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गोंड समुदाय की रामायनी लोकगाथा

गोंड समुदाय की रामायनी लोकगाथा


भारतवर्ष की सांस्कृतिक विविधता के बीच लोकगाथाओं का एक संसार भी बसा हुआ है। इसी शृंखला में गोंड जनजाति के मध्य प्रचलित और परधान जनजाति के गायकों द्वारा गाई जाने वाली 'रामायनी' कथा अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है। गोंड समुदाय में रची बसी और परधानों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित इन गीतों के मूल पात्र अवश्य ही वाल्मीकि रामायण पर आधारित हैं, परन्तु इसके अतिरिक्त शेष आंचलिक लोक चेतना से ओतप्रोत है।


रामायनी लोकगाथा के विविध प्रसंग समाज के जीवन दर्शन के अनुरूप, उनकी ही देशज वाणी में इस काव्यात्मकता के साथ संजोए गए हैं कि सारी कथा एक धाराप्रवाह सूत्र के रूप में आगे बढ़ती जाती है। इस कथा का आकर्षण इतना है कि एक बार इसका श्रवण करने पर श्रोता मन्त्रमुग्ध हो जाता है। गोंड समुदाय ने परम्पराओं और मान्यताओं के अनुसार कथा को एक सर्वथा नवीन मोड़ दिया है।

इस लोक रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम राम की अपेक्षा लक्ष्मण का चरित्र अधिक प्रमुखता से उभरा है। लक्ष्मण के त्याग और चरित्र को विभिन्न प्रसंगों तथा घटनाओं के माध्यम से निरन्तर उकेरा गया है और सम्पूर्ण गाथा में उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है। वस्तुतः रामायनी के आदर्श नायक लक्ष्मण दिखाई देते हैं। इस लोकगाथा की एक और विशेषता यह है कि इसमें महाभारत के पात्रों, विशेषकर पाण्डवों की भी चर्चा है।

रामायनी - भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति का अनुपम उदाहरण 
रामायनी - भारत की वैविध्यपूर्ण संस्कृति का अनुपम उदाहरण 

कथा में राम और लक्ष्मण की सहायता हेतु पाण्डवों की आवश्यकता बार-बार बताई गई है, जिसमें महाबली भीम की भूमिका सर्वाधिक प्रमुख है। इस प्रकार यह लोकगाथा 2 भिन्न कालों के कथा चरित्रों (महाभारत के कौरव पाण्डव और रामायण के राम लक्ष्मण व सीता) को एक ही सूत्र में पिरो देती है। रामायनी में लक्ष्मण जी की चरित्र परीक्षा के 7 विशिष्ट प्रसंग दिए गए हैं। प्रथम 2 प्रसंग लक्ष्मण और रानी इन्दर कामनी से जुड़े हैं।

तृतीय प्रसंग लक्ष्मण जी और तिरिया फूल का है, चतुर्थ लक्ष्मण जी और रानी मचलादई का, पञ्चम लक्ष्मण जी और रानी फुफैया का, षष्ठम लक्ष्मण जी और रानी बीजलदई का तथा सप्तम प्रसंग सीता वनवास से सम्बन्धित है। स्थानीय प्रभाव के कारण ही इस कथा में हनुमान तथा भीम, राम को 'मामा' कहकर सम्बोधित करते हैं, और रामायनी में राजा वासुकी को राम का मामा बताया गया है।

सीता वनवास की लोकगाथा
एक बार की बात है, अवधपुरी के एक बड़े तालाब पर एक धोबी अपनी पत्नी के साथ वस्त्र धो रहा था। उसी समय उन दोनों के मध्य किसी बात को लेकर तीव्र विवाद हो जाता है। क्रोधित होकर धोबिन कहती है कि मैं अब तुम्हारे पास नहीं रहूंगी। इस पर धोबी आक्रोश में आकर कहता है कि जा भाग जा, मैं तेरे पैर नहीं पड़ता। मैं राजा रामचन्द्र नहीं हूं जिसे अपनी पत्नी से इतना अन्ध मोह हो।

माता सीता के नाम से उलाहना देता धोबी
माता सीता के नाम से उलाहना देता धोबी

सीता जी 12 वर्ष तक लंका में रहीं, फिर भी वे उसे जाकर ले आए और अपनी पटरानी बना लिया। तू यहां से भाग जा, यदि लौटकर आई तो मैं तेरे हाथ पैर तोड़ दूंगा। दुर्भाग्य से राम और लक्ष्मण दोनों वेष बदलकर नगर भ्रमण कर रहे थे और उस धोबी की ये कठोर बातें सुन लेते हैं। रामचन्द्र जी का हृदय व्यथा से भर उठता है और वे कहते हैं कि लक्ष्मण, देखो यह धोबी कैसी बात कह रहा है।

