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आत्मिक अलंकार- गोदना

आत्मिक अलंकार- गोदना

कला मानव जीवन का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ उसकी पहचान भी है. हर मनुष्य में कुछ न कुछ कला अवश्य होती है क्यूंकि उसकी सृजनशीलता ही है जो उसे प्रकृति के अन्य घटकों जैसे जीव-जंतु, वनस्पति आदि से अलग बनाता है । यूँ तो विधाता द्वारा हर वह वस्तु जिसमें जीवन है उसमे सृजनात्मक क्षमता होती है परन्तु मानव इस मामले में थोड़ा और विशेष, इस सन्दर्भ में हो जाता है कि वह अपने मनोभावों और किसी कला में निहित विभिन्न पहलुओं को इस सृजनात्मकता के माध्यम से बहुत स्पष्ट और सुन्दर ढंग से समझा सकता है ।
भित्ति चित्र से आरम्भ हुई कला की इस यात्रा में, कला ने मानव के विकास के साथ-साथ खुद को भी विकसित किया और अलग-अलग रूपों में परिष्कृत होकर समय-समय पर नए कलेवर के साथ हमारे सामने आती रही । पर आज हम जिस कला की बात करने जा रहे हैं वह कमोबेश भित्तिचित्र के सामान ही कला का एक पुरातन स्वरुप है । इसके पीछे का दर्शन सीधे मानव के सूक्ष्म शरीर अर्थात आत्मा से जुड़ा हुआ है ।


भित्ति चित्र से लेकर परिष्कृत चित्रकला तक  

जी हां हम बात कर रहें हैं “गोदना ” कला की जिसका सम्बन्ध भारतीय दर्शन के आत्मा के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है । गोदना जनजातीय समाज के बीच प्रचलित सदियों पुरानी परंपरा है । यह भारत की सभी जनजातियों की कला एवं परंपरा का हिस्सा है जैसे राजस्थान के सहरिया, उत्तरांचल के बोक्सा-राजी, झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के असुर, बिरहोर, कोरवा, ओडिशा के बोडो-जुआंग, त्रिपुरा के रियांग संक्षेप में पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण तक सभी जनजातीय समुदाय के बीच यह कला प्रचलित भी है और लोकप्रिय भी। 
गोदना का शाब्दिक अर्थ है किसी सतह को बार-बार छेड़ना अर्थात छिद्रित करना । इस प्रकार गोदना का भावार्थ  हुआ उपरोक्त प्रक्रिया द्वारा शरीर पर स्थाई रूप से अंकित की गई कलाकृति । इसे जनेऊ संस्कृति का अंग माना गया है । छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों के सन्दर्भ में चर्चा करें तो जनजातियों में कुछ समुहों की युवतियां विवाह  के पूर्व ही गोदना गुदवा लेती हैं तो कुछ विवाहोपरांत गोदना गुदवाती हैं । सभ्यता के विकास के क्रम में गोदना अलंकार की भूमिका में स्थायी हो गया और लोग चेहरे को सुंदर बनाने के लिये थुड्डी में तीन टीका, माथे व नाक पर बिन्दु के रूप में, हाथ व पैर में आभूषण के रूप में गोदना अलंकृत किया जाने लगा साथ ही स्त्री और कुछ पुरूष भी हाथ में अपने प्रियजनों का नाम एवं अपने स्वयं का नाम भी गोदना के जरिये लिखवाने लगे ।


गोदना उकेरती ग्रामीण महिला

लोक संस्कृति की इस अद्भुत कला का प्रचलन सदियों से है । वैसे तो स्त्री और पुरुष दोनों ही गोदना के प्रति रूचि रखते हैं लेकिन पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ अधिक गोदना गुदवाती हैं । इसीलिए जहाँ पुरुष बहुत सीमित अंगों में गोदना गुदवाते है स्त्रियाँ अपने अधिकांश अंगों पर गोदना गुदवाना पसंद करती हैं । इस कला में अलग क्षेत्रों में कुछ-कुछ विवधता भी दृष्टिगत होती है जैसे- कांकेर के जिले में विवाह पूर्व लड़कियों में गोदना गुदवाने का रिवाज है । यहाँ की जनजातीय महिलाओं में अलग-अलग अंगों के लिए विभिन्न बनावटों का प्रचलन है उदाहरणार्थ कोहनी में मक्खी, अंगूठा के किनारे खिच्ची,पंजा में खड्डू, झूलाचींघा और छाती में सुता गोदवाने का प्रचलन है ।
सरगुजा अंचल की बात करें तो  वहाँ की स्त्रियाँ माथे की सुन्दरता को बढ़ाने के लिए माथे पर बिंदी गुदवाती है जिसके पीछे का उद्देश्य केवल सौन्दर्यवर्धन नहीं बल्कि यह मान्यता भी निहित है की इस स्थान पर गोदना बनवाने से बुद्धि का भी विकास होता है । वैसे ही मुट्की गोदना दांतों की मजबूती के लिए ठुड्डी पर, फल्ली गोदना नाक पर, और झुमका बनावट का गोदना कान पर बनवाया जाता है । गले को सुन्दर दिखने के साथ-साथ आवाज़ में मधुरता लाने के लिए  हसली गुदवाया जाता है तो कलाई में मोलहा बनवाया जाता है।


