राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

लोकपर्व खमरछठ (हलषष्ठी) माताओं द्वारा सन्तान के लिए किया जाने वाला पर्व है। यह छत्तीसगढ़ राज्य की अनूठी संस्कृति का हिस्सा है। हर वर्ग और हर जाति के लोग इसे सद्भाव से मनाते हैं। माताएं अपनी सन्तान के सुखी जीवन की कामना करती हैं। लोग हलषष्ठी को हलछठ, कमरछठ या खमरछठ भी कहते हैं। लोग यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाते हैं। सन्तान प्राप्ति और उनके दीर्घायु तथा सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएं यह व्रत रखती हैं।
इस दिन माताएं सुबह से ही महुआ पेड़ की डाली का दातून करती हैं। वे स्नान करके व्रत धारण करती हैं। वे भैंस के दूध की चाय पीती हैं। दोपहर के बाद वे घर के आंगन, मन्दिर, देवालय या गांव की चौपाल में बनावटी तालाब (सगरी) बनाती हैं। वे उसमें जल भरती हैं। सगरी का जल जीवन का प्रतीक है। लोग तालाब के किनारे बेर, पलाश और गूलर आदि पेड़ों की टहनियां लगाते हैं। वे काशी के फूल लगाकर इसे सजाते हैं। वे सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी गणेश और कलश रखते हैं। वे भैंस के घी में सिन्दूर से हलषष्ठी देवी की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करते हैं।
कमरछठ की सामूहिक पूजा
वे साड़ी आदि सुहाग की सामग्री भी चढ़ाते हैं। वे हलषष्ठी माता की 6 कहानियों को कथा के रूप में सुनते हैं। माताएं इस व्रत के दौरान छत्तीसगढ़ में प्रचलित ग्वालिन की कथा सुनाती है जो कुछ इस प्रकार है । प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी, जिसका प्रसव का समय अत्यंत निकट था, फिर भी दूध-दही खराब न हो जाए इस विचार से वह मटकी सिर पर रखकर बेचने निकल पड़ी। मार्ग में एक खेत के किनारे झड़बेरी की झाड़ियों के पास उसे अचानक प्रसव-पीड़ा हुई और उसने एक पुत्र को जन्म दिया। नवजात शिशु को वहीं झड़बेरी की ओट में लिटाकर वह दूध बेचने पास के गाँव चली गई, जहाँ उस दिन माताएं हल षष्ठी (कमर छठ) का पावन व्रत कर रही थीं।
इस व्रत में केवल भैंस का दूध या दही ही ग्रहण करने का विधान है, परंतु लोभवश ग्वालिन ने गाय और भैंस का दूध मिला दिया था और गाँव की माताओं से झूठ बोलकर उसे शुद्ध भैंस का दूध बताकर बेच दिया, जिससे अनजाने में ही उनका पवित्र व्रत खंडित हो गया। इधर, जिस खेत की मेड़ पर शिशु लेटा था, वहाँ एक किसान हल जोतने आया और दुर्भाग्यवश हल का फल शिशु को लग गया, जिससे उसके प्राण निकल गए; भयभीत किसान झड़बेरी के कांटों से शिशु के घाव टांककर भाग गया। जब ग्वालिन लौटी और अपने नवजात को मृत पाया, तो उसे तत्काल आभास हो गया कि यह विपत्ति उसके द्वारा माताओं का पवित्र व्रत खंडित करवाने के घोर पाप का ही प्रतिफल है।
वह विलाप करती हुई पुनः गाँव दौड़ी और हर द्वार पर जाकर अपना अपराध स्वीकार करते हुए माताओं से क्षमा मांगने लगी। ग्वालिन के हृदय से निकले सच्चे पश्चाताप को देखकर व्रतधारी माताओं का हृदय पसीज गया और उन्होंने सामूहिक रूप से षष्ठी माता से उसके शिशु के जीवनदान की प्रार्थना की। माताओं के क्षमादान और आशीर्वाद के प्रभाव से जब ग्वालिन वापस झड़बेरी के पास पहुँची, तो उसने देखा कि उसका पुत्र चमत्कारिक रूप से जीवित है और प्रसन्नतापूर्वक खेल रहा है, जिसके बाद उसने षष्ठी माता को प्रणाम कर जीवन में पुनः कभी असत्य न बोलने का प्रण लिया।
