छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस
July 22, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

छत्तीसगढ़ की धरती पुरातात्विक धरोहरों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहां पुरातात्विक महत्व के अनेक केन्द्र हैं। जिन पुरातात्विक स्थानों पर पुरातत्ववेत्ताओं का ध्यान अधिक आकृष्ट हुआ, जिनको ज्यादा प्रचार-प्रसार मिला वे स्थान लोगों की नजरों में आये और गौरव के केन्द्र बने। जिन पर लोगों का ध्यान नहीं गया था कम गया वे स्थान कम प्रचारित हुए, किंतु अप्रचारित इन स्थानों का महत्व पुरातात्विक दृष्टि से किसी भी मायने में कम नहीं हैं। इनमें से घटियारी भी एक है। आवश्यकता है इसके समुचित उत्खनन व आकलन की।
घटियारी राजनांदगांव जिला मुख्यालय से 72 कि.मी. दूर गण्डई के पश्चिम भाग में 5 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। गण्डई-कोपेभांठा से सुरही नदी को पार कर, पक्की सड़क तो नहीं है पर सुगमता से घटियारी पहुंचा जा सकता है। गण्डई क्षेत्र का अतीत गौरवशाली रहा है। यह प्राचीनकाल से कला संस्कृति व पुरातत्व का केन्द्र रहा है। गण्डई के आसपास के अनेक गाँवों में पुरा संपदा बिखरी पड़ी है। ये पुरासंपदा इस बात के प्रमाण हैं, जिसका एक साक्षी है घटियारी।
वैसे तो घटियारी वर्तमान में आबादी विहीन है। आबादी की दृष्टि से इसके पूर्व में है ग्राम बिरखा व उत्तर में ग्राम कटंगी तथा पश्चिम में घने जंगल घटियारी से ही प्रारंभ होता है। ये दोनों गाँव बिरखा व कटंगी में भी पुरावशेषों के भण्डार हैं। घटियारी में कलचुरिकालीन 10वीं-11वीं. ई. में निर्मित शिव मंदिर के भग्नावशेष प्रचुर मात्रा में बिखरे पड़े हैं। राज्य सरकार द्वारा सन् 1978-79 में यहाँ उत्खनन कार्य किया गया। जिसमें सैकड़ों की संख्या में कलात्मक प्रस्तर मूर्तियों व मंदिरों के वास्तुखंड प्राप्त हुए हैं। तब से यह मंदिर पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है।

वर्तमान में मंदिर का थर भाग एवं द्वार शाखाएं ही सुरक्षित हैं। प्राकृतिक कारणों से यह भले ही बिखर गया है पर जो भी शेष है वह बड़ा ही आल्हादकारी व प्राचीनकला संस्कृति के स्वर्णिम अध्याय का स्वमेव उदाहरण है। बालुई व ललछौंहें प्रस्तर से निर्मित यह मंदिर निश्चित रूप से भोरमदेव की तरह भव्य, विशाल और कलात्मकता से परिपूर्ण रहा होगा। पुरातत्व वेत्ताओं के अनुसार यह मंदिर भोरमदेव का समकालीन है तथा कवर्धा के फणि नागवंशीय कालीन मंदिर वास्तु का परिचायक है। घटियारी के शिव मंदिर व गण्डई टिकरीपारा के भाड़ देऊर मंदिर के निर्माण व शिल्प में काफी साम्यता है।
घटियारी का प्राचीन शिवमंदिर प्रस्तर निर्मित व पूर्वाभिमुखी है। वत्रमान में इस मंदिर के मंडप, अंतराल और गर्भगृह के प्रस्तरखंड यहाँ मौजूद हैं। इन प्रस्तर खंडों को देखकर यह सहज अनुमान लगता है कि इस मंदिर में भोरमदेव मंदिर की ही तरह महामंडप तथा तीनों ओर मुखमंडप निर्मित रहे होंगे। मुख्य मंदिर के उत्तर, दक्षिण व पूर्व में भी अनेक शिवमंदिरों के ध्वस्त अवशेषों के साथ-साथ जलहरी व शिवलिंगा प्राप्त हुए हैं। जो परवर्तीकाल में निर्मित जान पड़ते हैं। घटियारी के भग्नावशेषों को देखकर ही इसकी भव्यता और विशालता का आकलन किया जा सकता है। इसकी इसी विलक्षणता के कारण पुरातत्ववेत्ताओं ने इस मंदिर को मंदिर नहीं बल्कि महामंदिर होने की कल्पना की है। पंचरथ शैली के इस मंदिर के अभिमुख नंदी की विशाल और अलंकारिक प्रतिमा सुशोभित है। नंदी की पीठ पर उत्कीर्ण घंटियों का शिल्प सौंदर्य आंखों को संतृप्त कर देता है और शिल्पी की प्रशंसा के लिए अनायास देखने वालों के मुंह से वाह-वाह के स्वर उठ पड़ते हैं।
