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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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गोत्रोद्भव : संस्कृत वाङ्मय

गोत्रोद्भव : संस्कृत वाङ्मय

हमारे समाज में गोत्र, वंश परिचय के रूप में भी प्रतिष्ठित है। इसका आरंभ प्राचीन साहित्य में ऋषि परंपरा से माना जाता है। यह व्यवस्था कब से तथा किस प्रकार से प्रचलन में है, इस बारे में निश्चयपूर्वक तो कुछ कहा नहीं जा सकता, किंतु प्राचीन प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर निकटतम निष्कर्ष पर अवश्य पहुँचा जा सकता है।

जाति व गोत्र में पर्याप्त भेद है। गोत्र को बहिर्विवाही समूह माना जाता है अर्थात् ऐसा समूह जिसका उद्भव किसी एक आदिपुरुष से माना जाता है। इस प्रकार एक ही रक्त संबंध होने से उनका परस्पर विवाह उचित नहीं माना जाता। इसके विपरीत जाति एक अन्तर्विवाही समूह है यानि एक जाति के लोग जो प्रायः अपने समूह में ही विवाहादि संबंध करते हैं। भारतीय जीवन में गोत्र व्यवस्था का बहुत महत्त्व है, क्योंकि इससे वंशावली की पहचान होती है।

पाणिनि ने अपने अष्टाध्यायी में गोत्र शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए बताया है- अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् । (अष्टाध्यायी 4.1.162) अर्थात् पौत्र (तीसरी पीढ़ी) तथा उससे आगे सभी अपत्य की गोत्र संज्ञा होती है।
हर व्यक्ति में यह स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि वह अपनी वंश परंपरा को जाने तथा अपनी वंश परंपरा के कर्तव्य व संस्कारों को अक्षुण्ण रखें। धार्मिक आधार पर देखें तो ऋषियों को गोत्र प्रवर्तक माना गया है। वैदिक साहित्य, महाकाव्यों व पुराणों में इसके उल्लेख प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद में द्वितीय से अष्टम मंडल के ऋषि क्रमशः गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज, वशिष्ठ, कण्व हैं तो सप्तर्षियों की एक मुख्य परम्परा मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वशिष्ठ मानी गयी है। महाभारत के आदिपर्व में षट् ऋषियों का वर्णन कर सप्तम ऋषि कश्यप से समस्त प्रजाओं की उत्पति कही गयी है-

ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः।
मरीच्यर्त्यगिरसी पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।
मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपात्तु इमाः प्रजाः ॥

इन ऋषियों के नाम वेदों, पुराणों, महाभारत में किंचित् पृथकता के साथ मिलते हैं। संभावित है, कालांतर में ऋषियों की प्रसिद्धि के कारण कुछ नयेस्वतंत्र गोत्रों का प्रचलन हुआ तथा गोत्रों की संख्या अनवरत बढ़ती गई। प्रायः हम यह देखते भी हैं कि कई जातियाँ व उनके गोत्र स्वयं को एक ऋषि परम्परा से जोड़ने का प्रयास करते हैं।

एक समस्या यह उपस्थित होती है कि ये सभी ऋषि ब्राह्मण थे, किंतु गोत्र व्यवस्था तो सभी वर्षों में विद्यमान है, तब अन्य वर्षों में गोत्रों का प्रचलन किस प्रकार हुआ? इस संदर्भ में एक संभावित मत यह हो सकता है कि तत्कालीन समय में यज्ञ सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न अंग था। क्षत्रिय तथा वैश्य यज्ञ के समय अपने पुरोहित के गोत्र का नाम उच्चारण करते थे। अतः सुवर्ण जातियों के गोत्रों के नाम अपने-अपने पुरोहित व ब्राह्मण के नाम से प्रचलित हुए होंगे। शूद्रों के संबंध में यह मत अनुमत हो सकता है कि वे जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय परिवार से विशिष्ट रूप से संबंधित होते थे, उन्हीं के गोत्र को अपना लेते थे। इस ऋषि परंपरा से इतर भी गोत्र व्यवस्था के प्रचलन के कई समाजशास्त्रीय आधार परिलक्षित होते हैं।

गोत्र व्यवस्था के संदर्भ में 'छांदोग्योपनिषद्' में निबद्ध सत्यकाम-जबाला की कथा भी पर्याप्त प्रकाश डालती है, जिससे आभास होता है कि आवश्यकता अनुभव होने तक कई बार बालकों को अपने गोत्र का पता ही नहीं होता था।

