मेवाड़ की गवरी में नरसिंह का प्राचीन स्वरूप
June 06, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार
नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

राजस्थान के उदयपुर निवासी डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू जी ने प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र और वृक्षायुर्वेद जैसे विषयों के साधक के रूप में अपना जीवन समर्पित किया है। संस्कृत के ज्ञान को हिंदी में सुलभ बनाने वाले आप देश के शीर्षस्थ अनुवादकों और शास्त्र-मर्मज्ञों में गिने जाते हैं।
आपकी लेखनी से अब तक 100 से अधिक पुस्तकें और सैकड़ों शोध-लेख निःसृत हो चुके हैं। साहित्य और शिक्षा में आपके महती योगदान हेतु आपको भारत सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान' तथा हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज द्वारा प्रतिष्ठित 'गुरु गोरक्षनाथ राष्ट्रीय सम्मान' से अलंकृत किया गया है।
क्या आपने कभी विचार किया है कि हमारे लोक पर्व केवल उत्सव नहीं अपितु प्रकृति और कृषि विज्ञान के अद्भुत संगम हैं? आइए जानें कि वैशाख अमावस्या के पावन अवसर पर कैसे हमारे पूर्वज मिट्टी के कुल्हड़ों से वर्षा का सटीक आकलन करते थे और हल का पूजन कर समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करते थे!
हाली अमावस: कृषि परम्परा और लोक संस्कृति का पावन उत्सव
हमारे विस्तृत लोक अंचल में आज भी उन अनेक प्राचीन पर्वों का जीवन्त व्यवहार निरन्तर बना हुआ है जिनका सम्भवतः शास्त्रीय ग्रन्थों में श्लोक के रूप में सीधा उल्लेख प्राप्त नहीं होता। लोक जीवन की अपनी एक स्वतन्त्र और समृद्ध परम्परा है। वैशाख मास की अमावस्या जिसे ग्रामीण अंचलों में 'हाली अमावस' अथवा 'हली अमोस' के नाम से पुकारा जाता है एक ऐसा ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पर्व है। इस पावन दिवस का सम्बन्ध मुख्य रूप से कृषक जीवन और उसके सबसे बड़े आधार 'हल' से गहराई से जुड़ा हुआ है।
इस सन्दर्भ में कई गम्भीर प्रश्न उठते हैं कि वैशाख मास में जब खेत प्रायः रिक्त होते हैं तब हल से इसका क्या सम्बन्ध है? क्या कभी प्राचीन काल में विशाखा नक्षत्र के दौरान खेतों में जुताई खड्डा खोदने खड़न अथवा खाड़ जैसे महत्त्वपूर्ण कृषि कार्य सम्पन्न किए जाते थे? क्या इस विशिष्ट दिन हल के फाल को विशेष रूप से तैयार किया जाता था अथवा उसे ससम्मान उतार कर सुरक्षित रख दिया जाता था?
इसी दिन खेतों में काम करने वाले कर्मठ कृषि श्रमिक जिसे 'हाली' कहा जाता है को काम पर रखने की प्राचीन परम्परा रही है। हाली शब्द हमारे लोकगीतों और लोक चेतना में इतना गहरा बसा है कि यह अनेक लोकप्रिय गीतों में भी प्रतिध्वनित होता है जैसे "मेरे खेतों का हाली तू..."। यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि हाली केवल एक श्रमिक नहीं अपितु कृषक के जीवन का एक अभिन्न अंग है।
इस विशिष्ट दिवस से अनगिनत प्रश्न और परम्पराएँ जुड़ी हुई हैं। मुख्य रूप से यह पावन पर्व गुजरात के कच्छ प्रान्त से लेकर राजस्थान के भीनमाल और जालौर क्षेत्र तक गहराई से जुड़ा रहा है। यह एक विचारणीय विषय है कि मारवाड़ क्षेत्र की अपेक्षा गोड़वाड़ क्षेत्र में हल का इतना अधिक महत्त्व कैसे स्थापित हुआ। इस विशेष दिन हल तथा हल से उत्पन्न होने वाले कृषि उत्पादों का विधि विधान से पूजन किया जाता है।

