भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल अष्टमी | रविवार
नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा | योग: सुकर्मा | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

भारतीय वाङ्मय में नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं हैं, अपितु वे चेतना की संवाहक हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा का पर्व इसी कृतज्ञता का राष्ट्रीय उत्सव है। विदुषी लेखिका पुष्पा शर्मा ने अपने इस शोधपरक आलेख में पुरावृत्त, आयुर्वेद और लोक-परम्परा के साक्ष्यों से देवनदी की महत्ता को प्रतिपादित किया है। सिन्धु घाटी से लेकर आधुनिक काल तक भारत का इतिहास इस पुण्य सलिला के तटों पर ही आकार लेता रहा है। 'दक्षिण कोसल टुडे' अपने सुधि पाठकों के लिए तीर्थ जननी गंगा के वैज्ञानिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पक्षों को उद्घाटित करता हुआ यह विशिष्ट सम्पादकीय लेख प्रस्तुत कर रहा है।

काशी (वाराणसी) के दशाश्वमेध घाट की 'भव्य गंगा आरती'
भारतीय सनातन संस्कृति में प्रकृति के विविध रूपों के श्रद्धापूर्वक पूजन की पावन परम्परा अति प्राचीन रही है। सिन्धु घाटी की प्राचीन सभ्यता के गहन पुरातात्त्विक अध्ययन से यह सम्यक रूप से ज्ञात होता है कि तत्कालीन मानव समाज में पशु-पूजा, वृक्ष-पूजा, अग्नि-पूजा, सूर्य-पूजा एवं जल-पूजा का विशेष शास्त्रीय विधान पूर्णतः स्थापित था।
प्रसिद्ध पुरावृत्तवेत्ता जॉन मार्शल के प्रामाणिक मत के अनुसार सिन्धु सभ्यता के प्रमुख स्थल मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार का उपयोग अनिवार्यतः किसी सार्वजनिक अथवा विशिष्ट धार्मिक आयोजन के लिए ही होता रहा होगा। हमारी अति प्राचीन वैदिक संस्कृति में भी पञ्चतत्वों के श्रद्धापूर्वक पूजन का स्पष्ट और विस्तृत उल्लेख पग-पग पर प्राप्त होता है। प्राचीन वैदिक संहिताओं में कुल 31 पवित्र नदियों का पावन नामोल्लेख प्राप्त होता है, जिनमें से 25 नदियों का गौरवमयी वर्णन अकेले ऋग्वेद की ऋचाओं में समाहित है। ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध नदी सूक्त के भीतर 21 पवित्र नदियों की महिमा का गान किया गया है।
ऋग्वेद 10.75 (श्लोक 5,6)
हिन्दू धर्म के सुदृढ़ वैचारिक मूलाधारों में पूजनीय गौमाता, अमर ग्रन्थ गीता, पावन गायत्री मन्त्र, जगदाधार भगवान गोविन्द एवं देवनदी गंगा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। सम्पूर्ण विश्व के मानचित्र पर भारतवर्ष को इसी अनुपम नाम से विशिष्ट पहचान मिली है कि यह वह पावन देवभूमि है जिस देश में गंगा बहती है। वैज्ञानिक, आर्थिक, धार्मिक एवं भौगोलिक दृष्टिकोण से ऐसे अनेक कारण उपस्थित हैं, जिन्होंने इस देवनदी को सम्पूर्ण चराचर जगत में अद्वितीय और अतुलनीय महत्त्व प्रदान किया है।
ऐसी मान्यता है कि सनातन संस्कृति के कई प्राचीन आरण्यक ग्रन्थों की रचना इसी पवित्र गंगा के शान्त तटों पर बैठकर की गई। हमारे अनेक पुराणों और धर्म ग्रन्थों में इक्ष्वाकु वंशीय राजा सगर के वंशजों के उद्धार के लिए परम तपस्वी राजा भगीरथ द्वारा किए गए घोर तप से लेकर माँ गंगा के पृथ्वी पर पावन अवतरण का जो विस्तृत व्याख्यान मिलता है, उससे हम सभी भली-भाँति परिचित हैं। समस्त पुराणों में इस पुण्य सलिला को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों की परम प्रिय नदी बतलाया गया है।

