आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार

नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार

नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

विश्व के कबीर पंथियों का संत समागम

विश्व के कबीर पंथियों का संत समागम


छत्तीसगढ़ की धर्मनगरी दामाखेड़ा में आयोजित कबीर पंथियों का संत समागम आध्यात्मिकता, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का अद्वितीय संगम है। वसंत पंचमी से माघ पूर्णिमा तक चलने वाले इस आयोजन में विश्वभर से संत और अनुयायी एकत्र होकर कबीर वाणी, सत्यनाम और साधना की परंपरा को जीवंत करते हैं। यह मेला केवल उत्सव नहीं, बल्कि कबीर दर्शन के गहन आध्यात्मिक चिंतन और साधना का केंद्र है।


धरती पर वृक्षों के पीत पात जैसे झरते हैं। खेतों में खड़ी फसलें पकने का संकेत देती हैं। रक्तिम पलास खिल उठते हैं। स्वर्णमयी आभा देते अमलतास झरता झलक उठता है। अम्र मंजरियां फूट पड़ती हैं। सूखे पेड़ों पर रंग-बिरंगी कोंपलें प्रस्फुटित होने लगती हैं। सजी संवरी प्रकृति ऋतुराज वसंत के पदार्पण के लिए आतुर हो उठती है। ऐसे मनोरम वातावरण में छत्तीसगढ़ में मड़ई मेले सज उठते हैं।

धर्मनगरी दामाखेड़ा - 'साहेब बंदगी' का उदघोष करते करते हुए वसंत पंचमी पर्व पर कबीर पंथियों का विश्व प्रसिध्द मेला आरंभ हो जाता है। सफेद बाना धारण किए विश्व भर के संत, कबीर पंथी धर्मनगरी दामाखेड़ा में हर बरस आ जुटते हैं। माघ पूर्णिमा तक चलने वाला कबीर पंथियों का संत समागम अपने आप में अनूठा होता है। सगुण भक्ति के उपासक संत कबीर की वाणी छत्तीसगढ़ की धरोहर कैसे बन गई इसके पीछे एक रोचक प्रसंग है जिसे परंपरागत रूप से संजोए हुए है। कबीर पंथ के पंतश्री की ग‌द्दियों का एक लंबा इतिहास है।


दामाखेड़ा में प्रतिवर्ष होता ई संत समागम 

छत्तीसगढ़ में कबीर पंथ- छत्तीसगढ़ के प्रथम कवि संत धरम दास सगुणोपासक थे। मथुरा में धरम दास जी की भेंट सदगुरु कबीर से हुई। सदगुरु कबीर के सत्य ज्ञान से अभिभूत होकर धरमदास उन्हें अपने गृहग्राम बांधोगढ़ ले आए। सद्गुरु कबीर और धरमदास के बीच हुए वार्तालाप को चालीस ग्रंथों में बांधा गया है। धरम दास की श्रध्दा भक्ति को देखकर विक्रम संवत 1540 में सद्‌गुरु कबीरदास ने इन्हें ब्यालीस वंश तक कबीर धर्मगद्दी का अधिकार प्रदान किया। वंशगद्दी के संबंध में कबीर वाणी में कहा गया है-

"बीस दिन और बरस पचीसा,
 एता कलि में चले संदेशा।।"

सदगुरु के आशीर्वाद से धरमदास के दूसरे पुत्र कबीर पंथ के प्रथम पंथश्री मुक्तामणि नाम साहेब हुए। पंथश्री मुक्तामणि नाम साहेब बांधोगढ़ से छत्तीसगढ़ के कुदुरमाल आ बसे। हसदेव नदी के तट पर लगे पीपल वृक्ष के नीचे बैठ सदगुरु कबीर की वाणी का उ‌दघोष करने लगे। संवत 1577 में प्रथम कबीर पीठ की स्थापना कुदुरमाल में की। यहीं घंटहा पीपल इनके अलौकिक चमत्कार का मूक साक्षी बना।

मुक्तामणि नाम साहेब के तात्विक ज्ञान से तत्कालीन जमींदार प्रभावित हुए और उन्होंने कबीर पंथ को अपना लिया। इसी के साथ छत्तीसगढ़ में शर्मा, साहू, वैश्य और मानिकपुरी जैसे उपनाम धारी कबीर पंथ से जुड़ने लगे। कुदुरमाल में पहले पंथश्री भले नहीं है, लेकिन मुक्तावन तुलसी का बिरवा हर घर आंगन में दिखता है।

 

कबीर पंथ की गद्दियां - कबीर पंथ का विस्तार होता चला गया। परंपरा गत वंश गुरुओं ने देश के अनेक स्थानों पर धर्म गद्दी की स्थापना की। ऐसे सभी स्थल कबीर मत वालों के तीर्थ स्थल बने हुए हैं। संवत 1610 में सुदर्शन नाम साहेब ने रतनपुर में गद्दी स्थापित की। जहां वे 60 वर्षों तक रहे। जिनके बाद कुलपत नाम चांपा के कुदुरमाल में रहे। 1695 में प्रमोदगुरु बालापीर साहेब ने मंडला में वंश गद्दी स्थापित की।