तं होवाच किं गोत्रो नु सौम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यगोत्रोऽहमस्म्यष्टच्छं मातरं सा मा प्रत्यब्रवीहह्वाहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्त्र वेद यगोत्रस्त्वमसि जवाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नामत्वमसीति सोऽहं सत्यकामो जावालोऽस्मि भो इति ॥

सत्यकाम जब ब्रह्मविद्या सीखने के लिए गुरु के पास जाता है तो गुरु गौतम उनसे गोत्र के विषय में पूछते हैं। अनभिज्ञ होने के कारण वह अपनी माता से अपने गोत्र के विषय में पूछते हैं, तब उनकी माता उत्तर देती हैं कि यौवन में ही उसके पति का देहांत हो गया। पत्तिव्रता स्त्री का धर्म केवल पति की सेवा करना है, अतः उसने कभी भी अपने पति से उनके गोत्र के विषय में नहीं पूछा था, इसलिए गोत्र के विषय में बताने में असमर्थ है। वह उसका समाधान बताती है कि मेरा नाम जबाला है, अतः तू अपना नाम सत्यकाम जबाला बता देना। गोत्रोत्पत्ति का यह भी एक प्रकार हो सकता है, जहाँ माता के नाम से विविध गोत्रों का निर्माण हुआ हो। यद्यपि ऋषि गौतम सत्यकाम की सत्यनिष्ठा के कारण उसे ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।

एक अन्य बात निश्चयपूर्वक कही जा सकती है कि ऋग्वैदिक काल में गोत्र व्यवस्था काफी लचीली थी। ऋग्वेद में ऋषि पुत्र अंगीरस कहते हुए पाए जाते हैं कि मैं स्तव रचना करता हूँ, पिता भिषक् है व माता पिसनहरी है। इससे आभास होता है कि एक ही परिवार में लोग अनेक वर्षों का काम करने के लिए स्वतंत्र थे, किन्तु कालांतर में इस व्यवस्था ने स्थायी जाति का रूप ले लिया तथा वह जाति भी अनेक गोत्रों में विभाजित हो गई।

युद्ध में पराजित होने पर पराजित पक्ष में किस प्रकार नए गोत्रों का निर्माण हुआ होगा, इसे 'विष्णुपुराण' के निम्नलिखित उद्धरण से देखा जा सकता है- 'कई जातियाँ' जो पहले क्षत्रिय थीं। इन्होंने सगर का पैतिक राज्य छीन लिया था इसीलिये सगर ने उनके साथ घोर युद्ध किया। ये लोग हारकर उपायान्तर न देख वशिष्ठ के शरणापन्न हुए। (विष्णु. 413118) वशिष्ठ यहाँ बहुत ही कूटनीति-कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में दिखाई देते हैं। उन्होंने सगर से कहा- 'इन जातियों के रक्त से व्यर्थ ही हाथ मत रंगो।' संस्कृति से रहित मनुष्य तो जीवन्मृत ही है। इसीलिये उन्होंने सगर से कहा- 'जीवन्मृतों को मारने से क्या लाभ ? तुम्हारी प्रतिज्ञा को रक्षा के लिये मैंने ही उनके धर्म का और ब्राह्मण संसर्ग का परित्याग करा दिया। (विष्णु 4.3.18-20)। इस प्रकार हाथ से बिना मारे हुए भी मनुष्य को भीतर-भीतर मार डालने की इस युक्ति से प्रसन्न होकर सगर ने कहा- 'तो फिर यही हो' और वशिष्ठ के वचन से उनकी वेश भूषा और तरह की कर दी। (विष्णुपुराण 4-3-21) इस प्रकार ब्राह्मणादि के संसर्ग-त्याग से वे म्लेच्छ हो गये।

शास्त्र ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जिनमें क्षत्रियों ने ब्राहाणत्व प्राप्त किया। प्रसिद्ध ऋषि विश्वामित्र इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इस प्रकार ऋषि परंपरा के सिद्धांत के अनुसार विश्वामित्र के वंशज क्षत्रिय गोत्रोत्पन्न होने चाहिए थे, किंतु विश्वामित्र एवं उनके पुत्र तपस्वी ब्रह्मवेता व गोत्रकर्ता हुए। शल्यपर्व (39-46) में वर्णित है-

