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अनोखी त्यागमूर्ति श्रवणा

अनोखी त्यागमूर्ति श्रवणा


भगवान श्रीराम की कथा हमारे समाज की सबसे बड़ी विशेषता यानी 'एकात्मता' का सर्वोत्कृष्ट आख्यान है। रामकिसन खंडेलवाल जी द्वारा रचित यह आलेख भारतीय संस्कृति की इस विशेषता को अपने जीवन में चरितार्थ करने वाली रामकथा की महत्त्वपूर्ण पात्र त्यागमूर्ति 'श्रवणा' (शबरी) के जीवन का अत्यन्त मार्मिक, और प्रेरक चित्रण प्रस्तुत करता है। किस प्रकार एक भील कन्या ने मूक पशुओं की रक्षा के लिए अपने विवाह और घर का त्याग कर दिया, और कैसे उन्होंने अपनी सम्पूर्ण 'शबर' जाति के गौरव के लिए अपना मूल नाम त्यागकर स्वयं को 'शबरी' कहलाना स्वीकार किया, यह इस लेख का प्रधान कथ्य है।


भारतीय संस्कृति, और रामायण के पावन इतिहास में शबरी का नाम केवल एक पात्र नहीं, अपितु अटूट विश्वास, धैर्य, और निःस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है। हम प्रायः उन्हें शबरी के नाम से ही जानते हैं, परन्तु उनके इस नाम के पीछे छिपे त्याग, और उनके मूल नाम 'श्रवणा' की गाथा अत्यन्त प्रेरणादायी है। श्रवणा, जो कालान्तर में शबरी के नाम से प्रसिद्ध हुई, उनका जन्म जंगलों में रहने वाली शबर (भील) जाति के परिवार में हुआ था। शबर जाति का मुख्य व्यवसाय आखेट अर्थात् शिकार था। श्रवणा का बचपन इन्हीं हिंसक परिवेशों के बीच बीता, किन्तु उनके हृदय में जन्मजात करुणा की एक मन्द धारा प्रवाहित थी।

जब श्रवणा विवाह के योग्य हुईं, तो उनके पिता ने कुल की परम्परा के अनुसार उनका विवाह वागदत्त नामक युवक से तय कर दिया। विवाह की तैयारियां जोर शोर से आरम्भ हुईं। परन्तु इसी बीच एक ऐसी घटना घटी जिसने श्रवणा के जीवन की दिशा ही बदल दी। विवाह से कुछ दिन पूर्व श्रवणा ने देखा कि उनके घर के पास बने बाड़ों, और कटघरों में सैकड़ों मूक पशु पक्षियों को बन्दी बनाकर लाया जा रहा है। उनकी चीखें, और भयभीत आंखें देखकर श्रवणा का हृदय द्रवित हो उठा। जब उन्होंने अपने पिता से इसका कारण पूछा, तो उत्तर मिला कि पुत्री तुम्हारी बारात में आने वाले अतिथियों, और जाति-बिरादरी के भोजन के लिए इन पशुओं की बलि दी जाएगी।

यह सुनकर श्रवणा स्तब्ध रह गईं। उनके मन में यह विचार कौन्धा कि जिस गृहस्थ जीवन का आरम्भ ही सहस्रों निर्दोष जीवों की हत्या, और रक्तपात से हो, वह सुखद कैसे हो सकता है। उन्होंने पिता से विनय की कि इन निरीह प्राणियों को मुक्त कर दिया जाए, और शाकाहारी भोजन से स्वागत किया जाए। परन्तु पिता ने कुल की मर्यादा, और लोक लाज का वास्ता देकर उनकी मांग ठुकरा दी। पिता का तर्क था कि यदि मांस नहीं परोसा गया, तो समाज में उनका अपमान होगा।

यही वह क्षण था जब श्रवणा ने एक बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने सोचा कि यदि मेरे विवाह के कारण ये हत्याएं होने वाली हैं, तो मैं विवाह ही नहीं करूंगी। एक रात जब सब सो रहे थे, श्रवणा ने दबे पाँव जाकर उन सभी बाड़ों के द्वार खोल दिए। सैकड़ों जानवर जंगल की ओर भाग गए। इसके साथ ही श्रवणा ने भी अपने सांसारिक मोह के बन्धन तोड़ दिए, और अन्धेरी रात में अज्ञात दिशा की ओर निकल पड़ीं।

बालिका शबरी के ह्रदय में थी अपार करुणा
बालिका शबरी के ह्रदय में थी अपार करुणा

घर छोड़ने के बाद श्रवणा के सामने सबसे बड़ी चुनौती शरण की थी। एक भील कन्या को समाज में कोई स्थान प्राप्त नहीं था। वे अनेक ऋषि मुनियों के आश्रमों के द्वार पर गईं, परन्तु उनकी जाति, और वेशभूषा देखकर उन्हें भीतर प्रवेश तक नहीं मिला। उन्हें तिरस्कृत कर भगा दिया गया।

