आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

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आखेटक: भारतीय सभ्यता के प्रहरी

आखेटक: भारतीय सभ्यता के प्रहरी


नमो निषादेभ्यः पुञ्जिष्ठेभ्यश्च वो नमः
नमः श्वनिभ्यो मृगयुभ्यश्च वो नमः
नमो वन्याय कक्ष्याय नमः
(
शु. यजुर्वेद 16.27,34)

पर्वतवासी भीलों को, निषादों को नमस्कार है, वनजातियों को नमस्कार है, किरातों को नमस्कार है, और वन में शिकार कर निर्वाह करने वालों को नमस्कार है। वन और वन की परिधि में रहने वालों को नमस्कार है।

यजुर्वेद का यह श्लोक भारत की उस गरिमापूर्ण संस्कृति का द्योतक है, जिसका निर्माण केवल ग्रामों, नगरों, राजप्रासादों से नहीं हुआ है। उसके निर्माण में वन, पर्वत और नदी तटों पर रहने वाले समुदायों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आखेटक इन्हीं समुदायों का ऐसा प्रतिनिधि है, जिसने पशुओं के स्वभाव, पदचिह्नों, जलस्रोतों, ऋतु परिवर्तन और दुर्गम वनमार्गों का व्यावहारिक ज्ञान अर्जित किया। वह केवल आखेट करने वाला एक साधारण व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि वन का जानकार और राज्य प्रदेशों की सीमाओं का प्रहरी था।

भारतीय संस्कृति में पर्व आस्था के साथ-साथ ऐसे समुदायों के लिए भी समर्पित है, जिन्होंने परिश्रम और ज्ञान से हमारी सभ्यता को आगे बढ़ाया। भारतीय पंचांग में श्रावण शुक्ल 13 को आखेटक त्रयोदशी के रूप में मनाया जाता है।

आज आखेटक शब्द का सामान्य अर्थ शिकारी माना जाता है। लेकिन प्राचीन वाङमय से ज्ञात होता है कि वन्य जीवन में आखेटक की भूमिका अधिक व्यापक थी। वह पशुओं के पदचिह्न, ऋतुओं का स्वभाव, जलस्रोत और सुरक्षित वनमार्ग पहचानता था। उसे खाद्य कन्दों, औषधीय वनस्पतियों और वन्य प्राणियों के व्यवहार का व्यावहारिक ज्ञान था। सभ्यता के आरंभ में यही अनुभव मनुष्य के जीवन की रक्षा और भोजन-पोषण आदि का आधार बना।


एक आखेटक

भारतीय समाज ने सदैव ही प्रकृति को एक शक्ति माना है। नदी, पर्वत, वृक्ष और पशु उसके जीवन के अंग रहे है। इस दृष्टि से भगवान शिव उसके सर्वाधिक निकट दिखाई देते हैं। शिव पर्वतवासी और पशुपति हैं। नाग और नन्दी उनके सहचर हैं तथा गंगा उनकी जटाओं में विराजती हैं। उनके स्वरूप से यह ज्ञात होता है, कि शिव सर्व व्याप्त है।

महाभारत के वन पर्व में भगवान शिव किरात वेश में और पांडु पुत्र अर्जुन के मध्य एक प्रसिद्ध पौराणिक प्रसंग है। जब युधिष्ठिर कौरवों के साथ सम्पन्न द्यूतक्रीड़ा में सब कुछ हार गये तो उन्होंने अपने भाइयों एवं द्रौपदी के साथ 13 वर्ष का वनवास जाना पड़ा और उनका अधिकांश समय द्वैतवन में बीता। भविष्य में युद्ध की स्थिति को देखकर पांडवों ने शक्ति संवर्धन के लिए अर्जुन ने इन्द्रकील पर्वत पर शस्त्रास्त्र के लिए देवराज इन्द्र की तपस्या की और देवराज ने प्रसन्न होकर अर्जुन को मनोरथ-पूर्ति के लिए शिव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर वरदान मांगने की युक्ति दी।