मैं यहां का राजा हूं और राजधर्म की मर्यादा से बंधा हुआ हूं। समाज के छोटे छोटे लोग मेरी और मेरे कुल की हंसी उड़ा रहे हैं। तुम सीता को अभी इसी क्षण घने जंगल ले जाओ और वहां ले जाकर उसके 2 टुकड़े कर दो। बड़े भाई की आज्ञा सुनकर लक्ष्मण जी भारी मन से महल में आते हैं। वे सीता जी को रथ में बैठाकर निविड़ जंगल की ओर ले जाते हैं।

लम्बी यात्रा और वन के ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर चलते चलते सीता जी बहुत थक जाती हैं और विश्राम करने हेतु एक विशाल पेड़ की छांव के नीचे बैठ जाती हैं। प्यास से व्याकुल सीता जी लक्ष्मण से कहती हैं कि देवर जी, मुझे बहुत जोर से प्यास लगी है, कृपया कहीं से थोड़ा पानी लेकर आओ। आज्ञाकारी लक्ष्मण जी तुरन्त जल की खोज में निकल जाते हैं। शीतल पवन के झोंकों से थकी हारी सीता जी को उसी पेड़ के नीचे गहरी नींद आ जाती है।

कुछ समय पश्चात जब लक्ष्मण जी जल लेकर लौटते हैं, तो वे देखते हैं कि सीता जी बेसुध होकर पेड़ के नीचे सो रही हैं। विश्राम की अवस्था में उनकी साड़ी का आंचल खिसक गया है। तब लक्ष्मण जी का ध्यान इस सत्य की ओर जाता है कि माता सीता गर्भवती हैं। उनके भीतर एक नया जीवन पल रहा है। लक्ष्मण जी सोचते हैं कि यदि मैं इस अवस्था में इनका वध करूंगा, तो मुझे स्त्री हत्या के साथ साथ शिशु हत्या का भी महापाप लगेगा। ऐसा विचार कर उनका विवेक जागृत होता है और वे सीता जी को उसी घने जंगल में अकेला सोता हुआ छोड़कर अयोध्या वापस आ जाते हैं।

माता सीता को गर्भवती देखकर विचार करते लक्ष्मण 
माता सीता को गर्भवती देखकर विचार करते लक्ष्मण 

लौटते समय लक्ष्मण जी सोचते हैं कि मैं अपने बड़े भाई के समक्ष जाकर कौन सी युक्ति लगाऊंगा और उन्हें किस प्रकार सन्तुष्ट करूंगा। यह सोचकर लक्ष्मण जी वन मार्ग में एक कुशल बढ़ई के पास जाते हैं और उससे सीता जी के हाथ के समान लकड़ी का एक अत्यन्त सुन्दर हाथ बनवाते हैं। उसी समय वन में हिरणों का एक झुण्ड लक्ष्मण जी के सामने से गुजरता है। लक्ष्मण जी एक हिरण का वध करके उसकी आंखें निकाल लेते हैं, क्योंकि उस हिरण की आंखें माता सीता की आंखों के समान ही सुन्दर और विशाल थीं।

लकड़ी का हाथ और हिरण की आंखें लेकर लक्ष्मण जी सीधे रामचन्द्र जी के पास राजमहल पहुंचते हैं। जब लक्ष्मण जी रामचन्द्र जी को सीता जी का वह कटा हुआ हाथ और दोनों आंखें दिखाते हैं, तो रामचन्द्र जी का कठोर आवरण टूट जाता है और वे अपनी प्रिय पत्नी के वियोग में फूट फूट कर विलाप करने लगते हैं। उधर, उस भयानक वन में जब सीता जी की आंख खुलती है, तो उन्हें वहां लक्ष्मण जी कहीं नहीं दिखते।

पास ही पानी का लोटा रखा हुआ था। वे उसी लोटे से जल पीकर अपनी प्यास बुझाती हैं। अपने भाग्य को कोसती हुई सीता जी वन में आगे बढ़ती हैं। चलते चलते उन्हें एक नदी के किनारे एक शान्त कुटिया नजर आती है। सीता जी उस कुटिया में पहुंचती हैं। वहां 2 सिद्ध बाबा निवास करते थे। उनमें से एक सिद्ध बाबा ने सीता जी के तेज को देखकर उन्हें तुरन्त पहचान लिया।

