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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा का पर्व

सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा का पर्व


प्रस्तुत लेख में साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी जी ने इस पर्व के माध्यम से सरगुजा की लोक संस्कृति और परम्पराओं का बहुत ही सजीव व मार्मिक चित्रण किया है। यह लेख जल संरक्षण और प्रकृति प्रेम का गहरा सन्देश देता है। एक उत्कृष्ट और मानक भाषा में सम्पादित यह लेख पाठकों को अपनी  संस्कृति से जोड़ने का एक प्रयास है।


भारतवर्ष में गंगा गोदावरी यमुना सरस्वती और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों को सदैव जीवनदायिनी मानकर पूजा जाता है। इन सभी पावन नदियों में देव नदी गंगा का स्थान भारतीय जनमानस में सर्वोपरि है। इसी धार्मिक आस्था और लोक संस्कृति का अनूठा संगम गंगा दशहरा के पावन अवसर पर सरगुजा अंचल में देखने को मिलता है। यहाँ पारम्परिक श्रद्धा और उल्लास के साथ यह पर्व तथा गंगा दशहरा मेला आयोजित किया जाता है। हमारे देश में इन नदियों को केवल पानी का साधन नहीं माना जाता है। इन्हें जीवन देने वाली प्राणदायिनी के रूप में सम्मान प्राप्त है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में गंगा मैया को अपने ही गाँव के तालाब में उतार लेने की एक बेहद खूबसूरत परम्परा निभाई जाती है। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को यहाँ मनाया जाने वाला गंगा दशहरा (दसराहा) एक सामान्य त्योहार मात्र नहीं है। यह मूल रूप से जल संरक्षण लोक संस्कृति मनोरन्जन और मानवीय संवेदनाओं का एक अद्भुत उत्सव है।


गंगा दशहरा का अनुष्ठान संपन्न करने हेतु एकत्रित हुआ महिलाओं का समूह, सरगुजा 

भगीरथ की तपस्या और प्रकृति का पावन उत्सव
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की अस्थियों के उद्धार के लिए बहुत कठोर तपस्या की थी। इस तपस्या के बल पर उन्होंने देवी गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया था। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुए इसी पावन अवतरण की मधुर स्मृति में गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है।

जलाशय ही गंगा और कमल से गहरा नाता
सरगुजा वासियों की यह अटूट आस्था है कि गंगा दशहरे के दिन मैया दूर हिमालय से आकर उनके गाँव के उस जलाशय में विराजती हैं जहाँ पुरइन यानी कमल के पत्ते खिले होते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि गंगा जी बहुत दूर हैं इसलिए वे अपने गाँव के तालाब को ही गंगा के समान मानकर पूजते हैं। इसी से वे पुण्य भी कमाते हैं। यह यहाँ के निवासियों का एक बहुत अटूट विश्वास है।

सरगुजा गंगा दशहरा पूजा
सरगुजा का गंगा दशहरा पूजा

इस पवित्र दिन पर साल भर के शुभ कार्यों के प्रतीक पूरे विधि विधान के साथ तालाब में विसर्जित किए जाते हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में सेराना कहा जाता है। इन प्रतीकों में विवाह का मौर कंगन और कलश मुख्य रूप से शामिल होते हैं। बच्चे के जन्म के समय की नाल और छठी के बाल भी गाँव के बैगा अथवा पुरोहित की मौजूदगी में विसर्जित किए जाते हैं। बच्चे की नाल को विशेष रूप से कमल की जड़ के नीचे गाड़ा जाता है। यह अनुष्ठान जल और जीवन के गहरे अन्तर्सम्बन्ध को बहुत सुन्दरता से दर्शाता है।

कठपुतली विवाह से बच्चों को संस्कारों की शिक्षा
इस त्योहार का एक बहुत ही अनोखा और कौतुक जगाने वाला हिस्सा कठपुतली विवाह है। प्राचीन मनोरन्जन की यह विधा यहाँ की कुँवारी लड़कियों के लिए अपनी परम्परा को सीखने का एक बहुत सशक्त माध्यम है।

