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डुंगरी भील: प्रकृति और परंपरा का अनूठा संगम

डुंगरी भील: प्रकृति और परंपरा का अनूठा संगम

अक्सर कुछ लोग कहते हैं कि भारत अनेक संस्कृतियों वाला देश है। यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है। वनांचलों, पर्वतों, नगरों या गांवों में रहने वाले लोगों की संस्कृति अलग नहीं है और ना ही सबको मिलाकर भारतीय संस्कृति बनती है, ऐसा भी नहीं है। बड़ों का सम्मान, अतिथि सत्कार, पर्वों का उत्साह, प्रकृति के प्रति श्रद्धा,परिवार के प्रति आदर और अध्यात्म का भाव आदि हमारी संस्कृति के मूल तत्वों में से एक है। मूल रूप से हम सबकी संस्कृति एक ही है। जिसे विभिन्न अंचलों के लोग इसे अपने-अपने तरीकों से व्यक्त करते हैं।


भारत की इस विशाल संस्कृति की झलक गुजरात के भील समुदाय में दिखाई देती है। यह समाज प्रकृति के साथ कदमताल मिलाकर चलता है। 'भील' शब्द मूल रूप से 'बिल्लु' शब्द से बना है। इसका अर्थ बाण या तीर होता है। भील प्राचीन काल से अपने साथ बाण रखते आए हैं। इसी कारण उन्हें यह नाम मिला। वर्तमान में वे बाण या तीर के लिए 'बीलखु' शब्द का उपयोग करते हैं। भील समाज में सुरक्षा का मुख्य हथियार तीर और धनुष रहा है।

गुजरात में भील समुदाय राज्य की 29 अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल है। ये लोग बनासकांठा से डांग तक अरावली, आरासुर, विन्ध्याचल, सातपुड़ा और सह्याद्रि की पहाड़ियों में निवास करते हैं। गुजरात की अन्य जनजातियों की तुलना में इनकी संख्या 50 प्रतिशत है। पूरे राज्य में इन्हें एक ही नाम से जाना जाता है। इसके बाद भी हर जिले और तालुके के भील समाज का जीवन और विशेषताएँ भिन्न हैं।

गुजरात के बनासकांठा, साबरकांठा, गोधरा, दाहोद, वडोदरा, भरूच, नर्मदा, सूरत और डांग जिलों में भील जाति की आबादी अधिक है। साबरकांठा जिले के खेडब्रह्मा और ईडर से 70 किलोमीटर दूर पोशीना तालुके में डुंगरी भील निवास करते हैं। डुंगरी भील समुदाय के जन्म से मृत्यु तक के सामाजिक नियम कुछ विशेष हैं। ये लोग अपने कुल की परम्परा को बनाए रखते हैं। ये सामूहिक भावना और संगठन के साथ कार्य करते हैं। समय के साथ प्रत्येक समाज में बदलाव आते हैं। डुंगरी भील समुदाय में भी परिवर्तन हुए हैं। शिक्षा और आर्थिक स्थिति में सुधार से इनकी सामाजिक परम्पराओं में बदलाव आ रहे हैं। अन्य समाजों के प्रभाव ने भी इन्हें बदला है।

आध्यात्मिक जीवन
डुंगरी भीलों की मान्यताओं में देवी देवताओं का मेल दिखता है। इसमें मुख्य देवता, स्थानीय देवियाँ, वीर पूर्वज, प्रकृति और अदृश्य शक्तियाँ शामिल हैं। वे हर प्राकृतिक घटना और सामाजिक अवसर के पीछे किसी शक्ति की उपस्थिति मानते हैं। डुंगरी भीलों के दैनिक जीवन में स्थानीय और प्राकृतिक देवताओं का स्थान बहुत बड़ा है। उदाहरण के लिए नन्देरवो को खेती और अनाज का देवता माना जाता है। लोग उन्हें प्रसन्न करने के लिए हर दूसरे वर्ष मुर्गे और बकरे की बलि देते हैं। इस दिन पत्तियों की सब्जी और शाकाहारी भोजन करना मना होता है। डुंगरी भील वाघदेव की पूजा भी श्रद्धा से करते हैं। इनकी आस्था में महादेव, पार्वती और गणेश का भी विशेष स्थान है।

