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सुजननिकी (यूजैनिक्स): हिन्दुओं में विवाह प्रणाली का मूलभूत आधार-एक परिचर्चा

सुजननिकी (यूजैनिक्स): हिन्दुओं में विवाह प्रणाली का मूलभूत आधार-एक परिचर्चा

पाश्चात्य देशों में यूजैनिक्स अर्थात् सुजननिकी / सुजनशास्त्र को जातिगत संस्कृति का विज्ञान माना गया है। जिस प्रकार कृषक का लक्ष्य होता है उन्नत से उन्नत बीज बोकर स्वस्थ फलदायी फसल पैदा करना, ठीक उसी प्रकार सुजनन शास्त्री का उद्देश्य होता है कि मानव जाति में उन्नत सदस्यों की वृद्धि करें जो शारीरिक एवं मानसिक रूप से उच्चतर हों। वह मानव से सम्बन्धित वस्तुओं जैसे उसके शरीर के गठन, त्वचा का रंग, उसकी आदतें, व्यवहार, उपलब्धियों इत्यादि में सुधार लाना चाहता है।


 
मनुष्यों की आनुवंशिक गुणवत्ता में सुधार हेतु अध्ययन

मनुष्य, प्राणी जगत की अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं श्रेष्ठतम प्रजाति है। सुजनन शास्त्र जैसे विषय पर वैज्ञानिकों ने समुचित ध्यान नहीं दिया है। आज जब जटिल रोगों, अनुवांशिकता से उत्पन्न विकराल परिस्थितियों से चिकित्सकों एवं आयुर्विज्ञानिकों को जूझना पड़ रहा है तो एक बार फिर सुजननिकी को एक तकनीक के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। "डिजाइनर भ्रूण" क्लोनिंग, टेस्ट ट्यूब में भ्रूण का विकास, डी.एन.ए. से प्राप्त उन जीनों का प्रत्यारोपण, जो आने वाले शिशुओं में अनुवांशिक परिवर्तन कर दे, इत्यादि से सम्बन्धित शोध कार्यों में वैज्ञानिक तल्लीन हैं।


आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) प्रक्रिया

क्या यह प्रयास सुजननिकी के अंतर्गत नहीं हो रहे हैं? भारतीय संस्कृति की संरचना करने वालों ने आदिकाल से इस विषय पर ध्यान दिया है एवं इसकी महत्ता को जाना है। वैदिक काल, महाकाव्य काल इत्यादि सभी दर्शाते हैं कि प्राचीन काल में हिन्दुओं ने किस प्रकार इस उपयोगी विज्ञान के मूल सिद्धान्तों को अपने व्यवहार में समायोजित किया और आदिकाल से इन तत्वों पर आधारित प्रथाओं का वंशानुवंश पालन करते हुए इक्कीसवीं शताब्दी में कदम रखने जा रहे हैं।


भारत के प्राचीन मंदिर शिल्प में अंकन वरमूर्तिश्वरर मंदिर (1000 वर्ष पुराना) 

यूरोप एवं अमेरिका सुजननशास्त्र के महत्व को पहचान रहे हैं किन्तु इसके क्रियान्वयन हेतु न कोई कानून बनाने में सक्षम हैं और न ही इस पर आधारित किसी परम्परा का प्रतिपादन ही करने में सफल हुए हैं। हिन्दुओं ने इस विज्ञान के महत्व, इसके सिद्धान्तों की सभ्यता एवं इच्छित परिणाम देने की क्षमता को परखा। इसके नियमों का उपयोग उन्होंने सामाजिक संरचना में इस प्रकार किया कि उपर्युक्त सभी कालों में शान्ति, समृद्धि एवं चतुर्मुखी उन्नति बनी रही।

