बस्तर के भूमकाल विद्रोह के कारण एवं गुण्डाधुर की भूमिका
February 10, 2022
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

बस्तर अपनी जनजातीय संस्कृति एवं प्राकृतिक सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है । बस्तर का प्रवेश द्वार केसकाल ही बस्तर की जनजातीय कला एवं संस्कृति, धरोहर के रूप में अनेक प्राचीन भग्नावशेष, कल-कल छल-छल करते झरने एवं जलप्रपात बस्तर की प्राकृतिक एवं पुरातात्विक वैभव का आभास करा देता है।
केसकाल में दर्जन भर से अधिक जलप्रपात और झरने हैं, किन्तु ये बाहरी दुनिया से अज्ञात या अल्पज्ञात ही हैं। इन्ही जलप्रपातों में से एक मोहक जलप्रपात है हिता पुंगार घुमर। यहां तक पहुंचने के लिए पहले केसकाल से 30 किलो मीटर दूर ग्राम धनोरा पहुंचना होगा। धनोरा से लगभग 6 किलोमीटर कोरकोटी नामक गांव है।
कोरकोटी गांव से जंगल एवं पहाड़ी रास्ते से पैदल चलना पड़ेगा तब आपको मिलेगा तुड़ेका मट्टा नामक पहाड़़ी। इसी पहाड़ी पर है एक जलप्रपात जिसे हिता पुंगार घुमर के नाम से जाना जाता है। दूसरा मार्ग है राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित ग्राम बटराली से बावनीमारी, रावबेड़ा मारी, बेड़मा मारी, होते हुए उपरबेदी तक कच्चा मार्ग है।
इस मार्ग से जलप्रपात के समीप (पहाड़ी के ठीक ऊपर) तक दुपहिया वाहन से पहुंचा जा सकता है। चारपहिया वाहन भी जा सकता है लेकिन कुछ अवरोधों का सामना करना पड़ सकता है। जलप्रपात की सुन्दरता निहारने के लिए पहाड़ी के नीचे तक उतरना आवश्यक है। नीचे जाने के लिए गाईड के रूप में कोई ग्रामीण हो तो ज्यादा अच्छा है क्योंकि नीचे उतरने के लिए कोई सुगम मार्ग नही है।

हितापुंगार की वादियाँ
बहुत दूर से चल कर चक्कर काटते हुए झाड़ियो के सहारे, पत्थरों पर सावधानी पूर्वक पैर रखते हुए उतरना पड़ता है। जलप्रपात तक पहुंचते ही नयनाभिराम दृश्य देख कर पहाड़ी यात्रा की सारी थकान स्वतः दूर हो जाती है। वैसे तो यह जलप्रपात बारहमासी है पर अक्टूबर से फरवरी तक का समय भ्रमण के लिए ज्यादा उपयुक्त है।
जलप्रपात के आस-पास ऊपर पठार तक पत्थरों की प्राकृतिक दीवार है। इस दीवार की अद्भुत संरचना प्रकृति की स्वभाविक कला धर्मिता को प्रदर्शित करती है। नीचे की ओर नजरें डालें तो गहरी खाई है, जो हरी भरी वादियों से ढंकी हुई है। दूसरी ओर नजर घुमाएं तो पूरा पहाड़ घने जंगलों से आच्छादित है।
जलप्रपात के आस-पास ऊँचे-ऊँचे इमली के पेड़ हैं। इमली को गोंडी जनभाषा में हिता और फूल को पुंगार कहते हैं अर्थात इमली के फूल को हिता पुंगार कहा जाता है। लम्बी अवधि तक खिले रहने वाले रक्तिम पीले रंग के ये इमली के फूल मोहक लगते हैं, संभवतः इन्ही इमली के मोहक फूलों के कारण इस जलप्रपात को हिता पुंगार (इमली फूल) घुमर कहते हैं।
जलप्रपात से कुछ ही दूरी पर पठार का एक भूमिगत जलधारा इन इमली के पेड़ों पर गिरता है, पेड़ों से टकरा कर जलधारा का पानी बिखर जाता है। और बिखर कर इमली की पत्तियों से फिसलता हुआ नीचे झरता है तो ऐसा लगता है मानों बिन बादल वर्षा हो रही है।
पत्थरों की संरचना के बीच-बीच में खोह है, ग्रामीणों द्वारा बताया जाता है कि ये खोह भालुओं का निवास स्थान है इसलिए इन गुफाओं को भालू गड़दा कहते हैं। ( गुफा या सुरंग को स्थानीय लोग गड़दा कहते हैं) खोह में भालू हमेशा नही रहते फिर भी सुरक्षा के लिए सावधानी आवश्यक है।

आदिमानवों द्वारा निर्मित शैलचित्र एवं उनका आराधना स्थल
जलप्रपात का स्वच्छ जल और पास में सुरक्षित खोह होने के कारण पहले यहां आदिमानवों का पसंदीदा निवास स्थान था। आस-पास हजारों वर्ष पूर्व आदिमानव द्वारा बनाये गये अनेक शैलचित्र हैं। इन शैलचित्रों में गलबहियां डाले युवक-युवतियां सामूहिकं नृत्य करते हुए दिखते हैं, नीचे हाथ के पंजो के निशान हैं।
अन्य शैलचित्र भी हैं दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि ये कोई यंत्र हैं या अस्त्र-शस्त्र हैं अथवा कुछ अन्य आकृति। अब तक श्ैलचित्रों का कोई विशेषज्ञ या जानकार यहां नहीं पहुंच पाया है। गहन अध्ययन एवं विश्लेषण के बाद ही इन शैलचित्रों के सम्बंध में कोई निश्चित अवधारणा बन सकती है। गेरुए रंग से बने ये शैलचित्र मानव दखलंदाजी न होने के कारण अभी तक सुरक्षित हैं।
लिंगदरहा जलप्रपात तक सुगम मार्ग होने के कारण लोगों का आना जाना ज्यादा है। शैलचित्रों के पुरातात्विक महत्व से अनभिज्ञ होने के कारण लोग छेड़छाड़ कर इन्हें विकृत कर रहे हैं, जिससे इन शैलचित्रों की मौलिकता नष्ट हो रही है। डर है कि यहां भी लोगों की भीड़ बढ़ने से पुरखों के इस धरोहर को छेड़छाड़ कर विकृत किया जा सकता है ।

आदिमानवों का शैलाश्रय
हरी-भरी वादी, दीवार की तरह पत्थरों की अद्भुत संरचना, इन दीवारों के बीच खोह, गगनचुंबी इमली के पेड़, पुरातात्विक महत्व के शैलचित्र, भूमिगत जलधारा की फुहार, और बीच में लगभग 80 फुट ऊपर से गिरता हुआ उज्ज्वल जलधारा, कलकल, छलछल निनाद करते हुए इस जलधारा का वादियों में विलुप्त हो जाना ये सब अद्भुत नजारा है।
दिन में सूर्य का प्रकाश सीधा पड़ने से इस जलप्रपात में इन्द्र धनुष उभर आता है। जलप्रपात के आस-पास का दृश्य ही इन्द्रधनुषी है कहें तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। चारों ओर नजरें घुमायें तो इस नयनाभिराम दृश्य को देख कर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति सोलह श्रृंगार कर यहां बैठी है और अपनी सुन्दरता दिखाने के लिए सैलानियों की प्रतीक्षा कर रही है।
आलेख
घनश्याम सिंह नाग
ग्राम पोस्ट-बहीगाँव जिला कोण्डागाँव छ.ग.
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