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रामलीला के संस्थापक गोस्वामी तुलसीदास जी

रामलीला के संस्थापक गोस्वामी तुलसीदास जी

भारत में रामकथा का नाटक के रूप में मंचन की परंपरा बड़ी प्राचीन है। रामकथा नाटक के रूप में भारत ही नहीं पूरे एशिया महाद्वीप में लोकप्रिय है। थाईलैंड, इंडोचाइना, बर्मा आदि सभी देशों में रामकथा रची गई है और आज भी उनका मंचन होता है।

थाई देशों में तो रामकथा वहां के जनजीवन में इतनी घुली-मिली है कि वहां अयोध्या, चित्रकूट आदि के नाम से नगर भी बने हैं। वहां के निवासी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि श्रीराम उनके देश में नहीं जन्मे थे। वहां के शासक भी 'राम' कहे जाते हैं। इन सभी देशों में रामकथा के मंचीय प्रदर्शन आज भी बड़े जोश से अनुष्ठान के रूप में होते हैं और उनमें सभी धर्मों और वर्ग के कलाकार बिना किसी भेदभाव के भाग लेते हैं।


थाईलैंड की खोन नाट्य परंपरा में रामायण के थाई रूप ‘रामाकियन’ का मंचन

परंतु जिस रामलीला की हम चर्चा कर रहे हैं, उसकी परंपरा लगभग 400 वर्ष ही पुरानी है। रामचरितमानस की रचना के बाद लगभग सन् 1600 के आसपास वाराणसी से यह रामलीला आरंभ हुई थी।

गोस्वामी तुलसीदास जी और अस्सी की रामलीला
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामलीला मंच की स्थापना की थी। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस को आधार बनाकर श्रीराम के लोकरंजक रूप के व्यापक प्रचार का उद्देश्य अपने सामने रखकर अस्सी घाट क्षेत्र में जो रामलीला प्रारंभ कराई, वह राम-राज्याभिषेक की घटनाओं को ही अपनी कथावस्तु बनाकर चली। आज भी अस्सी की रामलीला इसी रूप में होती है; उसमें रामजन्म, अवध की बाल लीला तथा राम विवाह तक के प्रसंग नहीं होते। राम के वन जाने, वहां राक्षसों का संहार करके रामराज्य की स्थापना ही इस लीला में प्रदर्शित होता है।


काशी की रामलीला परंपरा में श्रीराम, लक्ष्मण और अन्य पात्रों का पारंपरिक स्वरूप

यह रामलीला मैदान में खेली जाती है जो काशी के विभिन्न भागों में होती है:

  • लंका: जिस मोहल्ले में लंका की लीला होती है, उसे अब 'लंका' ही नाम दे दिया गया है।

  • अयोध्या: अस्सी से सोनारपुरा (सोनापुर) तक के भू-भाग में अयोध्या की रामलीला होती है।

  • गंगा पार की लीला: दुर्गा कुंड में होती है।

  • वन यात्रा व पंचवटी: श्रीराम की वन यात्रा संकट मोचन के पीछे से होकर हिन्दू विश्वविद्यालय तक चलती है। पंचवटी की लीलाएं विश्वविद्यालय के द्वार के पास होती हैं।

इस लीला में सभी जातियों का व्यापक सहयोग लिया जाता है। श्रीराम का सिंहासन कौन सी जाति के लोग उठाएंगे, लीला में कौन सा काम किस वर्ग के लोग करेंगे, यह व्यवस्था गोस्वामी तुलसीदास जी ने ही की थी, जो आज भी चली आ रही है।

सवारियों की परंपरा और लाट भैरव की लीला
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा इस रामलीला को लोकप्रिय बनाने के लिए उसमें समय-समय पर जुलूस और सवारी निकालने की व्यवस्था की गई। अस्सी की रामलीला में खर-दूषण की सवारी बहुत प्रसिद्ध है। इस लीला में राक्षस भैंसे, घोड़े, खच्चर आदि वाहनों पर निकलते हैं। गोस्वामी जी ने काशी के सभी वर्गों और जातियों को रामलीला में कोई न कोई सेवा देकर लीला में सभी वर्गों का व्यापक सहयोग प्राप्त किया था। यही कारण है कि काशी से प्रारंभ होकर रामलीला की यह परंपरा शीघ्र ही पूरे भारत में फैल गई।


