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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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हिन्दू एवं बौद्ध धर्मों में मानव-कल्याण-चिन्तन तथा करुणा की विश्व-संस्कृति

हिन्दू एवं बौद्ध धर्मों में मानव-कल्याण-चिन्तन तथा करुणा की विश्व-संस्कृति

सृष्टि का प्रवाह अनादि और अनंत है। वह विविध रूपा है। मनुष्य इस सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी है। उसे हृदय, बुद्धि एवं वाणी का अनुपम उपहार प्रकृति से प्राप्त है। इन तीन शक्तियों के बल पर उसने समस्त सुष्टि पर नियंत्रण करने की निरंतर चेष्टा की है। इसी चेष्टा में उसने सुख और शान्ति के लिए समाज की रचना की है। इस रचना को व्यवस्थित रखने के लिए उसने राज-सत्ता एवं धर्म-सत्ता का विकास किया है।

इन दोनों सत्ताओं को उसने सदा अपने लिए सुख के अनुशासनों में परिवर्तित किया है। किन्तु, विभिन्न देशों के इतिहास इस तथ्य के साक्षी हैं कि मानव-कल्याण के लिए आविष्कृत ये अनुशासन परस्पर सहयोग कम, विरोध अधिक करते रहे हैं। राज-सत्ता धर्म-सत्ता को अपने अधीन रखने की चेष्टा करती रही है और धर्मसत्ता राजसत्ता पर नियन्त्रण के लिए प्रयत्नशील रही है। व्यक्ति और उसका समाज दोनों इस अन्तर्विरोध में प्रभावित हुए हैं तथा उनकी सुख शान्ति को निरन्तर नए-नए खतरों का सामना करना पड़ा है।

किन्तु, मनुष्य निराश और परास्त नहीं हुआ। यह निरन्तर नई-नई व्यवस्थाएँ रचता रहा है। राज-सत्ता को उसने एकतंत्र, कुलीनतंत्र, सामंतवाद, फासीवाद आदि के मार्गों से निकालकर जनतंत्र तक पहुंचाया है तथा धर्म-सत्ता विभिन्न दर्शनों से होकर आचार और व्यवहार के नए-नए रूप धारण करती रही है।

इतना सब कुछ होते हुए भी मानव समाज आज संकटग्रस्त है। समस्त बीसवीं शताब्दी युद्धों, पराचीनता की पीड़ाओं एवं विभिन्न प्रकार के आतंकों से जूझती रही है। जनतंत्र निरन्तर नए-नए खतरों की जकड़न में फंसता जा रहा है। विभिन्न धर्मों एवं उनके दर्शनों का जनतंत्र के नाम पर निरन्तर विश्व भर में दुरुपयोग हो रहा है।

हर्ष का विषय है कि विश्व के सर्वोच्च पर्वत हिमालय के शिखर देश नेपाल में इस समस्या पर विचारार्थ समस्त विश्व के श्रेष्ठ साधु-संन्यासी एवं विद्वान मनीषी एकत्र हुए तथा विचारार्थ 'करुणा' जैसा महत्वपूर्ण विषय चुना, जो विश्व की इस गम्भीरतम समस्या के समाधान का केन्द्र बिन्दु हो सकता है। एशिया के दो महान् धर्मों हिन्दू एवं बौद्ध के दर्शनों में 'करुणा' का बीज-स्थान है। मानव-हृदय की गहनतम अनुभूतियों में 'करुणा' का रसनिधि लहराता है। इसी रसनिधि की उत्ताल तरंगों में तिरते हुए लुम्बिनी के जंगल में जन्मे कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ जन्म, जरा और मृत्यु के दुखों से मानव जाति को बचाने के लिए राज-सत्ता का सुख त्याग कर अर्थ रात्रि में सन्यासी हुए।

 

 

गहन साधना के उपरान्त कृश-काय सन्यासी सिद्धार्थ ने संसार के दुखों का समाधान खोज निकाला और मानव जाति को चार सत्य बतलाए। उन्होंने कहा कि दुख पहला आर्य सत्य है। जन्म, जरा, व्याधि, मरण तथा इच्छित वस्तु की अप्राप्ति इस सत्य में सम्मिलित करुणापूर्ण हृदय लेकर राजमहल से निकले सिद्धार्थ ने गम्भीर तप द्वारा इस सत्य का आध्यात्मिक बोध प्राप्त किया।

उन्होंने दूसरा आर्य सत्य प्रत्येक दुख का कोई-न-कोई कारण बतलाया और कहा कि वह कारण तृष्णा का एक रूप होता है ।

बुद्ध ने तीसरा आर्य सत्य बतलाया कि दुख को दूर करने का उपाय उसके कारण को तृष्णा-को-है। तृष्णा-ग्रस्त इस संसार को उन्होंने करुणापूर्ण दृष्टि से देखा, न कि घृणा या ईर्ष्या से। दूर करना है।

