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हरेली: प्रकृति, कृषि और लोकजीवन का पर्व

हरेली: प्रकृति, कृषि और लोकजीवन का पर्व


छत्तीसगढ़ का लोकपर्व हरेली केवल ऋतु परिवर्तन का सूचक नहीं है। यह प्रकृति, कृषि, पशुधन और मानवीय श्रम के बीच गहरे सम्बन्ध को स्पष्ट करता है। आधुनिक तकनीक और यन्त्रीकरण के दौर में यह पर्व हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है। प्रस्तुत लेख में लेखक भागचन्द चतुर्वेदी ने हरेली के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया है कि यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और वैज्ञानिक सोच का सुन्दर समन्वय कैसे प्रस्तुत करता है। दक्षिण कोसल टुडे की इस प्रस्तुति में हम हरेली के इसी सांस्कृतिक और लोकतात्विक महत्व का अध्ययन करेंगे।


भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता में निहित एकता है। देश के विभिन्न राज्यों में ऋतुओं, कृषि और प्रकृति से जुड़े अनेक पर्व मनाए जाते हैं। इन पर्वों के नाम अलग हो सकते हैं। इनकी तिथियों में थोड़ा अन्तर हो सकता है। क्षेत्रीय रीति रिवाजों में भी विविधता दिखाई देती है। इन सभी पर्वों का मूल भाव एक ही होता है। यह भाव प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, श्रम का सम्मान, समृद्धि की कामना और सामाजिक सद्भाव है। छत्तीसगढ़ का हरेली पर्व इसी सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। यह किसानों के जीवन, लोकविश्वास, पर्यावरण संरक्षण, पशुधन के सम्मान और ग्राम्य संस्कृति का उत्सव है।

हरेली शब्द की उत्पत्ति हरियाली से मानी जाती है। सावन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व वर्षा ऋतु के मध्य आता है। इस समय खेतों में धान की फसल लहलहाने लगती है। प्रकृति हरी भरी हो जाती है। किसान भी नई आशा और विश्वास से भर जाता है। इसी कारण हरेली को कृषि संस्कृति का प्रथम प्रमुख पर्व माना जाता है।


हरेली पर्व

छत्तीसगढ़ के गाँवों में हरेली का उत्साह कई दिनों पहले से दिखाई देने लगता है। ग्रामीण अपने घरों की साफ सफाई करते हैं। वे आँगन लीपते हैं। वे कृषि में उपयोग होने वाले हल, फावड़ा, कुदाली, रापा, गैंती तथा अन्य उपकरणों की अच्छी तरह सफाई करके उनकी पूजा करते हैं। ग्रामीण इन उपकरणों पर हल्दी, रोली और चावल का तिलक लगाते हैं। यह परम्परा धार्मिक आस्था होने के साथ श्रम और श्रम साधनों के प्रति सम्मान का प्रतीक है। किसान जानता है कि उसकी मेहनत उपकरण सुरक्षित और उपयोगी रहने पर ही सफल होगी।

हरेली के दिन ग्रामीण पशुधन की भी विशेष पूजा करते हैं। बैल, गाय और भैंस जैसे पशु कृषि व्यवस्था का मुख्य आधार हैं। लोग पशुओं को स्नान कराकर सजाते हैं। वे उनके सींगों पर तेल लगाते हैं और उन्हें विशेष भोजन कराते हैं। यह परम्परा स्पष्ट करती है कि भारतीय संस्कृति में मनुष्य और पशु के बीच उपयोगिता के साथ आत्मीयता और सहजीवन का रिश्ता है।

इस पर्व की एक रोचक परम्परा घर के मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियाँ लगाना है। लोकमान्यता है कि इससे नकारात्मक शक्तियाँ दूर रहती हैं और घर में सुख समृद्धि आती है। वैज्ञानिक दृष्टि से नीम प्राकृतिक रूप से रोगाणुनाशक और कीटाणुनाशक होता है। वर्षा ऋतु में संक्रामक रोगों की सम्भावना बढ़ जाती है। ऐसे समय में नीम का उपयोग स्वास्थ्य सुरक्षा का सन्देश देता है। इस प्रकार हरेली में लोकविश्वास और वैज्ञानिक सोच का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है।


मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियाँ

हरेली का सबसे आकर्षक पक्ष बच्चों का उत्साह होता है। गाँवों में बच्चे बाँस से बनी गेड़ी पर चढ़कर पूरे गाँव में घूमते हैं। गेड़ी चलाने की परम्परा मनोरंजन के साथ सन्तुलन, साहस और शारीरिक दक्षता का अभ्यास है। पहले वर्षा के दिनों में जलभराव वाले क्षेत्रों में आने जाने के लिए भी गेड़ी उपयोगी होती थी। आज यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। राज्य के अनेक स्थानों पर लोग गेड़ी प्रतियोगिताएँ आयोजित करते हैं।

