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ज्ञान भारतम् अभियान: प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का संकल्प

ज्ञान भारतम् अभियान: प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का संकल्प


प्राचीन भारत अपने ज्ञान और अध्यात्म के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। पूरे विश्व को अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने के सामर्थ्य के कारण ही इसे विश्व गुरु कहा जाता है। भारत शब्द की उत्पत्ति भी इसके मूल स्वभाव 'भा' अर्थात ज्ञान और 'रत' अर्थात लीन होना को दर्शाती है।


भारतीय ज्ञान परंपरा में श्रुति और स्मृति के साथ ही लिपिबद्ध करने की परिपाटी पौराणिक काल से ही अत्यंत समृद्ध रही है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण महर्षि वेद व्यास द्वारा श्री गणेश के सहयोग से लेखन का शुभारंभ करना है। यह इस तथ्य का प्रमाण है कि हमारी विद्याएँ केवल मौखिक ही नहीं बल्कि लिखित रूप में भी सुरक्षित रही हैं। मानव इतिहास वस्तुतः विचारों के क्रमिक विकास और ज्ञान के संचरण की एक अटूट यात्रा है।


महर्षि वेदव्यास और लिपिकर्ता भगवान गणेश

इस ज्ञान की यात्रा में पांडुलिपियों की भूमिका एक ऐसे सेतु के समान है जो अतीत के ज्ञान को भविष्य से जोड़ती है। वर्तमान समय की भाँति प्राचीन काल में कागज और कलम का प्रचलन नहीं था। उस युग में ज्ञान को लिपिबद्ध करने के लिए ताड़पत्र, ताम्रपत्र और शिलाओं आदि का उपयोग किया जाता था। ऐतिहासिक संदर्भों में प्रयुक्त 'पांडुलिपि' शब्द का निर्माण दो पदों 'पांडु' तथा 'लिपि' के मेल से हुआ है।


पांडुलिपियां-अतीत और वर्तमान की कड़ी 

'पांडु' का अर्थ धवल अथवा पीताभ वर्ण होता है और 'लिपि' का तात्पर्य लेखन कला से है। प्राचीन काल में भोजपत्र, ताड़पत्र और वस्त्र जैसे माध्यमों पर हस्तलिखित ग्रंथ तैयार किए जाते थे। अतः पांडुलिपि का अर्थ वह हस्तलिखित ज्ञान संग्रह है जो इन पारंपरिक माध्यमों पर अंकित हो। भारतीय संदर्भ में इन्हें 'पांडुलेख' या 'मातृका ग्रंथ' के नाम से भी संबोधित किया जाता है। ये ग्रंथ हमारी गौरवशाली ज्ञान परंपरा के प्रमुख आधार स्तंभ हैं।

भारत में पांडुलिपियों के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्रियों में गहरी क्षेत्रीय विविधता दिखाई देती है। दक्षिण भारत और बंगाल में ताड़पत्र का व्यापक उपयोग हुआ जो जल प्रतिरोधी होने के कारण अत्यंत टिकाऊ सिद्ध हुए। वहीं कश्मीर और हिमालयी क्षेत्रों में भोज वृक्ष की छाल अर्थात भूर्जपत्र का प्रयोग किया जाता था।पूर्वोत्तर भारत में अगरु वृक्ष से निर्मित 'हांसी पाता' के नाम से प्रसिद्ध रेशेदार पत्रों पर लेखन की परंपरा रही है।


भूर्जपत्र 

राजकीय आदेशों और महत्वपूर्ण अभिलेखों के लिए पूरे भारत में ताम्रपत्रों का उपयोग किया जाता था। शुद्ध ताँबा उत्कीर्णन के लिए सर्वोत्तम होने के कारण इसे अत्यधिक टिकाऊ माध्यम माना गया है। मध्यकालीन भारत में सेल्युलोज और वानस्पतिक रेशों से बने हस्तनिर्मित कागज का प्रचलन तेजी से बढ़ा। इसके अतिरिक्त राजस्थान और मध्य भारत में चित्रात्मक पांडुलिपियों के लिए सूती या रेशमी वस्त्रों का उपयोग भी अत्यंत लोकप्रिय रहा है।

भारतीय पांडुलिपियों में आयुर्वेद का ज्ञान अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक रूप में उपलब्ध है। पूर्व में प्राप्त हुई पांडुलिपियों में जैसे चरक संहिता जहाँ काय चिकित्सा का आधार है, वहीं सुश्रुत संहिता शल्य चिकित्सा का प्राचीनतम प्रमाण प्रदान करती है। इसमें प्लास्टिक सर्जरी और 121 प्रकार के शल्य उपकरणों का विस्तृत वर्णन मिलता है। नेत्र रोगों के लिए 'शलाक्य तंत्र' और पशु उपचार हेतु 'अश्वफलप्रकाश' (अश्व आयुर्वेद) जैसी पांडुलिपियाँ हमारी तकनीकी उन्नति को प्रमाणित करती हैं।