तब सीता जी ने अपने आंसुओं को रोकते हुए उन बाबाओं को बताया कि मेरे पति ने मुझे घर से निकाल दिया है, इसलिए मैं वन वन भटक रही हूं। दोनों दयालु बाबा सीता जी को अपनी कुटिया में ससम्मान आश्रय देते हैं और एक पुत्री की भांति उनकी सेवा करने लगते हैं। समय पूरा होने पर उसी आश्रम में सीता जी एक तेजस्वी पुत्र को जन्म देती हैं। दोनों बाबा उस सुन्दर बच्चे का नाम लव रखते हैं।

एक दिन की बात है, सीता जी अपने पुत्र लव के वस्त्र धोने के लिए नदी के तट पर जाने लगती हैं। जाने से पूर्व वह दोनों बाबाओं से कहती हैं कि बाबा, मैं नदी की ओर जा रही हूं, आप लोग लव का ध्यान रखना। दोनों बाबा लव को बड़े प्रेम से झूला झुलाने लगते हैं। झूला झूलते झूलते लव को गहरी नींद आ जाती है। मन्द मन्द बहती पवन के प्रभाव से दोनों बाबाओं को भी नींद आ जाती है।

इस बीच सीता जी नदी से लौट आती हैं और बाबाओं को सोता देख, लव को झूले से उठाकर कुटिया के अन्दर ले जाती हैं और उसे दूध पिलाने लगती हैं। कुछ समय पश्चात जब दोनों बाबाओं की नींद खुलती है, तो वे झूले को खाली पाते हैं। झूले में लव को न पाकर दोनों बाबा घबरा जाते हैं। उन्हें लगता है कि कोई वन्य जीव बालक को उठा ले गया।

वे विचार करते हैं कि सीता को क्या उत्तर देंगे। तब दोनों बाबा कुशा नामक घास का चारा लाते हैं और अपने तपोबल से उस पर मन्त्र फूंकते हैं। उनके मन्त्र प्रभाव से वह कुशा घास लव के ही समान दिखने वाले एक अत्यन्त सुन्दर बालक के रूप में परिवर्तित हो जाती है। बाबा तुरन्त उस नए बालक को झूले में लिटा देते हैं।नया बालक भूख के कारण रोने लगता है। बालक के रोने की ध्वनि सुनकर सीता जी कुटिया के अन्दर से लव को गोद में लिए हुए बाहर आती हैं।

बाहर आकर वे देखती हैं कि झूले में एक और बालक रो रहा है। दोनों बाबा यह देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि लव तो सीता जी की गोद में सुरक्षित खेल रहा है। सीता जी भी घोर आश्चर्य में पड़ जाती हैं कि लव के समान रूप-रंग वाला यह दूसरा बालक झूले में कहां से आ गया। किसी की समझ में नहीं आता कि यह क्या चमत्कार हो गया है।

सीता जी उस सुन्दर बालक को भी उठाकर बड़े प्रेम से चूमने लगती हैं। दोनों बाबा अपनी भूल पर लज्जित होते हैं। सीता जी बाबाओं की घबराहट देखकर हंसती हैं और कहती हैं कि मैं इस बालक का नाम कुश रखती हूं, क्योंकि यह कुशा घास से उत्पन्न हुआ है। अब मेरे 2 पुत्र हो गए हैं-लव और कुश। मैं इन दोनों का समान रूप से पालन करूंगी। समय के साथ-साथ लव और कुश दोनों वीर बालकों की भांति आश्रम में बड़े होने लगते हैं।

लव-कुश का पालन करती माँ सीता
लव-कुश का पालन करती माँ सीता 

एक दिन युवा लव और कुश अपने तीर कमान लेकर जंगल में शिकार खेलने जाते हैं। संयोगवश उसी दिन अवध नरेश राम और लक्ष्मण भी आखेट हेतु उसी वन में आते हैं। रामचन्द्र जी उस घने वन में 2 इतने सुन्दर और तेजस्वी बालकों को निडर होकर घूमते देख अत्यधिक आश्चर्यचकित हो जाते हैं। वे समीप जाकर उन दोनों बालकों से उनका परिचय पूछते हैं।

