आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार

नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

मदनपुर के गोंड़ राजा ड़ेलनशाह - भाग 01

मदनपुर के गोंड़ राजा ड़ेलनशाह - भाग 01

अठारहवीं सदी के प्रारंभ में भारत अनेक टुकड़ों में विभक्त हो चुका था। प्रशासनिक ढांचा कमजोर था और जन-जीवन तथा संपत्ति असुरक्षित स्थिति में थे। इसी काल में यूरोप से आए अंग्रेज व्यापारी धीरे-धीरे सत्ता के स्वामी बन बैठे। परिणामस्वरूप भारत एक लंबे समय तक औपनिवेशिक दासता में जकड़ गया।

भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र प्राचीन काल में गोंड़ राजाओं के अधीन रहा था। इसी क्षेत्र में स्थित नरसिंहपुर जिले से लगभग 60 किलोमीटर दूर मदनपुर और तेंदूखेड़ा का क्षेत्र आता है। यह स्थान वर्तमान में राष्ट्रीय राजमार्ग भोपाल रोड से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से यह इलाका गोंड़ शासन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।


मध्यप्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र

मदनपुर का प्राचीन नाम रामगढ़ था। प्रखर सेनानी गोंड़ राजा डेलनशाह के जीवन से संबंधित है। राजा डेलनशाह का जन्म सन् 1802 में इसी ग्राम में हुआ था। बाल्यावस्था से ही उनमें निर्भयता, वीरता और धैर्य के गुण स्पष्ट दिखाई देते थे।

राजा डेलनशाह मदनपुर राज्य के शासक थे। उनके पिता का नाम राजा विश्राम सिंह था, जिनकी दो पत्नियाँ थीं। पहली पत्नी से डेलनशाह और निजामशाह तथा दूसरी पत्नी से कमोदशाह और देवीसिंह का जन्म हुआ। इस प्रकार राजा डेलनशाह चार भाइयों में ज्येष्ठ थे।

राजा डेलनशाह धार्मिक प्रवृत्ति के शासक थे। वे देवी-देवताओं, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक साधनाओं में गहरी आस्था रखते थे। उनके व्यक्तित्व में धर्म और वीरता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। प्रजा भी उन्हें श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखती थी।

राजा डेलनशाह का विवाह छिंदवाड़ा जिले के हर्रई के राजघराने में 22 वर्ष की आयु में हुआ था। उनके ससुर छिंदवाड़ा क्षेत्र के प्रतिष्ठित जमींदार थे। उनकी पत्नी का नाम मदनबाई था। जनश्रुति के अनुसार डीलवार और मदनपुर गांव की बसाहट इन्हीं के काल में हुई।

गोंड़ी लोकगीतों में आज भी इस बसाहट का प्रमाण मिलता है। एक प्रसिद्ध पंक्ति इस प्रकार है –
“कौन बसाये मदनपुर और कौन बसाये डीलवार, राजा बसाये मदनपुर रानी बसाये डीलवार।”
इससे स्पष्ट होता है कि मदनपुर और डीलवार की स्थापना राजा डेलनशाह और रानी मदनबाई द्वारा की गई थी। डीलवार, डेलनवाड़ा का अपभ्रंश माना जाता है।

राजा डेलनशाह को एक पुत्र की प्राप्ति हुई थी, किंतु बीमारी के कारण उसका असमय निधन हो गया। यह घटना उनके जीवन का एक गहरा आघात थी। इसके बावजूद उन्होंने अपने दायित्वों से विमुख हुए बिना राज्य और प्रजा की सेवा जारी रखी। उनके जीवन में व्यक्तिगत दुख और सार्वजनिक संघर्ष साथ-साथ चलते रहे।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेजों ने मध्यप्रदेश क्षेत्र में अपने पाँव जमाने शुरू कर दिए। सन् 1817 में अंग्रेजों ने नरसिंहपुर के निकट चौरागढ़ पर कब्जा कर लिया। 1818 में परिषद के माध्यम से उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। इससे स्थानीय शासकों और जनता में असंतोष फैल गया।

सन् 1800 के आसपास मंडला से नरसिंहपुर तक नागपुर के भोंसले, ग्वालियर के सिंधिया और बुंदेलों का शासन प्रभावी था। भोपाल के नवाब भी इस क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। चीचली, गगई, बरहा और पलोहा जैसे क्षेत्रों में गोंड़ राजाओं का शासन था। यह क्षेत्र राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बन चुका था।

नागपुर के भोंसले राजाओं ने इस क्षेत्र को 1750 में सात लाख रुपये में खरीदा था। सन् 1817-18 के बाद अंग्रेजों ने इस पर पूर्ण अधिकार कर लिया। बरहा और पलोहा क्षेत्र पिंडारियों को सौंप दिए गए। यहां सरदार चिंटू और करीम खाँ का शासन स्थापित हुआ।

