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होली- लोकजीवन का बहुरंगी त्यौहार

होली- लोकजीवन का बहुरंगी त्यौहार

ऋतुएं हमारे जीवन को  प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं और चूँकि  भारतीय दर्शन पूर्णतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किकता पर आधारित है इसलिए यहाँ तीज-त्योहारों में भी यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है । अब आपको लग रहा होगा कि त्यौहार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का यह तालमेल शायद भारतीय दर्शन की महिमा का अतिशयोक्तिपूर्ण बखान करने का एक प्रयास किया जा रहा है क्योंकि मैकाले की शिक्षा पद्धति और पाश्चात्य दुनिया के प्रभाव ने हमारे भीतर इतनी गहरी पैठ जमा ली है कि आज हम बहुत अपनी संस्कृति पर ही प्रश्न चिन्ह लगाने और उसको हास्यास्पद बताने में तनिक भी संकोच नहीं  करते है । यही कारण है कि इस लेख में सोदाहरण इसे समझाने का प्रयास हमने किया है और फाग गीतों से उल्लसित वातावरण में होली से अच्छा भाला इसका और कौन सा उदाहरण हो सकता है । तो चलिए  भारतीय परम्परा और तीज-त्योहारों से सम्बंधित वैज्ञानिक पहलू को समझने के लिए हम होली के त्यौहार पर चर्चा करते हैं ।


होली का पर्व

भारतीय ऋतुओं के अनुसार होली का त्यौहार वसंत ऋतु में मनाया जाता है जब चहुँ ओर हरियाली बिखरी होती है। इस ऋतु के आने पर सर्दी कम हो जाती है, मौसम सुहावना हो जाता है, पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं, आम के पेड़ बौरों से लद जाते हैं और खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं । अतः राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है इसलिए  इसे ऋतुराज भी कहा गया है। इस ऋतु की विशेषता है वातावरण में न गर्मी और न सर्दी का होना, फूलों का खिलना, पौधो का हरा भरा होना और बर्फ का पिघलना । कुल मिलाकर जब प्रकृति अपने रंग बिखेर रही होती है उसी की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है “होली का त्यौहार” और इसीलिए इस त्यौहार में रंगों का महत्व है ।


आम का पेड़

भारतीय लोकजीवन में इतनी विविधताएँ विद्यमान हैं कि इसने रंगों के त्यौहार होली को भी  पर्याप्त विविधता दे डी है ठीक वैसे हे जैसे रंग-बिरंगे गुलाल इस त्यौहार की विशेषता हैं ।

जैसे होली पर होलिका दहन की परंपरा से तो हम सभी चिर-परिचित हैं पर क्या आप यह जानते हैं कि भारत के मध्यवर्ती  क्षेत्र में स्थित छत्तीसगढ़ प्रदेश में उरांव समुदाय द्वारा होलिका दहन के स्थान पर फगुआ काटने की परंपरा निभाई जाती है । पर आखिर यह फगुआ काटना होता क्या है ? चलिए जानते हैं – फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को अरंडी और सेमल की डंगालियों पर घास-फुंस लपेटी जाती है ताकि उस पर अच्छी तरह आग लगाई जा सके । इसके लिए समुदाय के युवा सम्बंधित स्थानों पर कटाई का काम करने लगते हैं ताकि कृषि योग्य भूमि पर से खरपतवारों और अवांछित पेड़-पौधों की सफाई की जा सके उसके बाद सभी को एकत्रित कर पाहन (स्थानीय बोली में पुजारी हेतु प्रयुक्त शब्द ) द्वारा अरंडी और सेमल की डंगालियों का दहन किया जाता है । जलती हुई डालियों को गांव के लोग तलवार या दूसरे धारदार हथियारों से काटते है । इसके बाद नृत्य और गायन करके उत्सव मनाया जाता है । ठीक यही परंपरा गोटुल में भी दिखलाई पड़ती है जिसमे अगले दिन इसी राख को शरीर में लगाकर होली खेली जाती है । इसमें युवाओं की भागदारी भी सुनिश्चित की जाती है जिसका अर्थ है इन रिवाजों के माध्यम से उन्हें आगामी कृषि गतविधियों हेतु प्रशिक्षित करना, खेत-खलिहानों को भावी कृषि के लिए तैयार करना और मनोरंजन के माध्यम से इस जटिल और कठिन परिश्रम से थके हुए मन और शरीर को पुनः स्फुरित करना जिसे आजकल पाश्चत्य सभ्यता में “स्ट्रेस मैनेजमेंट” की संज्ञा दी जाती है । फाग जलने से उठने वाले धुएं की दिशा देखकर पाहन और बड़े-बुजुर्ग ये बता देते हैं कि इस साल मानसून में बारिश कैसी होगी । यानि की “वेदर फोरकास्ट” की तकनीक भी हमारी लोक और वाचिक ज्ञान परंपरा में प्राचीनतम काल से ही विद्यमान है तब शायद आधुनिक विज्ञान को इसकी आवश्यकता भी समझ नहीं आई थी ।