शरीर के विभिन्न अंगो पर गोदना

हाथ के अंगूठे में मुंदरी और  पैर  के अंगूठे में उकेरी गयी डिजाईन को  अनवठ कहते हैं । सरगुजा अंचल की कुछ प्रमुख गोदनाप्रिय जनजातियाँ गोंड, उरांव, कंवर, कोरकू और पंडा हैं ।राजगोंड जनजाति की महिलाएं अपने अंगों में अधिक मात्रा में गोदना गुदवाना पसंद करती हैं । इनके गोदना में निकटवर्ती राज्य ओडिशा की संस्कृति भी परिलक्षित होती है जो जनजातियों से जुड़ी एक और भ्रान्ति, कि वे बहुत रुढ़िवादी होते है किसी और से मेलमिलाप पसंद नहीं करते, को तोड़ती है ।
चूँकि गोदना से धार्मिक मान्यताएं भी सम्बद्ध हैं अतः इनके द्वारा अधिकांशतः मुकुट, पादुका, शंख, प्रतिमा आदि गोदना उनकी मान्यतानुसार गुदवाये जाने की प्रथा है । अबूझमाड़िया जनजाति की महिलाओं में भी गोदना के प्रति विशेष रूचि है इनके मध्य गोदना ‘अंजलंग’ के नाम से प्रचलित है इसलिए माथे पर गुदना को ‘कपाड़ अंजलंग’, ठुड्डी पर ‘टडुआ अंजलंग’, हथेली पर ‘डुमकेलांग अंजलंग’ और बांह पर गुदवाये जाने वाले गोदना को ‘डंडा अंजलंग’ कहा जाता है । 
कभी-कभी गहन विचार करने पर आश्चर्य होता कि यह समाज जिसे तथाकथित आधुनिक और प्रगतिशील समाज असभ्य कहता है और उनके प्रति हेय भाव रखता है वह समाज कितना व्यवस्थित और तार्किक है कि इसने गोदना का भी नामकरण कर रखा है ताकि बनवाने वाले को समझाने में और बनाने वाले को समझने में आसानी हो, जबकि हम विकास के इतने आयाम रचने के बावजूद अव्यवस्थित जीवन शैली के शिकार हैं ।
जैसा की हम आरम्भ में चर्चा कर चुके हैं गोदना के सन्दर्भ में एक बहुप्रचलित मान्यता यह है कि गोदना ही वह गहना है जो मरणोपरांत भी हमारे साथ जाता है बाकी सब तो यहीं रह जाता है । यह तो एक दार्शनिक महत्व हुआ परन्तु इसके पीछे स्वास्थ्य लाभ जैसी मान्यताएं भी जुड़ी है जैसे घोंघा रोगी के गले में, संतानोत्पत्ति में समस्या की स्थिति में नाभि के नीचे, बच्चे के चलने में देर करने पर घुटने के पास गोदना गोदा जाता है जिसके उपरांत वांछित परिणाम भी मिलते हैं । इस प्रकार शरीर के भिन्न-भिन्न रोगों में इसे उपचारात्मक पद्धति के रूप में भी देखा जाता है और अनेक चिकित्सकों ने भी निःसंकोच इसे वर्तमान एक्यूपंक्चर चिकित्सा पद्धति (जिसका प्रयोग  देश में1959 से आरम्भ  हुआ) का पूर्वगामी माना हैं ।
गोदना केवल अलंकार की विषयवस्तु नहीं अपितु स्त्री अस्मिता की रक्षा और समाज की शोषणकारी वर्जनाओं का विरोध प्रदर्शन का भी माध्यम रही है । आप सोच रहे होंगे कैसे? इसका उत्तर ओडिशा की कुट्टीया कोंध जनजाति की स्त्रियों में गुदवाये जाने वाले पैटर्न से समझ आता है । ये स्त्रियाँ चेहरे पर मोटी- मोटी रेखाएं गुदवाती हैं कारण पता करने पर जानकारी मिलती है कि कोंध स्त्रियों की सुन्दरता के कारण आक्रमणकारी सैनिक उन्हें उठाकर ले जाते थे अतः गोदना के माध्यम से उन्होंने अपना सौन्दर्य विद्रुप कर आत्मरक्षा की युक्ति निकाली ।
इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में एक रामनामी समुदाय  दिखलाई देता है प्राचीन समय जब एक वर्ग विशेष को मंदिर प्रवेश और पूजा-अर्चना से जातिगत आधार पर वंचित किया गया तब शोषित वर्ग ने शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों पर रामनाम गुदवाकर अपना प्रतिकार दर्ज करते हुए यह सन्देश दिया एक कि ईश्वर और उनकी भक्ति पर प्रत्येक मनुष्य का समानाधिकार है ।