तस्य पुत्रा महात्मानो ब्रह्मवंशविवर्धनाः।
तपस्विनो ब्रह्मविदो गोत्रकर्तार एव च।।

गोत्र व्यवस्था के संदर्भ में एक बात ध्यातव्य है कि प्राचीनकाल में कई प्रभावशाली ऋषियों व राजाओं की प्रसन्नता व रुष्टता भी नए गोत्रों के निर्माण में सहायक रही होगी। कहते हैं कि किसी मेर जाति के आदमी के तीन पुत्र थे भूपाल, नरपति व गजपाल। भूपाल ने मुनि की बड़ी सेवा की, मुनि ने भूपाल को ब्राह्मण बनाकर यजुर्वेद की शिक्षा दी, नरपति वंश वाले वणिक् हुए व गजपाल की संताने मेर हुई। एक ही वर्ण से सभी जातियों व गोत्रों का निर्माण हुआ, इसके उदाहरण महाभारत में अन्यत्र भी प्राप्त होते हैं। गृत्समदवंशज शुनक के शौनक नामक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातीय अनेक पुत्र हुए थे। (हरि. 2911519) गृत्समद क्षत्रिय वीतहव्य की सन्तान थे। (अनुशासन 30159)। इसी तरह वत्सभूमि और भृगुभूमि के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि असंख्य पुत्र जन्मे थे (हरि. 2911517-18)।

पशु-पक्षियों-वनस्पति के नामों से गोत्रों का प्रचलन संभवतः बहुत आरंभिक अवस्था में हुआ। भगवान विष्णु के दस अवतारों में से आरंभिक तीन मत्स्य, कूर्म, वराह मनुष्य से भिन्न है। हयग्रीव व नृसिंह, गणेश, हनुमान आदि का भी पशुओं से घनिष्ठ संबंध है। गरुड़ के संबंध में भी पुराणों में बताया गया है कि उनका मस्तक गरुड़ पक्षी के समान तथा शरीर व इंद्रियाँ मनुष्य जैसी थीं। योगवशिष्ठ ने रामकथा के स्रोत भुशुंड काक को अत्यंत रूपवान व श्याम वर्ण का बताया है। भागवत कथा का स्रोत शुक है। जटायु भी अत्यंत ज्ञानी था, जिसने राजा दशरथ के साथ अपनी मित्रता का स्मरण करते हुए सीताहरण की बात राम को बताई। पुराकथाओं के गरुड़ को अपनी माँ को दासता से मुक्त करने के लिए निषादों, गजों, कच्छपों आदि से युद्ध करना पड़ता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान अत्यंत ज्ञानी थे, जिन्हें व्याकरण परिष्कृत भाषा का सम्यक् ज्ञान था। हनुमान विविध भाषाओं के ज्ञाता थे। भाषाओं का ऐसा अधिकार किसी कपि या मर्कट को होना संभव नहीं है। कृष्ण की आठ रानियों में से एक जांबवती रीछ की पुत्री थी। अर्जुन नागकन्या उलूपी से विवाह करते हैं। मांडूक्योपनिषद् भी मंडूक से संबंधित है व तैत्तिरीय उपनिषद् तितिर पक्षी से संबंधित है। यदि इन सभी पर तार्किक दृष्टि से विचार किया जाए तो ये सभी पात्र वास्तव में पशु-पक्षी ना होकर गणगोत्रों के विकास की कथाएँ हैं। इनमें से कई गोत्र के रूप में आज भी भारतवर्ष के अलग-अलग क्षेत्रों में विद्यमान है।

महाभारत तो पशु-पक्षी गोत्र के राजाओं के वर्णन से आप्लावित है। देशों का नाम भी इन्हीं पक्षियों के नाम से जाना गया तथा वह नाम राजा की पहचान का सूचक भी बना। विभिन्न प्रसिद्ध प्रदेशों के नाम भी पशु-पक्षियों के ऊपर रखे गए तथा इनमें से कई नाम तो उन्हीं राजाओं के गणगोत्र के रूप में पहचान बन गए, जिसके कई दृष्टांत में महाभारत में प्राप्त होते हैं।

महाभारत में युधिष्ठिर के द्वारा किए जाने वाले राजसूय यज्ञ के समय जब सभी राजा युधिष्ठिर की मित्रता अथवा अधीनता स्वीकार करते हैं, तो उस संदर्भ में कई गोत्रों का उल्लेख प्राप्त होता है, यथा-उलूक, कंक, काक, मत्स्य, गोधा, महीष, मूषक, कौक्कुटक, वृक, शृगाल, अश्वक, शशक आदि। पशु-पक्षियों के नाम पर विभिन्न जातियों प्रदेशों के नाम सभापर्व, भीष्म पर्व आदि में प्राप्त होते हैं। इनके अतिरिक्त कीचक, औंदुबर, तालचर, तालजंघ, तालवन, दार्शनिक, शाल्व आदि विविध वनस्पति विषयक नाम वाले गोत्रों का उल्लेख भी महाभारत में प्राप्त होता है। कीचक महाभारत का एक पात्र था, जो राजा विराट का साला था।