यह स्वतः सिद्ध सत्य है कि किसी भी प्रजाति के विकास में महत्वपूर्ण होता है बीज। हिन्दू गाथाओं में सृष्टि की उत्पत्ति की कहानी का प्रारम्भ होता है हिरण्यगर्भ से। इसको ब्रह्माण्ड अथवा सर्वोच्च अण्ड भी कहा गया है। शुक्र अथवा वीर्य जैसे शब्द को उसका पर्यायवाची माना गया। वीर्य अथवा मानव बीज ही वह प्रथम विषय वस्तु है जिसका अध्ययन सुजनन शास्त्र में होता है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य के पालन पर विशेष महत्व दिया गया है।


हिरण्यगर्भ का प्रतीकात्मक चित्र

संक्षेप में ब्रह्मचर्य अविवाहित रहकर बीज को परिपक्व करने की विधि है जहां शिक्षार्थियों को ब्रह्मचर्य का व्रत लेना अनिवार्य था। ऐसे ब्रह्मचारियों का समाज में आदर एवं सम्मान होता था क्योंकि यही भावी पीढ़ी के जन्मदाता थे। तपस्या करके यह यथोचित ज्ञान उपार्जन करते थे। भावावेश पर नियंत्रण रखने की कला भी सीखते थे। ये दोनों अर्थात् यथोचित ज्ञान एवं भावावेश पर नियंत्रण, एक स्वस्थ पीढ़ी के जन्म और गृहस्थ नागरिक बनने हेतु आवश्यक योग्यताएं थीं।


गुरुकुलों में ब्रह्मचर्य की शिक्षा

25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचारी रहने के पश्चात ही गृहस्थ आश्रम में प्रवेश हेतु व्यक्ति को योग्य माना जाता था। अतएव यह स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय समाज ने मानव बीज के संरक्षण एवं परिपक्वता पर विशेष बल दिया। जो व्यक्ति इनको जीवन भर शिरोधार्य करता था उसको आदित्य ब्रह्मचारी कहकर सम्मान दिया जाता था। विवाह की योग्यता हेतु 25 वर्ष की न्यूनतम आयु तक ब्रह्मचारी रहना अनिवार्य था।

Ram Sita Wedding - Indian Miniature Painting From Ramayan - Vintage Indian  Art - Framed Prints
ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थ आश्रम में प्रवेश

जो उपर्युक्त योग्यता का अनादर करता था वह निन्दनीय था। उपनिषद में श्वेतकेतु के पिता पर केन्द्रित गाथा में वह स्वयं जनेऊ धारण से वंचित कर दिया जाता है एवं अपमानित होता है क्योंकि उसने अपने पुत्र को निर्धारित आयु सीमा के अन्दर ब्रह्मचारी नहीं बनाया। सुजननिकी में बीज के पश्चात् महत्व होता है साहचर्य पर जिसका हिन्दू-आचार संहिता में विशेष स्थान है। वह व्यक्ति जो मानसिक रूप से असामान्य हो, मनोरोगी हो, संक्रामक रोग से ग्रस्त हो, कुष्ठ रोगी हो, उपदंश (सिफलिस), मेह (गनोरिया), गठिया इत्यादि रोगों से प्रभावित हो उसे विवाह न करने का निर्देश है। दूसरी ओर जिसने ब्रह्मचर्य का 25 वर्ष पालन किया हो उसे भी सहचरी चुनने की स्वतन्त्रता नहीं थी।


उपनिषद में श्वेतकेतु की कथा

नियमानुसार उस पर अंकुश था कि वह बिना समझे बूझे किसी स्त्री को गर्भवती न कर सके अर्थात् भावावेश में कुछ भी करने की अनुमति नहीं थी। इस प्रकार समाज का आधार था वंशागति एवं अनुवांशिकता पोषित अनुशासन। यही सिद्धान्त बना विवाह पद्धति की नींव का पत्थर। यह सर्वविदित है कि बीज न केवल भौतिक गुणों (अर्थात् शारीरिक गुणों) के भण्डार हैं अपितु बौद्धिक एवं नैतिक मूल्यों के भी। इन वंशागत प्रवृत्तियों का अभ्यास कर उनमें गुणवत्ता कूट-कूट कर भरी जाती थी जो प्रत्येक माता-पिता अपनी सन्तान को विरासत में देते थे।

