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बैगा समुदाय के गुनिया

बैगा समुदाय के गुनिया


मध्य प्रदेश के डिंडौरी अंचल में बैगा समुदाय  की पारंपरिक उपचार पद्धतियाँ लोकज्ञान, जड़ी-बूटियों, मंत्र और संगीत की विशिष्ट परंपरा को सामने लाती हैं। सर्पदंश से जुड़ी ‘गुनिया’, ‘जागर’ और ‘बरुआ’ जैसी मान्यताएँ बैगा समाज की सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण पक्ष हैं। प्रस्तुत आलेख इसी लोकपरंपरा, उसकी उपचार विधियों और पीढ़ियों से संरक्षित ज्ञान का परिचय कराता है।


मध्य प्रदेश का नवगठित जिला डिंडौरी जड़ी-बूटियों तथा तंत्र-मंत्र का सिद्ध क्षेत्र है। यहाँ के मैकल पर्वत की गहन गिरि कंदराओं और सुरम्य वनस्थली में एशिया महाद्वीप की सबसे पुरानी समुदाय 'बैगा' निवास करती है।

इस समुदाय के लोग सदियों से वैद्य का कार्य करते आ रहे हैं। ये कठिन से कठिन बीमारियों का इलाज अपने वन परिसर में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों तथा तंत्र-मंत्र से करते हैं। चिकित्सा विज्ञान के इतना प्रगति कर लेने और सर्पदंश के इलाज के लिए 'एंटी-वेनम ड्रग्स' ईजाद हो जाने के बावजूद, डिंडौरी जिले के बैगा समुदाय सांप के काट लेने पर संगीत एवं मंत्रों के माध्यम से सर्पदंश का जहर उतारते हैं। यहाँ के बैगाओं का विश्वास है कि संगीत और मंत्रों के जरिए सर्पदंश का जहर उतर जाता है।

डिंडौरी के वनांचल में प्रकृति के साथ जीवन जीता बैगा समुदाय
डिंडौरी के वनांचल में प्रकृति के साथ जीवन जीता बैगा समुदाय

सर्पदंश के जहर उतारने की यह परंपरा पुरातन काल से प्रचलित है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह विधा हस्तांतरित होती रहती है। प्रत्येक बैगा बाहुल्य ग्राम में इस विधा के सिद्ध पुरुष होते हैं, जिन्हें 'गुरु' या 'गुनिया' कहा जाता है। इसे सिद्ध करने या सिखाने के लिए कोई नियमित या विशेष आयोजन नहीं होते, बल्कि अपने दैनिक कार्यों के दौरान ही गुरुओं द्वारा आकांक्षी को यह विधा सिखा दी जाती है।

इलाज की अनूठी प्रक्रिया:
मध्य प्रदेश का डिंडौरी जिला एक मात्र ऐसा जिला है जहां सबसे ज्यादा सर्प पाए जाते हैं और सबसे ज्यादा सर्पदंश से मृत्यु होती है। किसी व्यक्ति को सांप के काटने का समाचार सुनते ही गुरु अपने शिष्यों के साथ सारे काम छोड़कर घटनास्थल की ओर चल देता है। कई गुरु या गुनिया सर्पदंश का समाचार बताने वाले के गाल में खबर सुनते ही एक चांटा मार देते हैं; मान्यता है कि इधर वह खबरची को चांटा मारता है, वहां सर्पदंश के मरीज को आराम मिलना चालू हो जाता है (चाहे मरीज सौ किलोमीटर दूर क्यों ना हो)।

अधिकतर मामलों में जिस घर या स्थान पर सांप काटता है, उसी जगह पर परम्परानुसार 'पटा' बैठाला जाता है। पटा लगाने के बाद गुरु या गुनिया अपने देवी-देवताओं की आराधना करते हैं। फिर वे सबसे पहले 'काड़ी' देखते हैं; वे लकड़ी की दो काड़ी लेते हैं और उसे अंगुल से नापते हैं। यदि एक काड़ी बड़ी व एक काड़ी छोटी हो जाती है, तो इसका अर्थ है कि शरीर में तेजी से जहर फैल रहा है। तब गुनिया रोगी को जड़ी पानी में घोलकर पिलाता है, जिससे सर्प विष का असर कम होने लगता है। वह भंवर माल, कजरा, छीरकना जड़ी, बोथिर और दूधनाग—इन सभी जड़ियों को मिलाकर पानी के साथ दे देते हैं।

संगीत और मंत्रों से 'जागर' बैठाना:
इसके बाद गुनिया विष की 'हांकनी' करता है। वह अपने देवी-देवताओं का सुमिरन करता है। हांकनी के बाद गुनिया 'बांधनी' मंत्र पढ़ते हैं। मंत्र के द्वारा उस क्षेत्र को बांधते हैं। उसके बाद गुनिया सूप (सूपा) को गोद में रखता है, उसमें कोदों के दाने डालकर उस पर हाथ फेरता है जिससे स्वर लहरियां निकलती हैं। गुनिया का साथी लौकी के 'तूमे' को हिलाता है, उससे भी संगीत निकलता है।