इस पूजन की सामग्री में पसहर चावल (बिना हल जोते हुए जमीन से उगा हुआ धान), महुआ के पत्ते, धान की लाई, भैंस का दूध, दही और घी आदि रखते हैं। पूजन में बच्चों के खिलौने जैसे भौंरा और बाटी भी रखते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गेड़ी को भी सगरी में रखकर पूजा करते हैं। लोग गेड़ी हरियाली त्योहार के दिन बच्चों के चढ़ने के लिए बनाते हैं। गेड़ी का स्वरूप पूरी तरह हल से मिलता जुलता है और यह बच्चों के ही उपयोग का है।

कमरछठ की पारंपरिक पूजन सामग्री के साथ माताएं
इस व्रत के बारे में पौराणिक कथा है कि वसुदेव और देवकी के 6 बेटों को कंस ने कारागार में मार डाला था। 7वें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आने पर देवर्षि नारद ने देवकी को हलषष्ठी देवी का व्रत रखने की सलाह दी। देवकी ने यह व्रत सबसे पहले किया था। इसके प्रभाव से उनकी आने वाली सन्तान की रक्षा हुई। 7वीं सन्तान का जन्म समय जानकर भगवान कृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया। उन्होंने कहा कि माता देवकी के इस गर्भस्थ शिशु को खींच कर वसुदेव की बड़ी रानी रोहिणी के गर्भ में पहुंचा देना।
रोहिणी उस समय गोकुल में नन्द और यशोदा के यहां रह रही थीं। भगवान ने योगमाया को स्वयं माता यशोदा के गर्भ से जन्म लेने का आदेश भी दिया। योगमाया ने भगवान के आदेश का पालन किया। देवकी के गर्भ से संकर्षण होकर रोहिणी के गर्भ से जन्म लेने वाली सन्तान ने बलराम के रूप में जन्म लिया। इसके बाद देवकी की 8वीं सन्तान के रूप में भगवान कृष्ण ने जन्म लिया।
बलराम और श्रीकृष्ण की कृषि-गोपालन परंपरा
इस तरह हलषष्ठी देवी के व्रत और पूजन से देवकी की दोनों सन्तानों की रक्षा हुई। हलषष्ठी का पर्व भगवान कृष्ण और बलराम से सम्बन्धित है। हल से कृषि कार्य होता है। यह बलराम का प्रमुख हथियार भी है। बलराम कृषि कर्म को महत्त्व देते थे और भगवान कृष्ण गौ पालन को महत्त्व देते थे। इसलिए इस व्रत में हल से जोते हुए स्थानों का अन्न और गाय के दूध, दही तथा घी का उपयोग वर्जित है। लोग हलषष्ठी और जन्माष्टमी 1 दिन के अन्तराल में धूमधाम से मनाते हैं।
इस दिन उपवास रखने वाली माताएं खेत में नहीं जाती हैं। पूजन के बाद माताएं अपनी सन्तान की पीठ पर कमर के पास पोता मारती हैं। पोता नये कपड़े का टुकड़ा होता है जिसे हल्दी के पानी से भिगाते हैं। इसके बाद वे उसे अपने आंचल से पोंछती हैं। यह माता द्वारा दिया गया रक्षा कवच का प्रतीक है।

कमरछठ का पारंपरिक प्रसाद
पूजन के बाद व्रत करने वाली माताएं प्रसाद ग्रहण करने बैठती हैं। वे पसहर चावल का भात और 6 प्रकार की भाजी की सब्जी खाती हैं। इन भाजियों में मुनगा, कद्दू, सेमी, तोरई, करेला और मिर्च शामिल हैं। वे भैंस का दूध, दही, घी और सेन्धा नमक का भी उपयोग करती हैं। वे महुआ पेड़ के पत्ते का दोना, पत्तल और लकड़ी की चम्मच का उपयोग करती हैं।
लोग बच्चों को प्रसाद के रूप में धान की लाई, भुना हुआ महुआ और 6 प्रकार के अन्न बांटते हैं। इनमें चना, गेहूं और अरहर आदि शामिल हैं। इस व्रत में 6 की संख्या का अधिक महत्त्व है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष का 6वां दिन, 6 प्रकार की भाजी, 6 प्रकार के खिलौने, 6 प्रकार के अन्न वाला प्रसाद और 6 कहानियों की कथा इसके मुख्य अंग हैं। कमरछठ पर्व में काम आने वाली सारी चीजें गांव में ही उपलब्ध होती हैं।