इस प्रकार भावी पीढ़ियां प्राप्त संस्कारों को अपनी अगली पीढ़ी को देकर यह सिलसिला निरन्तर चलाने में सहयोग देते थे। जातियों की संरचना का गौण स्वरूप था वह समूह जिसके सदस्य समूह के भीतर विवाह करें एवं उसी व्यवसाय को गतिशील रखें, जिसे समूह ने मौलिक रूप से अपनाया है। इस प्रकार विभिन्न व्यवसायों पर केन्द्रित समूह की व्यावसायिक परम्पराओं को अविच्छिन्न बनाए रखा गया। सम्बन्धित व्यावसायिक समूहों के सदस्य अपनी जाति में ही विवाह को प्राथमिकता देते थे।

यद्यपि जाति कोई छोटा समूह नहीं हुआ करता था। चूंकि निकट सम्बन्धियों में विवाह करने से प्रजनन सम्बन्धी जन्मगत विकार होने की सम्भावना है अतः समाज ने सपिण्डों में विवाह को अवैध माना अर्थात् उन व्यक्तियों में विवाह सम्बन्ध नहीं हो सकते जिनके पुरखे एक हों। अतः एक ऋषि की संतानों के मध्य परस्पर विवाह पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इस प्रकार वर के पिता, वर की मां के पिता, वर की मां की मां के पिता एवं पिता की मां के पिता के वंशजों के मध्य विवाह प्रतिबन्धित कर दिया।

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हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सगोत्रीय विवाह वर्जित

वहां दूसरी ओर आदि पुराण में अनेक उदाहरण हैं जहां सुदूर भू-भागों में रहने वाले निवासियों के साथ वैवाहिक सम्बन्धों को प्राथमिकता दी गई। इतिहास साक्षी है कि हिन्दू राजाओं ने ग्रीस की राजकुमारियों के साथ विवाह किए। अनेक उदाहरण हैं जहां भारतीयों ने नेपाली, तिब्बती, काबुली एवं फारसी पुत्रियों के साथ विवाह किये।

कैकेई, जो काबुल के राजा की पुत्री थीं, उनसे राजा दशरथ ने विवाह किया था। ऐसे विवाहों के उदाहरण रामायण, महाभारत तथा कालिदास के काव्यों में मिलते हैं। जहां एक ओर अच्छी नस्ल के निर्माण हेतु सुजननिकी के नियमों का प्रतिपादन किया गया वहीं दूसरी ओर वर्णसंकरों को तिरस्कृत किया गया। समाज में धारणा थी कि वर्णसंकर की उत्पत्ति का कारण है कामोत्तेजना के अधीन भावावेश में पारस्परिक सम्बन्ध।

किन्तु मनु ऐसे सम्बन्धों को प्रोत्साहन देते हैं यदि ऐसे सम्बन्धों का ध्येय रहता है जाति में उच्चतर बुद्धि, प्रखर ज्ञान, उच्च कार्यकुशलता अर्थात् जाति के गुणात्मक विकास का बीजारोपण। किन्तु इन सम्बन्धों में पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं थी। नियंत्रण इस प्रकार समाज का आधार था वंशागति एवं अनुवांशिकता पोषित अनुशासन। यही सिद्धान्त बना विवाह पद्धति की नींव का पत्थर। यह सर्वविदित है कि बीज न केवल भौतिक गुणों (अर्थात् शारीरिक गुणों) के भण्डार हैं अपितु बौद्धिक एवं नैतिक मूल्यों के भी।

इन वंशागत प्रवृत्तियों का अभ्यास कर उनमें गुणवत्ता कूट-कूट कर भरी जाती थी जो प्रत्येक माता-पिता अपनी सन्तान को विरासत में देते थे। इस प्रकार भावी पीढ़ियां प्राप्त संस्कारों को अपनी अगली पीढ़ी को देकर यह सिलसिला निरन्तर चलाने में सहयोग देते थे। जातियों की संरचना का गौण स्वरूप था वह समूह जिसके सदस्य समूह के भीतर विवाह करें एवं उसी व्यवसाय को गतिशील रखें, जिसे समूह ने मौलिक रूप से अपनाया है।

