करवाचौथ: परिवार की एकता से विश्वबंधुत्व तक
October 09, 2025
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार
नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी अर्थात् भारत की सामान्यजन चेतना, समष्टिजन चेतना, सर्वजन चेतना और भारत के सामाजिक जीवन की अविच्छिन्न निरन्तरता। यह ठीक है कि गांधी जी एक व्यक्ति थे, किन्तु व्यक्ति का क्या? व्यक्ति तो करोड़ों और अरबों खरबों हैं, पहले भी हुए हैं। फिर गांधी जी पर ही नजर क्यों टिकती है? अनुयायी हों या विरोधी, सभी की चर्चा के केन्द्र में गांधी जी क्यों रहते हैं?

महात्मा गांधी की मूर्ति, विधान सौधा, बेंगलुरु
वास्तव में जब कोई व्यक्ति अपने को सर्वजन चेतना से अभिभूत कर लेता है, जब व्यक्ति-चेतना अथवा अहन्ता-ममता की बर्फ पिघलकर जलधारा बन जाती है, तब व्यक्ति, व्यक्ति नहीं रहता। वह कोटि कोटि जन की अभिव्यक्ति बन जाता है। वास्तव में गांधी जी व्यक्ति नहीं रह गए थे। वे समष्टि चेतना बन गए थे। भारत के लोकजीवन की मूल्य प्रणाली, विश्वास प्रणाली, विचार प्रणाली और अभिव्यक्ति प्रणाली का युगावतार। गांधी जी एक व्यक्ति ही नहीं हैं, एक दर्शन हैं। भारत की जो विचारधाराएँ सहस्राब्दियों से लोकजीवन में प्रवाहित हो रही हैं, उनका परिपाक गांधी जी हैं।
बापू ऐसा मानते थे कि राष्ट्रीय जीवन की समस्त गतिविधियाँ जनोन्मुख हों। बोली और भाषा का जनतन्त्र हो, संस्कृतियों का जनतन्त्र हो और व्यवस्था विशेष से साधारण की ओर गतिशील बने। यदि लोकतन्त्र की आत्मा लोकचेतना है, तो भारत के संविधान की आत्मा है सत्य।
आजादी के आन्दोलन में गांधीजी ने जनता को अपने साथ लिया। सत्य का अहिंसात्मक आग्रह और सविनय अवज्ञा उनके संघर्ष के आधार बने। बापू और जनता के बीच विश्वास का सूत्र था सत्य। यदि हम ‘सत्यमेव जयते’ को संविधान से अलग कर दें, तो संविधान अन्यथा सिद्ध हो जाएगा। सत्याग्रह दर्शन विश्वमानवता को प्रकाश देगा। जो सत्य और अहिंसा की विचार प्रणाली को नहीं समझता, वह भारत को कैसे जान सकेगा?
गांधी व्यक्ति से विचार बन चुके थे, युग बन चुके थे, गांधी युग। प्रेमचन्द और दूसरे साहित्यकार हों या चित्रकार, कलाकार, विचारक और शिक्षाविद, सभी के कृतित्व पर उस युग का प्रभाव हुआ। गांधी को युगावतार के रूप में नमन किया जाता है। वे लोकमानस में आज भी रसे बसे हैं। तभी सोहनलाल द्विवेदी के कंठ से स्वर फूटा था:
चल पड़े जिधर दो डग, मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर;
जिसके सिर पर निज धरा हाथ, उसके सिर रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गये उसी पर कोटि माथ।
हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु! हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
सामान्यजन तत्व उनके व्यक्तित्व में इतनी गहराई तक रमा हुआ था कि वे असामान्य बन गए। उनकी मृत्यु के बाद युग के महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था: आने वाली पीढियां विश्वास ही नहीं कर सकेंगी कि गान्धी नाम का व्यक्ति इस धरती पर उसी प्रकार चलता-फिरता था , जिस प्रकार सामान्य जन चलते फिरते हैं ,उसी तरह बातचीत करता था , जिस प्रकार सामान्यजन बातचीत करते हैं ,उसका व्यक्तित्व और वेशभूषा उसी प्रकार की थी ,जिसप्रकार आम-जनों की होती है ।

