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मानव संस्कृति और मैथिलीशरण गुप्त का काव्य

मानव संस्कृति और मैथिलीशरण गुप्त का काव्य

सच्ची और सार्थक कविता हृदय की अनुभूतिओं का उद्‌गार होती है। वह किसी विचार-धारा का अनुवाद न होकर विचारों और दर्शकों को जन्म देती है। इस प्रकार की कविता के रचयिता ही "कविर्मनीषी परिभू स्वयम्" कहलाते हैं। ऐसे कवियों की वाणी मानव मात्र के प्रति प्रेम की धारा बहाती है और सभी जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। हिंदी साहित्य के इतिहास का गौरव ऐसे कई कवियों ने बढ़ाया है और विश्व को मानव प्रेम की संस्कृति प्रदान की है। कबीर, सूरदास, नानक, मीरा, तुलसीदास, प्रसाद, निराला, सुमित्रानंद पंत, महादेवी वर्मा और मैथिलीशरण गुप्त उनमें प्रमुख हैं।

स्वाधीनता-यज्ञ में बाणी की समिधा देने वाले मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि के सम्मान से विभूषित किया गया है किन्तु विश्व मानव के प्रति उनके काव्य में जो प्रेमानुभूति अभिव्यक्त हुई है, उसके आधार पर उन्हें विश्वकवियों की श्रेणी में सम्मान देना अनुचित नहीं है। मानव जाति के विभिन्न वर्गों, संप्रदायों, धर्मों आदि की सभी अच्छी बातों का आदर करते हुए काव्य-रचना करते रहे हैं।

हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन आदि सभी धर्मों को कथाओं को लेकर उन्होंने काव्य लिखे हैं तथा उन तत्वों को उजागर किया है जो मानव जाति की एकता, समता एवं भाईचारे को बल देते हैं। पारस्परिक संघर्षों की त्रासदियों और विडम्बनाओं के विरुद्ध वे सर्वत्र काव्य-भूमि पर संघर्षरत मिलते हैं। गुप्त जी सच्चे वैष्णव कवि हैं, इसीलिए "पीर पराई" को सरस्वती गहराई से जानते और उसके निवारण का मार्ग अपनी अनुभूतियों के माध्यम से खोजते हैं। वे विश्व भर में आत्मभाव भरना चाहते हैं। कहते हैं-

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती

उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती

उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती

उसी उदार को सदा समस्त सृष्टि पूजती है

अखंड आत्म-भाव जो असीम विश्व में भरे।

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

मनुष्य-प्रेम की अभिव्यक्ति आत्म त्याग, संतोष और बलिदान के मानों से होती है। गुप्त जी की दृष्टि में मनुष्यता का मापदंड मनुष्य मात्र के लिए त्याग और बलिदान करना है। भारतीय संस्कृति की इस माननीय धारा को गुप्त जी ने पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं के माध्यम से मानव-प्रेम के महा समुद्र में मिलाया है। वे कुछ उदाहरण देते हुए उक्त भाव को आगे इस प्रकार अभिव्यक्ति देते हैं-

क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी।

तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थि-जाल भी।

सहर्ष वीर कर्म ने शरीर नर्म भी दिया।

उशीनर क्षितीश ने स्व मांस दान भी किया।

यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही करे।

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ॥

उनकी यशोधरा संसार के कल्याण हेतु शत बार सहर्ष मरना चाहती है। उसे मुक्ति नहीं, मानव-प्रेम का गीत चाहिए-

आओ प्रिय! भव में भाव-विभाव करें हम।

डुबेंगे नहीं कदापि, तरें न तरें हम।

कैवल्य काम भी काम, स्वधर्म धरें हम।

संसार-हेतु शत बार, सहर्ष मरें हम।

तुम सुनो क्षेम से, प्रेम-गीत में गाऊँ।

कह मुक्ति, भला किसलिए तुझे मैं पाऊँ ॥

गुप्त जी ने अपनी वैष्णव भावना के अनुसार भगवान राम को प्रमुखतः अपनी कविता का विषय बनाया था, किंतु अपने उपास्य को भी वे मानव के रूप में ही अपने हृदय में रमाते हैं। कहते हैं-

राम तुम मानब हो, ईश्वर नहीं हो क्या ?

