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सामाजिक समरसता के आलोक में गोटुल

सामाजिक समरसता के आलोक में गोटुल


विश्व में विविध दर्शन और विचारों के बावजूद "वसुधैव कुटुम्बकम्" की नीति केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का वह आधारभूत तत्व है, जिसने सह-अस्तित्व, समरसता और बंधुता की अवधारणा को जन्म दिया। इस भावना की सर्वाधिक जीवंत अभिव्यक्ति हमे छत्तीसगढ़ के बस्तर में देखने को मिलती है।

प्रकृति की गोद में, चारों ओर पर्वतों और वनों से घिरा बस्तर, ऐसा क्षेत्र है, जहाँ न पश्चिमी दुनिया और न ही मुगलों की संस्कृति का प्रभाव पड़ा। जिसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे माँ भारती ने अपने आँचल से इस क्षेत्र को सहेज रखा हुआ है। "गांधीजी कहा करते थे, अगर आपको असली भारत का दर्शन करना है तो आप वहाँ जाइए जहाँ रेल नहीं पहुँची है।"

विशुद्ध भारतीय संस्कृति के बीज कैसे आरण्यक क्षेत्रों में विकसित हुए, यह बहुत सरलता से हमें बस्तर में नज़र आता है। तो आइए, हमारी संस्कृति के ऐसे ही पक्ष को देखने की यात्रा पर चलें, जहाँ समरसता और सामुदायिक चिंतन की अवधारणा कई शताब्दियों से सतत रूप से चलती आई है, जिसे आज विश्व "गोटुल" के नाम से जानता है।


गोटुल, बस्तर

"गोटुल" शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों की राय अलग-अलग रही है। प्रसिद्ध मानवशास्त्री एस. सी. सरकार का मत है कि यह शब्द संस्कृत के "गोष्ठ" (सभा/निवास) से भी प्रभावित हो सकता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह "गो थुल" = "ज्ञान का स्थल" से बना है। अधिकांश विद्वान गोटुल को "युवा गृह" कहते हैं। भिन्न मतों के बावजूद सभी विद्वान इस ओर संकेत करते हैं कि "गोटुल" ग्राम का वह सामुदायिक स्थल है। जहाँ युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति-परंपराओं को सीखती है, विचार-विमर्श करती है और सामाजिक गतिविधियों में सेवा देती है।


जगदलपुर संग्रहालय में बना गोटुल

गोटुल की उत्पत्ति को लेकर समाज का दृष्टिकोण और वाचिक इतिहास भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार स्वयं लिंगो पेन ने मुरिया बच्चों को सेमल वृक्ष के नीचे शिक्षा दी थी। यहीं से गोटुल की शुरुआत मानी जाती है। बाद में लिंगो की स्मृति में ग्राम-ग्राम में गोटुल निर्मित किए गए, जो आज भी मुरिया जनजाति के युवाओं के जीवन के केंद्र बने हुए हैं।

गोटुल को केवल नृत्य-गान के केंद्र तक सीमित कर देना, उसके व्यावहारिक पक्षों के साथ अन्याय है। गोटुल अपने आप में एक पूरी संस्था है, जिसमें कई पदाधिकारी और उनके दायित्व निर्धारित होते हैं: यह व्यवस्था पूरी संस्था और समाज को सुचारु रूप से चलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।

गोटुल में सिरेदार (सरदार) का पद अत्यंत सम्माननीय होता है। प्रत्येक सदस्य सरदार के निर्देश और गोटुल के नियमों का पालन करता है। चयन के बाद सरदार सभी से चर्चा करके दायित्व सौंपता है। कोटवार, दीवान, जमादार, चालकी, कांडकी, कजांची. सिपाही आदि पदों पर सदस्य नियुक्त किए जाते हैं। गोटुल की युवती सदस्यों की प्रमुख को बेलोसा और युवक सदस्यों के प्रमुख को चेलिक कहा जाता है।


गोटुल के सदस्य

गोटुल के केंद्र में समरसता का भावः समरसता, सम + रस से बना है। इसका अर्थ है "एक समान रस" सामाजिक संदर्भ में इसका आशय है कि व्यक्तियों और समुदायों के भाव ऐसे घुलें कि व्यक्ति-व्यक्ति के बीच के सारे भेद मिट जाएँ। जब मनुष्य अपनी व्यक्तिगत पहचान छोड़कर समाज की सामूहिक पहचान से स्वयं को अंगीकार कर लेता है, जब वह व्यक्ति-व्यक्ति में भेद नहीं देखता, तभी वह समाज के साथ समरस हो जाता है।