इस नंदी को देखकर मेरा मन आज भी रोमांचित हो उठता है और बचपन की स्मृतियों में खो जाता है। बात तब की है जब मैं विद्यार्थी था। 8वीं-9वीं में पढ़ता था। तब इस जंगल में कभी-कभार अघुवा बनकर भौजी की लकड़ी लेने के लिए जाता था। गाँव की महिलाओं के साथ हमारी बड़ी भौजी लकड़ी लाने जंगल जाती थी। तब हम पड़ोस के बच्चे घटियारी तक जाते थे। उनके बोझा हल्का से कुछ निकालकर स्वयं लाते थे इससे उनका बोझा हल्का हो जाता था। अब भी लोग अघुवा जाते हैं। तब हम बच्चे लकड़हारिनो का इंतजार करते।

घटियारी तालाब के किनारे पास टीले पर (जिस टीले की खुदाई से मंदिर के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं) खेलते थे। वहीं पर खुदाई से मंदिर के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं) खेलते थे। वहीं पर नंदी की मूर्ति थी। लोहे का बना एक टेपरा था। हम बच्चे उसी नंदी की पूजा करते, टेपरा बजाते और तब तक खेलते रहते जब तक के लकड़हारिनें हमें पुकारती नहीं थी। बालमन की स्मृतियां इस मंदिर को देखकर आज भी मन को आनंदित कर देती हैं। तब किसी को ऐसा कहां अनुमान था कि उस टीले में हमारी यह पुरा संपदा छिपी है। घटियारी की पुरातात्विक आभा के साथ-साथ सागौन व पलाश वृक्षों से आच्छादित इसकी प्राकृतिक शोभा बड़ी निराली थी। अरे मैं तो स्मृतियों में खो गया।
आईये प्रवेश करें मंदिर प्रांगण और देखें मंदिर की द्वार शाखाओं को। वर्तमान में मंदिर प्रांगन में पुरातत्व विभाग द्वारा यहाँ प्राप्त पद्मास्थ राजपुरूष, गणेश, खडगासनास्थ तीर्थकर, स्थानक विष्णु, योद्धा, प्रतिक्षारत नायिका, गवाक्ष, चामरधारिणी, शिवलिंग पूजनरत उपासिका, राम-हनुमान, महिषासुर मर्दनी आदि की महत्वपूर्ण प्रतिमाएं मंदिर प्रांगण में चबूतरों में स्थापित की गई हैं। घटियारी शिवमंदिर की द्वार शाखाएं अत्यंत ही अलंकृत हैं। शिल्पकार ने अपनी कला की अद्भूत और अलौकिक छवि को प्रस्तरों पर सजीव कर दिया है।
शिलाखंडों पर नृत्यांगनाओं व वादकों की मूर्तियां जीवंत प्रतीत होती हैं। चैखट पर उत्कीर्ण लता वल्लरियों व नृत्यरत मयूरों का शिल्पांकन बड़ी सूक्ष्मता के साथ किया गया है। अधोभाग में गणेश जी, सरस्वती जी, नागकन्याओं व कीर्तिमुख की अलंकारिक मूर्तियां उत्खचित हैं। प्रवेश द्वार के दोनों भाग में भगवान शिव व पार्वती की मूर्तियां हैं। नीचे नंदी विराजित है। दोनों ओर सहचर भी खड़े हुए हैं तथा द्वारपालों के साथ-साथ कलश धारण किये गंगा यमुना की मूर्तियां भी इस भाग में उत्कीर्ण हैं। द्वारशाखा का सिरदल गिरकर नीचे पड़ा हुआ है। सिरदल में भी बड़ा ही नयनाभिराम शिल्पांकन है।