हरेली का सामाजिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। इस दिन परिवार, पड़ोसी और गाँव के लोग मिलकर एक दूसरे के घर जाते हैं। वे शुभकामनाएँ देते हैं और पारम्परिक व्यंजनों का आनन्द लेते हैं। देसी पकवान, चिला, फरा, भजिया तथा स्थानीय खाद्य पदार्थ इस पर्व के उल्लास को बढ़ाते हैं। सामूहिकता की यह भावना समाज को जोड़ने का कार्य करती है। यह आपसी प्रेम, सहयोग और भाईचारे को मजबूत बनाती है।

लोक परम्पराओं में हरेली का सम्बन्ध अनेक जनश्रुतियों और मान्यताओं से जुड़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों में बैगा, वैद्य और पारम्परिक उपचार करने वाले लोग इस दिन औषधीय पौधों का संग्रह करते हैं। उनका विश्वास है कि हरेली के दिन संग्रहित औषधियों में विशेष प्रभाव होता है। यह एक लोकमान्यता है। इसके पीछे एक तथ्य यह भी है कि वर्षा ऋतु में अनेक औषधीय वनस्पतियाँ अपने सर्वोत्तम रूप में उपलब्ध होती हैं।


औषधीय पौधों का संग्रह

आज पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण की चिन्ता कर रही है। ऐसे समय में हरेली का सन्देश प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें प्रकृति के साथ सन्तुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। वृक्ष, जल, मिट्टी, पशु पक्षी और खेत के बिना मानव जीवन अधूरा है। यदि हम प्रकृति का सम्मान करेंगे तो प्रकृति भी हमें अनुकूल जीवन देगी। हरेली इसी पारिस्थितिक सन्तुलन का लोकपर्व है।

वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ शासन हरेली के अवसर पर व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण, जैविक खेती, कृषि जागरूकता, पारम्परिक खेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है। शिक्षक विद्यालयों में बच्चों को इस पर्व का महत्व बताते हैं। वे बच्चों को स्थानीय संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करते हैं। इससे नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझती है और उस पर गर्व करती है।

हरेली का भाव अन्य राज्यों के कृषि पर्वों से भी मेल खाता है। पंजाब की बैसाखी, तमिलनाडु का पोंगल, केरल का ओणम, असम का बिहू और ओडिशा का नुआखाई जैसे सभी पर्व किसान, प्रकृति और समृद्धि के उत्सव हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा कृषि और प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है। पर्वों के नाम बदलते हैं। उनका मूल भाव एक समान रहता है।


पंजाब की बैसाखी, तमिलनाडु का पोंगल, केरल का ओणम, असम का बिहू और ओडिशा का नुआखाई

हरेली के अवसर पर गाँवों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। लोग प्रातः काल अपने कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं। वे घरों के द्वार पर नीम की डालियाँ लगाते हैं। बच्चे गेड़ी चलाते हुए गीत गाते हैं। मन्दिरों में विशेष पूजा अर्चना होती है। बुज़ुर्ग नई पीढ़ी को इस पर्व की कहानियाँ सुनाते हैं। वे बताते हैं कि प्रकृति की रक्षा करना ही सच्ची समृद्धि का मार्ग है। इन परम्पराओं के माध्यम से संस्कृति एक से दूसरी पीढ़ी तक प्रवाहित होती है।

आधुनिकता और तकनीक के युग में जीवनशैली तेजी से बदल रही है। मशीनों ने बैलों का स्थान ले लिया है। रासायनिक खेती बढ़ी है और गाँवों का स्वरूप भी बदल रहा है। ऐसे समय में हरेली हमें अपनी जड़ों की याद दिलाता है। यह पर्व सिखाता है कि विकास प्रकृति, पर्यावरण और मानवीय मूल्यों के सन्तुलन से ही सार्थक है। हमें इस उत्सव के सन्देश को अपने जीवन में भी उतारना चाहिए।

हरेली हरियाली के साथ आशा, परिश्रम, पर्यावरण, लोकज्ञान, संस्कृति और सामाजिक एकता का पर्व है। यह हमें बताता है कि धरती संसाधन होने के साथ हमारी माता है। कृषि व्यवसाय होने के साथ जीवन का आधार है। प्रकृति देखने की वस्तु न होकर हमारे अस्तित्व की सहचरी है। हमें हरेली के मूल सन्देश को आत्मसात करना चाहिए। प्रकृति संरक्षण, श्रम सम्मान, सामूहिकता और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण आवश्यक है। ऐसा करने पर यह पर्व आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित, स्वस्थ और समृद्ध भविष्य का आधार बन सकता है।

हरेली का उत्सव तभी पूर्ण होगा जब हम हर वर्ष पूजा करने के साथ एक पौधा भी लगाएंगे। हमें जल और मिट्टी का संरक्षण करना चाहिए। पशुओं के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए। अपनी लोक परम्पराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प लेना चाहिए। यही हरेली की सच्ची भावना और भारतीय संस्कृति की पहचान है।

लेखक:
भागचन्द चतुर्वेदी
एम ए हिन्दी साहित्य, राजनीति विज्ञान, बीजेएमसी (पत्रकारिता)
राजिम (छत्तीसगढ़) मो. 9755857964

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