यह भाव प्रकृति के छोटे से उदाहरण में साफ दिखता है। मधुमक्खी अनेक फूलों से पराग बटोरती है, पर जब वह मधु बनता है तो किसी एक पुष्प की अलग पहचान नहीं रहती. फिर भी सभी का अंश उसमें निहित रहता है। यही समरस होना है। इसी तरह दूध और पानी मिलकर एक ही स्वाद में ढल जाते हैं; अलग-अलग होकर भी एक ही रस बन जाते है।

गोटुल इसी समरसता की जीवंत पाठशाला है। यहाँ आने वाला युवा "मैं" से "हम" की ओर बढ़ता है। अपनी व्यक्तिगत पहचान छोड़कर वह समाज के साथ समरस हो जाता है। सभी साथ सीखते हैं, साथ गाते हैं. साथ श्रम करते हैं। जब गोटुल में नृत्य होता है और वाद्य-यंत्रों की थाप पर कदम मिलते हैं, तो केवल नृत्य नहीं होता, एक सामाजिक लय भी बनती है। यही लय गोटुल और समाज के बीच युवाओं को समरस कर देती है; इसके बाद व्यक्ति और समाज के बीच का भेद समाप्त हो जाता है और समरसता विचार से व्यवहार में उतर आती है।


गोटुल में नृत्य करते युवक - युवती 

समरसता और कर्तव्यबोध की पाठशाला गोटुलः
गोटुल समरसता और कर्तव्यबोध की पाठशाला है। गोटुल की जिम्मेदारी केवल संस्थागत न होकर सामाजिक स्तर पर भी होती है। गोटुल को सुचारु रूप से चलाने के साथ ग्राम में होने वाले महत्त्वपूर्ण आयोजनों को सफलता पूर्वक सम्पन्न कराने की जिम्मेदारी भी होती है। गोटुल के अंतर्गत होने वाली विविध गतिविधियों से स्पष्ट होता है कि यह केंद्र किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं है, जहाँ न केवल नृत्य-गीत-संगीत सिखाए जाते हैं, बल्कि युवाओं में समाज-आस्था, संस्कृति, परंपराएँ, आध्यात्मिकता और दर्शन के तत्व भी जागृत होते हैं।

यह प्रक्रिया गोटुल में प्रवेश से शुरू होती है। समरस होने की पहली प्रक्रिया यही से शुरू हो जाती है, जहाँ वह अपनी व्यक्तिगत पहचान छोड़कर गोटुल के साथ एकीकृत होता है। हर नए सदस्य को एक नया नाम मिलता है; वह व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठकर "हम" की पहचान अपनाता है। यहाँ आने वाले युवक-युवतियाँ किसी भी गोत्र या आर्थिक पृष्ठभूमि के हों, सभी एक साथ रहते और सीखते हैं। पूरी व्यवस्था लोकतांत्रिक तरीके से संचालित होती है। सिरेदार, बेलोसा, कोटवार, चालकी जैसे पद सामूहिक सहमति से चुने जाते हैं। पदाधिकारी द्वारा नियम तोड़ने पर दंड उन्हें भी मिलता है। यहाँ के नियम और दंड सबके लिए एक सामान होता है।


गोटुल में पदस्थ सदस्य

गोटुल के सदस्य अपनी संस्कृति, परंपराओं, नैतिक शिक्षा और लोकाचार के साथ-साथ शिकार विधि, शिल्पकला तथा घर-गृहस्थी की मरम्मत जैसी बातें सीखते हैं। ज्ञान किसी एक के पास नहीं रहताः जो किसी को आता है, वह सभी को सिखाया जाता है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होने वाली मौखिक वाचिक परंपराएँ केवल दोहराई ही नहीं जातीं, वे युवाओं में पूर्वजों के दिखाए मार्ग और दायित्व का बोध भी कराती हैं। साथ ही सामुदायिकता का भी एहसास कराती है।

गोटुल में गीत गाने वाले, वाद्य यंत्र बजाने वाले और नृत्य करने वालों में भेद नहीं होता । सभी समान रूप से गीतों के बोल, पैरों की कदमताल और विविध वाद्यों की धुन पर एक साथ थिरकते हैं। जिसमें सहभागिता प्रधान होती है, प्रदर्शन नहीं। दर्शक के रूप में कोई नहीं होता, सभी सहभागी होते हैं। प्रतिदिन होने वाली इन गतिविधियों से जो समरसता की लय निकलती है, वह सभी को एकरूप कर देती है। इस भाव से गोटुल के सदस्य व्यक्तिगत भेद को भूल कर एक हो जाते है।