गर्भगृह में प्रवेश के लिए छः सीढ़ियां उतरनी पड़ती है। गर्भगृह में कृष्ण प्रस्तर से निर्मित विशाल जलहरी है जिसमें शिवलिंग स्थापित है। किन्तु यह शिवलिंग वास्तविक न होकर कृत्रिम है। क्यों कि स्थापित शिवलिंग जलहरी के अनुपात में छोटा हैं। शिवलिंग में चढ़े जल के लिए प्रवाहिका की दिशा उत्तर की ओर है। गर्भ की भित्तियाँ अलंकार विहीन हैं। केवल पश्चिम दिशा की दीवार में एक आले में गणेश जी की भव्य मूर्ति विराजित हैं। घटियारी मंदिर के पास दो और टीले है। जिनके उत्खनन से इस मंदिर का पुरातात्विक महत्व और भी अधिक सुदृढ़ हो गया। सागौन वृक्षों से घिरे ये टिले अपने गर्भ में महत्वपूर्ण जानकारियां समेटे हुए हैं।
इन मंदिरों व मूर्तियों के अतिरिक्त घटियारी क्षेत्र के आसपास और भी अनेकों अलंकारिक मूर्तियां व वास्तुखंड बिखरे पड़े हैं। इससे यह अंदाजा लगता है कि अतीत में यहाँ समृद्ध और गौरवशाली नगर रहा होगा। जो प्रकृति के थपेड़ों के कारण विनष्ट हो चुका है। आईये घटियारी से लगे उन स्थानों का भी भ्रमण करें जहाँ प्रचुर मात्रा में पुरासंपदा बिखरी पड़ी है।
बिरखा गाँव, गण्डई से 4 कि.मी. पश्चिम व घटियारी से 1 कि.मी. पूर्व में स्थित है। घटियारी जाने के लिए बिरखा ही प्रवेश द्वार है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि बिरखा ही महाभारतकालीन विराट नगर है। बिरखा के नवनिर्मित शीतला मंदिर में विराजित काले ग्रेनाइट प्रस्तर में उत्कीर्ण चतुर्भुजी देवी की बड़ी सजीव व सुन्दर प्रतिमा है। जो आसनस्थ है। ऊपरी दाँया हाथ खंडित है। नीचे हाथ में अक्षमाला तथा ऊपरी बांये हाथ में दर्पण व निचला हाथ वरद मुद्रा में है। ललितासन इस चतुर्भुजी देवी के पद तल में तीन मानव मस्तिष्क व तीन ऊंटों का शिल्पांकन नई जिज्ञासा पैदा करता है। दोनों ओर उपासिकाएं उत्कीर्ण हैं।

इसी मंदिर में एक और भव्य व अलौकिक प्रतिमा है जिसमें पाँच पुरूष शरीर के साथ एक ही सिर जुड़ा हुआ है। किसी भी ओर से देखने पर वह पाँच मूर्तियां पूर्ण रूप से दिखायी पड़ती हैं। इस तरह की प्रतिमा अन्यत्र शायद दुर्लभ हो। बिरखा में एक प्राचीन कुआँ है, लोग इसे बीहर कुआँ कहते हैं। क्योंकि यह स्थान सागौन, मोखला व पलाश आदि वृक्षों की सघनता के कारण बीहड़ जंगल के रूप में है। यह कुआँ भी अपने भीतर अतीत का गौरव छुपाये हुए है। यहीं पर दो अन्य टीले हैं जहाँ पर काले पत्थर से निर्मित जलहरी व नंदी की खंडित और कला पर प्रकाश पड़ेगा। ग्राम कृतबांस में भी वास्तुखण्ड बिखरे पड़े हैं।
घटियारी के उत्तर में 1 कि.मी. की दूरी पर स्थित है कटंगी गाँव। कमल फूलों से आच्छादित तालाब के किनारे प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं। यहाँ उपलब्ध प्रतिमाओं व वास्तुखंडों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यहाँ भी दो विशाल मंदिर रहे होंगे। एक शिव का व दूसरा विष्णु का। वर्तमान में यहाँ चर्तुभुजी विष्णु की भव्य व अलौकिक स्थानक प्रतिमा है। काले ग्रनाइट पत्थर से निर्मित यह विष्णु प्रतिमा कल्चुरिकालीन मूर्तिकला का अद्भुत नमूना है। अंशतः खंडित यह प्रतिमा बड़ी मनोहारी है। शंख, गदा, चक्र पदमधारण किये इस मूर्ति का अलंकरण शिल्पी द्वारा बड़े मनोयोग और सूक्ष्मता के साथ किया गया है। इससे लगी हुई लक्ष्मी की खंडित मूर्ति है। यहाँ गणेश जी की भी विशाल मूर्ति है। इसके साथ ही सरस्वती, अलंकृत नंदी, आसनस्थ उपासक, कुंडलित नाग पुरूष आदि की प्रतिमाएं यहाँ विद्यमान हैं। दूसरे भग्न मंदिर में काले पत्थर की एक बड़ी जलहरी स्थापित है जिसमें शिवलिंग नहीं है।