संगीत, ढोल और जागर का वातावरण
संगीत, ढोल और जागर का वातावरण

कभी-कभी गुनिया नदी के मुहाने पर बैठता है तो तूमा वाला गुनिया नदी के दूसरे पार बैठकर तूमा बजाता है। सूपा से तूमा को एक धागे से बांध देते हैं जिससे दोनों में संपर्क हो जाता है। फिर मंत्रों का उच्चारण करते हुए सूपा पर धीरे-धीरे हाथ फेरते हैं, तो दूसरी पार बैठा गुनिया तूमा हिलाता है। सूपा और तूमा से जो स्वर निकलता है, उन्हीं स्वर लहरियों के बीच मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जिसे 'जागर बैठाना' कहते हैं।

बरुआ पर भाव का आरोहण:
इन मंत्रों और स्वर लहरियों के जरिए एक अन्य व्यक्ति पर भावात्मक छाया के आरोहण के लिए सांपों की विभिन्न प्रजातियों का नाम लेकर उनका आवाहन किया जाता है। जिस व्यक्ति को भाव आता है उसे 'बरुआ' कहते हैं। इस दौरान पीड़ित व्यक्ति को एक-दो व्यक्ति संभाले रखते हैं और इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि पीड़ित व्यक्ति सोने न पाए। इसके हेतु जोर-जोर से ढोल, नगाड़े, मांदर, टिमकी, गुदुम आदि वाद्य बजाते हैं।

इस प्रक्रिया के दौरान बरुआ पर जिस सर्प का भाव आता है, उससे उनके इष्ट देव का नाम पूछा जाता है। गुनिया इष्ट देव से मरीज की गलती या अपराध पूछता है। इनमें ऐसी मान्यता है कि कोई गलती या अपराध होने पर ही सांप काटता है। गलती या अपराध जान लेने के बाद मंत्रों के माध्यम से सिर से लेकर पांव तक विष चढ़ जाता है। बरुआ को विष चढ़ जाने के बाद ग्राम देवता का आवाहन किया जाता है, जिससे बरुआ के माध्यम से जो बात नाग देवता से हो, उसके ग्राम देवता साक्षी रहें।

जहर उतारने की अंतिम विधि:
नाग देवता का रूप धारण किए बरुआ का व्यवहार बिल्कुल सांप जैसे ही हो जाता है। वह सर्प जैसे ही जमीन पर सरकने लगता है, कभी-कभी छप्पर आदि पर चढ़ जाता है। साध पूरी होने पर वह पटा के निकट आ जाता है। जब जहर बरुआ के सिर तक पहुंचता है, तो वह अचेत हो जाता है। उसकी बेहोशी दूर करने के लिए मंत्रों का उच्चारण करते हैं। इसके बाद संगीत के साथ गीत गाए जाते हैं। गीत में प्रत्येक सर्प का नाम लिया जाता है; संबंधित सर्प का नाम आते ही बरुआ कुछ ऐसी हरकतें करता है जिससे पता चल जाता है कि अमुक सर्प ने पीड़ित व्यक्ति को डसा है।

बैगा परंपरा में जागर अनुष्ठान
बैगा परंपरा में जागर अनुष्ठान

फिर कुल देवता और नाग देवता से मिन्नतें की जाती हैं, गलती और अपराध की क्षमा मांगी जाती है। इसके बाद बरुआ पीड़ित व्यक्ति के सर्पदंश वाले स्थान को मुंह या लकड़ी की पोली नली के जरिए विष चूसने की प्रक्रिया करता है। कई बैगा गुनिया मंत्र को पीड़ित व्यक्ति के कान में सुनाते हैं। इस मंत्र को तीन बार पढ़ना पड़ता है। मंत्र पढ़ते ही मरीज होश में आ जाता है। यदि तीन बार मंत्र पढ़ने पर होश नहीं आता, तो मरीज के कान के पास मुंह ले जाकर मरीज को मंत्र सुनाना पड़ता है। मंत्र पढ़ने के बाद पुनः चुल्लू में पानी लेकर मरीज की आंख में मारते हैं।

मरीज का विष उतर जाने के बाद आमंत्रित किए गए देवी-देवताओं को बकायदा गीत गाकर विदा कर दिया जाता है। उसके बाद बरुआ का विष भी गीत-संगीत के माध्यम से उतार दिया जाता है। सारे कार्यक्रम पूरे होने के बाद पीड़ित व्यक्ति वहां उपस्थित बुजुर्गों के चरण स्पर्श करता है। आयोजन समाप्त हो जाने के बाद नाग देवता के निर्धारित स्थान पर सभी लोग दूध चढ़ाते हैं और नारियल फोड़ते हैं।

गुरु या गुनिया कभी भी इस परोपकारी कार्य का पैसा नहीं लेते।

डॉ. विजय चौरसिया
पोस्ट: गाड़ासरई, जिला: डिंडौरी (म.प्र.)

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