खैरागढ़ – एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय
February 04, 2026
संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

शिल्पकला अथवा हस्तकला सिर्फ प्रदर्शन की विषय-वस्तु नहीं बल्कि संस्कृति का आईना भी होती है । हमारा देश जिसका वन क्षेत्र लगभग 72.7 मिलियन हेक्टेयर है है और वनक्षेत्र की सूची में वैश्विक स्तर पर 9वें स्थान के साथ विश्व के कुल वन क्षेत्र का लगभग 2% हिस्सेदारी रखता है । संभवतः यही कारण है कि भारतीय हस्तशिल्प में वनोत्पाद से बनी कलाकृतियाँ भीं खासी लोकप्रिय हैं।

भारत का वनक्षेत्र - नवीनतम आंकड़े
बांस शिल्प उन्हीं में से एक है। बांस जिसकी 1450 प्रजातियाँ उपलब्ध हैं दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाले पौधों में से एक है जो एक दिन में करीब 60 से.मी. बढ़ने की क्षमता रखता है। इसके उपयोग द्वारा घरेलु उपयोग, सजावटी सामान, फर्नीचर और वन प्रदेश के रहवासी उनके दैनिक जीवन में काम आने वाली ऐसे बहुत सी वस्तुएं तैयार करते हैं।
पूर्वोत्तर भारत, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे वन-प्रधान क्षेत्रों में केंद्रित यह शिल्प प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहने वाली समुदायों द्वारा उन्नत किया गया है। क्योंकि पूर्वोतर भारत, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड इन प्रदेशों में वनक्षेत्रों की बहुलता है अतः इस तरह के उत्पादों को बनाने और उनकी उच्च क्वालिटी के लिए प्रसिद्ध हैं।
बांस केवल घास नहीं है; यह "हरित सोना" है। तेजी से बढ़ने वाला यह अत्यधिक टिकाऊ संसाधन कार्बन अवशोषित करता है और मिट्टी अपरदन रोकता है, जिससे यह हरित भविष्य का निर्माण खंड बनता है। आजकल इसे लकी प्लांट के रूप में भी अच्छी लोकप्रियता हासिल है इसलिए उपहार के तौर पर भी इसका बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है ।

भाग्यशाली भी माना जाता है बांस का पौधा
वैसे तो वनप्रदेशों में वृक्षों की बहुलता होती है किन्तु इस कलाकृति के लिए विशेष तौर पर बांस का चयन किये जाने की पीछे का कारण है उसकी सुन्दरता और पर्यावरण अनुकूलता। बांस एक ऐसा वनोत्पाद है जो हमारी मूलभूत आवश्यकताओं से लेकर हमारी दैनिक जीवन की छोटी-छोटी जरूरतों से लेकर मनोरंजन से जुड़ी सामग्री, सबकुछ बनाकर देने में सक्षम है ।
सबसे रोचक बात यह है कि इन सुन्दर वस्तुओं को बनाने का काम करने वाले हाथ समाज का वह विभाग हैं जिन्हें अनपढ़ और अनगढ़ कहा जाता है और यह कुतर्क देने वाले तथाकथित बौद्धिक वर्ग के लोग होते हैं ।
बांस से बनने वाली सामग्रियों को निम्नांकित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -
घरेलू उपयोग की वस्तुएं : टोकरी, डिब्बे, चटाई और प्रतिष्ठित भारतीय 'चारपाई' (बिस्तर) कई घरों में आम हैं। चम्मच, कटोरे और रसोई के बर्तन जैसे रसोई सामान इसकी व्यावहारिकता दर्शाते हैं।
फर्नीचर और अवसंरचना: छोटी वस्तुओं से परे, बांस से सुंदर और टिकाऊ फर्नीचर जैसे कुर्सियां, मेजें और अलमारियां बनाई जाती हैं। नवाचारी रूप से, इसकी मजबूती भूकंप-रोधी घर, नकली डंडे और कुछ क्षेत्रों में पुल बनाने में उपयोग की जाती है।