डुंगरी भीलों के जीवन में पर्वत, वन, नदियाँ, झरने, बड़े वृक्ष और शिलाएँ देवता के समान मानी जाती हैं। उनका गहरा विश्वास है कि इन प्राकृतिक स्थलों में देवताओं और पूर्वजों की आत्माएँ रहती हैं। इस कारण वे इन स्थानों का विशेष सम्मान और संरक्षण करते हैं। लोग कृषि कार्य, गृह निर्माण, विवाह, सन्तान जन्म या सामुदायिक उत्सव से पहले देवताओं का आह्वान करते हैं। गाँव के भोपा या पारम्परिक पुजारी धार्मिक कार्यों को पूरा कराते हैं। वे लोक मन्त्रों, गीतों और पूजा विधियों से समुदाय और शक्तियों के बीच सम्पर्क बनाते हैं। धार्मिक आयोजनों में सामूहिक नृत्य, लोकगीत, ढोल और पारम्परिक वाद्य यन्त्रों का उपयोग होता है। इन मान्यताओं से डुंगरी भील अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। इसके साथ ही वे प्रकृति संरक्षण, सामुदायिक एकता और पूर्वजों का सम्मान करते हैं। वे अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी को सौंपते हैं।

मान्यताएँ और परम्पराएँ: बाबरी (मुंडन संस्कार)
डुंगरी भील समाज में लड़की की बाबरी नहीं होती है। परिवार पहले पुत्र की बाधा मायके पक्ष में मामा के घर करता है। इसे ‘वतांमणा’ कहते हैं। समाज के जानकार दीपक भाई डाभी बताते हैं कि युवक के बड़े होने पर विवाह से पहले उसे मामा के घर ले जाते हैं। वहाँ कुलदेवी को बकरे का भोग चढ़ाकर भोज करते हैं। बाधा के समय सिर के बाल नहीं काटते हैं। लोग केवल विधि पूरी करते हैं। युवक और उसके सम्बन्धी दो झण्डे और एक बकरा लेकर मामा के घर पहुँचते हैं। मामा बाधा कराने वाले भांजे को साफा या माला पहनाते हैं। वे अपनी बहन को साड़ी भेंट करते हैं। इसके बाद देवरा और कुलदेवी को झण्डा चढ़ाकर विधि पूरी करते हैं। सुबह की विधि के बाद मामा के परिवार वाले आए हुए सम्बन्धियों को नाश्ता कराते हैं। नाश्ते में शीरा, दाल भात या रोटी सब्जी देते हैं। नाश्ते के बाद लोग गीत गाते हैं। दोपहर में बकरे का भोज होता है। नाश्ते और भोज के मसालों का खर्च मामा पक्ष उठाता है। भोज समाप्त होने पर सभी लोग विदा लेते हैं। आजकल व्यस्तता के कारण लोग अधिक समय नहीं रुकते हैं। वे बाधा का कार्य जल्दी समाप्त कर लेते हैं। आर्थिक स्थिति के अनुसार नाश्ते के व्यंजन बदल सकते हैं।


विवाह का दृश्य 

डुंगरी भील समाज में डाम देने की एक पुरानी प्रथा है। छोटे बच्चों को ‘टाबरिया’ जैसा विशेष रोग होने पर विशेषज्ञ उन्हें डाम देते हैं। जानकार व्यक्ति बच्चे को सुई से पसलियों के नीचे त्रिशूल के आकार में डाम देता है। समाज के लोग इस स्थान को ‘डूबकी’ कहते हैं। डाम देने का कार्य केवल अनुभवी व्यक्ति करता है। यह समाज की पारम्परिक उपचार पद्धति है।

डुंगरी भीलों की धार्मिक और आध्यात्मिक परम्पराएँ उनके प्रकृति आधारित जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों की पहचान हैं। उनकी आस्था देवी देवताओं की पूजा तक सीमित नहीं है। वे प्रकृति, पूर्वजों और स्थानीय देवताओं का गहरा सम्मान करते हैं। यह व्यवस्था सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण और नैतिक जीवन को बनाए रखती है। डुंगरी भीलों की इन आध्यात्मिक परम्पराओं का अध्ययन भारतीय संस्कृति और प्रकृति आधारित जीवन दर्शन को समझने में सहायक है।

- डॉ. रत्ना त्रिवेदी

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