होलिका दहन

कुछ क्षेत्रों में प्रचलित किवदंती प्रह्लाद और उसकी बुआ होलिका की कथा से कुछ अलग है । जैसे उत्तरी छत्तीसगढ़ और छोटा नागपुर क्षेत्र में एक सांसूडी सर्प की कथा सुनने को मिलते है जो लोगो ने तब देखा जब वे शिकार की खोज में जा रहे थे । इसे सांसूडी इसलिए कहा गया क्योंकि यह अपनी सांस से खीच कर ही लोगो को अपना निवाला बना लेता था  जिससे वहां के लोग त्रस्त हो गए थे । सभी ने इस विशालकाय सांप को मारने का निर्णय लिया। इस घटना के दौरान एक महिला के सुझाव पर धधकते आग को लेकर उस रास्ते से गुजरने का निर्णय लिया गया। जैसे ही महिला आग को माथे पर लेकर से रास्ते से गुजरने लगी, तो उस सांप ने उसे अपनी ओर खींच लिया। उसके बाद आग और राख से सांप अंधा हो गया। जिसके बाद लोगों ने उसे मार दिया। सांप सेमल के पेड़ पर रहता था। आदिवासियों ने उस पेड़ में सूखे खैर बांधकर आग लगा दी, ताकि कोई दूसरा सांप अगर हो, तो वह भी जिन्दा न रहे। इसलिए फाल्गुन पूर्णिमा के दिन कुछ जनजातियों में सेमल की डाली पर खैर बांधकर जलाने की परंपरा है । 


सेमल वृक्ष द्वारा होलिका दहन

इसी तरह दक्षिणी छत्तीसगढ़ में प्रचलित कथा में सोनो और रूपो नाम के गिद्ध रुपी राक्षसों  का  वर्णन मिलता है । इस कथा के अनुसार एक दिन जनजातीय समुदाय के लोग  इन राक्षसों से पीड़ित होकर रक्षा करने की विनती लेकर भगवान शंकर के पास गए । ये गिद्ध रुपी राक्षस लोगो के बच्चों को अपना आहार बना लेते थे, जो वहां के रहवासियों के लिए बड़ी समस्या थी । महादेव के आदेश पर लोहार ने 12 मन का धनुष और नौ मन का तीर बनाया और ठीक फागू चंदो अर्थात फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एक मचान बनाकर भगवान महादेव वहां बैठ गए और पूर्णिमा की चांद की रोशनी से देखकर पेड़ पर बैठे दोनों गिद्धों को मार गिराया। उसके पश्चात उस सेमल के पेड़ पर और कोई राक्षस ना रह सके, इसके लिए गांव वालों ने सेमल के पेड़ को आग लगाकर जला दिया । स्वयं भोलेनाथ द्वारा इस संकट से आजीवन मुक्ति मिल  जाने की  खुशी में अगले दिन उस क्षेत्र के वनवासियों ने उत्सव मनाया  उसके बाद से ही फाल्गुन पूर्णिमा के  दिन सेमल के पेड़ को जलाने की परंपरा और दूसरे दिन उत्सव मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई, जो आज भी चल रही है । मान्यता कुछ भी हो  चाहे सांप, चाहे गिद्ध या होलिका, मूल सार तो यही है कि  भारतीय दर्शन के अनुसार सदैव नैतिकता की ही जीत होगी और  यही इस उत्सव को मनाये जाने का प्रमुख कारण है ।