तब लव बड़ी निर्भीकता से कहता है कि हमारी माता का नाम सीता, पिता का नाम राम तथा हमारे काका का नाम लक्ष्मण जी है। हम दोनों भाई यहां पर शिकार खेलने आए हैं। यह सुनकर रामचन्द्र जी लक्ष्मण जी से कहते हैं कि भाई लक्ष्मण, सीता जी को मरे तो 12 वर्ष बीत चुके हैं। ये मेरे बच्चे कहां से आ गए। तब रामचन्द्र जी ने सन्देह दूर करने के लिए उन बालकों से कहा कि यदि तुम वास्तव में मेरे ही पुत्र हो, तो मेरे चलाए हुए बाणों को स्वीकार करके दिखाओ।

इतना सुनते ही लव और कुश रामचन्द्र जी के सामने अपनी छाती तानकर वीर मुद्रा में खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि यदि हमारा जन्म सत्य है, तो आपके बाण हमारा सप्रेम स्पर्श कर वापस चले जाएंगे। रामचन्द्र जी लव और कुश पर अपने तीक्ष्ण बाण चलाते हैं, परन्तु वे बाण लव और कुश के पास जाकर उनका स्पर्श कर, वापस रामचन्द्र जी के पास लौट आते हैं।

लव-कुश का स्पर्श कर वापस लौटते श्रीराम के बाण
लव-कुश का स्पर्श कर वापस लौटते श्रीराम के बाण

इस चमत्कार को देखकर रामचन्द्र जी को पूर्ण विश्वास हो जाता है कि ये दोनों मेरे ही प्राणप्रिय पुत्र हैं। राम और लक्ष्मण दौड़कर लव और कुश को अपनी बांहों में भर लेते हैं। रामचन्द्र जी भरे गले से लक्ष्मण से पूछते हैं कि भाई लक्ष्मण, तुमने तो कहा था कि तुमने सीता जी को मार डाला है। तुमने मुझे सीता जी का कटा हुआ हाथ और आंखें भी दिखाई थीं। अब यह सब क्या रहस्य है।

तब लक्ष्मण जी हाथ जोड़कर कहते हैं कि भैया, वह सब एक झूठ था। भाभी के पेट में आपका अंश पल रहा था, इसलिए मैं उन्हें मार नहीं सका। मैंने आपको बढ़ई का बनाया हुआ लकड़ी का हाथ और हिरण की आंखें दिखाई थीं। यह जानकर राम-लक्ष्मण दोनों लव-कुश को साथ लेकर सीता जी की कुटिया की ओर दौड़ पड़ते हैं। कुटिया के बाहर जैसे ही सीता जी राम और लक्ष्मण को अपने सम्मुख देखती हैं, उनके भीतर के अपमान की अग्नि धधक उठती है।

वे उसी क्षण धरती माता का आह्वान करती हैं और पाताल लोक में उतरने लगती हैं। यह दृश्य देखकर रामचन्द्र जी व्याकुल होकर दौड़ते हैं और सीता जी की चोटी पकड़ लेते हैं। सीता जी तो पाताल में समा जाती हैं, परन्तु खिंचाव के कारण सीता जी की चोटी उखड़कर रामचन्द्र जी के हाथों में रह जाती है। रामचन्द्र जी ने दुःख में डूबकर उन केशों को वहीं भूमि पर फेंक दिया। लोक मान्यता है कि वे ही सीता जी की लटें थीं, जो धरती पर गिरकर सांप बन गईं। आज भी इन विशेष सर्पों को गोंड अंचल में 'सीता लटी' कहा जाता है।


पाताल में समाती माता सीता 

कथा के इस संस्करण में, रामचन्द्र जी अपने बल से सीता जी की बाहें पकड़कर उन्हें पाताल से बाहर निकाल लाते हैं। रामचन्द्र जी रो रोकर सीता जी से अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगते हैं। वहां उपस्थित दोनों सिद्ध बाबा भी सीता जी को समझाते हैं। बाबा कहते हैं कि हे पुत्री सीता, तुम अपने घर जाओ और अपने मान सम्मान का इतना घमण्ड मत करो। बाबाओं के बहुत समझाने बुझाने पर सीता जी का हृदय पिघल जाता है। वे लव और कुश को साथ लेकर राम और लक्ष्मण जी के साथ पुनः अयोध्या के राजमहल में लौट आती हैं। उनके लौटने पर पूरे राज्य में अपार उत्साह और आनन्द का उत्सव मनाया जाने लगा।

- डॉ. विजय चौरसिया

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