हाली अमास- गुजरात और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में है प्रचलित
यहाँ खेतों में उत्पन्न होने वाले पवित्र अन्नों विशेषकर बाजरे आदि की गंगाजल के साथ सविधि पूजन करने की एक अत्यन्त प्राचीन और सात्त्विक परम्परा भी सहज रूप से देखी जा सकती है। लोक जीवन का यह अनुपम पर्व अपने भीतर कृषि क्षेत्र की अनगिनत सुगन्धित स्मृतियों को सहेज कर रखे हुए है। यह पर्व हमें हमारी मिट्टी की गन्ध से जोड़ता है। इस पर्व पर गाए जाने वाले लोकगीत कृषकों के उल्लास को प्रकट करते हैं। लोक स्वर कुछ इस प्रकार गूंजता है:
अमोस रा राम राम सा।
फूले फले गांव गांव सा।।
पौ फाटा जागो,खेते भागो।
हल सीत मांडो पाली ऊ पाली।
सुकन विचारो,भाई ओ भाई...!
लेखक के घनिष्ठ मित्र श्री गंगासिंह मूठली जी ने अत्यन्त सटीक लिखा है कि आज के निरन्तर बदलते हुए सामाजिक परिवेश में ऐतिहासिक तथा धार्मिक त्योहारों को लेकर नगरों में तो आकर्षण प्रायः समाप्त सा हो रहा है। परन्तु इसके विपरीत हमारे ग्रामों में आज भी प्राचीन परम्पराएँ मान्यताएँ और रीति रिवाज पूर्ण रूप से जीवन्त और कायम हैं।
हाली अमावस्या के पावन अवसर पर कृषक वर्ग आने वाले वर्ष में श्रेष्ठ समय और अनुकूल प्रकृति की मंगल कामना के साथ अन्न देवता से अच्छी फसल पकने की हृदय से प्रार्थना करते हैं। इस दिन कृषक प्रातः काल अत्यन्त भोर में असीम उत्साह और आन्तरिक उमंग के साथ अपने-अपने खेतों की ओर प्रस्थान करते हैं और वहाँ जाकर श्रद्धापूर्वक हल जोतते हैं। अच्छी वर्षा की पवित्र कामना को लेकर फसलों की विधिवत पूजा अर्चना की जाती है।

हाली अमावस- किसानों का महापर्व
वे अन्न देवता से यह प्रार्थना करते हैं कि आगामी वर्ष में उत्तम पैदावार हो और सम्पूर्ण समाज में खुशहाली का साम्राज्य स्थापित हो। इस दिन कृषक अपने सभी कृषि उपकरणों की विशेष रूप से वन्दना करते हैं। वैशाख अमावस्या और अश्विनी नक्षत्र का एक अत्यन्त प्राचीन और शास्त्रीय सन्दर्भ भी उपलब्ध है। महर्षि अत्रि जी ने ऋग्वेद के मन्त्रों में इस कृषि परम्परा का साक्षात दर्शन किया है:
दशस्यन्ता मनवे पूर्व्यं दिवि यवं वृकेण कर्षथः।
ता वामद्य सुमतिभिः शुभस्पती अश्विना प्र स्तुवीमहि
(ऋग्वेदसंहिता 8.22.6)
इस वैदिक मन्त्र पर परम विद्वान सायण अपने प्रामाणिक भाष्य में अत्यन्त गूढ़ व्याख्या करते हुए कहते हैं कि हे अश्विनी कुमारों! आप अत्यन्त पुरातन काल से द्युलोक में स्थित जल को 'मनु' नामक राजा को निरन्तर प्रदान कर रहे हैं। आप अपने वृक अर्थात् हल के माध्यम से यव नामक धान्य की खेती करते हैं। आचार्य यास्क ने निरुक्त में 'वृक' शब्द की व्याख्या करते हुए इसे हल का पर्यायवाची माना है क्योंकि यह भूमि को विदीर्ण करता है।
सायण आगे स्पष्ट करते हैं कि आप उस हल से भूमि का विलेखन करते हैं अर्थात् उसे जोतते हैं। हे जल का पूर्ण रूप से पालन करने वाले अश्विनी कुमारों! पूर्वोक्त सभी महान लक्षणों से युक्त आप दोनों की आज हम इस पावन यज्ञ के दिन अपनी शोभन स्तुतियों के माध्यम से प्रकर्ष रूप से वन्दना करते हैं। यह वैदिक सन्दर्भ सिद्ध करता है कि कृषि कर्म हमारे यहाँ अत्यन्त पवित्र है।
हमारे ग्राम्यांचलों में आज भी जानकार बुजुर्ग व्यक्ति अपने घरों तथा खेतों के आसपास विचरण करने वाले पशु पक्षियों की ध्वनियों वृक्षों की स्थिति और प्राकृतिक दृश्यों का सूक्ष्म अवलोकन करके आगामी वर्षा ऋतु तथा फसल की पैदावार का अत्यन्त सटीक अनुमान लगाते हैं। घर के प्रांगण में भी शकुन विचार के तौर पर खलिहान की प्रतिकृति बनाते हुए विभिन्न प्रकार के धान के छोटे-छोटे ढेर लगाए जाते हैं जिनमें पृथक पृथक प्रकार के धान्य सम्मिलित होते हैं।
उन धान के ढेरों पर पवित्रता के साथ गुड़ रुई आदि मांगलिक वस्तुएँ भी स्थापित की जाती हैं। उन ढेरों के ठीक मध्य में जल से परिपूर्ण एक पवित्र लोटा रखा जाता है। प्रातः काल निद्रा से उठते ही घर के सभी सदस्य सर्वप्रथम उन धान के ढेरों को साष्टांग नमस्कार करते हैं और आने वाले दिनों के लिए मंगल कामना करते हैं कि उनके खेत में अत्यन्त अच्छी पैदावार हो और उनके खेत खलिहानों में भी इसी प्रकार धान के विशाल ढेर लगें।

