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गाँधी जी का छत्तीसगढ़ आगमन

गाँधी जी का छत्तीसगढ़ आगमन

दुनिया के इतिहास में मोहनदास करमचंद गाँधी, जिन्हें हम महात्मा गाँधी के रूप में जानते एवं पहचानते है, एक अमिट नाम है। भारत में अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों में महात्मा गाँधी ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने पूरे देश के भीतर एक राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक चेतना का संचार किया, उनके इस प्रयास से छत्तीसगढ़ का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा।

1915 में मोहनदास करमचंद गाँधी दक्षिण अफ्रीका से सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर भारत लौटे थे. शुरूआती दौर में वे आजादी के सक्रिय संघर्ष में हिस्सा लेने उत्सुक नहीं थे। गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर जब से पूरे देश की यात्रा कर लौटे तब देश की जनता की पीड़ा उन्होंने समझी और अंग्रेजों की गुलामी का दुष्प्रभाव उनको समझ में आया। छत्तीसगढ़ मध्य प्रांत का एक हिस्सा था 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्थ वर्षों में इस क्षेत्र में राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना जागृत हुई।

माधवराव सप्रे, वामनराव लाखे जैसे नेताओं ने कांग्रेस पार्टी के अधिवेशनों में हिस्सा लेने और वापस आकर अपने-अपने क्षेत्रों में ब्रिटिश सरकार विरोधी जागरण शुरू कर दिया। पं. सुन्दरलाल शर्मा अछूत उद्धार कार्यक्रम में सक्रिय थे, राय बहादुर हीरालाल, माधव राव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, जगप्राथ भानु, ठाकुर जगमोहन सिंह जैसे साहित्यकार हिंदी भाषा की सेवा में लगे हुए थे। 1920 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के निधन के बाद महात्मा गाँधी कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे। छत्तीसगढ़ में भी महात्मा गांधी का प्रभाव देखने को मिलता है। 

भारत में जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ तब उसके प्रभाव में छत्तीसगढ़ के धमतरी क्षेत्र में किसानों ने अंग्रेजों द्वारा नहर के पानी पर लगाये गये टैक्स के विरोध में कंडेल सत्याग्रह शुरू किया था। पं. सुन्दरलाल शर्मा, नारायण राव मेघावाले जैसे नेताओं ने सत्याग्रह का नेतृत्व किया। इसी समय दिसंबर 1920 में कांग्रेस का अधिवेशन नागपुर में होना था, स्थिति को भांपते हुए पं. सुन्दरलाल शर्मा कलकत्ता गये, क्योंकि मोहनदास करमचंद गाँधी कलकत्ता से नागपुर आने वाले थे, पं. शर्मा ने गाँधी जी को कंडेल सत्याग्रह के संबंध में जानकारी देकर उन्हें अपने साथ रायपुर ले आये। इस समय तक गांधीजी के व्यक्तित्व का प्रभाव अंग्रेजों पर भी हो चुका था।

1917 में कुछ इसी तरह चंपारण में नील किसानों ने आंदोलन किया था उस समय एक नेता राजकुमार शुक्ल महात्मा गांधीजी को कलकत्ता से चंपारण लेकर गए थे। जब अंग्रेजों ने जाना कि गाँधीजी चंपारण के किसानों का समर्थन करने आ रहे है उन्होंने तत्काल इसके निराकरण के लिए एक समिति बना दी और इस तरह चंपारण का किसान आंदोलन सफल हुआ। कुछ ऐसा ही छत्तीसगढ़ के कंडेल सत्याग्रह के मामले में हुआ। अंग्रेजों ने महात्मा गांधी के रायपुर पहुँचने के पहले ही कंडेल सत्याग्रहियो की मांगे मान ली। इस प्रकार मोहनदास करमचंद गाँधी का पहला प्रवास हुआ था। इसे बाद महात्मा गाँधी का दूसरा छत्तीसगढ़ प्रवास 1933 में नवंबर के महीने में हुआ। सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद डॉ. भीमराव आम्बेडकर के साथ गांधी जी ने पूना समझौता किया था, इस समझौते के बाद महात्मा गाँधी ने डॉ. आम्बेडकर को वचन दिया की वे समाज में व्याप्त अछूत की समस्या को खत्म करने जीवन भर प्रयास करेंगे। तब तक महात्मा गाँधी का स्थाई निवास नागपुर मुंबई रेल मार्ग पर स्थित वर्धा के समीप सेवाग्राम बन चुका था।

गाँधी जी ने छुआछूत के खिलाफ समाज में जनमानस तैयार करने के उद्देश्य से देशव्यापी यात्रा प्रारंभ की, यह संयोग था कि उनकी यात्रा छत्तीसगढ़ से प्रारंभ हुई। वे 22 नवंबर को दुर्ग पहुंचे, वहाँ से रायपुर को अपना केन्द्र बनाते हुए 27 नवंबर तक धमतरी, नवापारा राजिम, बलौदाबाजार और बिलासपुर में अनेक सभाएं ली। प्रत्येक सभा में उन्होनें समाज से अछूत जैसी घृणित समस्या से मुक्त करने के लिए प्रत्येक वर्ग के लोगों से आव्हान किया।