चलिए मान्यताओं से हटकर अब हम उत्सव की मुख्य पहचान यानी रंग खेलने की चर्चा करते हैं । क्या होली के रंगों को  घर पर ही तैयार किया जा सकता है ? उत्तर है – हाँ । आज जहाँ नगरीय समाज में होली के रंगों में रासायनिक तत्वों के  दुष्प्रभाव से बहुतों के लिए रंगों का यह त्यौहार बेरंग हो जाता है वही हमारी ज्ञान परंपरा  ऐसे बहुत से नुस्खे उपलब्ध है जिससे आप सुरक्षित और केमिकल फ्री होली मन सकते हैं । तो आइये सबसे पहले हरे रंग से आरम्भ करते हैं  सुखा हरा रंग तैयार करने के लिए हिना/मेहंदी को सुखाकर उसमे कोई भी  आटा मिलकर हरा रंग तैयार कर लेते है । हरे रंग का पानी तैयार करने के लिए भी अनोखी तकनीक अपनाई जाती है एक लीटर पानी में मेहंदी (लगभग 1 चम्मच) अच्छी तरह से मिला लिया जाए और इसमें पालक, धनिया, पुदीना और तुलसी की ताजी हरी पत्तियों के रस को मिलाया जाए, औषधीय गुणों से भरपूर ये हरे रंग आपके त्योहार का मजा दुगुना ज़रूर कर देंगे ।


शहरी होली

अब हम लाल रंग बनाने की विधि जानते है जो इस त्यौहार में तो लाल गुलाल का काम करेगा ही बाद में आप इसका इस्तेमाल कंडिशनर के तौर पर भी कर सकते हैं । लाल रंग तैयार करने के लिए गुड़हल (हिबिस्कस) के बहुत सारे ताज़े फूल एकत्रित किये जाते हैं  और इन्हें छाँव में सुखा लिया जाता है जिसे बाद में कुचलकर चूर्ण बना लिया जाता है । इस तरह बहुत कम खर्च और कम समय में सुर्ख लाल गुलाल आपके पास उपलब्ध है । 


गुड़हल पुष्प से निर्मित गुलाल

दक्षिण भारत की प्रसिद्धी के अनेक कारणों में से एक है चन्दन की उपलब्धता ! आमतौर पर फेस पैक की तरह प्रयोग किया जाने वाला लाल चन्दन इस क्षेत्र के जनजातीय समुदाय द्वारा लाल गुलाल की तर्ज पर किया जाता है इससे आपके चेहरे  की रंगत तो खिलेगी ही औषधिय गुणों से युक्त होने के कारण यह त्वचा पर सूक्ष्मजीवी संक्रमण को दूर करने में मदद करता है । गुलाबी रंग के लिए चुकंदर (बीट रूट ), केसरिया रंग के लिए टेसू के फूल जिसे पलाश या ढाक भी कहते हैं, पीला रंग बनाने के लिए हल्दी या बेसन, भूरा रंग के लिए कत्था , काला रंग के लिए आंवले के फल और लोहे का पात्र, सुर्ख तरल लाल रंग के लिए सिंदूरी के बीज यदि हम और रंगों तथा उन्हें बनाने की तकनीकों पर बात करें तो निश्चय ही यह सूची बहुत लम्बी हो जाएगी ।

 आज की भागदौड़ भरी जीवन शैली में इन नुस्खों को अजमाना तो दूर हमे इतनी भी फुर्सत नही की हम उनका इस्तेमाल कर सकें लेकिन गांवों में वनों के आस-पास रहने वाले लोगों  के पास छुपे इस खजाने के बारे में जानकर आप यह सोचने पर अवश्य विवश हो जायेंगे की हमारे पूर्वज कितने ज्ञानी और सरल जीवन शैली के पुरोधा रहें हैं ।

बाज़ार में बिकने वाले अधिकांश रंग न केवल हमारे नेत्रों, त्वचा और न जाने कितनी ही अंगों पर अपना दुष्प्रभाव छोड़ने के साथ-साथ पर्यावरण पर भी दुष्प्रभाव डालते है वहीँ औषधिय गुणों से युक्त ये प्राकृतिक रंग के उपयोग से हमारे त्यौहार का मज़ा दुगुना किया जा सकता है । तीज-त्योहारों के साथ सेहत का ख्याल ऐसी युक्ति केवल इन प्रकृति  पुत्रों के द्वारा ही संभव है । इस आलेख को अपना कीमती समय देने के लिए आपका बहुत आभार और साथ ही  एक आग्रह भी कि, इस आलेख को पढ़ने के बाद जब आपकी भेंट किसी ऐसी विचारधारा वाले व्यक्ति से जो इन त्योहारों और इन्हें मानने वालों को पिछड़ा, अनपढ़ या अज्ञानी कहे तब इन मान्यताओं से जुड़े दर्शन और उनमें निहित वैज्ञानिक सोच से अवगत करा कर उनका भ्रम अवश्य तोड़ियेगा ।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
रायपुर

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