रामलीला में सवारी और जुलूस की परंपरा

काशी में 'लाट भैरव' की रामलीला की स्थापना भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। यह लीला भी काशी की पुरानी रामलीला है जिसमें होने वाले चमत्कारों की चर्चा भी जनता में होती है।

चित्रकूट की रामलीला (मेघा भगत की लीला)
काशी की तीसरी प्रसिद्ध रामलीला 'चित्रकूट लीला' के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे लोग तुलसीदास जी के पहले की रामलीला मानते हैं (जो पहले मेघा भगत की रामलीला के नाम से प्रसिद्ध थी)। तुलसीदास जी के स्वर्गवास के बाद दुखी पीपा जी अन्न-जल त्याग कर संकट मोचन हनुमान जी के चरणों में गिर गए थे। तब उन्हें आदेश हुआ था कि वे अपने हृदय को शांत करने के लिए वह रामलीला करें।


चित्रकूट की रामलीला

यह रामलीला तुलसीदास जी की लीला प्रणाली से सर्वथा पृथक और निराली है, जो झांकियों के आधार पर होने वाली मूल रामलीला है। इस चित्रकूट की रामलीला का 'भरत मिलाप' पूरे देश में विख्यात है। काशी वालों का कहना है कि इस लीला में सायंकाल जब भरत मिलाप होता है, उस क्षण कैसी भी वर्षा या प्रतिकूल मौसम हो, सूर्य नारायण अवश्य प्रकट होकर राम-भरत मिलन के दृश्य का दर्शन करते हैं।

रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला
काशी, अयोध्या और चित्रकूट वे स्थान हैं जहां से रामलीला का देशव्यापी प्रचार हुआ। काशी नगरी गोस्वामी तुलसीदास जी तथा अयोध्या और चित्रकूट स्वयं भगवान राम के जीवन से सीधे जुड़े हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने जो परंपरा स्थापित की, वह शीघ्र ही पूरे उत्तरी भारत में लोकप्रिय हो गई और गांव-गांव में रामलीला आरंभ हो गई। इन लीलाओं में नगर से ही पात्र छांटे जाते हैं और नियमित पूर्वाभ्यास के बाद दशहरा के अवसर पर क्वार (आश्विन) मास में यह रामलीला धूमधाम से प्रदर्शित की जाती है।


रामलीला की परंपरा नगरों से गाँवों तक भारतीय लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई

परंतु इन परवर्ती रामलीलाओं में जिस लीला की सर्वाधिक ख्याति है, वह काशी नगरी के सामने गंगा पार बसे 'रामनगर की रामलीला' है। यह रामलीला देश की सर्वाधिक प्रसिद्ध व सबसे लंबे समय तक (लगातार 40 दिनों तक) चलती है। इस वैभवपूर्ण राजसी रामलीला का प्रारंभ काशी नरेश ने किया था, जो एक प्रसिद्ध रामभक्त थे। यहां की रामलीला मैदान की लीला है जो दस से बारह किलोमीटर के घेरे में होती है।

राष्ट्रीय भावात्मक एकता का प्रतीक
वास्तव में रामकथा हमारे देश में इतनी व्यापक है और वह जनमानस के मन-मंदिर में ऐसी समाई है कि छोटे, बड़े, पढ़े-बेपढ़े सभी की उसमें रुचि है। अतः रामकथा, रामलीला या भगवान राम की मानव लीला के अनेक स्वर और मंच हैं, जिनसे जनता अपनी-अपनी रुचि और मनोवृत्ति के अनुसार रस ग्रहण करती है। रामकथा हमारी राष्ट्रीय भावात्मक एकता का एक सुदृढ़ आधार और देश का एक राष्ट्रीय रंगमंच है।

आलेख - डॉ. विजय चौरसिया
गाड़ासरई, जिला डिंडौरी (म.प्र.)

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