इस प्रकार विभिन्न व्यवसायों पर केन्द्रित समूह की व्यावसायिक परम्पराओं को अविच्छिन्न बनाए रखा गया। सम्बन्धित व्यावसायिक समूहों के सदस्य अपनी जाति में ही विवाह को प्राथमिकता देते थे। यद्यपि जाति कोई छोटा समूह नहीं हुआ करता था। चूंकि निकट सम्बन्धियों में विवाह करने से प्रजनन सम्बन्धी जन्मगत विकार होने की सम्भावना है अतः समाज ने सपिण्डों में विवाह को अवैध माना अर्थात् उन व्यक्तियों में विवाह सम्बन्ध नहीं हो सकते जिनके पुरखे एक हों।

Consanguinity, Genetics and Art, Part 2 — Metis Genetics

उदाहरणस्वरूप अर्जुन भी कुरुक्षेत्र के युद्ध में सेना की अवश्यंभावी पराजय का विलाप करते हैं क्योंकि इस पराजय के परिणामस्वरूप मिश्रित जातियों का पदार्पण होना सुनिश्चित था एवं उसके फलस्वरूप तत्कालीन भारतीय समाज की प्रथाओं, संस्कारों एवं रीतियों का पतन होने की सम्भावना का उन्हें आभास था।

विज्ञान जगत में सुजननिकी की परिस्थिति का अवलोकन करें तो इसके अंग्रेजी पर्यायवाची शब्द यूजैनिक्स का प्रयोग सर्वप्रथम 1884 में सर फ्रांसिस गाल्टन ने लन्दन के समाज वैज्ञानिकों की सभा को सम्बोधन के दौरान किया था तथा इस विषय की परिभाषा, उसके आयाम एवं इससे सम्बन्धित परिकल्पनाओं का विस्तृत ब्योरा दिया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुजननिकी सामाजिक नियंत्रण के अंतर्गत उन माध्यमों का अध्ययन है जो भावी पीढ़ियों में जातीय गुणों के शारीरिक एवं मानसिक उन्नति एवं विकास अथवा पतन के उत्तरदायी होंगे।

सर गाल्टन सम्भवतः हिन्दुओं के प्राचीनतम सुजननशास्त्र के सैद्धान्तिक नियमों की ही वैज्ञानिक व्याख्या कर रहे थे क्योंकि उन्हें यह विदित था कि हिन्दू आदिकाल से ही यूजैनिक्स को धर्माचार की परिधि में लाकर उनके नियमों का अनुपालन समाज में करवा रहे थे। विवाह के विषय में अनुवांशिकता एवं परिवेश / परिस्थितिकी के महत्वपूर्ण मुद्दे थे जो पात्र/पात्री की योग्यता अथवा जाति की सदस्यता का निर्धारण करते थे। इस आधार पर उन वर्गों, प्रकारों तथा सम्बन्धियों के मध्य विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया गया जिनसे जाति के वंशानुगत गुणों का पतन होता हो।

वैदिक एवं पौराणिक काल में भी यूजैनिक्स के नियमों का पालन किया जाता रहा था। बाणभट्ट, सुश्रुत एवं चरक के उपचार सम्बन्धी शोध कार्यों में उपर्युक्त नियमों का प्रचुर उल्लेख मिलता है। यह तथ्य सर्वप्रथम प्रतिपादित किया गया कि ज्ञानोपार्जन एक अच्छे नागरिक की रचना में सहायक होता है। ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक पदार्थ, जैसे-दूध, चावल गेहूँ, फल इत्यादि के सेवन को नागरिक के अच्छे स्वास्थ्य का मूलाधार माना गया।