आज भी विद्यमान है गद्दी परंपरा

इनके उत्तराधिकारी कंवल नाम साहेब ने संवत 1720 में धमधा से कबीर पंथ चलाया। संवत 1745 में इस ग‌द्दी में अमोल नाम विराजे जो मंडला में ही रहे। जिनके बाद सुरित स्नेही हुए जिन्होंने संवत 1778 तक यह गद्दी सिघौरी में स्थापित की। हक्कनाम साहेब 43 वर्षों तक कवर्धा में पंथश्री रहे। जिन्होंने हटकेसर में एक पृथक गद्दी की स्थापना की। हक्कनाम साहेब के बाद प्रगट साहेब सत्रह वर्ष तक गद्दीनशीं हुए। ग्यारहवें पंथश्री धीरज नाम हुए।

इसी समय गद्दी के विभाजन से विन्दवंश और नाद वंश हुए। विन्द वंश के अन्तर्गत दामाखेड़ा की ग‌द्दी स्थापित हुई। नाद वंश की शाखा बिलासपुर जिले के खरसिया में स्थापित हुई बारहवें गुरु उग्रनाम साहेब ने कुदुरमाल चांपा में अपनी ग‌द्दी बनाई। 1904 में उग्रनाम साहेब के समय दामाखेड़ा अस्तित्व में आया। जिन्होंने वसंत पंचमी से दामाखेड़ा में मेला की शुरुआत की।जिनके बाद दयानाम साहेब दामाखेड़ा में ही कबीर मत का उपदेश देते रहे।

पंत श्री गृंधमुनि नाम साहेब पंथ के चौदहवें गुरु हुए जिन्होंने अपने दामाखेड़ा को एक नया परिवेश दिया। धर्मनगरी दामाखेड़ा में देश के प्रतिष्ठित विद्वानोंं को आमंत्रित किया गया। हजारी प्रसाद द्विवेदी, सुमित्रा नंदन पंत, महादेवी वर्मा,डॉ. रामकुमार वर्मा जैसे अनेक विद्वान दामाखेड़ा आए। 1990 माघ पूर्णिमा के दिन गृंधमुनि नाम सत्यलोक वासी हुए। जिनके बाद से प्रकाश मुनि नाम साहेब दामाखेड़ा गद्दी में विराजमान हुए।

अट्ठारहवीं सदी में कबीर पंथ -विश्वभर में फैले हुए कबीर पंथियों का प्रमुख तीर्थ दामाखेड़ा बना हुआ है। भारत भ्रमण में साधुचरण दास ने 1889 में कबीर पंथ के बारे में वर्णन करते हुए लिखा है, "मध्यप्रदेश में खास करके बिलासपुर, रायपुर और छिंदवाड़ा जिले में कबीर पंथी बहुत हैं, जो सन 1881 की मनुष्य गणना के समय मध्यप्रदेश में 3,47,994 थे। मध्यप्रदेश के कबीर पंथियों का प्रधान मठ बिलासपुर जिले के कवर्धा में और उसके बाद कुदुरमाल और गढ़बांधव में है।

इसके अलावा नौवें गुरु पाकनाम साहेब के काल में बुरहानपुर में पृथक गद्दी बनी जो बीजक पंथी के नाम से विख्यात है। यहां के महंत रामस्वरूप दास ने पटना बिहार के पास फतुआ में भी एक गद्दी स्थापित की। राजनादगांव जिले के नदिया गांव में भी एक गद्‌दी बनाई गईं अधिकतर कबीर पंथियों का रूझान दामाखेड़ा की गद्दी पर है।

सोलहवें पंथश्री उदित नाम बने- 2026 में कबीर पंथ की गद्दी में सोलहवें पंथश्री उदित नाम विराजमान हुए। प्रकाश मुनि नाम साहेब ने अपना पैंतिस साल पूरा किया। 1570 से चली आ रही वंश परंपरा को निभाते हुए प्रकाश मुनि नाम साहेब ने चादर तिलक कर उदित नाम को गद्दी सौंप दी। बलौदाबाजार भाटापारा जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग रायपुर से 40 किलोमीटर दूर सड़क मार्ग पर बिलासपुर की ओर स्थित है, दामाखेड़ा कबीर पंथियों की धर्म नगरी में हर वर्ष कबीर पंथियों का संत समागम होता है। मेला में हर ओर साहेब बंदगी संबोधित करते कबीर पंथी मिलते हैं।

 संत समागम के साथ माघ मास का चौदहवां दिन चौका आरती का विशेष महत्व होता है। चौका का वास्तविक अर्थ है वह विधान, जिसके माध्यम से सत्यनाम की प्राप्ति के लिए संसार के सत्यपुरुष स्वरूप का पूजन किया जाता है। शब्द सुरति योग से आज भी सत्यलोक का दर्शन व शरीरान्त उसे सत्यलोक की प्राप्ति होती है। इस के लिए सारे कबीर पंथी आ जुटते हैं।

चौका आरती का है विशेष महत्व
चौका आरती का है विशेष महत्व

उत्सवधर्मी मेलों से अलग हटकर दामाखेड़ा में कबीर दर्शन अध्यात्म से ओत-प्रोत संत समागम होता है। कबीर पंथियों के लिए माघ शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक दामाखेड़ा विशेष धार्मिक महत्व का स्थल बन जाता है। चौदस को पंथश्री का उपदेश होता है। कबीर पंथी दामाखेड़ा पहुंच अपने पंथश्री के हाथों प्रसाद ग्रहण कर धन्य हो उठते हैं।

-रविन्द्र गिन्नौरे

 

Follow us on social media and share!