ऐसे ही आधुनिक विज्ञान की कई गणनाओं का आधार भी इन्हीं पांडुलिपियों के सूत्रों में निहित है। गंधार से प्राप्त बखशाली पांडुलिपि 'शून्य' के प्राचीनतम लिखित साक्ष्यों में से एक मानी जाती है। इसी प्रकार भास्कराचार्य की सिद्धांत शिरोमणि खगोलीय गणनाओं और त्रिकोणमिति के जटिल सिद्धांतों को स्पष्ट करती है। मैसूर में प्राप्त कौटिल्य के अर्थशास्त्र की पांडुलिपि ने प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था और कूटनीति की गहरी समझ प्रदान की है।


अर्थशास्त्र की पांडुलिपि - मैसूर

साथ ही पांडुलिपियों के अंत में अंकित 'कोलोफ़ोन' (पुष्पिका) से लेखक और तत्कालीन शासक की सटीक जानकारी मिलती है। यह ऐतिहासिक विवरण इतिहास के पुनर्निर्माण में अत्यंत सहायक सिद्ध होता है।आज के दौर में वैश्विक समस्याओं का समाधान पांडुलिपियों में निहित प्राचीन भारतीय प्रज्ञा से संभव है। उपनिषदों का 'वसुधैव कुटुंबकम' का सिद्धांत वैश्विक एकजुटता के लिए एक आध्यात्मिक आधार प्रदान करता है। 'वृक्षायुर्वेद' जैसी पांडुलिपियाँ जैविक कृषि और जल प्रबंधन के ऐसे सूत्र देती हैं जो वर्तमान संकटों का विकल्प बन सकते हैं।

मानसिक कल्याण के क्षेत्र में 'पतंजलि योग सूत्र' तनाव प्रबंधन के लिए एक वैज्ञानिक मार्गदर्शिका के रूप में विश्वभर में प्रतिष्ठित है। वहीं 'भगवद्गीता' जैसी रचनाएँ नैतिक नेतृत्व और संकट काल में सटीक निर्णय लेने की कला सिखाती हैं। ये पांडुलिपियाँ मात्र ऐतिहासिक धरोहर नहीं बल्कि मानवता के सर्वांगीण विकास का अक्षय भंडार हैं। आधुनिक शोधकर्ताओं के लिए पांडुलिपियाँ 'प्राथमिक डेटा' के रूप में एक विश्वसनीय आधार कार्य करती हैं।

मुद्रित पुस्तकों में अनुवाद की त्रुटियाँ संभव हैं, किंतु मूल पांडुलिपि लेखक के वास्तविक विचारों को शुद्ध रूप में प्रकट करती है। मध्यकालीन भारत के शिक्षण केंद्रों में इनका व्यापक उपयोग एक अखंड ज्ञान परंपरा को जीवित रखने हेतु किया गया।पांडुलिपियों का जीवन काल उनकी निर्माण सामग्री और जलवायु की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वानस्पतिक सामग्री से बनी होने के कारण ये प्राकृतिक अपघटन और कीटों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं।

ताड़पत्रों का अनुमानित जीवन 600 वर्ष तक होता है, जबकि भूर्जपत्र 800 वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं। ऐतिहासिक रूप से विदेशी आक्रमणों के कारण भारत की ज्ञान परंपरा पर गहरा आघात पहुँचा और कई महत्वपूर्ण ग्रंथालय नष्ट कर दिए गए। कई पांडुलिपियों को अंग्रेज ले गए। बची हुई पांडुलिपियाँ अब अपने आयु काल के अंतिम दौर में हैं और जर्जर होने की कगार पर पहुँच चुकी हैं। अतः इस अमूल्य बौद्धिक धरोहर का संरक्षण अब अत्यंत अनिवार्य और सामयिक हो गया है।


'ज्ञान भारतम् मिशन' के तहत बस्तर में पांडुलिपियों की जानकारी   

भारत सरकार ने इस दिशा में 'ज्ञान भारतम् मिशन' (2024-2031) को एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में प्रारंभ किया है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के नेतृत्व में इसके लिए ₹491.66 करोड़ का विस्तृत बजट आवंटित किया गया है। मिशन का लक्ष्य 1 करोड़ पांडुलिपियों का सर्वेक्षण और डिजिटलीकरण कर उन्हें भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित करना है।


ज्ञान भारतम् मिशन- पांडुलिपियों के संरक्षण हेतु 

इस मुहिम के तहत छत्तीसगढ़ के बस्तर और कोरबा से ताम्रपत्र प्राप्त हुई है। आने वाले समय में ऐसे कई पांडुलिपियाँ प्रकाश में आने वाली है। यह अभियान हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है और भारत को पुनः 'ज्ञान गुरु' के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

पांडुलिपियों का संरक्षण केवल संस्थागत या सरकारी कार्य नहीं बल्कि हम सब की सामाजिक जिम्मेदारी भी बन चुका है। यह युगांतकारी पहल अतीत की प्रज्ञा से भविष्य के पथ को आलोकित करने का सबसे सशक्त माध्यम बनने वाली है।


लेख:
वेद प्रकाश सिंह 
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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