चौथा आर्य सत्य बताते हुए उन्होंने कहा कि दुखों से छुटकारा-मुक्ति पाने का मार्ग अवश्य है। यह आष्टांगिक मार्ग है। सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्य, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् जीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति तथा सम्यक् समाधि इस मार्ग के आठ अंग हैं। इन अंगों का व्यावहारिक आधार पर पालन करना ही मानव जाति के लिए सच्चा सन्मार्ग है। इस मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ही दुखों का नाश कर सकता है।

विज्ञान के इस युग में निरंतर वृद्धिगामी तृष्णाओं से उत्पन्न ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिस्पर्धाजन्य संघर्ष, भौतिक विलास आदि के कारण अनेक प्रकार के दुख मानव मात्र को ग्रसित कर रहे हैं। आर्थिक समृद्धि को उन दुखों से बचने का साधन मानना इस युग के मानव की सबसे बड़ी भूल है। यदि वास्तव में उसे सच्ची मुक्ति के सुख में जीवित रहना है, तो 'करूणा' पर आधारित भगवान् बुद्ध द्वारा दिखाए गये आष्टांगिक मार्गों का अनिवार्यतः अनुसरण करना होगा और तभी समस्त सृष्टि की कल्याण-चेतना मानव समाज में आयेगी।

कोई भी राज-सत्ता या विज्ञान सत्ता बीसवी शताब्दी में प्राप्त सांसारिक दुखों की वसीयत को इक्कीसवीं शताब्दी में जाने से नहीं रोक सकी। भगवान बुद्ध का यह मार्ग धर्म-सत्ता का सुगम मार्ग है। हमें यह स्मरण रखना है कि मानव बुद्धि ने धर्म-सत्ता की उपेक्षा करके राज-सत्ता का जब-जब साथ दिया है, तब-तब विनाश के संकटों का इतिहास रचा गया है। बीसवीं शताब्दी भी इस तथ्य की भयंकरता से नहीं उभर सकी।

वैज्ञानिक अविष्कारों पर राज-सत्ता का एकछत्र अधिकार हो जाने और राज-सत्ता पर धर्म-बुद्धि-हीन व्यक्तियों का नियंत्रण हो जाने के कारण आज समस्त विश्व पर युद्धों एवं आतंकवाद के बादल घिर रहे हैं। हर मनुष्य भयभीत है। सुरक्षा हीन एवं सुरक्षित सभी व्यक्तियों को मौत के साये में जीने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। ऐसी भयभीत शताब्दी की झुकी कमर और उठती अरथी को देख कर हर बुद्ध के हृदय में 'करुणा' का जो सागर लहरा उठेगा, वही हिंसा पर अहिंसा को एवं असत्य पर सत्य को विजयी बना सकता है।

आज निर्दय अर्थात् दया या करूणा-विहीन मनुष्यों की बेतहाशा वृद्धि हो रही है। वे भौतिक विज्ञान के बल पर जिस व्यक्तिगत सुख की तलाश में दौड़ रहे हैं, वह सुख नये-नये दुखों में उन्हें धकेलता जा रहा है। उसी के परिणामस्वरूप युद्ध, संत्रास, आतंक, प्रदूषण, महामारी, विभिन्न रोग, बहुमुखी अन्याय और उत्पीड़न आदि की विभीषिकाएं मानव जाति के सामने खड़ी हैं।

आध्यात्मिक विज्ञान की शरण में गए बिना इन दुखों से किसी प्रकार मानव का कल्याण संभव नहीं। भगवान बुद्ध द्वारा प्रतिपादित दुखों से मुक्ति का मार्ग सनातन हिन्दू मुक्ति-मार्ग ही है। 'इंडियन रिलीजन्स' नामक अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ में डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखा है कि 'बुद्ध ने किसी नये मार्ग या स्वतंत्र धर्म का प्रवर्तन नहीं किया। ये तो हिन्दुओं के प्राचीन धर्म का ही नया संस्करण था।'

वस्तुतः भगवान् के पद तक पहुंचे सिद्धार्थ का बुद्धत्व हिन्दू-धर्म में समय के साथ आ जाने वाली बुराइयों का ही संशोधन चक्र था। महात्मा बुद्ध ने जो चार आर्य सत्य बतलाये, वे उनकी उस 'करुणा' की ही साधनात्मक उपलब्धि थे, जो मनुष्य की झुकी हुई रीढ़ और अवश्यम्भावी मृत्यु के बोध से उत्पन्न हुई थी। जीवन के इन सत्यों का सम्बोध वैदिक ऋषियों को बुद्ध से पहले हो चुका था। भगवान् बुद्ध ने उसको भावी जीवन के लिए मुक्ति का साधन बना कर मानव जाति को सौंपा। उन्होंने 'धम्मपद' में स्वयं वैदिक दर्शन एवं धर्म मेंनिहित सिद्धांतों को अपने उपदेशों का आधार मानते हुए अपने मुक्ति-मार्ग को 'धम्मो सनन्तनो' नाम दिया है।