स तद्राज्यमवस्थाप्य उलूकसहितौ ययौ। सेना विदुमथो राजानाज्यादाशु समाक्षिपत् ।।'
एवमेष तदा वीरबलिभिः कुक्करान्धकैः। वृष्णिभिश्च महाराज नीतिहेतोरुपेक्षितः ।। 

अनुलोम-प्रतिलोम विवाह भी सर्वप्रथम जातियों की संख्या बढ़ाने में एवं तदनंतर इन जातियों से अनेक गोत्रों की संख्या बढ़ाने में मुख्य भूमिका का निर्वाह करने वाले सिद्ध हुए।

वी. पी. काणे ने धर्मशास्त्रों का इतिहास' में तथा शैलेन्द्रनाथ सेनगुप्त से पश्चिम बंगाल की 1951 ई. वाली जनगणना-रिपोर्ट में अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों से उत्पन्न होने वाली जातियों का सुस्पष्ट वर्गीकरण किया है। श्री सेनगुप्त ने 209 जातियों की गणना की है, जो आर्येतर जातियाँ थीं और जिनका आर्य समाज में प्रवेश प्रतिलोम या अनुलोम विवाहों के द्वारा हुआ है।

यह अवस्था ई.पू. 500 के आस-पास की हैं। यदि इस काल से और पीछे चले तो महाभारत के समय विवाहों में और भी उदारता बरती जाती थी। आर्येतर नारियाँ आर्यों के गृह में पूर्ण आदर का स्थान आसानी से प्राप्त कर लेती थीं। स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यास का जन्म सत्यवती या मत्स्यगन्धा की कुक्षि से हुआ था, जो धीवर जाति की कन्या थी। भीम ने हिडिम्बा नाम की राक्षसी से विवाह किया था। अर्जुन का एक ब्याह उलूपी से हुआ था, जो नाग जाति की कन्या थी।"

हर बड़ी घटना के बाद में वर्ण, जाति एवं गोत्रों का एक नई प्रकार से पुनर्गठन हुआ एवं कई नई जातियों एवं गोत्रों का नए प्रकार से उदय हर वर्ण से हुआ।

महाभारत युद्ध के बाद नदियों के किनारे-किनारे शहर बने, उनमें व्यापार बढ़ने लगा। इस समय की हलचल में भारतीय समाज में वर्ग स्वार्थ ने विभिन्न जातियों के बीच के व्यवधानों को तोड़ा और हर जाति के वर्ग विशेष अलग-अलग अपना संगठन करने लगे। परिणाम यह हुआ कि राक्षस, नाग इत्यादि सब जातियों में आपस में अंतर्भुक्ति हुई और सबके पुरोहित वर्ग ब्राह्मण कहलाने लगे।

इनमें वेद को प्राधान्य मिला कितु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वेद में ही अनेक आर्योत्तर जातियों के विश्वास अंतर्भुक्त हो चुके थे। इसी प्रकार क्षत्रिय वर्ण में सारी जातियों के योद्धा वर्ग समन्वित हो गये, वैश्य वर्ण में सारी जातियों के व्यापारी वर्ग सम्मिलित हुए और शूद्र वर्ण में इनके कमतर या मेहनतकश वर्ग एक हो गये। बुद्ध से पहले व्यापार के संतुलन ने यही भेद नहीं डाला, वरन् दास प्रथा को भी तोड़ा। दासप्रथा में दास ठीक से काम नहीं करते थे। व्यापारी को इससे लाभ नहीं था। वह ठेके पर काम कराने लगा। उसमें दास और व्यापारी दोनों को लाभ था। इस प्रकार दासप्रथा का ह्रास हुआ, किन्तु दासप्रथा सर्वत्र एक-सी नहीं टूटी, उसमें स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भेद अवश्य रह गये। जो बहुत ही गंदा काम करने वाले दास थे, उनकी अंत्यज जातियाँ बन गई। नए गोत्रों के निर्माण के संबध में एक उल्लेख यह भी प्राप्त होता है कि पहले आदमी प्रथम विवाह अपनी जाति में ही करने का प्रयास करता था, किन्तु द्वितीय विवाह की स्थिति में वह अपने से निम्न जाति में विवाह करने के लिए स्वतन्त्र था। इसी प्रकार उच्च वर्गों में वधुओं की कमी होने पर निम्न जातियों से उनका वैवाहिक संबंध होने लगा। जैसा कि पूर्व में भी उल्लेख किया जा चुका है कि राजाओं द्वारा भी विविध जातियों को प्रोन्नत करना या अवक्रमित करने का अधिकार भी रहा है। इससे जंगलों में रहने वाली जनजातियाँ भी धीर-धीरे विभिन्न जातियों के संपर्क में आयी।