शहरी क्षेत्रों में लोकप्रिय बांस के फर्नीचर
कला और सजावटी वस्तुएं: जटिल लैंपशेड, दीवार फूल, सजावटी पैनल और यहां तक कि मूर्तियां बनाई जाती हैं, जो नरम डंठल में छिपी कलात्मक क्षमता प्रकट करती हैं। इस वनोत्पाद से बहुत सी विशिष्ट और विशेषीकृत वस्तुएं भी तैयार की जाती हैं जैसे- शिल्प अगरबत्ती, माचिस, पेंसिल और कागज आदि । संगीतकार लंबे समय से प्रतिष्ठित 'बांसुरी' (बांसुरी) और अन्य ताल वाद्ययंत्र बनाने के लिए इसे पसंद करते हैं।
बांस शिल्प का सांस्कृतिक मूल्य अमूल्य है, लेकिन इसका आर्थिक योगदान भी महत्त्वपूर्ण है और तेजी से बढ़ रहा है। हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से बहुत महत्त्व के हैं और इसमें बांस प्रमुख शक्ति है।

हस्त और कुटीर उद्योग में बांस का है विशेष स्थान
भारतीय हस्तशिल्प क्षेत्र का मूल्य 30,000 करोड़ रुपये (लगभग 3.6 बिलियन डॉलर) से अधिक है और यह रोजगार का प्रमुख स्रोत है। विशेष रूप से, भारतीय बांस बाजार बहुत वृद्धि देख रहा है । उद्योग रिपोर्टों के अनुसार, 2021 में बाजार लगभग 3.6 बिलियन डॉलर का था और 2029 तक लगभग 4.8 बिलियन डॉलर पहुंचने का अनुमान है, महत्वपूर्ण चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) पर ।
यह वृद्धि अमूर्त नहीं है यह सीधे जीविकोपार्जन में बदल जाती है। यह क्षेत्र लाखों कारीगरों को रोजगार प्रदान करता है विशेषकर जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों में, जो इस पारंपरिक ज्ञान के प्राथमिक संरक्षक हैं।
बांस अपनी तेज वृद्धि दर (दिन में 1 मीटर तक), टिकाऊपन और कार्बन शोषण क्षमता के लिए विशेष है, जो इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाता है। भारत में बांस आधारित उद्योग का बाजार मूल्य 2025 तक लगभग 30,000 करोड़ रुपये का अनुमानित है, जिसमें पूर्वोत्तर राज्यों की 60% हिस्सेदारी है।
वैश्विक स्तर पर, बांस उत्पाद बाजार 2026 तक 72 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें भारत प्रमुख निर्यातक है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में 50,000 से अधिक कारीगर बांस शिल्प से जुड़े हैं, जो ग्रामीण रोजगार उत्पन्न करते हैं।
बांस शिल्प से भारत को प्रतिवर्ष 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात राजस्व प्राप्त होता है, मुख्यतः यूरोप और अमेरिका को। कुटीर उद्योग के रूप में यह 10 लाख से अधिक रोजगार प्रदान करता है, विशेषकर उन समुदायों को जो वनक्षेत्रों के सन्निकट निवासरत हैं।

वनबाहुल्य क्षेत्रों में जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन- बांस
सरकारी योजनाओं जैसे 'बांस मिशन' ने 2025 तक 1 लाख हेक्टेयर बांस रोपण को बढ़ावा दिया है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है।हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और इस नाते भारतीय अर्थव्यवस्था में इनकी बहुत अहम् भूमिका है।
जीडीपी में इसका योगदान 2% है। बांस एवं अन्य हस्तशिल्प जैसे उत्पाद न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करते हैं, बल्कि समाज के उन अनपढ़-अनगढ़ हाथों को सशक्त बनाते हैं, जो तथाकथित बुद्धिजीवियों की अवहेलना के बावजूद विश्वस्तरीय कलाकृतियां रचते हैं।

बांस के जंगल
यह उद्योग आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक है, जो पर्यावरण संरक्षण, रोजगार सृजन और वैश्विक बाजार में हमारी श्रेष्ठता को दर्शाता है एक ऐसा भविष्य जहां बांस की हर टहनी समृद्धि की कहानी कहती है ।
लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा
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