विश्व में रमे हुए सभी कहीं नहीं हो क्या?

तब मैं निरीश्वर हूँ, ईश्वर क्षमा करे।

तुम न रमो तो मन तुम में रमा करें।

उनके ये राम मानव-प्रेम का श्रेष्ठतम प्रतीक बन कर जन जन का कल्याण करते हैं। वे वन में जाकर मन, वचन और कर्म से मनुष्य मात्र का उद्धार करते हैं। ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, सबके प्रति उनके राम के हृदय में प्रेम और समता के भाव हैं। गुप्त भी कहते हैं-

गुह निषाद शबरों तक का मन रखते हैं प्रभु कानन में।
क्या ही सरल वचन रहते हैं उनके भोले आनन में।
इन्हें समाज नीच कहता है पर हैं ये भी तो प्राणी। 
इनमें भी मन और भाव हैं किन्तु नहीं वैसी वाणी।

मनुष्यत्व जन में ही निवास करता है। कर्म से कोई छोटा-बड़ा नहीं हो जाता। मनुष्यत्व में जो बड़ा है, वह हीन कैसे हो सकता है ? द्वापर काव्य में वे कहते हैं-

मनुष्यत्व जन में ही रहता नहीं विशाल भवन में।
वह भी क्या दुर्लभ है तुमको जो तुम चाहो मन में।

यह मनुष्यत्व ही मानव मात्र के प्रति प्रेम का सच्चा आधार है, जिस पर गुप्त जी अपने काव्य का संसार रचते हैं। मानव प्रेम समता और सदाशयता का मार्ग है। इस मार्ग में सदा से राजसत्ता बाधक रही है, लोभ, मद और दंभ का त्रिपुट मानवता का विनाश कर रहा है इसीलिए साकेत काव्य में गुप्त जी कहते हैं-

राज-पद ही क्यों न अब हट जाय ?
लोभ-मद का मूल की कट जाय।
कर सके कोई न दर्प न दंभ।
सब जगत में हो गया आरंभ। विगत हों नरपति, रहें नर मात्र।
और जो जिस कार्य के हों पात्र वे रहें उस पर समान नियुक्त। सब जियें ज्यों एक हो कुल-मुक्त।

इसी भावना के आधार पर गुप्त जी विश्व-राज्य की कल्पना करते हैं, जिसमें मानव मात्र स्वतंत्रता और समता का भागी बन सके। वस्तुतः मैथिलीशरण गुप्त की यही वह भाव-घारा है, जो उनको भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुंबकम् भाव से जोड़ती है। समस्त वसुधा हमारा कुंटुम्ब है। इस कुटुम्ब-भाव का आरंभ स्वदेश से ही हो सकता है। घर-बाहर सर्वत्र मानव-प्रेम की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। इसीलिए राष्ट्रकवि गुप्त जी स्वदेश की ओर विशेष ध्यान देते हुए कहते हैं-

नाओ मिलें सब देश बांधव ।
हार बन कर देश के।
साधक बने सब प्रेम से सुख-शान्ति-मब तद्देश के।
क्या साम्प्रदायिक भेद से है एक्य मिट सकता अहो।
बनती नहीं क्या एक माला विविध सुमनों से कहो ?

अर्थात् सम्प्रदाय भिन्न-भिन्न हैं, तो क्या हम मानव-प्रेम के आधार पर एक माला नहीं बन सकते ? गुप्त जी की दृष्टि में मानव प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है उनके राम इसी धर्म के बल पर भूतल को ही स्वर्ग बनाने के लिए अवतार लेते हैं। गुप्त जी के शब्दों में स्वयं राम कहते हैं-

भव में नव वैभव भरने आया।
नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया ।
संदेश मैं नहीं स्वर्ग का लाया।
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।

वस्तुतः सबसे बड़ा सत्य यही है कि अगर मानव प्रेम के आधार पर समाज और शासन की नीतियाँ चलें, तो पृथ्वी पर ही स्वर्ग की कल्पना साकार हो सकती है।

मानव संस्कृति और मैथिलीशरण गुप्त का काव्य
डॉ. उषा कटारा
"संस्कृति: अंक-03"

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