गाँधीजी जहां भी जाते उनको देखने हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ जाती। लोग उन्हें देखने, सुनने और पैर छूने के लिए लालायित रहते थे, गाँधीजी भी सहज भाव से लोगों से मिलते और उनकों अपने विचारों से अवगत कराते और प्रेरणा देते।
महात्मा गाँधीजी 1933 के नवंबर माह में 5 दिनों तक लगातार अछूत उद्धार के कार्यों में लगे रहे। उन्होंने पुरानी बस्ती रायपुर स्थित जयतु साव मठ के मन्दिर में हरिजनों का प्रवेश कराया। वे रायपुर के मौदहापारा स्थित सतनामी समाज के मंदिर में भी गये तथा रायपुर के मोती बाग में स्वदेशी मेले का भी उद्घाटन किया था, इस कार्यक्रम में गाँधी को देखने एक लाख लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।

गाँधीजी ने अपनी दूसरी यात्रा के आखिरी दिन रायपुर के राजकुमार कालेज में अध्ययनरत राजकुमारों को अपना भाषण दिया था। इस भाषण में महात्मा गाँधीजी ने राजा और प्रजा के बीच लोक कल्याणकारी संबंध बनाने की शिक्षा दी थी, उन्होंने कहा था कि राजाओं के बच्चे भारतीय भाषा एवं संस्कृति से दूर अंग्रेजों की बुराईयों को अपनाने लगते है, जबकि इंग्लैंड में राजा के बच्चे आम आदमी की तरह जीवन जीते हैं।

हमारे देश में अंग्रेजों की अच्छाई को राजाओं द्वारा नहीं अपनाया जाता जबकि अंग्रेजों की बुराइयों जैसे नशा करना एवं जुआ खेलना को सहज अपना लेते है। गाँधी जी ने इनसे बचने की सीख दी थी, छत्तीसगढ़ का दौरा समाप्त कर गाँधी बालाघाट होते हुए इटारसी चले गये थे।

छत्तीसगढ़ में गांधीजी दो बार आये, पहली बार मोहनदास बनकर दूसरी बार महात्मा बनकर, और इन दोनो ही यात्राओं के दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ के समाज और प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित किया। पं. रविशंकर शुक्ल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, खूबचंद बघेल, घनश्याम सिंह गुप्त, ई. राधेवेन्द्र राव, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जैसे हजारों नेता गाँधी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर आजीवन देश की सेवा में लग गये।

तत्कालीन मध्य एवं बराड़ प्रांत का सर्वाधिक राजनैतिक दृष्टि से जागरूक क्षेत्र बनकर छत्तीसगढ़ उभरा। गाँधीजी के प्रभाव से युवा पीढ़ी बड़ी संख्या में राजनीति मे आई जिसने 1940-42 के स्वतंत्रता आंदोलनों में हिस्सा लिया। यही कारण था कि जब मध्यप्रदेश राज्य की स्थापना हुई उस समय नये राज्य का मुख्यमंत्री, विधानसभा के अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष छत्तीसगढ़ से जुड़े हुए नेता थे।

महात्मा गाँधीजी के महत्वपूर्ण प्रभाव क्षेत्र में छूआछूत जैसी समस्या के समाधान में देखने को मिलता है। हालांकि छत्तीसगढ़ में अछूत उद्धार कार्यक्रम महात्मा गाँधी के प्रयासों से पूर्व पं. सुन्दरलाल शर्मा ने मंदिर प्रवेश आंदोलन की शुरूआत कर दी थी, इसके बाद गाँधीजी का भी प्रभाव था।

छत्तीसगढ़ में भेदभाव की भावना अपेक्षाकृत न्यून रही। गाँधीजी के छत्तीसगढ़ पर महत्वपूर्ण प्रभाव बुनकर सहकारी आंदोलनों में भी देखने को मिलता है। छत्तीसगढ़ में शायद ही कोई क्षेत्र हो जहां हथकरघा से बुने सूती वस्त्रों का निर्माण नहीं होता है। बाकायदा सहकारी समितियों के माध्यम से पूरे प्रदेश एवं देश भर में सूती और सिल्क के वस्त्रों का व्यापार भी होता है।

छत्तीसगढ़ की जीवनशैली में सादगी एवं सरलता सत्य एवं शांतिप्रियता भी गाँधीजी के मतपर आधारित है। महात्मा गाँधीजी वैसे भी भारतीय सनातन सिद्धांत के अग्रदूत थे जो समाज को सदैव प्रगतिशील मार्ग दिखाते हैं। यह विचार वैदिक साहित्यों से गाँधीजी तक अविरल प्रवाहित है और समय के साथ देश और दुनिया में प्रांसगिक बने रहेंगें। 

आलेख
शशांक शर्मा
वरिष्ठ लेखक एवं चितंक
रायपुर छत्तीसगढ़

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