दिनकर ने लिखा है कि नीग्रो, औष्ट्रिक, द्रविड़, आर्य, यूनानी, यूची, शक, आभीर, हुण, मंगोल और मुस्लिम आक्रमण के पूर्व आने वाले तुर्क; इन सभी जातियों के लोग कई झुंडों में इस देश में आए और भारतीय समाज में दाखिल होकर सब-के-सब उसके अंग हो गए।

इस प्रकार उपर्युक्त छोटे-छोटे कारकों ने भी संभावित रूप से नई-नई जातियों व गोत्रों के निर्माण में भूमिका का निर्वहन किया होगा।

टोटेम प्रथा संभवतः प्राचीन काल से ही विभिन्न गोत्रों के विकास का प्रमुख कारण रही हो। रिजली साहवने 'पीपल ऑव इंडिया' नामक ग्रन्थ में भारत के आदिम निवासियों की जो तालिका बनाई है उसमें 'टोटेम' का अच्छा परिचय मिलता है। इन इसी प्रकार के 73 गोत्र या विभाग हैं, इनमें तिरकी (चुहिया), एक्का (कछुआ), लाकड़ा (लकड़बग्घा), बाघ, गेडे (हंस), खोयेपा (जंगली कुत्ता), मिनकी (मछली), चिरा (गिलहरी) आदि हैं। संथालों में एगों (चूहा), हंस, मारुडी (जंगली घास), बेसरा (बाज), हेमरण (सुपारी) शंख, कारा (भैंस) आदि गोत्र हैं। जीवों के नाम पर ही इनका गोत्र हुआ करता है। ओराँव जाति के
भूमिकों में शालरिसि (मत्सस्य विशेष), हंस, शांडिल्य (पक्षी), तुमरंग (कद्दू), नाग (सर्प) आदि गोत्र हैं। कोए जाति में कश्यप (कच्छप), शोल (मछली), वासिवक (बगला), हंस, सांयू (सांड) आदि हैं। कुर्मी जाति में तयार (भैंस), डुमुरिया, चोंच, मुक्रुआर (मकड़ी), हस्तवार (कच्छप), बाघ आदि नाम हैं। जगन्नाथी कुम्हारों में कौण्डिन्य (वाघ), सूर्य, नेवला, गरु (बैल), मुदिर (मेंढक), भरभद्रिया (गौरैया), कूर्म आदि नाम हैं। युक्तप्रान्त के मिर्जापुर जिले की आगरिया जाति में इसी प्रकार के सात गोत्र पाये जाते हैं। 'मर्काम' गोत्र के लोग 'मॉम' अर्थात् कच्छप नहीं खाते; कच्छप ही उनका टोटेम है। गोइरार गोत्र वाले गोइरार वृक्ष के पूजक हैं, इस वृक्ष को वे काट नहीं सकते। परसवान या पलसवान गोत्र वाले पलास के उपासक हैं; शनवान् 'सन' को आदरणीय मानते हैं और किसी काम में सन का व्यवहार नहीं करते। वड़गवाड़ बरगद के पेड़ को पवित्र समझते हैं।

सांराशतः यदि हम विस्तारपूर्वक भारतीय परम्परा का अध्ययन करें तो पाएँगे कि भारत में विश्व के कई देशों से लोगों का आगमन हुआ, विवाह संबंध स्थापित हुए। स्थिति और परिस्थितियों के अनुसार वे किसी न किसी वर्ण में समाविष्ट हुए, इसमें नई जातियों का उदय हुआ और उन जातियों से कई गोत्रों का उदय हुआ, जिनकी संख्या, समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रही। मूल रूप से सभी मनुष्य समान हैं, क्योंकि सभी का मूल उद्गम एक ही है। श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि उनके द्वारा चार वर्षों का निर्माण गुण व कर्म के आधार पर किया गया। धीरे-धीरे इस वर्ण व्यवस्था ने जाति का रूप लिया व जाति भी कालांतर में अनगिनत गोत्रों में परिवर्तित हो गई। प्राचीन काल में ऐसे कई गोत्र थे जो वर्तमान में नहीं हैं तथा वर्तमान के कई गोत्र प्राचीन समय में नहीं थे। इस प्रकार यह एक परिवर्तनशील व्यवस्था रही है।

लेख - 
डॉ. मुकेश जैन

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