घटियारी से लगभग 2 कि.मी. दूर दक्षिण दिशा में सुरही नदी के किनारे स्थित है भड़भड़ी। यह एक मनोरम प्राकृतिक स्थल है। यहीं पर एक एनीकट बना हुआ है जिसके कारण लोग यहाँ अक्सर भ्रमण के लिए आते हैं। प्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण इस स्थान पर अनेकों प्राचीन मूर्तियां व भग्न मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें प्रमुख है-दुरपता की प्रतिमा। पुरातत्व वेत्ताओ के अनुसार यह मूलतः कमला अर्थात् लक्ष्मी की मूर्ति है। इस देवी के हाथों में पद्म एवं गदा विराजित है। नीचे के हाथ भग्न है जिसे कृत्रिम रूप से पुननिर्मित किया गया है। गले ले से लेकर पैरों तक वैजयन्ती माला सुशोभित है। नीचे भाग में एक ओर आराधक तथा दूसरी ओर सिंह का अंकन है। यह मूर्ति बड़ी भव्य, अलंकारिक और मनोरम है। किंतु स्थानीय जन लोक आस्था के कारण इसे दुरपता अर्थात द्रोपदी देवी मानकर इसकी पूजा करते हैं। आस्थावश लोगों ने इस मूर्ति को बंदन से पोतकर, चाँदी की आंखें लगाकर व नथ पहनाकर इसे नारी परिधान से श्रृंगारित कर आवृत्त कर दिया है। यहाँ जन सहयोग से एक मंदिर का निर्माण भी हो रहा है। नींव की खुदाई के समय ईंटें, कुछ मूर्तियां मिली हैं जिसमें उपासक की प्रतिमा प्रमुख है। यहाँ पर अन्य देवी देवताओं की भी खंडित प्रतिमायें विद्यमान हैं। भड़भड़ी के पश्चिम में 2 कि.मी. दूर घने जंगल के बीच भॅंवरदाह नामक स्थान पर भी कुछ प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं।
घटियारी व आसपास के क्षेत्रों में प्राप्त इन पुरातात्विक महत्व के भग्न मंदिरों व मूर्तियों के संरक्षण-संवर्धन के लिए स्थानीय लोगों ने ग्राम धरोहर समिति घटियारी बिरखा (गंडई) का निर्माण कर अपनी जागरूकता और अपने कला प्रेम का परिचय दिया है। समिति के द्वारा विगत तीन वर्षों से महाशिवरात्रि के अवसर पर वृहद् मेला व घटियारी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। घटियारी महोत्सव में अंचल के लगभग 200 लोक कलाकारों की सहभागिता होती है। जिसमें छत्तीसगढ़ के लोकगीत, लोकनृत्य, लोक नाट्य यथा- सुवा, करमा, ददरिया, पंथी, पंडवानी, भरथरी, राऊत नाचा, बाँस संगीत, जसगीत , नाचा आदि की मनमोहक प्रस्तुतियां देकर छत्तीसगढ़ लोक कला और लोक कलाकारों को प्रोत्साहित किया जाता है।
कल्चुरिकालीन मंदिरों और कलाकृतियों से यह क्षेत्र अटा पड़ा है। इस क्षेत्र के मंदिरों की विशालता का अनुमान यहाँ बिखरे वास्तुखंडों से सहज लगाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ शासन पुरातत्व विभाग द्वारा इन वास्तुखंडों व भग्न मंदिरों के संरक्षण के लिए कांटेदार चहारदीवारी का निर्माण किया गया है। किंतु इतना ही पर्याप्त नहीं है। यहां की अनमोल कलाकृतियों व मंदिरों के भग्नावशेष को सुरक्षित व संरक्षित रखने के लिए मुख्य मंदिर के ऊपर टीन शेड व मूर्तियों के लिए संग्रहालय की आवश्यकता है।
ये मंदिर, ये मूर्तियाँ हमारी गौरवशाली इतिहास, कला और संस्कृति के साक्षी हैं। इस क्षेत्र के इन पुरातात्विक धरोहरों की सुरक्षा बहुत आवश्यक है।
डाॅ. पीसी लाल यादव ‘
‘साहित्य कुटीर‘‘ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव (छ.ग.) मो. नं. 9424113122
छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस
July 22, 2026
राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
फाग का लोकरंग
February 27, 2026
हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ी संस्कृति में खेलों की जीवंत परंपरा
July 24, 2025
लोक परंपरा में नारी शक्ति का उत्सव : तीजा-तिहार
July 22, 2025
आस्था और विश्वास का केन्द्र : नर्मदा
July 02, 2025
जनजातीय अनुष्ठान : गौरी-गौरा पूजा
April 30, 2025
छत्तीसगढ़ी फाग का लोकरंग
March 25, 2024
कुदरत का नजारा, धाँस की जलधारा
December 05, 2023
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में नदियों का महत्व
October 13, 2023
नरोधी नर्मदा जहाँ झिरिया से बुलबुलों में निकलता है जल
August 05, 2023
रमणीय बुजबुजी एवं नथेला दाई
July 15, 2023
प्रदक्षिणा की संस्कृति : राजिम की पंचकोशी यात्रा
June 15, 2023
लोक संस्कृति का जीवन सरिताएं
June 05, 2023
परम्परा के संवाहक भ्रमणशील कथा गायक : बसदेवा
May 15, 2023
बकरकट्टा के बैगा और उनका देवलोक
May 08, 2023
कोल जनजाति का देवलोक
May 01, 2023
छत्तीसगढ़ का लोक पर्व : तीजा तिहार
August 30, 2022
मोटियारी घाट की बंजारी माता : नवरात्रि विशेष
October 09, 2021
छत्तीसगढ़ का पर्यटन स्थल : बैताल रानी घाट
September 01, 2021
चोड़रापाट के डोंगेश्वर महादेव : सावन विशेष
August 11, 2021
छत्तीसगढ़ का हरेली त्यौहार एवं लोक प्रचलित खेलों की परम्परा
August 08, 2021
जानो गाँव के प्रस्तर शिल्पकार
July 14, 2021
छत्तीसगढ़ी लोक में रचा बसा रथदूज का त्यौहार
July 12, 2021
लोक जीवन की शक्ति, लोक पर्व अक्ति
May 14, 2021
पंडवानी के सूत्रधार श्रीकृष्ण
April 26, 2021
कुँवर अछरिया की लोक गाथा एवं पुरातात्विक महत्व
April 09, 2021
छत्तीसगढ़ी बालमन की मनोरंजक तुकबंदियाँ
April 05, 2021
छत्तीसगढ़ के लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ
April 01, 2021
दे दे बुलौआ राधे को नगर में : होली फाग गीतों के संग
March 27, 2021
लोक का सांस्कृतिक उत्सव: मड़ई
February 10, 2021
छत्तीसगढ़ी लोक शिल्प : कारीगरी
February 03, 2021
छेरिक छेरा छेर बरकतीन छेरछेरा : लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी
January 28, 2021
प्राचीन इतिहास की साक्षी घटियारी
January 16, 2021
प्राकृतिक हरितिमा और भौगोलिक सौंदर्य का अतुलनीय संगम : कुआँ धाँस
December 08, 2020
अन्न बहन-बेटी तथा मां के प्रति सम्मान का लोकपर्व पोला
August 18, 2020
लोक आस्था का दर्पण : आठे कन्हैया
August 11, 2020
प्रकृति-प्रेम का प्रतीक : भोजली
August 04, 2020
छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार और खेल की लोक परम्परा
July 20, 2020
प्रकृति का अजूबा मंडीप खोल : छत्तीसगढ़
June 03, 2020
सुरही नदी के तीर देऊर भाना के पुरातात्विक अवशेष
March 23, 2020
छत्तीसगढ़ का लोक साहित्य एवं वाचिक परम्परा
March 19, 2020
गंडई का शिवालय जहाँ पाषाण बोलते हैं
March 12, 2020
संघर्ष, साधना और विजय: निराला की कालजयी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’
October 17, 2026
शारदीय नवरात्रि: छत्तीसगढ़ के सोनपैरी और लचकेरा ग्राम की लोकपरम्पराएँ
October 17, 2026
छत्तीसगढ़ में शाक्त परंपरा: वैदिक और लोक-आस्था का संगम
October 17, 2026
चौहान सम्राटों की इष्टदेवी: महाशक्ति चामुण्डा
October 16, 2026
जनजातीय युवती वल्ली और भगवान कार्तिकेय का विवाह
October 16, 2026
