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पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अप्रैल 2026

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गोलू – शक्ति का प्रतीकात्मक उत्सव

गोलू – शक्ति का प्रतीकात्मक उत्सव

गोलू दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में नवरात्रि के अवसर पर मनाया जाने वाला एक विशेष शक्ति और परंपरा का उत्सव है। इसे कहीं-कहीं “बोम्मई गोलू” या “बोम्बे हब्बा” भी कहा जाता है।
हालाँकि नवरात्रि पूरे भारत में मनाई जाती है, लेकिन गोलू दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में मनाया जाने वाला एक अनूठा उत्सव है। गोलू क्या है? इसे क्यों और कैसे मनाया जाता है? इसका उत्तर हमारी संस्कृति और परंपरा की गहराइयों में निहित है। यह बुराई पर देवत्व की विजय है, शक्ति का प्रमाण है। हिंदू धर्म ने स्त्रियों के सम्मान को अपनी दर्शन-परंपरा में स्थान दिया था और शक्ति की उपासना के देशभर में मनाये जाने वाले यह विभिन्न स्वरुप इसी दर्शन का प्रतीक हैं।

महिषासुर का वध
बहुत समय पहले असुरों का  एक राजा हुआ  जिसका नाम महिषासुर था। वह अत्यंत शक्तिशाली और धनी था। उसने हजारों वर्षों तक तप किया और ब्रह्मा से वरदान पाया कि पृथ्वी पर कोई पुरुष, कोई नर-प्राणी या कोई अस्त्र उसे नहीं मार सकेगा। परंतु उसने स्त्रियों उपेक्षा कर दी, क्योंकि उसे लगा कि स्त्रियाँ निर्बल और असहाय हैं। वरदान पाकर उसका अहंकार आकाश छूने लगा और उसने लोगों पर अत्याचार शुरू कर दिए। उसके सेनापति चंड-मुंड, शुंभ-निशुंभ भी निर्दयी और क्रूर थे। लोग पीड़ित होकर माँ शक्ति से प्रार्थना करने लगे।
माँ शक्ति अपने संतानों की पीड़ा सहन नहीं कर सकतीं। उन्होंने दुर्गा का रूप धारण किया। पहले वे एक सुंदर कन्या के रूप में प्रकट हुईं। चंड और मुंड ने उन्हें देखा और महिषासुर को बताया। काम-वासनाग्रस्त राजा ने आदेश दिया कि कन्या को उसके महल में लाया जाए। जब दूत पहुँचे और आज्ञा सुनाई तो देवी दुर्गा ने उत्तर दिया:
“अपने राजा से कहो कि पहले मुझसे युद्ध जीत ले, फिर देखेंगे।”

नौ दिन का युद्ध
युद्धभूमि सज गई। दुर्गा ने नवदुर्गा का रूप धारण किया और उनके अंगों से सप्तमातृकाएँ प्रकट हुईं। असुर-सेना ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन धीरे-धीरे उनकी भारी हानि हुई। चंड-मुंड, शुंभ-निशुंभ सब मारे गए।
फिर महिषासुर ने अपने योद्धा रक्तबीज को भेजा। उसे वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की हर बूंद से अनेक रक्तबीज उत्पन्न होंगे। युद्ध कठिन हो गया। तभी नारद मुनि ने देवताओं और मनुष्यों को बताया कि अपनी सारी ऊर्जा माँ दुर्गा को दें। सबने अपनी शक्ति उन्हें समर्पित कर दी और वे मूर्तियों की तरह खड़े हो गए।
माँ दुर्गा ने महाकाली का रूप लिया। सप्तमातृकाओं ने रक्तबीज पर प्रहार किया और महाकाली ने उसके रक्त की हर बूंद को पी लिया। इस प्रकार रक्तबीज मारा गया। अंततः माँ दुर्गा ने सिंह पर सवार होकर महिषासुर का वध किया। यह युद्ध नौ दिन चला, इसलिए नवरात्रि नौ दिन मनाई जाती है।

गोलू का प्रतीक
गोलू उसी घटना का प्रतीक है जब समस्त जीवों ने अपनी शक्ति माँ दुर्गा को दी और वे मूर्तिवत खड़े हो गए। इसलिए आज भी इसे मूर्तियाँ सजाकर याद किया जाता है। गोलू उत्सव का आरम्भ महालय अमावस्या से होता है जिसके लिए सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं और उन पर मूर्तियाँ सजाई जाती हैं। सीढ़ियाँ हमेशा विषम संख्या (जैसे 3, 5, 7, अधिकतम 11) की होती हैं। नीचे के पायदानों पर जानवर, फूल या अन्य जीव-जंतुओं की मूर्तियाँ रखी जाती हैं।
सबसे ऊपर देवताओं की मूर्तियाँ रखी जाती हैं। इस तरह का रूपांकन इस बात का प्रतीक है की सृष्टि के प्रत्येक जीव के सञ्चालन का मुख्य स्त्रोत शक्ति स्वरूपा माँ ही हैं। प्रतिदिन दीप जलाकर माँ दुर्गा को प्रसाद अर्पित किया जाता है। महिलाओं को आमंत्रित कर सिंदूर, फूल, सुपारी, पान आदि भेंट किए जाते हैं। दशमी को विशेष भोज बनाकर देवी को अर्पित किया जाता है और फिर परिवार प्रसाद ग्रहण करता है। ग्यारहवें दिन मूर्तियों को सुरक्षित रख दिया जाता है।

तमिलनाडु में परंपरा
तमिलनाडु में हर साल नवरात्रि पर बाजारों में नई-नई मिट्टी और चीनी मिट्टी की गुड़िया बिकती हैं। परिवार इन्हें खरीदते हैं, सजाते हैं, पुरानी गुड़ियों को रंगते हैं। पंद्रह दिनों तक उत्सव का माहौल रहता है। गोलू वास्तव में स्त्री-शक्ति का उत्सव है और यह हमारी हिंदू परंपरा का प्रतीक है जिसमें नारी को सम्मान दिया गया है।

चाहे गुजरात का गरबा हो, कोलकाता की दुर्गा पूजा, पंजाब का कंजक हो, तेलंगाना का बथुकम्मा हो या हिमाचल का मेला या फिर तमिलनाडु का गोलू सबमें भाव एक ही निहित है और वह है शक्ति की उपासना ! हमारे देश में त्योहारों को मनाने का स्वरुप चाहे जितना विविधता से परिपूर्ण हो लेकिन विश्वास और दर्शन एक है और यही भारत में निहित ऐक्य के भाव को दर्शाता है ।
आइए, शक्ति का उत्सव मनाएँ! आइए, गोलू मनाएँ!!

लेख
श्रीजा वेंकटेश, लेखिका, चेन्नई

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