वाद्य यंत्र
गोटुल के वाद्य यंत्र 

गोटुल के नियम और अनुशासन सरल किन्तु दृढ़ हैं। समयपालन, स्वच्छता, झूठ न बोलना, चोरी निषेध जैसे आचरण सामाजिक नैतिक मूल्यों का निर्माण करते हैं। अतिथि सत्कार में गोटुल के लोग अत्यंत पारंगत होते हैं: सचमुच "अतिथि देवो भवः" को व्यवहार में उतारते हैं। विवाद होने पर समाधान दंड से अधिक सुधार पर आधारित होता है। पक्षों की सुनवाई, क्षमा और सामुदायिक निर्णयों से संबंध खराब नहीं होते, बल्कि व्यक्ति को स्वयं को सुधारने का अवसर मिलता है।

दैनिक एकत्रीकरण के साथ-साथ विभिन्न अवसरों पर ढोल बजाकर सभी को समान रूप से सूचित किया जाता है। आपातकालीन घटना होने पर सामूहिक रूप से एकत्र होने की सूचना दी जाती है। कोई भी कार्य अकेले में नहीं, सभी के संज्ञान में रखकर किया जाता है, इससे परस्पर विश्वास मजबूत होता जाता है।

कई गोटुलों में प्रतिदिन एक लकड़ी जमा करने का नियम भी होता है, जो सामाजिक एकता और पारस्परिक सहयोग का संकेत है। कजांची जमा हुए सामान की जानकारी रखता है, जिसकी सूचना सभी को समान रूप से होती है। पारदर्शी तरीके से सारे कार्य होते है। हर कार्य में श्रम का बराबर बंटवारा होता है। सभी को उनकी सामर्थ्य अनुसार कार्य दिए जाते हैं। स्त्री और पुरुष की समान भागीदारी व्यवहार में दिखाई पड़ती है। साथ सीखना, साथ निर्णय लेना और साथ श्रम करना, समाज में समरसता स्थापित करने की पहली कुंजी है।

गोटुल से शिक्षित युवा एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में निखरता है, जिसमें समाज के प्रति करुणा, प्रेम, सह-अस्तित्व, संवेदनशीलता और सामुदायिक कर्तव्यबोध स्वाभाविक गुण बन जाते हैं। समग्र रूप से देखें तो गोटुल में समान नैतिक मूल्य, सामुदायिक अस्मिता, समान शिक्षा और अवसर, सहयोगी वातावरण और न्यायपूर्ण नियम पर आधारित वह दार्शनिक पद्धति है. जो केवल प्रशिक्षण स्थल नहीं, बल्कि समरस समाज की पाठशाला है। इस कारण जनजातीय समाज का व्यक्ति से पहले समुदाय के बारे में सोचता है; वह अपना नुकसान सहकर भी समाज की गरिमा की रक्षा करता है।


गोटुल, नारायणपुर

गोटुल के भीतर मिली हुई सीख बाहर सेवा बनकर प्रस्फुटित होती है। गाँव की गलियाँ हों या खेत, उत्सव हो या आपदा, हर जगह गोटुल के युवा सामाजिक दायित्व और समरसता को व्यवहार में उतारते दिखाई देते हैं। वे भली-भाँति समझते हैं कि ग्राम समाज और गोटुल अलग-अलग नहीं है। गोटुल अपने भीतर महान विचारों के बीज युवाओं में भर देता है, जो आगे चलकर समाज को उच्चतर मूल्यों वाले समुदाय के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

गाँव में कोई पर्व, जन्मोत्सव, विवाह, मृतक संस्कार या अन्य सामुदायिक आयोजन हो. गोटुल के युवा इन्हें भली-भाँति सम्पन्न कराते हैं। आमंत्रण देना, लोगों को एकत्र करना. आवास-व्यवस्था और भोजन जैसे कार्य गोटुल करता है। ग्राम देवता के उत्सव, मड़ाई और अन्य ग्रामों के साथ होने वाले संयुक्त आयोजन पूरे गाँव को एक लय में बाँधते हैं। कृषि के बाद धान कटाई के समय गोटुल के युवा आवश्यकतानुसार खेतों में सहयोग देते हैं। घर घर जाकर नृत्य करते है, पूस कोलांग जैसे नृत्य फसल उत्सवों में श्रम को उल्लास में बदल देते हैं। लोगों में बंधुता बढ़ती है और पूरा गाँव समरस होकर उत्सव मनाता है।