लेख: सुश्री उर्वशी जायसवाल
इतिहास एवं लोक संस्कृति की अध्येता
रायपुर, छत्तीसगढ़
राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार
September 05, 2026
रायपुर : विशेष लेख : नक्सलमुक्त क्षेत्रों में शिक्षा की नई भोर
September 05, 2026
डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा
September 04, 2026
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला
September 04, 2026
“कोटा (नंदगाँव) की कृष्ण जन्माष्टमी की अनूठी परम्परा”
September 04, 2026
देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य
September 04, 2026
श्री कृष्ण का वैदिक स्वरूप
September 03, 2026
संतान सुख और रक्षा, मातृत्व का पर्व: हलषष्ठी (खमरछठ)
September 02, 2026
बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम
September 02, 2026
लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा
September 01, 2026
प्रकृति और नारी के उल्लास का पर्व- कजली तीज
August 31, 2026
सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल
August 30, 2026
संस्कृत ध्वनियों का उच्चारण एक सहज योग
August 29, 2026
लोकपर्व भोजली
August 29, 2026
रक्षाबन्धन : भारतीय मानस में रक्षासूत्र का दर्शन
August 28, 2026
संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद समय की मांग है!
August 27, 2026
ओणम पर्व की मान्यता और परम्पराएँ
August 26, 2026
आखेटक: भारतीय सभ्यता के प्रहरी
August 25, 2026
आधुनिक AI के युग में संस्कृत भाषा का महत्व
August 24, 2026
राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो
September 06, 2026
शिक्षक दिवस विशेष: संविधान सभा में डॉ. राधाकृष्णन के विचार
September 05, 2026
रायपुर : विशेष लेख : नक्सलमुक्त क्षेत्रों में शिक्षा की नई भोर
September 05, 2026
डॉ.राधाकृष्णन और भारतीय ज्ञान परम्परा
September 04, 2026
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला
September 04, 2026
“कोटा (नंदगाँव) की कृष्ण जन्माष्टमी की अनूठी परम्परा”
September 04, 2026
देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य
September 04, 2026
श्री कृष्ण का वैदिक स्वरूप
September 03, 2026
संतान सुख और रक्षा, मातृत्व का पर्व: हलषष्ठी (खमरछठ)
September 02, 2026
बघेरा(केकड़ी) के मूर्ति शिल्प में विष्णु अवतार बलराम
September 02, 2026
लोक-अनुभव का भंडार: हमारी वाचिक परंपरा
September 01, 2026
प्रकृति और नारी के उल्लास का पर्व- कजली तीज
August 31, 2026
सांस्कृतिक व शैक्षिक तत्वों से भरपूर है:छतीसगढ़ी लोक खेल
August 30, 2026
संस्कृत ध्वनियों का उच्चारण एक सहज योग
August 29, 2026
लोकपर्व भोजली
August 29, 2026
रक्षाबन्धन : भारतीय मानस में रक्षासूत्र का दर्शन
August 28, 2026
संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद समय की मांग है!
August 27, 2026
ओणम पर्व की मान्यता और परम्पराएँ
August 26, 2026
आखेटक: भारतीय सभ्यता के प्रहरी
August 25, 2026
आधुनिक AI के युग में संस्कृत भाषा का महत्व
August 24, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
संतान सुख और रक्षा, मातृत्व का पर्व: हलषष्ठी (खमरछठ)
September 02, 2026