रामनामी संप्रदाय के अनुयायी

इस प्रकार हम ध्यान से देखते है तो पाते है कि गोदना एक कला मात्र नहीं जीवन के धार्मिक, आध्यात्मिक सहित स्वास्थ्यगत पहलुओं को भी समेटे हुए है । यदि हम विज्ञान और वैज्ञानिक सोच को मशीनों से परे रखकर सोचें तो पाते हैं कि जिन्हें हम वैज्ञानिक दृष्टि से पिछड़ा मानते हैं उन्हें प्रकृति ने कितनी वैज्ञानिक पद्धति से सराबोर कर रखा है उसकी एक झलक गोदना बनाने की विधि में नज़र आती है ।
आजकल शहरी क्षेत्र में  हर वर्ग में टैटू (गोदना का आधुनिक स्वरुप) बनवाने का काफी उत्साह नज़र आता है पर चूँकि यह कार्य मशीन से किया जाता है इसलिए सावधानियां बरतने के बाद भी कभी-कभी ऐसे समाचार सुनने में आ ही जाते है जिसमे किसी प्रकार की स्वास्थ्यगत हानि हुई हो लेकिन हमारा जनजातीय समाज इस मामले में बड़ा सजग है ।


आधुनिक टैटू

किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचाव के लिए गोदना गोदने के लिए बबूल के कांटे का प्रयोग किया जाता है और उस कांटे से डिजाईन बनाई जाती है ।  काजल बनाने के लिए तिल,सरसों अथवा प्रायः अरंडी के तेल का प्रयोग किया जाता है फिर उस काजल को उकेरी गई आकृति पर और अंततः उस पर हल्दी और अन्य औषधियों का लेप लगाया जाता है ताकि घाव के पकने और संक्रमण होने के खतरे से बचा जा सके।
हालाँकि कालांतर में सुई का प्रयोग भी प्रचलन में आया परन्तु लेप में वही पुरातन विधि अपनाई जाती है ताकि सुई या काँटों को चुभोने पर होने वाले घावों को शीघ्रता से भरा जा सके । चूँकि यह प्रक्रिया कुछ पीड़ादायक होती है इसलिए गोदना के विशेष गीत भी जनजातीय संस्कृति में विधमान है तो बताइए क्या इस पुरी प्रक्रिया में आपको वैज्ञानिक और तार्किक सोच दिखाई नहीं पड़ती ?
गोदना गोदने  का कार्य आमतौर पर मेले और मड़ई में किया जाता है इसलिए यह कला इस कार्य को करने वाली जनजातियो के आर्थिक पक्ष से भी जुड़ी हुई है । गोदना, गोदने का कार्य सर्वाधिक रूप से  देवार और ओझा जनजातियों  द्वारा किया जाता है वही बैगा को सर्वाधिक गोदनाप्रिय जनजाति में सम्मिलित किया गया है ।
जीवन के चहुंमुखी आयामों को समेटे होने के बाद भी यह कला कहीं न कहीं आधुनिकता के चपेट में आकर विलुप्ति की कगार पर आ खड़ी हुई है। चूँकि जनजातीय समाज भी बाजारवाद और वर्त्तमान की चकाचौंध से भरी दुनिया से अछूता नहीं है इसलिए इस समाज के युवक-युवतियों में इस कला के प्रति रुझान काफी कम हो गया है और वे इससे विमुख होते जा रहे हैं ।
वे आधुनिक समाज का हिस्सा बनने की होड़ में अपनी गौरवशाली परंपरा को विस्मित करते जा रहे हैं । इससे पहले की हमारी जीति-जागती पुरातन संस्कृति भूली-बिसरी कहानियों में बदल जाये शासन-प्रशासन सहित हमें भी व्यक्तिगत भागीदारी सुनिश्चित कर हमारी सांस्कृतिक धरोहर को संजोने और पुनर्जीवित करने में अपनी महती भूमिका निभाने के लिए अविलम्ब आवश्यक कदम उठाने चाहिए  ।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान 

 

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