हिन्दुओं के लिए वर्तमान युग में श्रीमद्भगवत्गीता' तथा 'रामचरितमानस' आध्यात्मिक चिन्तन के प्रमुख आधार ग्रन्थ हैं। इन ग्रन्थों में भी दुखों से मुक्ति का वही मार्ग बताया गया है, जिसकी चर्चा हम महात्मा बुद्ध के उपदेशों के सन्दर्भ में कर आये हैं। गीता में समस्त कामनाएँ त्याग कर आत्मा से आत्मा में सन्तुष्ट प्राणी की स्थितप्रज्ञ कहा गया है, जो दुख-सुख, रागद्वेष, भय-क्रोध आदि से मुक्त, शुभ-अशुभ से ऊपर उठता हुआ इन्द्रियों को विषयों से समेट लेता है।

जब इन्द्रियां वश में हो जाती हैं, तब हृदय निर्मल हो जाता है एवं समस्त दुखों का अभाव हो जाता है। मन को वश में कर के अहंकार-रहित होने पर ही शान्ति प्राप्त हो सकती है। गीता की यह धर्म-चेतना ही मानव-कल्याण-कारिणी वह मुक्ति-चेतना है, जिसका भगवान बुद्ध एवं भगवान कृष्ण ने समान भाव से उपदेश दिया है। यह चेतना 'करुणा' के मूल से उत्त्पन्न होती है।

यही कारण है कि हिन्दु धर्मावलम्बियों की प्रार्थनाओं में ईश्वर माने जाने वाले शिव, शक्ति, राम, कृष्ण तथा अन्य देवी-देवताओं को करुणानिधि, करुणानिधान, करुणाकर आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है और उनसे दुख मुक्ति के लिए याचना की जाती है। हिन्दू धर्म में भगवान को करुणानिधान मानकर प्रार्थना करने का जो विधान है, वह बाह्य दृष्टि से बुद्ध की करुणा से भिन्न लगता है।

मोटे तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दू धर्म में मनुष्य स्वयं सर्वथा असमर्थ है और बौद्ध धर्म में मनुष्य में ही वह करुणाशक्ति निहित है। किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से ध्यानपूर्वक देखने पर दोनों में कोई विशेष भेद नहीं रह जाता, क्योंकि हिन्दू जिस तत्व की ईश्वर या ब्र‌ह्मा मानता है, वह उसी के भीतर निहित है, कोई बाहरी सत्ता नहीं है। जीवरूप में जो कुछ बाहर दिखाई दे रहा है, वह उसी ईश्वर का अंश है, इसीलिए वह अविनाशी है 'ईश्वर अंश जीव अविनाशी'।

हिन्दुओं के शैवदर्शन के अनुसार परम शिव ही एकमात्र सत्ता है, जो शून्य है। उसी की इच्छा से उसी के भीतर उसी के द्वारा समस्त सृष्टि का उन्मीलन और निमीलन होता है। अतः जीव ही शिव है, किन्तु जब वह अपने शिवत्व को भूल कर पंचभूतात्मक सृष्टि में ही सुख मानता है, तब वह दुखात्मक अनुभूति का भागी बनता है और तभी वह अपनी मुक्ति के लिए अज्ञान वश 'स्व' से बाहर ईश्वर को मानकर उससे करुणा की प्रार्थना करता है।

किन्तु यह करुणा याचना भी निरर्थक नहीं है, क्योंकि अप्रत्यक्षतः इसमें उसके भीतर व्याप्त उसी परमात्म-तत्व से 'करुणा' की प्रार्थना है। अतः यह प्रार्थना भी मानव कल्याण का ही मार्ग है, जो भक्ति-मार्ग कहलाता है। बुद्ध के मुक्ति मार्ग के बीज इसी मार्ग में समान रूप से सन्निहित हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम पराधीनता काल में की गई करुणानिधान को बाहर देखने वाली इन प्रार्थनाओं में बुद्ध के आत्म-तत्व को प्रतिष्ठित करें और अपने भीतर छिपे उस ईश्वर को पहचानें, जिसे तुलसीदास ने रामचरितमानस में कभी भीतर और कभी बाहर बतलाया है तथा अपराधों, दुष्कर्मों से मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा है कि-

प्रनतपाल रघुनायक,करुणा-सिंधु खरारि।

गए सरन प्रभु राशि हैं,सब अपराध विसारि ॥

हिन्दू तथा बौद्ध धर्मों में दार्शनिक चिन्तन की यह आधारभूत समान दृष्टि आज भी मानव-कल्याण के लिए हमें ये पंक्तियां दुहराने की प्रेरणा देती हैं-

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माकश्चिद् दुखमाप्नुयात्।

तथा बुद्धं शरणं गच्छामि। धर्म शरणं गच्छामि।

संघ शरणं गच्छामि ॥

प्रो. रामगोपाल शर्मा 'दिनेश'
हिन्दू एवं बौद्ध धर्मों में मानव-कल्याण-चिन्तन तथा करुणा की विश्व-संस्कृति
"संस्कृति: अंक-02"

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