शिव की जटाओं से निकलती गंगा
वैष्णव मत के अनुयायी ऐसा दृढ़तापूर्वक मानते हैं कि यह देवनदी साक्षात भगवान विष्णु के वाम चरणकमल से नि:सृत हुई है। हिमशिखर पर स्थित गंगोत्री हिमनद के ऊपर अवस्थित दीर्घ पर्वतमाला को आज भी लोक में नारायण पर्वत के नाम से जाना जाता है, जहाँ से कल-कल ध्वनि करती हुई यह पुण्य सलिला भगवान शिव की जटाओं में समाहित हुई। भारत की पवित्र परम्परा ने इस मोक्षदायिनी नदी को साक्षात तीर्थ चेतना का मूर्तिमान प्रतीक बना दिया है।
ऐसे प्राचीन नगर जो इस मोक्षगामी परिक्षेत्र के तटों पर बसे हैं, उनके लिए तो यह साक्षात जीवन-प्राण हैं, जो भूभाग इससे मीलों दूर स्थित हैं, उनके भी प्राणों में माँ गंगा के प्रति असीम आदर, अनन्य प्रेम एवं गहरी श्रद्धा रची-बसी है। हजारों फुट की गगनचुम्बी ऊँचाई पर बने हिममण्डित गंगोत्री मन्दिर से लेकर देवप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार, कनखल, गढ़मुक्तेश्वर, सोरो, प्रयाग, काशी एवं गंगासागर तक के अनगिनत तीर्थों को इसी एकमात्र देवनदी ने अपनी अलौकिक आध्यात्मिक आभा से महिमामण्डित किया है।

अलकनन्दा और भागीरथी नदी का संगम: देव प्रयाग
संसार के विराट धार्मिक मेलों में सर्वोपरि कुम्भ मेलों का आयोजन जिन 4 पावन तीर्थ स्थलों पर होता है, उनमें से प्रयाग और हरिद्वार दो महान तीर्थ इसी पवित्र गंगातट पर ही अवस्थित हैं। मकरसंक्रान्ति के पावन पर्व पर आयोजित होने वाला गंगासागर का सुप्रसिद्ध मेला, कार्तिक मास का पवित्र स्नान, माघ स्नान एवं वैशाख स्नान, इन सभी विशिष्ट अवसरों का अपना एक गहरा आध्यात्मिक महत्त्व और विधान माना गया है।

गंगा सागर का प्रसिद्ध मेला- पश्चिम बंगाल
सनातन संस्कृति के प्रत्येक धार्मिक संस्कार और अनुष्ठान में इस पवित्र जल का विशिष्ट उपयोग अनिवार्य है। महर्षि चरक द्वारा रचित आयुर्वेद के सुप्रसिद्ध ग्रन्थों में यह स्पष्ट रूप से वर्णित मिलता है कि पवित्र हिमालय पर्वत से निकलने वाला जल मानव स्वास्थ्य के लिए परम हितकारी और पथ्य होता है।
भण्डारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट पूना में सुरक्षित 18वीं शती के एक दुर्लभ आयुर्वेद ग्रन्थ 'भोजनकुतूहल' में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि भागीरथी गंगा का जल पूर्णतः श्वेत, स्वादु, स्वच्छ, अत्यन्त रुचिकर, भोजन पकाने के लिए सर्वोत्तम, पाचनशक्ति को तीव्र करने वाला, समस्त पापों का शमन करने वाला, तृषा को शान्त करने वाला, मानसिक मोह को नष्ट करने वाला तथा क्षुधा और बुद्धि में तीव्र वृद्धि करने वाला होता है।