विवाह में सहयोग देते गोटुल के सदस्य
विवाह में सहयोग देते गोटुल के सदस्य

विवाह चाहे किसी के यहाँ हो, व्यवस्था की जिम्मेदारी गोटुल के युवा निभाते हैं। मंडप तैयार करना, भोजन बनाना, पत्तल सिलना, लकड़ी लाना, बारातियों के ठहराव की व्यवस्था करना हो दुल्हन को तैयार करना उनकी जिम्मेदारी होती है। मृतक संस्कार में वही युवाजन शोकाकुल परिवार का सहारा बनते हैं और गरिमा के साथ पूरी व्यवस्था सँभालते हैं। आनंद और शोक दोनों में साथ खड़ा होना ही समुदाय की असली शक्ति और गोटुल की पहचान है।
गाँव में आने वाले आगंतुक के लिए आवास, भोजन और पानी की व्यवस्था गोटुल के जिम्मे होती है। "अतिथि देवो भवः" यहाँ केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि अतिथि के प्रति देवतुल्य भावना है। स्वागत से लेकर आवास और विदाई तक के कार्य गोटुल के युवा संभालते है।

कृषि और संसाधनों का संरक्षण गोटुल की दूसरी बड़ी जिम्मेदारी है। युवक खेतों और फसलों की रखवाली करते हैं। अगले वर्ष के लिए चुने गए अच्छे बीज सामूहिक रूप से चुने, सुखाए और संग्रहित किए जाते हैं: इसके लिए गाँव में एक पर्व का आयोजन भी होता है।

कई ग्रामों के साथ संयुक्त रूप से किए जाने वाले कार्यों से गोटुल का दायरा गाँव की सीमा से बाहर जाता है। दो या अधिक गाँव मिलकर नदी-नालों पर पुल बनाना, आवागमन हेतु रास्ते तैयार करना, तालाब गहरीकरण या अन्य कार्य बड़ी जिम्मेदारी से सम्पन्न करते हैं। अनेक ग्रामों के गोटुल मिलकर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जिनसे मेल-मिलाप, संबंध और बंधुता की भावना सुदृढ़ होती है।

आपातकालीन स्थिति में भी गोटुल के सदस्य बिना किसी भेदभाव के निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करते हैं। किसी का स्वास्थ्य खराब होने पर अस्पताल पहुँचाना हो या बारिश से घर ढह जाने पर सामूहिक प्रयास से एक-दो दिनों में नया मकान खड़ा कर देना, सब तत्परता से किया जाता है।

गोटुल केवल युवाओं का निवास या नृत्य-गान का केंद्र नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का जीवंत संस्थान है, जहाँ से मिली शिक्षा सेवा के रूप में समाज में प्रवाहित होती है।

सांस्कृतिक बोध से शुरू होकर अनुशासन, ज्ञान, स्वास्थ्य, लोकाचार और सामाजिक न्याय तक, गोटुल युवा को "मैं" से "हम" की पहचान में रूपांतरित करता है। यही रूपांतरण अतिथि-सत्कार, त्योहारों की व्यवस्था, विवाह जन्म जैसे अवसरों पर सहयोग, सामूहिक श्रम और आपातकालीन सहायता जैसी सार्वजनिक सेवाओं में दिखाई देता है। समरसता यहाँ केवल विचार नहीं, सामान्य जन-जीवन के मूल्यों में रची-बसी है।

आज जब सामाजिक मूल्यों का क्षय और आपसी दूरियाँ बढ़ रही हैं, ऐसी स्थिति में गोटुल जैसी संस्था समरस जीवन का सशक्त प्रतिमान बनकर सामने आती है। समान अवसर, सहअस्तित्व, सहभागी नेतृत्व, न्याय और उत्तरदायित्व जैसे सिद्धांत गोटुल में व्यवहार के रूप में दिखाई देते हैं. इन्हें आधुनिक शिक्षा और सामुदायिक विकास कार्यक्रमों में सीधे समाहित किया जा सकता है। सार यह कि समरसता किसी आदेश या दबाव से नहीं बनती, वह व्यक्तिगत से सामुदायिक पहचान, सामुदायिक श्रम और सामुदायिक उत्तरदायित्व से पैदा होती है। यही गोटुल की परंपरा का सार है और यहीं भारत की शाश्वत शक्ति, जो पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन में फलती फूलती रही है।
 


लेख:
वेद प्रकाश सिंह,
संपादक, 
दक्षिण कोसल टुडे

 

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