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बस्तर का सामाजिक ताना बाना, साझी विरासत, संस्कृति और देव परंपरा के मूल भाव में समरसता

बस्तर का सामाजिक ताना बाना, साझी विरासत, संस्कृति और देव परंपरा के मूल भाव में समरसता

भारत की संस्कृति मूलतः एक आरण्यक संस्कृति है और अनुसूचित जनजाति वर्ग में समाहित किए गए हमारे बन्धु उस आरण्यक संस्कृति के संवाहक हैं। भारतीय संस्कृति का उद्भव वनों, गिरि-कंदराओं से हुआ है और खेत-खलिहानों से यह विकसित हुई है।

जनजाति संस्कृति भारत वर्ष की सर्वसमावेशी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है ,जनजाति समाज बोला हुआ स्मृतियों का समाज है ,जो मौखिक नीति का पालन करता है,सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक, रीति-नीति परंपराएँ सभी मौखिक है,जो इनके गीत,संगीत, नृत्य,वाद्ययंत्र, वाचिक कथा, गाथाओं में विद्यमान है जो नगर ,ग्राम और अरण्य में समरसता और एकात्मता का भाव हमारी मान्यताएँ, हमें एक सूत्र में बाँधती है,जो बताती है कि सहचर और सहयोग ही सृष्टि का मौलिक सूत्र है  इसी धांगें में हम सब पिरोए हुए हैं जिसके भाव में विविधताओं में मौलिक एकता है,इसी आदर्श और श्रेष्ठ समरस भावना की अमूल्य जीवंत अभिव्यक्ति हमें छत्तीसगढ के बस्तर संभाग में उनकी संस्कृति, परंपराओं और प्रकृति सम्मत आदर्श जीवन पध्दति में देखनें को मिलती हैं।

प्रकृति पूजा

बस्तर की धरती केवल जंगलों, पहाड़ों और नदियों की नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है। यह वह भूमि है जहाँ देवता मिट्टी से नहीं, जन-चेतना से जन्म लेते हैं। यहाँ की देव परंपरा कोई स्थिर अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक जीवंत क्रांति है—जो हर जाति, हर वर्ग को एक साझा पहचान देती है।

वाचिक परंपरा सें बस्तरवासियों नें सामाजिक विवेक की धरोहर ,विरासत, सांस्कृतिक चेतना, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकता को सजोकर रखा है।

10,000 वर्षों की विरासत, जब बस्तर के आदिवासी जनजाति  समाज ने इस भूमि को अपनाया, उन्होंने प्रकृति को देवता माना। पर समय के साथ जब अन्य जातियाँ यहाँ आईं, उन्होंने न केवल इस संस्कृति को अपनाया, बल्कि उसे अपने श्रम, कला और श्रद्धा से समृद्ध किया। यह समावेशी प्रक्रिया बस्तर की सबसे बड़ी ताकत है—जहाँ कोई जाति बाहरी नहीं, हर जाति देव कार्यों और संस्कृति की धुरी है।जो एकात्मिक दृष्टि से चलते  हैं सुख और आनंद को एक-दूसरें में ढ़ढूते है।

बस्तर के देव कार्यों में जातीय सहभागिता एक सामाजिक समरसता है यहाँ देवता केवल पूजनीय नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता के वाहक हैं। हर जाति की भूमिका देव कार्यों में एक क्रांतिकारी संदेश देती है:जो बताती है  कि  हमारें जड़े एकता में है,विविधता में नहीं है,सारे विविधता होने के नातें हम सब एक है,देश के नातें हम सब एक  है,राष्ट्र और मातृभूमि के नाते हम सब एक है ,समाज के नाते हम सब एक है जो विविधता में एकता और एकता में विविधता का समायोजन ही भारतीय संस्कृति है ,संभालतें हुए, उसका स्वीकार करते हुए, सम्मान करते हुए एकता पर सबकी दृष्टि लाना ही मूल भाव है ,एक ही सनातन संस्कृति का प्रवाह हम सबके आचार और संस्कार को निर्धारित करते आये है , मूल व्यवस्था एक समान है ,पूर्वजों से हम एक है।अपनें आचरण ,व्यवहार ,शिष्टाचार से,उदाहरण सें समाज में परिवर्तन कर समरस वातावरण उत्पन्न करना,ताकि समाज अपने मूल स्वभाव सामाजिक सदभाव में परिवर्तन हो।इसी श्रेष्ठ आदर्श जीवन मूल्य के समरस भाव बस्तर के देव परंपरा और संस्कृति में वो एकता व सम्मान दिखता है-