किरात रूपधारी शिव और अर्जुन

अर्जुन निराहार तपस्या में लीन, महादेव किरातों की स्थानीय जनजाति के सेनापति का स्वरूप धारणकर अर्जुन के पास जाते है, कथानुसार तभी मूक नामक दानव विशाल शूकर का शरीर धारण कर आक्रमण कर देता है। भगवान शिव एवं अर्जुन दोनों का द्वारा चलाए बाण से शूकर की जीवन लीला समाप्त हो जाती है। परिणामत:दोनों के मध्य युद्ध एवं विवाद आरम्भ हो जाता है। असहाय महसूस करते अर्जुन ने शिवलिंग पर पुष्प अर्पित कर महादेव की आराधना की तब अर्जुन को आभास हुआ कि किरात ही उसके आराध्य है। अर्जुन की वीरता से प्रसन्न होकर भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होते है और अर्जुन को दिव्य पाशुपतास्त्र फल प्रदान करते है -

तपा तथा मुदमस्य ययौ भगवान्यथा विपुलसत्त्वतया
-भगवान शिव अर्जुन की तपस्या से उतने प्रसन्न नहीं हुए जितने प्रसन्न वे उसके अपार साहस से हुए।

महादेव ने किरात बनकर एक अर्जुन को शिक्षा दी। ज्ञान और पराक्रम सभी वर्गों में व्याप्त होता है। गुरु एक शिकारी/आखेटक रूप में भी सामने आ सकता है। महाकवि भारवि ने इस प्रसंग को 18 सर्गों वाले संस्कृत महाकाव्य किरातार्जुनीयम् में विस्तार दिया। यहाँ किरात स्वयं शिव का चुना हुआ स्वरूप है। भारत में आखेटक को साहस, वनज्ञान के जानकार के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

वेदों में पंचजन्य, पंच प्रकार मनुष्यों का वर्णन प्राप्त होता है, उसमें एक निषाद भी है। निषादों ने नदियों, नौकाओं और जलमार्गों का ज्ञान सुरक्षित रखा। किरातों और भीलों की परम्पराओं में धनुर्विद्या, पर्वतीय मार्गों और वनजीवन का अनुभव पीढ़ियों तक चला आया है। आटविक राज्य जिसमें निषाद जनपद के युवराज एकलव्य की धनुर्विद्या प्रतिभा, ज्ञान और गुरु भक्ति की प्रशंसा चारों ओर होती है।

लोक कथाओं में कन्नप्प नयनार की कथा में एक आखेटक अपनी आँखें शिव को अर्पित कर देता है। दक्षिणापथ के सन्त कन्नप्प नयनार मूल रूप से वनवासी आखेटक थे। एक दिन उन्होंने वन में शिवलिंग देखा और उन्हें शिव से प्रेम हो गया। वे शिव को जल, फूल और भोजन अर्पित करते थे। एक बार शिवलिंग की आँखों से रक्त बहने लगा। यह देखकर उन्होंने अपनी आँखें निकालकर शिवलिंग पर लगा दीं। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें कन्नप्प नाम दिया। ये कथाएँ वनवासी अंचलों में शिव के प्रति आस्था को प्रगट करती हैं।

 

पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर मौर्योत्तर काल में कुषाण शासक विम कडफिसस की मुद्राओं पर त्रिशूलधारी शिव एवं नन्दी का चित्रांकन मिलता है एवं हुविष्क (कुषाणकाल) की प्राचीन मुद्राओं में शिव को धनुर्धर रूप में भी अंकित किया प्राप्य है। प्रतिमा विज्ञान के अध्ययन से ज्ञात होता है कि शिव की रूप प्रतिमा को शांत एवं उग्र के नाना प्रभेद में रूपांकित किया गया है। मूर्तिकला में शिव की अनुग्रह मूर्तियों में- विष्णवनुग्रह मूर्ति,नन्दीशानुग्रह मूर्ति,विध्नेश्वरानुग्रह मूर्ति,रावणानुग्रह मूर्ति, चंडेशानुग्रह मूर्ति एवं किरातार्जुन मूर्ति का चित्रण स्थापत्यकला में दृष्टव्य है। गुप्तोत्तर काल में महाकवि भारवि की रचना किरातार्जुनीयम् में किरात वेशधारी शिव और अर्जुन के मध्य युद्ध का वर्णन है। 