राजा डेलनशाह के विवाह के समय तक पूरा क्षेत्र अंग्रेजों के नियंत्रण में आ चुका था। डीलवार क्षेत्र में वे सीमित अधिकारों के साथ शासन कर रहे थे। यह स्थिति उन्हें भीतर तक व्यथित करती थी। उन्होंने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष का मार्ग चुना।

अंग्रेजों से प्रत्यक्ष युद्ध के लिए उनके पास पर्याप्त सेना नहीं थी। इसलिए उन्होंने जनजागरण और संगठन का मार्ग अपनाया। सन् 1818 में राजा डेलनशाह ने चौरागढ़ पर अचानक आक्रमण कर यूनियन जैक झंडा उतार फेंका। हालांकि वे किले पर अधिकार नहीं कर सके।

अंग्रेजों ने चौरागढ़ में अपने सैन्य बल को और मजबूत कर लिया। सन् 1836 में राजा डेलनशाह ने बरहा और पलोहा क्षेत्र को पिंडारियों से मुक्त कराने का पुनः प्रयास किया। इस बार भी उन्हें सफलता नहीं मिली। संघर्ष लगातार चलता रहा।

जब राजा डेलनशाह अन्य किलों की रक्षा में व्यस्त थे, तब पिंडारियों ने डीलवार के किले पर आक्रमण किया। उस समय चीचली के राजकुमार नरवरशाह ने डीलवार की रक्षा की। राजा डेलनशाह ने आभार स्वरूप उन्हें डीलवार का अधिपति बनाने का प्रस्ताव दिया। किंतु नरवरशाह ने यह अधिकार निजामशाह को सौंप दिया।

1818 में मराठों की पराजय के बाद नर्मदा, सतपुड़ा और विंध्य क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन आ गए। इन क्षेत्रों को “सागर-नर्मदा टेरिटरीज” के रूप में गठित किया गया। इसका प्रशासन फौजी अधिकारी सी. फ्रेजर को सौंपा गया। यह सीधे गवर्नर-जनरल के प्रति उत्तरदायी था।

सन् 1842 में सागर-नर्मदा टेरिटरीज में व्यापक विद्रोह हुआ। इसमें राजा, मालगुजार और जागीरदारों ने सक्रिय भागीदारी की। गोंड़, लोधी और बुंदेला शासक इस आंदोलन में अग्रणी थे। बुंदेलों की प्रमुख भूमिका के कारण इसे “बुंदेला विद्रोह” भी कहा गया।

राजा डेलनशाह के विद्रोह से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध वातावरण बना। क्षेत्र के तालुकेदारों और जमींदारों की शिकायतें अनसुनी रह गई थीं। असंतोष भीतर ही भीतर सुलगता रहा। यही असंतोष आगे चलकर 1857 के महासंग्राम में फूट पड़ा।

1857 के विद्रोह में मदनपुर के राजा डेलनशाह ने सक्रिय भागीदारी की। इसी वर्ष गढ़ा-जबलपुर के गोंड़ राजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथ शाह को 18 सितंबर को फांसी दी गई। इस घटना से राजा डेलनशाह अत्यंत आक्रोशित हो उठे। उन्होंने चांवरपाठा और तेंदूखेड़ा पर आक्रमण कर अंग्रेजी चौकियों को नष्ट कर दिया।

अंग्रेजी प्रशासन इस आक्रमण से स्तब्ध रह गया। 1858 के चैत्र मास में अंग्रेजी सेना ने डीलवार किले पर आक्रमण किया। गोंड़ सेना और जनता ने मिलकर वीरतापूर्वक प्रतिकार किया। किंतु संसाधनों की कमी के कारण अंततः पराजय स्वीकार करनी पड़ी।

राजा डेलनशाह को बंदी बनाकर स्थानीय जेल में रखा गया। उनके अनेक वीर सैनिक भी बंदी बनाए गए। अंततः उन्हें फांसी की सजा दी गई। उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई और शासन ने उनका नाम इतिहास से मिटाने का प्रयास किया।

शासकीय अभिलेखों में राजा डेलनशाह की वीरता का उल्लेख नहीं मिलता। किंतु मदनपुर, डीलवार और नरसिंहपुर अंचल के गांवों में उनके शौर्य की कथाएं आज भी जीवित हैं। स्थानीय जनश्रुतियां उन्हें लोकनायक के रूप में स्मरण करती हैं। यही उनकी वास्तविक विरासत है।

आज मदनपुर और डीलवार छोटे और लगभग गुमनाम गांव हैं। यहां केवल राजा डेलनशाह की गढ़ी के अवशेष बचे हैं। कुछ वृद्ध आज भी उनकी वीरता की कथाएं सुनाते हैं। यह स्थिति केवल डेलनशाह की नहीं, बल्कि उस युग के सभी बलिदानियों की रही है। 
राजा डेलनशाह के बलिदान के बाद परिवार को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा आगे क्या हुआ, इस लेख के दूसरे अंक में हम जाएंगे। 

लेख - ड़ॉ. विजय चौरसिया,
गाड़ासरई, जिला ड़िंड़ौरी म.प्र.

Follow us on social media and share!