धान्य को देवतुल्य मानकर मंगलकामना करता परिवार
हाली अमावस्या पर अलस्सुबह सम्पूर्ण ग्रामवासी समय और काल के शकुन लेने के पश्चात गाँव की चौपाल अथवा कोटड़ी में सामूहिक रूप से एकत्रित हो जाते हैं। उसके उपरान्त एक लकड़ी के बाजोट पर पांच प्रकार के कच्चे मिट्टी के कुल्हड़ रखे जाते हैं जिन्हें भली भाँति जल से भरा जाता है। इन मिट्टी के कुल्हड़ों को हिन्दू पंचांग के चार मुख्य वर्षा मासों आषाढ़ श्रावण भाद्रपद और आश्विन के प्रतीकात्मक आधार पर विभक्त किया जाता है।
इनमें जो पाँचवाँ कुल्हड़ होता है उसे 'थम्ब' कहा जाता है। यह एक अद्भुत लोक विज्ञान है कि यदि इन पाँच महीनों के पूर्व ही कोई विशिष्ट कुल्हड़ खंडित होकर फूट जाता है तो लोक मान्यता के अनुसार उस विशिष्ट महीने में अत्यधिक वर्षा होने का सटीक अनुमान लगाया जाता है। इसके सम्मुख अनेक प्रकार के धान्य जैसे बाजरी मूँग मोठ तिल ग्वार आदि को सलीके से रखा जाता है।
इन सब धान्यों की वैदिक और लौकिक विधि विधान से पूजा अर्चना करने के पश्चात जल से भरे उन कुल्हड़ों में ऊन के पवित्र धागों को डुबोकर रखा जाता है। उसके पश्चात वे कुल्हड़ जिस क्रम से एक-एक करके फूटने आरम्भ होते हैं ठीक उसी क्रम से उस विशिष्ट महीने में होने वाली वर्षा का सूक्ष्म अनुमान निकाला जाता है। इसी प्राचीन पद्धति से सम्पूर्ण वर्षा ऋतु में कैसी वर्षा होगी इसका पारम्परिक संकेत प्राप्त किया जाता है।
इस महती शकुन प्रक्रिया के पश्चात सभी ग्रामीण एक स्थान पर बैठकर आपस में 'हथाई' अर्थात् स्नेहपूर्ण गोष्ठी करते हैं। इस हथाई में उस गाँव के प्रत्येक घर से अन्न और भोजन का एक-एक थाल आता है। इस सामूहिक सहभोज में मुख्य व्यंजन के रूप में विशेष प्रकार से निर्मित खीच गळोणी जिसे गुड़ के पवित्र जल से बनाया जाता है और जिसे चपाती के साथ बड़े स्वाद से ग्रहण किया जाता है के साथ विभिन्न प्रकार की पौष्टिक सब्जियाँ विशेषकर ग्वार फली आदि परोसी जाती हैं।

हथई- स्नेहपूर्ण गोष्ठी की परम्परा
इस गोष्ठी के पश्चात सभी ग्रामवासी ऊंच नीच के सभी भेदों को भुलाकर एक पंक्ति में बैठकर एक-साथ भोजन ग्रहण करते हैं। छोटे बच्चे भी इस स्वादिष्ट खीच के साथ मीठी खीर रूपी गळोणी को बड़े ही परमानन्द के साथ खाते हैं। इस प्रकार का सामूहिक और प्रीतिपूर्ण भोजन अमावस्या के इस पावन दिन से लेकर आखातीज तक निरन्तर किया जाता है। यद्यपि यह सत्य है कि अब आधुनिक जीवन की बढ़ती कार्य व्यस्तता के चलते गाँवों के लोग भी इस हथाई में अपेक्षाकृत कम संख्या में उपस्थित हो पाते हैं फिर भी यह परम्परा जीवित है।
अन्ततः कृषि और कृषक जीवन की इस महान परम्परा के विषय में वेदों में सर्वथा सत्य ही कहा गया है:
सुसस्या: कृषिस्कृधि (यजुर्वेद 4.10)
इस मन्त्र का सन्देश है कि प्रत्येक मानव को उत्तम फसल वाली कृषि के लिए स्वयं आगे बढ़कर श्रम करना चाहिए। 'वैशाखी अमावस्या' अथवा 'हली अमोस' केवल एक तिथि नहीं है अपितु यह कृषि उन्नत बीज और मनुष्य के कठोर श्रम की सार्थकता को उजागर करने का एक पावन दिवस है। यह पर्व हमें निरन्तर स्मरण कराता है कि हमारी जड़ों का पोषण इसी माटी से ही सम्भव है और प्रकृति का यह सम्मान ही मानव सभ्यता का वास्तविक रक्षण है।
- श्रीकृष्ण जुगनू
उदयपुर, राजस्थान
वैश्विक महासंकट और भारतीय ऋषि परम्परा के समाधान
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