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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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ज्ञान,कूटनीति और सामरिक कौशल के महासागर श्री हनुमानजी

ज्ञान,कूटनीति और सामरिक कौशल के महासागर श्री हनुमानजी

हनुमान जी को हम केवल 'बल' के प्रतीक के रूप में देखते हैं, किंतु रामायण के सूक्ष्म प्रसंगों का विश्लेषण करने पर उनका एक ऐसा स्वरूप उभरता है जो महापंडित, मनोवैज्ञानिक और अद्वितीय कूटनीतिज्ञ का है। यहाँ उनके चरित्र के वे वर्त्तान्त हैं जो जनमानस की सामान्य चर्चाओं से परे हैं

वाक-चातुर्य और शास्त्र ज्ञान- जब हनुमान जी पहली बार ऋष्यमूक पर्वत पर श्री राम और लक्ष्मण से मिले, तो उन्होंने एक ब्राह्मण का रूप धरा। उनके बोलने के ढंग और शब्दों के चयन ने श्री राम को मंत्रमुग्ध कर दिया। वाल्मीकि रामायण में प्रभु श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं- 
"न ऋग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम्॥"

(अर्थ: जिसने ऋग्वेद की शिक्षा न ली हो, यजुर्वेद का अभ्यास न किया हो और सामवेद का ज्ञान न हो, वह ऐसी शुद्ध और प्रभावपूर्ण भाषा नहीं बोल सकता।)

भगवान और भक्त का प्रथम मिलन
भगवान और भक्त का प्रथम मिलन 

यह प्रसंग सिद्ध करता है कि हनुमान जी केवल 'वनवासी' नहीं थे, बल्कि वे चारों वेदों के प्रकांड विद्वान और व्याकरण के ज्ञाता थे। आज के समय में यह 'इफेक्टिव कम्युनिकेशन' का सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ आपकी भाषा ही आपके व्यक्तित्व की पहली छाप छोड़ती है।

अक्सर माना जाता है कि विभीषण स्वयं राम के पास आए थे, लेकिन इसके पीछे हनुमान जी की गहरी कूटनीति थी। सुंदरकांड की यह चौपाई उनके मानव-पहचान के गुण को दर्शाती है-
"तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥" 

अनसुना पक्ष यह भी है के लंका जैसी शत्रु नगरी में हनुमान जी ने विभीषण की सात्विकता को पहचाना। उन्होंने सीधे युद्ध की बात नहीं की, बल्कि 'राम कथा' के माध्यम से एक वैचारिक पुल बनाया।

विभीषण को श्रीराम से मिलवाने में हनुमानजी की रही विशेष भूमिका 
विभीषण को श्रीराम से मिलवाने में हनुमानजी की रही विशेष भूमिका 

उन्होंने विभीषण को विश्वास दिलाया कि रावण का साथ छोड़ना 'अधर्म' नहीं, बल्कि 'धर्म' की रक्षा है। यह एक सफल कूटनीतिज्ञ का गुण है जो शत्रु के अभेद्य किले में भी अपने लिए विश्वसनीय साथी खोज लेता है। 

संघर्ष प्रबंधन और सूक्ष्म बुद्धि- जब हनुमान जी समुद्र लांघ रहे थे, तब 'सुरसा' ने उनका रास्ता रोका। यहाँ एक बहुत ही सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रसंग मिलता है-
"जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप धयउ हनुमंता॥"
अब यहाँ हनुमान जी ने एक महान जीवन सूत्र दिया-जब शत्रु अपना अहंकार (बदन) बढ़ाए, तो हमें उससे बड़ा बनने की बजाय 'अति लघु' (विनम्र और सूक्ष्म) बन जाना चाहिए। अहंकार को शक्ति से नहीं, बल्कि बुद्धि और लचीलेपन से परास्त किया जा सकता है।

अहंकार पर विनम्रता से विजय पायी जा सकती है
अहंकार पर विनम्रता से विजय पायी जा सकती है

एक सोची-समझी सामरिक रणनीति-जनमानस में धारणा है कि हनुमान जी ने केवल क्रोध में लंका जलाई। लेकिन इसके पीछे एक गहरा सामरिक उद्देश्य था जो मनोवैज्ञानिक युद्ध के रूप में सामने आता है -हनुमान जी जानते थे कि भविष्य में वानर सेना को समुद्र पार कर लंका आना है।

लंका एक 'स्वर्ण नगरी' थी, जिसकी चकाचौंध और सुरक्षा देखकर साधारण वानर भयभीत हो सकते थे। हनुमान जी ने लंका जलाकर रावण के अहंकार और उसकी सेना के मनोबल को तोड़ दिया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि जिसे दुनिया अजेय समझती है, उसे राम का एक दूत भी खाक कर सकता है।

लंकादहन
लंकादहन ने किया रावण का मानमर्दन 

सेवा की पराकाष्ठा और समय प्रबंधन- रामायण का एक अत्यंत भावुक प्रसंग वह है जब हनुमान जी लंका से लौटते समय नंदीग्राम में भरत जी से मिलते हैं। अगर हनुमान जी वहां नहीं रुकते, तो भरत जी आत्मदाह कर लेते क्योंकि राम के लौटने की अवधि समाप्त हो रही थी।
 बीतें अवधि रहहिं जौं प्राणा।
अधम कवन जग मोहि समाना॥
हनुमान जी ने ठीक समय पर पहुँचकर उन्हें सूचना दी। यह दर्शाता है कि हनुमान जी केवल युद्ध के मैदान के योद्धा नहीं थे, बल्कि वे अयोध्या की आंतरिक परिस्थितियों और श्री राम के भाई के प्रति प्रेम की गहराई को भी समझते थे। वे भावनात्मक बुद्धिमत्ता के साक्षात स्वरूप हैं।

सार रूप में देखने पर हनुमान जी का चरित्र हमें सिखाता है कि शक्ति तभी सार्थक है जब उसके साथ शास्त्र (ज्ञान) और विनम्रता का संतुलन हो। वे एक ऐसे पूर्ण पुरुष हैं जिनके एक हाथ में ज्ञान की 'पोथी' है और दूसरे में शक्ति की 'गदा'। हनुमान जयंती पर उनका स्मरण हमें असंभव को संभव करने का साहस और विपरीत परिस्थितियों में शांत रहकर मार्ग खोजने की प्रेरणा देता है।

-नकुल सारंग 
(लेखक समाजसेवी एवं सक्रिय पत्रकार हैं, जो अपनी लेखनी के माध्यम से आंचलिक जन-समस्याओं और सामाजिक सरोकारों को प्रखरता से प्रस्तुत करते हैं।)

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