अन्ततः वे पम्पा सरोवर के तट पर स्थित मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचीं। मतंग ऋषि एक तत्त्वज्ञानी, और समदर्शी महात्मा थे। उन्होंने श्रवणा के भीतर छिपी पवित्र आत्मा को देखा, और उन्हें पुत्री कहकर सम्बोधित किया। यह श्रवणा के जीवन का पुनर्जन्म था। उन्होंने आश्रम में रहकर सेवा को ही अपना धर्म बना लिया। वे चुपचाप ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ऋषियों के चलने के मार्ग से कंकड़ पत्थर हटातीं, लकड़ियां बीनतीं, और साफ सफाई करतीं। उनकी निःस्वार्थ सेवा देखकर मतंग ऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुए।

समय बीतता गया, और मतंग ऋषि का अन्त समय निकट आया। उन्होंने जाते समय श्रवणा से कहा कि पुत्री तुम इसी आश्रम में रहकर साधना करना। एक दिन भगवान श्रीराम यहां अवश्य आएंगे। वे तुम्हें दर्शन देंगे, और तुम्हारा कल्याण करेंगे। 

गुरु के वचन थे श्रवणा के लिए ब्रह्मवाक्य
गुरु के वचन थे श्रवणा के लिए ब्रह्मवाक्य

गुरु के इन शब्दों को श्रवणा ने ब्रह्मवाक्य मान लिया। अब उनकी दिनचर्या केवल श्रीराम की प्रतीक्षा बन गई। वे प्रतिदिन मार्ग बुहारतीं, फूलों से सजातीं, और इस भय से कि प्रभु को खट्टे फल न मिल जाएं, वे एक एक बेर को चखकर टोकरी में रखतीं। उनकी आंखों में केवल एक ही छवि थी सांवले सलोने राम। युवा श्रवणा अब वयोवृद्ध हो चुकी थीं, उनके बाल श्वेत हो गए थे, और शरीर जर्जर हो गया था, किन्तु उनके विश्वास की शक्ति हिमालय जैसी अडिग थी।

अन्ततः वह शुभदिन आया जब श्रीराम, और लक्ष्मण माता सीता की खोज करते हुए मतंग ऋषि के आश्रम पहुंचे। वृद्ध श्रवणा की प्रतीक्षा सफल हुई। उन्होंने जीर्णावस्था से ग्रस्त शरीर व कांपते हाथों से प्रभु का स्वागत किया। जो ऋषि-मुनि भी अचम्भित रह गए कि जिन परमेश्वर के दर्शनमात्र के लिए वे वर्षों से तपश्चर्या का पानल कर रहे हैं, वे परमेश्वर साक्षात् एक भीलनी के जूठे बेरों को बड़े चाव से खा रहे हैं।

अंततः भक्त को मिल ही गए आराध्य के दर्शन 
अंततः भक्त को मिल ही गए आराध्य के दर्शन 

भगवान राम ने वहां शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया। शबरी न जब स्वयं को “अधम ते अधम अधम अति नारी।” कहा, तो प्रभु ने यह स्पष्ट किया – “मानउँ एक भगति कर नाता” अर्थात् ईश्वर केवल प्रेम, और भक्ति के भूखे हैं, जाति-पाँति, कुल, धनबल आदि के नहीं। राम की कृपा से श्रवणा का उद्धार हुआ, और वे दिव्य लोक को सिधार गईं।

श्रवणा के शबरी बनने के पीछे एक गहरा दार्शनिक, और दूरदर्शी दृष्टिकोण निहित है। उस काल में शबर जाति की पहचान हिंसक, और आखेटक समुदाय के रूप में थी। श्रवणा के मन में यह विचार आया कि यदि भगवान श्रीराम श्रवणा के पास आते हैं, तो भविष्य में केवल श्रवणा नामक एक व्यक्ति का नाम ही धन्य माना जाएगा। किन्तु यदि वे शबरी के पास आते हैं, तो उनके माध्यम से पूरी शबर जाति सदैव के लिए गौरवान्वित, और धन्य हो जाएगी।

अतएव अपनी सम्पूर्ण जनजाति के मान सम्मान, और सामूहिक हित को सर्वोपरि रखते हुए, श्रवणा ने अपना सम्बोधन शबरी स्वीकार कर लिया। उनका यह निर्णय इस बात का प्रमाण है कि एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली महिला भी कितनी महान हो सकती है, कितनी निःस्वार्थ सेवा कर सकती है, और समाज के प्रति कितनी दूरदर्शी सोच रख सकती है।

-रामकिसन खण्डेलवाल
(लेखक प्रबुद्ध चिंतक व भारतीय संस्कृति के अध्येता हैं, जो अपनी लेखनी से आध्यात्मिक चेतना, भक्ति-साहित्य और पौराणिक विमर्श में निरंतर वैचारिक योगदान करते हैं।)

 

 

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