कठपुतली विवाह
लकड़ी से बने गुड्डा गुड्डी का विवाह

लकड़ी से बने गुड्डा गुड्डी का यह विवाह पूरे 3 दिनों तक चलता है। मंडप गाड़ने से लेकर विदाई तक विवाह की हर रस्म बड़े बुजुर्गों की देखरेख में उसी प्रकार निभाई जाती है जैसे किसी वास्तविक विवाह में होता है। गाँव की लड़कियाँ दुल्हन की माँ और लड़के दूल्हे के पिता की भूमिका निभाते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को मनोरन्जन के साथ अपनी संस्कृति और परम्पराओं से जोड़ना है। दशहरे के दिन इन कठपुतली दूल्हा दुल्हन को जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है।

दान पुण्य और सामाजिक समरसता की परम्परा
सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा मनाने का ढंग बहुत खास है। इस दिन यहाँ दान पुण्य को विशेष महत्त्व दिया जाता है। मेले और विसर्जन के लिए निकलने से पूर्व ग्रामीण अपने सगे सम्बन्धियों को आदरपूर्वक घर पर आमन्त्रित करते हैं। अपनी परम्परा के अनुसार अपनों को तेल कपड़े रोटी और यथाशक्ति नकद राशि दान स्वरूप भेंट की जाती है। इसके उपरान्त उन्हें सप्रेम दशहरा मेला घूमने के लिए प्रेरित किया जाता है। यह परम्परा आपसी प्रेम और सामाजिक समरसता को अत्यधिक मजबूती प्रदान करती है।

पान की लाली और दसराहा गीतों की सुरीली जुगलबन्दी
साहित्यकार अजय चतुर्वेदी बताते हैं कि गंगा दशहरा के अवसर पर सरगुजा अंचल में 5 दिनों का भव्य मेला लगता है। इस मेले के प्रमुख आकर्षण पान के ठेले होते हैं। इस दिन पान खाने का एक विशेष महत्त्व माना गया है। युवक युवतियाँ हाथों में रंग बिरंगे छाते ताने और मुँह में पान दबाए दसराहा गीत गाते हैं। इन गीतों को स्थानीय स्तर पर धन्धा या उधुवा गीत भी कहा जाता है। गीतों की गूँज से मेले का माहौल पूरी तरह जीवन्त हो उठता है।

इन गीतों में सवाल जवाब और प्रेम की नोंक झोंक देखने को मिलती है। इसकी बानगी इस प्रकार है:

लड़का:
पान ला मुह ला करे लाल,
बेसी माया ला झिन करबे,
एक दिन हो जाही जीव कर काल।
चला चली दसराहा मेला देखे ला।।

लड़की:
जरइया ला तय जरे-मरे दे,
तेर मोर प्रीत ला आगू बढ़े दे।
चल चली दसराहा मेला देखे ला।।

नदी और जल संरक्षण का पावन सन्देश
गंगा दशहरा का यह पर्व सरगुजा अंचल के ग्रामीणों की प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को भलीभाँति दिखाता है। इस दिन से दसों दिशाओं में हरियाली छाने लगती है और उल्लास के साथ बारिश का स्वागत किया जाता है। पानी को पूजने अपनी परम्पराओं को सहेजने और आपसी भाईचारे को बढ़ाने का यह सरगुजिहा अन्दाज वाक़ई बेमिसाल है। यह पर्यावरण संरक्षण का एक बहुत बड़ा सन्देश देता है। अन्ततः यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि गंगा दशहरा मुख्य रूप से मेल जोल भाईचारा जल संरक्षण लोक संस्कृति की रक्षा और मनोरन्जन का पवित्र त्योहार है।

लेख:
श्री अजय कुमार चतुर्वेदी
शिक्षक एवं वरिष्ठ साहित्यकार
सरगुजा, छत्तीसगढ़

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