अजमेर की ऐतिहासिक हवेली द्वार
February 14, 2026
संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार
नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

वैदिक साहित्य सर्वागीण ज्ञान का भण्डार है | यह पवित्र साहित्य मानवता के लिए प्रकाश स्तम्भ है | इस साहित्य का अध्ययन करने पर प्रकृति के विभिन्न घटकों में शाख,पात एवं वृक्षों का भी विशेष महत्त्व है |वैदिक साहित्य में अनेकानेक वृक्षों को अत्यंत पूजनीय माना गया है साथ ही ऋतू परिवर्तन (संधिकाल) के समय उनके उपयोग का विधान प्रभाव एवं प्रयोजन भी उल्लेखित किये है | भारतीय संस्कृति की अविरल धारा में प्राकृतिक रंग जो शाख- पात से प्राप्त होते है का उपयोग भी अभिन्न अंग के रूप में जुड़ा है |

प्राचीन काल में होली के रंगों के लिए अरारोट,हल्दी,मेंहदी एवं विभिन्न पुष्पों की पंखुड़ियों जिसमें गुडहल,गेंदे, गुलाब एवं विशेष रूप से पलाश के पुष्पों का उपयोग किया जाता था |आयुर्वेद में भी पलाश के अनेकानेक गुण उल्लेखित है |प्राचीन ग्रन्थों में भी अश्वत्थ एवं पलाश वृक्ष की महिमा वर्णित है |पलाश का वृक्ष भारत के अतिरिक्त दक्षिणी पूर्वी एशिया में भी पाया जाता है |भौगोलिक एवं इतिहास के आधार पर पलाश गंगा- यमुना के दोआब से लेकर मध्य प्रदेश तक पायी जाने के प्रमाण मिलते है लेकिन लगातार जंगलों की कटाई इसके अस्तित्व पर भी खतरा बढ़ा रही है |केकड़ी परिक्षेत्र मे भी पलाश वृक्षों को देखा जा सकता है इसके पुष्प मेरी पहली पसंद है जो मुझे बचपन से आकर्षित करते रहे है और उसी कारण यह आलेख लिखने को कलम बोल ही पड़ी-
होली की आभा है पलाश,समय आगमन की रखता आस
ठूंठ बना था जो सावन में, महक उठा है वो फागुन में |
साहित्य में पलाश का श्रृंगार रस के साथ सुन्दर वर्णन मिलता है | पुष्पित पलाश के सम्बन्ध में महाकवि कालिदास ने- बसंत काल में पवन के झोकों से हिलती हुई पलाश की शाखाएं वन की ज्वाला के समान लग रही और इनसे ढकी हुई धरती ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे लाल साडी में सजी कोई नववधू हो | अनेक साहित्य के प्रसंग में पलाश का मोहक उल्लेख पढ़ा जा सकता है |आधुनिक काल की कृतियों में भी पलाश को केंद्र में रख कर अनेक सजृन हुए है |हिन्दी का प्रसिद्ध मुहावरा-ढ़ाक के तीन पात |

नामकरण - संस्कृत में इसे किंशुक के नाम से जाना जाता है |हिन्दी में पलाश जो दो शब्दों से पल + आश ऐसा वृक्ष जो रक्त के समान लाल पुष्पों से लदा रहता है | अनेक संस्कृत के लेखकों ने खिले हुए पलाश की उपमा युद्ध भूमि से की है |वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसका वर्गीकरण एक संरक्षक ब्युट के अर्ल जोहन की स्मृति में ब्यूटिया मोनोस्पर्मा नाम रखा गया जिसका अर्थ है- एक बीज वाला | पलाश के अन्य नाम- ढाक, टेसू ,केसू छूल आदि |
धार्मिक ,पर्यावरण एवं सामाजिक महत्त्व - यह वृक्ष सनातन धर्म में पवित्रता का प्रतीक है |इसकी पत्तियों की त्रिकोणीय संरचना त्रिमूर्ति (त्रिदेव- ब्रह्या,विष्णु,महेश )का प्रतीक मानी जाती है |श्रोतसूत्र में यज्ञ पात्र इस वृक्ष की लकड़ी से निर्मित का विधान मिलता है | सूत्र ग्रंथो के अनुसार उपनयन संस्कार के समय में ब्राह्यण कुमार (बटुक)को इसी की लकड़ी का दंड ग्रहण करने की विधि है |पर्यावरणीय एवं आर्थिक दृष्टिकोण से ढ़ाक के तीन पात ( पत्तियों)से पात्र बनाकर उसका उपयोग (दोना- पत्तल)खाना परोसने के प्रयोग में किया जाता है |

पलाश बसंत एवं होली का प्रतीक माना जाता है,इसके पुष्पों से पारम्परिक रंग तैयार किया जाता है जो शरीर को शीतलता प्रदान करते है | इसकी छाल से एक प्रकार का रेशा निकाला जाता है जिसे रस्सी एवं दरी इत्यादि बनाने के उपयोग में लिया जाता है |

अनेक क्षेत्रों में शिवरात्रि के दिन पलाश के पुष्पों से भगवान शिव की आराधना की जाती है |गणगौर,हरछठ एवं हरतालिका व्रत के पूजन में इसकी शाखा एवं पत्तों का उपयोग किया जाता है | पतझड़ में जब सभी वृक्ष सूखे नजर आते है तब पलाश खिलना शुरू होता है यह वृक्ष प्रचंड गर्मी की तपन में भी अपनी मनोरम छटा बिखरता रहता है |ऋतुराज बसंत के स्वागत का प्रमुख श्रेय रक्तिम पलाश को ही जाता है, मैने अपने द्वारा रचित प्रथम कविता में लिखा है – बसंत - मां शारदे के वन्दन को ठूंठ पलाश भी जाग उठा .....| उत्तर प्रदेश सरकार ने 8 दिसम्बर 2010 को पलाश को राज्य पुष्प घोषित किया और इसको 01 सितम्बर 1981 को भारतीय डाकतार विभाग द्वारा 35 पैसे का ड़ाक टिकट भी प्रकाशित कर इसके महत्त्व को स्थान दिया है |भारत ही नही अन्य देशों बांग्लादेश ने 25 अगस्त 2004, थाईलैंड 1978 सहित अनेक देशों ने पलाश को सम्मान प्रदान किया है |भारतीय दर्शन में पलाश प्रकृति में नई चेतना उमंग ,खुशियों के रंगों का प्रतीक है,तो इस होली का धमार पलाश का रंग साथ |
लेख - पुष्पा शर्मा
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