हिमालय की दिव्य औषधियों के बीच प्रवाहित होती गंगा
इस सन्दर्भ में ग्रन्थकार ने लिखा है कि गंगाजल शीतल, स्वादिष्ट, स्वच्छ, परम पाचक और पापों को हरने वाला है। यह प्यास और मोह का नाश करता है तथा जठराग्नि और बुद्धि को प्रखर करता है। सुप्रसिद्ध आयुर्वेद मनीषी चक्रपाणि ने भी अपने लेखों में स्वीकारा है कि हिमालय की दिव्य औषधियों के मध्य से प्रवाहित होने के कारण गंगा का जल अनेक दुर्लभ औषधीय गुणों से युक्त रहता है।
भारत भ्रमण पर आए विदेशी यात्री टैवर्नियर ने भी गंगा जल के स्वास्थ्य सम्बन्धी अद्भुत गुणों की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की थी। उसने अपने यात्रा विवरण में स्पष्ट लिखा कि भारत के बड़े उत्सवों और भोज आयोजनों के उपरान्त गणमान्य अतिथियों को आदरपूर्वक गंगाजल परोसने का एक अनूठा सामाजिक लोकाचार प्रचलित था। सुप्रसिद्ध कवि अब्दुरहीम खानखाना ने भी संस्कृत भाषा में 8 अनुपम पद्यों वाले 'गंगाष्टक' की रचना की, जिसमें उन्होंने देवी गंगा के प्रति अपनी गहरी व्यक्तिगत श्रद्धा और समर्पण भाव को प्रकट किया है।

पूजन में गंगा जल का विशेष स्थान
प्राचीन काल में प्रकृति के सूक्ष्म सन्तुलन का व्यावहारिक ज्ञान हमारे पूर्वजों और तत्कालीन मानवीय समाज को भली-भाँति था। इसी पावन कारण से वर्तमान समय में यह अमूल्य प्राकृतिक धरोहर हमें शुद्ध रूप में प्राप्त हो सकी है। वर्तमान समय में दृढ़ सकारात्मक सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से ही इस पुण्य सलिला को अविरल, अविराम और प्रदूषण मुक्त कल-कल प्रवाहित रखा जा सकता है, जिससे हम इस अमूल्य धरोहर को अपनी आने वाली भावी पीढ़ियों को सुरक्षित सौंप सकें। माँ गंगा की लहरें सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
गंगा दशहरा का यह पावन पर्व हमें अपनी इस जीवनदायिनी नदी के प्रति हमारे कर्तव्यों का स्मरण कराता है। गंगा केवल एक जलधारा नहीं, वरन भारत की अजस्र बहती सभ्यता की कहानी है। पुरावृत्त से लेकर आधुनिक विज्ञान तक इसके जल की दिव्यता अकाट्य सिद्ध हो चुकी है।

गंगा दशहरा का पवन पर्व
आज आवश्यकता इस सत्य को समझने की है कि प्रकृति का संरक्षण ही मानव जाति का संरक्षण है। यदि हम अपनी इस राष्ट्रीय धरोहर को अविरल और निर्मल बनाए रखने में सफल होते हैं, तभी हमारी तीर्थ परम्पराएँ और यह सनातन संस्कृति जीवन्त रह पाएगी। आइए, इस पावन तिथि पर हम सब मिलकर पुण्य सलिला गंगा और अन्य नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने का दृढ़ सङ्कल्प लें, ताकि इसकी लहरें युगों-युगों तक भारत भूमि को सींचती रहें। जय माँ हर-हर गंगे।
-श्रीमती पुष्पा शर्मा
(लेखिका समर्पित शिक्षिका व इतिहास की शोधार्थी हैं। उनका प्रधान अदान क्षेत्रीय इतिहास, संस्कृति और पर्यटन के विषयों पर केन्द्रित विमर्शों में है।)
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