शैव परंपरा के प्राचीन पुरातात्त्विक साक्ष्य

भारतीय स्थापत्यकला में कुंभकोणम के आदि कुंभेश्वर मन्दिर में किरात मूर्ति दृष्टव्य है। किरात समपाद स्थानक मुद्रा में चतुर्भुज रूप में है, प्रतिमा के दाहिने उर्ध्व कर में चक्र एवं बांये कर में कर्तरीमुख हस्त मुद्रा में शंख का अंकन है। अधो करों में धनुष एवं बाण का शिल्पांकन प्राप्य है। इतिहास एवं शास्त्रीय कथाओं में उल्लेख मिलते है कि प्राचीन युग में अनुमानत:किरातों को आखेटक समुदाय के रूप में देखा जाता हो, जो भगवान शिव को देव रूप में पूजते महाकवि कालिदास ने अपने काव्य में किरातों का उल्लेख-

यद्वायुरन्विष्टमृगैः किरातैरासेव्यते भिन्नशिखण्डिबर्हः॥

अर्थात गंगा नदी के झरनों की जलकणों को साथ लाने वाली और देवदार के पेड़ों को हिलाने वाली हिमालय की ठण्डी हवा जब बहती है, तो वह किरातों के शरीर पर सजे मोरपंखों को बिखेर देती है। हिमालय के दुर्गम वनों में मृगों का पीछा करते हुए जो किरात थक गए हैं, वे रुककर इस ठण्डी पहाड़ी हवा का सुख लेते हैं।


 किरातेश्वर शिव, सिक्किम

आखेटक त्रयोदशी का दिन उस जीवनपद्धति और प्रकृति ज्ञान के प्रति कृतज्ञ होना है। इसी ने मानव समाज को कठिन भूभागों में जीवित रहना और प्रकृति के संकेत पढ़ना सिखाया। भारतीय सभ्यता वन और ग्राम, नदी और पर्वत, ऋषि और आखेटक तथा राजा और निषाद के संयुक्त पुरुषार्थ से बनी है। आखेटक त्रयोदशी इसी साझी विरासत को स्मरण करने और हमारी समृद्ध संस्कृति को व्यवहार में उतारने का पावन अवसर है।

भारत में आज भी किरात समुदाय प्रकृति के साथ भगवान किरातेश्वर (शिव) की आखेटक त्रयोदशी को विशेष पूजा अर्चना करते है। भगवान शिव को पंच महाभूतों के नाथ भी कहा जाता है अत:भगवान शिव और प्रकृति का सम्बन्ध अटूट है। अर्जुन जैसे महान योद्धा को भी दिव्य अस्त्र प्राप्त करने से पहले अपने धैर्य, पराक्रम और पात्रता को प्रमाणित करना पड़ा।  आज आवश्यकता है कि हम आखेटक के जीवन से सजगता, साहस, प्रकृति प्रेम और आत्मविश्वास ग्रहण करें। अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने का अर्थ उसके जीवन मूल्यों को व्यवहार में उतारना भी है। आखेटक त्रयोदशी हमें यही संकल्प लेने की प्रेरणा देती है कि कठिनाइयां कितनी भी घनी क्यों न हों, ज्ञान को अपना धनुष, साहस को अपना बाण और धर्म को अपना लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ते रहना ही सच्चा पुरुषार्थ है।

- पुष्पा शर्मा, राजस्थान (लेखिका समर्पित शिक्षिका व इतिहास की शोधार्थी हैं। उनका प्रधान अवदान क्षेत्रीय इतिहास, संस्कृति और पर्यटन के विषयों पर केन्द्रित विमर्शों में है।)

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