शत्रु पर विजय का वरदान प्राप्त होता है बगुलामुखी देवी मन्दिर
October 15, 2026
विज्ञान, मानवीय संवेदना एवं राष्ट्र के प्रेरणापुंज - डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
October 15, 2026
भील जनजाति की लोकआस्था में रायकुंडा की महिषासुरमर्दिनी
October 15, 2026
सप्तमातृका: छत्तीसगढ़ और बस्तर की शक्ति परम्परा
October 15, 2026
हाड़ौती अंचल के प्रमुख देवी मन्दिर
October 14, 2026
प्रतियोगी परीक्षा की विफलता से राष्ट्रपति पद तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की जीवन यात्रा
October 14, 2026
डंगचघिन दाई : दारिका नटनी की समाधि से लोकदेवी तक
October 13, 2026
राजा विक्रमादित्य की आराध्या: हरसिद्धी देवी
October 12, 2026
शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र
October 11, 2026
सर्वपितृ अमावस्या: तर्पण और श्राद्ध का महात्म्य
October 10, 2026
भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
पितृपक्ष: लोकजीवन में पुरखों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व
October 09, 2026
भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता
October 08, 2026
बैगा समुदाय में बच्चों के खेल
October 07, 2026
सौम्यता: भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव
October 06, 2026
संघर्ष, साधना और विजय: निराला की कालजयी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’
October 17, 2026
शारदीय नवरात्रि: छत्तीसगढ़ के सोनपैरी और लचकेरा ग्राम की लोकपरम्पराएँ
October 17, 2026
छत्तीसगढ़ में शाक्त परंपरा: वैदिक और लोक-आस्था का संगम
October 17, 2026
चौहान सम्राटों की इष्टदेवी: महाशक्ति चामुण्डा
October 16, 2026
जनजातीय युवती वल्ली और भगवान कार्तिकेय का विवाह
October 16, 2026
शत्रु पर विजय का वरदान प्राप्त होता है बगुलामुखी देवी मन्दिर
October 15, 2026
विज्ञान, मानवीय संवेदना एवं राष्ट्र के प्रेरणापुंज - डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
October 15, 2026
भील जनजाति की लोकआस्था में रायकुंडा की महिषासुरमर्दिनी
October 15, 2026
सप्तमातृका: छत्तीसगढ़ और बस्तर की शक्ति परम्परा
October 15, 2026
हाड़ौती अंचल के प्रमुख देवी मन्दिर
October 14, 2026
प्रतियोगी परीक्षा की विफलता से राष्ट्रपति पद तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की जीवन यात्रा
October 14, 2026
डंगचघिन दाई : दारिका नटनी की समाधि से लोकदेवी तक
October 13, 2026
राजा विक्रमादित्य की आराध्या: हरसिद्धी देवी
October 12, 2026
शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र
October 11, 2026
सर्वपितृ अमावस्या: तर्पण और श्राद्ध का महात्म्य
October 10, 2026
भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
पितृपक्ष: लोकजीवन में पुरखों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व
October 09, 2026
भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता
October 08, 2026
बैगा समुदाय में बच्चों के खेल
October 07, 2026
सौम्यता: भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव
October 06, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
छत्तीसगढ़ के पारम्परिक व्यंजन
September 20, 2026