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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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गणगौर: शिवशक्ति के एकात्म तत्व का उत्सव

गणगौर: शिवशक्ति के एकात्म तत्व का उत्सव

शिव और शक्ति के एकात्म स्वरूप का उत्सव गणगौर महिलाओं और अविवाहित कन्याओं द्वारा प्रेम, समर्पण और त्याग के भाव के साथ मनाया जाता है। 18 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के अराध्य हैं ईसर देव (शिव) और गौर माता (पार्वती) । यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एकात्म चेतना, सामाजिक एकजुटता और आत्मिक शुद्धि का भी प्रतीक है।

प्रेम, श्रद्धा, समर्पण और त्याग भारत के सभी तीज-त्योहारों और अनुष्ठानों के केंद्र में यही भाव प्रधान रूप से विद्यमान रहते हैं। संभवतः इसी कारण मनुष्य का जीवन भी तभी सार्थक माना जाता है, जब उसकी जीवन-यात्रा में इन सभी भावों का समावेश हो। भारतीय दर्शन में मानव की देह से अधिक उसकी चेतना को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। इसी परिपूर्णता को प्रतिबिंबित करने वाले अनेक पर्वों में से एक है गणगौर, जो “गण” (शिव) और “गौर” (पार्वती) अर्थात शिव-शक्ति के एकात्म स्वरूप की स्मृति कराता है।

गणगौर : शिव और शक्ति के अद्वैतवाद का प्रतीक
गणगौर : शिव और शक्ति के अद्वैतवाद का प्रतीक 

गणगौर एक ऐसा त्यौहार है, जिसमें महिलाएँ और अविवाहित कन्याएँ अपने त्याग, समर्पण और प्रेम का उत्सव मनाती हैं। भारत में श्रुति परंपरा का एक समृद्ध इतिहास रहा है, अतः गणगौर का उल्लेख भी लोककथाओं और मौखिक परंपराओं में मिलता है। कथा के अनुसार, जब शिव और पार्वती का मिलन पूर्णता को प्राप्त हुआ, तो वही दिव्य क्षण ‘गणगौर’ के रूप में पृथ्वी पर अभिव्यक्त हुआ। इस मिलन को साक्षी मानकर विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु के लिए तथा अविवाहित कन्याएँ मनोवांछित वर की प्राप्ति और जीवन में प्रेम, त्याग व समर्पण के भावों को आत्मसात करने हेतु यह व्रत करती हैं।

यह 18 दिवसीय पर्व चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक मनाया जाता है। यद्यपि गणगौर मुख्यतः राजस्थान और मध्यप्रदेश में प्रचलित है, किंतु भारत की सांस्कृतिक विशेषता यह है कि किसी भी उत्सव की झलक विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिल ही जाती है। इसी कारण, यह पर्व देश के अनेक भागों में विभिन्न रूपों में मनाया जाता है।इस पर्व में भगवान शिव को ‘ईसर देव’ कहा जाता है।

ईसर देव और गौर माता
ईसर देव और गौर माता

होली के दूसरे दिन से लेकर चैत्र शुक्ल तृतीया तक प्रतिदिन ईसर देव (शिव) और गौर माता (पार्वती) की पूजा की जाती है। कहीं काष्ठ से तो कहीं मिट्टी से उनकी प्रतिमाएँ बनाकर श्रद्धापूर्वक पूजन किया जाता है। अंतिम दिन विसर्जन के समय निकलने वाली झांकियाँ और जुलूस अत्यंत आकर्षक होते हैं। यह दृश्य छत्तीसगढ़ में दीपावली के अवसर पर मनाए जाने वाले ‘गौरा-गौरी’ उत्सव की स्मृति भी ताजा कर देता है।

गौरा-गौरी उत्सव (छत्तीसगढ़ )
गौरा-गौरी उत्सव (छत्तीसगढ़ )

धार्मिक दृष्टि से इसकी कथा हरतालिका तीज से मिलती-जुलती है, जो भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। व्रत, पार्थिव मूर्ति निर्माण और विसर्जन की परंपराएँ दोनों में समान हैं। इस संदर्भ का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है कि भारत में भौगोलिक विविधता अवश्य है, किंतु सांस्कृतिक चेतना में एकात्मता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यही तत्व भारत को एक सूत्र में बाँधता है और विश्व को भी आश्चर्यचकित करता है।

गणगौर विसर्जन
गणगौर विसर्जन 

दार्शनिक दृष्टि से ‘शिव’ को निराकार, अनंत और चैतन्य का प्रतीक माना गया है, जबकि ‘शक्ति’ को साकार, सृजनशील और जीवनदायिनी रूप में देखा जाता है। गणगौर में इन दोनों का संगम अद्वैत की भावना को प्रकट करता है- जहाँ ‘गण’ और ‘गौर’ मिलकर एक ही साक्षात् स्वरूप का बोध कराते हैं। इस प्रकार यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण का माध्यम भी है, जो मनुष्य के भीतर स्थित द्वैत को समरसता में परिवर्तित करता है।

डिजिटल युग में तकनीकी प्रगति ने परंपराओं को नए स्वरूप में प्रस्तुत किया है। सोशल मीडिया पर ‘#गणगौर’ जैसे टैग के माध्यम से युवा कलाकार कागज-कला, डिजिटल पेंटिंग और त्रि-आयामी मॉडलिंग द्वारा ईसर देव और गौर माता को अभिव्यक्त कर रहे हैं। इससे इस प्राचीन परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में सहायता मिल रही है।

 

प्रत्येक दिन की पूजा में भजन, कीर्तन और आरती का विशेष महत्व होता है। इन गीतों में शिव-पार्वती के प्रेम का वर्णन होता है, जिससे श्रद्धालु अपने हृदय में उसी पवित्र भाव को जागृत कर पाते हैं।

दैनिक आरती और भजन का होता है विशेष महत्त्व
दैनिक आरती और भजन का होता है विशेष महत्त्व

गणगौर के अवसर पर महिलाएँ और अविवाहित कन्याएँ एकत्रित होकर समर्पण की भावना को आत्मसात करती हैं। ऐसे उत्सव सामाजिक एकता को सुदृढ़ करते हैं। उपवास, ध्यान और भजन-कीर्तन के माध्यम से मानसिक शांति प्राप्त होती है और सात्विक जीवन शैली का महत्व समझ में आता है। उपवास के दौरान किया गया त्याग केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का भी संकेत देता है।

इस प्रकार गणगौर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचेतना के जागरण का माध्यम है, जो हमें अपने भीतर स्थित ‘गण’ और ‘गौर’ को पहचानने की प्रेरणा देता है और जीवन को उच्चतर मानवीय मूल्यों की ओर अग्रसर करता है।

राजस्थान में एक प्रसिद्ध कहावत है- ‘तीज तींवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर’, जिसका अर्थ है कि सावन की तीज से त्योहारों का क्रम आरंभ होता है और गणगौर के विसर्जन के साथ ही त्योहारों में एक विराम आ जाता है।

इस प्रकार यह पर्व न केवल ऋतुचक्र के परिवर्तन का संकेत देता है, बल्कि भारतीय परंपराओं में निहित वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टि को भी उजागर करता है।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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