जीवन का हिस्सा है। पहले 1 रत्ती को लगभग 0.125 ग्राम माना जाता था। आज तोला 10 ग्राम का हो गया है, लेकिन शब्द और उसकी पहचान अब भी बनी हुई है। रत्ती वजन में बहुत ही छोटी और निश्चित होती है, इसलिए यह “बहुत थोड़ा” या “जरा सी” मात्रा का प्रतीक बन गई है। जैसे किसी चीज़ का सबसे छोटा माप रत्ती से होता था, वैसे ही किसी के गुण, भावना या व्यवहार को भी “रत्ती भर” कहकर आँका जाने लगा।
इसी से ऐसे वाक्य चलन में आए:
"तुम्हें तो रत्ती भर भी शर्म नहीं है।"
"इस घर में हमारी रत्ती भर भी क़द्र "नहीं।
"कुछ लोग रत्ती भर भी झूठ नहीं बोलते।"
आज भले ही मापन में कोई इसका उपयोग करे ना करे लेकिन, लेकिन बोलचाल में यह शब्द अब भी उतना ही प्रचलित है।
रत्ती को कई जगह कृष्णला, रक्तकाकचिंची और स्थानीय भाषा में गुंजा भी कहा जाता है। इसके बीज लाल या कभी-कभी सफ़ेद रंग के होते हैं, लेकिन आकार और वजन लगभग समान रहते हैं। यही समानता इसे खास बनाती है। परंपरागत ज्ञान में रत्ती का उपयोग पशुओं के घावों में भी किया जाता रहा है, खासकर वहाँ पैदा होने वाले कीड़ों को खत्म करने के लिए। इसके बीज जहरीले होते हैं, इसलिए इन्हें सामान्य रूप से खाने में नहीं लिया जाता। गाँवों में रत्ती की माला बच्चों को पहनाने की परंपरा भी रही है। यह विश्वास किया जाता था कि इससे बच्चों को बुरी नज़र से बचाव मिलता है।

रत्ती की माला
यह बीज, पहले भारतीय मापन पध्दती का अंग बना और जब इसका उपयोग व्यापक तौर पर होने लगा फिर हमारी दैनिक शब्दावली का हिस्सा भी बन गया। एक छोटा-सा बीज, लेकिन उसका उपयोग कई चीजों के लिए होता रहा है। शायद इसी वजह से “रत्ती भर” जैसे मुहावरे का प्रयोग आज भी उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है, जितना पहले हुआ करता था।
लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
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