- घड़वा की धातु कला देवता को रूप देती है।
- लोहार की भाला,छड़ी, सकरी,आदि देव शक्ति का प्रतीक बनती है।
- बढ़ाई की लकड़ी देवता को आसन देती है।
- कुम्हार की मिट्टी से देवता का वाहन, दिया, कलशा, बनता है।
- कोस्टा/महारा की बुनाई देव वस्त्रों में आत्मा भरती है।
- बंजारा की सजावट देवता को सौंदर्य देती है।
- राउत का जल देवता को जीवन देता है।
- तेली का तेल दीप में आस्था जलाता है।
- कलार की महुआ देवता को रस देता है।
- गाड़ा की धुन देवता को नृत्य कराती है।
- सिंगारी/सोनार की आभूषण देवता को गौरव देते हैं।
- मरार के फूल देवता को सुगंध देते हैं।
- केंवट के व्यंजन,मुर्रा,चना  देवता को सेवा रूप में भोजन अर्पित करते है।
- पारधी के व्दारा पिसवा, टुकनी ,पर्रा,चिरहा, डूटी, और झूलना, तीर- धनुष देवता के लिए बनाते है।
- ओझा के व्दारा देवताओं  और देव स्थल का श्रृंगार, गोदना से सौन्दर्य और सामाजिक श्रृंगार 
- देवार के व्दारा देवताओ के वाचिक परंपरा का नृत्य और पारंपरिक गायन किया जाता है।

यह समरस सामूहिक व्यवस्था को नार- गढ़, जागा, मण्डा  देव स्थलों में पेनो,पुजार्क, सिरहा भगत,माँझी,मुखियाँ पेरमा ,गायता के व्दारा बानी-बिरादरी व्यवस्था नाम दिया गया।जिसका वर्णन वाचिक परंपरा रेला गीतों के माध्यम सें मण्डा जगह में सुनने को मिलता है।रेला संस्कृति का संवाहक होती है, ये हमारी वाचिक परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं , रेला का मूल उद्देश्य मनोरंजन रहा हैं लेकिन यें कोरे मनोरंजन के लिए नहीं गढ़ी है,ये प्रत्यक्ष रूप सें संचित ज्ञान की गाथाएँ हैं, रेला मानव इतिहास ही नहीं बल्कि यें इतिहास सें कहीं आगें समाज और संस्कृति की गायन और कलात्मक अभिव्यक्ति हैं ,रेला में सृष्टि के रहस्यों सें लेकर प्राचीन तत्वों, भावनाओ एवं सामाजिक सदभाव के दर्शन हैं।

बस्तर का लोक गीत

यह सहभागिता बस्तर में कोई छोटा नहीं, कोई बड़ा नहीं। यहाँ हर जाति  समुदाय का देवता की सेवा में समान है। यह परंपरा जातीय भेदभाव को नहीं, बल्कि जातीय सहयोग को जन्म देती है। यह एक सामाजिक क्रांति है, जो बिना नारे, बिना मंच के, हर गाँव में, हर पूजा में घटित होती है। जब देश जातीय संघर्षों से जूझ रहा है, बस्तर की देव परंपरा और वैभवशाली संस्कृति एक जीवंत उदाहरण है कि कैसे विविधता को एकता में बदला जा सकता है। यह परंपरा बताती है कि श्रद्धा केवल पूजा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय भी है। यहाँ देवता केवल मंदिरों में नहीं, हर जाति के आस्था और  श्रध्दा श्रम सेवा में बसते हैं।

प्रकृति के प्रति लगाव को दर्शाता दृश्य

बस्तर की देव परंपरा एक सांस्कृतिक एकता की मिशाल है, जो हर जाति को सम्मान देती है, हर श्रम सेवा को पूजा बनाती है। यह परंपरा भारत को एक नया दृष्टिकोण देती है—जहाँ विविधता बाधा नहीं, बल्कि शक्ति है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि देवता वही हैं, जो सबको जोड़ें, सबको अपनाएँ। जिसमें सामूहिकता व एकता का दर्शन ,सांगिकता समानदृष्टि प्रकृति सें सामंजस्य और सबकें कल्याण की भावना दिखती हैं,समाज और देवी-देवताओ का एक साथ आने का उत्सव जों उत्सवधर्मिता जीवन और संस्कृति की एकात्मकता  हैं ,जो हमें जीव और संस्कृति अलग नहीं, जीवन और प्रकृति अलग नहीं यह सिखाता है बस्तर की देव परंपरा और सामाजिक ताना बाना साझी विरासत संस्कृति से आत्मीय रूप से जुड़े  लोगों में एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में निखारता हैं,जिनके व्यवहार में समाज के प्रति करूणा  प्रेम, सह-अस्तित्व, संवेदनशीलता और सामुदायिक कर्तव्यबोध स्वाभाविक गुण बन जाते हैं।

 

 

लेखक



विकेश कुमार हिचामी

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