वैदिक काल में ऋषियों ने जिन स्तुतियों का सृजन किया वह विवाह के अनेक अनुष्ठानों में दोहरायी जाती हैं, वे इस तथ्य की साक्षी है कि विवाह सम्बन्धित रीतियों के प्रत्येक चरण में सुजननिकी के नियमों का प्रतिपादन होता है। मनु एवं याज्ञवल्क्य जैसे शास्त्रियों ने सुजननिकी के आधार पर लोकाचार की नींव रखी। मध्यकाल में इन नियमों के अनुपालन में लचीलापन देखने को मिला। परिणामस्वरूप रक्तमिश्रण अर्थात् अन्तर्जातीय विवाह की परम्परा की नींव पड़ी।

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असंगत विवाह एवं प्रतिबंधविहीन गर्भधारण ने समाज में विसंगतियों को जन्म दिया और यह क्रम महाभारत के पश्चात् पुराणकाल तक चलता रहा। दूसरी ओर जिन जातियों ने सुजननिकी के नियमों का पालन किया उनकी वंशधारा में अपेक्षित उन्नति एवं विकास की धारा अनवरत चलती रही। उपरति के रूप में योग एवं योगक्रिया जैसी विधाएं सुजननिकी के नियमों के पालन में सहायक सिद्ध हुई।

विवाह सम्बन्धों के निर्धारण में गोत्र एवं प्रवर का ध्यान रखा जाता था। यह चेष्टा की जाती थी कि विवाह सजातीय सदस्यों एवं सहनिवासियों के मध्य हो। यदि कोई उचित वर/ वधू न मिले तो अन्य स्थान के निवासियों के मध्य सम्बन्ध किये जाते थे। समान रक्त एवं सगोत्री सम्बन्धियों के साथ सम्बन्ध नहीं किये जाते थे। ऋषियों ने गोत्रों एवं प्रवरों को अपना नाम दिया। आज भी सगोत्रों एवं सपिण्डों अर्थात् एक ही पूर्वजों के मध्य विवाह वर्जित है।

सप्त ऋषि - बालसंस्कार हिंदी
सप्त ऋषि जिनके नाम से कई गोत्रो का प्रादुर्भाव हुआ

यहां यह पुनः दोहरा देना आवश्यक होगा कि वैदिक काल में ब्राह्मण एवं क्षत्रिय अनन्य जातियां नहीं थीं। वे केवल सामाजिक वर्ग थे। एक वर्ग दूसरे वर्ग के बराबर माना जाता था एवं आपस में वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित हो जाते थे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें स्पष्ट है कि यदि किसी ब्राह्मण ने जातिसंगत कार्य नहीं किया तो उसे समाज में पूर्वनिश्चित स्थान नहीं दिया गया।

अतः उपर्युक्त मीमांसा से यह निष्कर्ष निकालना अनुचित न होगा कि जाति की संरचना के आधारों में एक महत्वपूर्ण आधार था सुजननिकी का नियम। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य था समाज में सक्षम बुद्धिजीवियों का विकास।

डॉ० सुरजीत चन्द सिन्हा, भूतपूर्व निदेशक, भारतीय मानव विज्ञान एवं भूतपूर्व उपाचार्य, विश्वभारती ने "बंगाल के ब्राह्मण" शीर्षक पुस्तक के प्राक्कथन में लिखा 'प्रोफेसर थ्योडोर डाब्जहैन्सकी ने 1960 में वार्तालाप के मध्य एक बार टिप्पणी की कि मानवजाति के इतिहास में भारतीय जाति व्यवस्था वह विशाल, दीर्घकालीन सुजननिकी अनुसंधान प्रक्रिया है जिसे शारीरिक एवं सांस्कृतिक मानव वैज्ञानिकों को मिलकर समझने का प्रयास करना चाहिये जिससे उनमें निहित सामाजिक संरचना के सूत्रों को उजागर करना चाहिये"।

लेख-
शिबानी राय
संस्कृति, नई दिल्ली

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