महात्मा गांधी और वैज्ञानिक आइंस्टीन
भारत की सामान्य जनता की निष्ठा के सम्बन्ध में महात्मा गांधी ने एक बार यूरोप के एक पत्रकार से बात की। पत्रकार रेवरेंट माट् ने पूछा: श्रीमन् ! सार्वजनिक-जीवन में आपको आशा और निराशा दोनों ही होती होंगी । आपको किस बात से आश्वासन मिला और किस बात से निराशा हुई ?
महात्मा गांधी ने उत्तर दिया: भारत की सामान्य जनता बहुत कष्ट में जीवन व्यतीत कर लेती है किन्तु अहिंसा की वृत्ति को नहीं छोड़ती ! इससे मुझे आश्वासन मिला है । महात्मा गांधी ने कहा कि निराशा की बात यह है कि शिक्षित लोगों के हृदय में दया भाव का स्रोत सूखता जा रहा है, इससे मुझे चिन्ता होती है। 2 अप्रैल 1947 को दिल्ली में एक इंटर एशियन रिलेशंस कान्फ्रेंस हुई थी। इसमें महात्मा गांधी ने जो भाषण दिया, उसमें उसी भारतीय लोकचेतना का स्वर सुनाई देता है। गांधीजी ने कहा: आप सभी दोस्तों ने जो भारत है, उसे वाकई नहीं देखा है। यह कांफ्रेंस भी असल भारत में नहीं हो रही है। दिल्ली, बॉम्बे, मद्रास, कलकत्ता, लाहौर- बड़े शहर होने की वजह से ये सभी पश्चिम से प्रेरित हैं।
उन्होंने एक कहानी सुनाई: एक बार की बात है, फ्रांस के तीन वैज्ञानिक सत्य की खोज में निकले। तीनों एशिया के अलग-अलग हिस्सों में चले गए। इनमें से एक वैज्ञानिक ने भारत में अपनी खोज जारी रखी। वह उस वक्त के तथाकथित शहरों में गया। यह अंग्रेजों और मुगलों के आधिपत्य से पहले की बात है। उसने यहां के कथित ऊंची जाति के लोगों, पुरुषों व महिलाओं को देखा। मगर उसे संतुष्टि नहीं मिली। अंत में थक-हार कर वह एक साधारण-सी कुटिया में जा पहुंचा। वहां उसे उस सत्य के दर्शन हुए, जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी।

बंगाल के एक गाँव का दृश्य: 1920
गांधीजी ने कहा: अगर आप वाकई भारत को देखना चाहते हैं, तो आपकों यहां के गांवों में बसे दलितों के बेहद साधारण-से घरों में आना होगा। यहां ऐसे सात लाख गांव हैं, जिनमें अड़तीस करोड़ लोग रहते हैं। इस भारत को मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है । मैंने भारत की एक छोर से दूसरे छोर तक यात्रा की है। मुरझाई आंखों से मैंने यहां मनुष्यता की दयनीय तस्वीर देखी है। भारत यहीं बसता है। गोबर से सनी इन मामूली झोपड़ियों में मिलते हैं, वे दलित, जिनमें मिलेगा आपको खाटी ज्ञान। लोकतंत्र और निर्धनतम लोगों के जागरण के इस दौर में आप पूरी ताकत से इस संदेश को फैला सकते हैं।
गांधी लोक में रमे और ऐसे रमे कि भारत के लोकमन बन गए। लोक ने गांधी में अपना ही अधिष्ठान किया और इसी अधिष्ठान के सहारे भारतीय लोकतन्त्र के सपने बुने थे। महात्मा गांधी भारत का मूर्तिमान लोकमन हैं। भारत की मूर्तिमान मेधा हैं। सचाई, ईमानदारी, सादगी, समानता, भाईचारा, लोकमंगल और विश्वशान्ति जैसे लोकजीवन के मूल्य महात्माजी के रूप में जीवन्त हो गए थे।
गांधी ने भारत के लोकजीवन का प्रत्यक्ष दर्शन और अनुभव किया था। उन्होंने भारत को जानने और पाने के लिए पैदल यात्राएँ करते हुए लोकमन से तादात्म्य की साधना की और लोकमानस में जगह बनाई। उन्होंने लोक को जगाया, उसके विश्वास को जगाया और उसका विश्वास जीता। लोक ने भी उन्हें विश्वास दिया।
6 जुलाई 1944 को आजाद हिन्द फौज रेडियो से सुभाषचन्द्र बोस ने महात्माजी के नाम एक सन्देश प्रसारित किया था। उसमें उन्होंने महात्माजी कहकर सम्बोधित किया और उन्हें लोकजागरण का प्रतीक बताया। कहा कि भारत और भारत के बाहर रहने वाले भारतीयों की दृष्टि में आप हमारे देश की वर्तमान जागृति के जनक हैं। लोकजागरण ही तो था, जिसके कारण सुभाषचन्द्र बोस ने अपने सन्देश में उनको राष्ट्रपिता कहा।

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस: 1938
भारत के लोकमानस को जितनी गहराई से गांधी ने पहचाना था, भारत के लोकमानस ने उतनी ही गहराई से महात्मा गांधी को स्वीकार कर लिया। इसे हम यों भी कह सकते हैं कि भारत की लोकचेतना महात्मा गांधी के रूप में साकार हो गई। लोकमन की इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति गांधी के रूप में चरितार्थ हुई। सचाई यह है कि भारत के लोकमानस ने ही गांधी को सिरजा था और फिर गांधी के रूप में भारत के लोकमानस ने अपने को ही पा लिया था। आप भले ही यों कहें कि गांधी नए भारत की लोकचेतना हैं।
गांधी लोकजीवन को इतना उद्वेलित नहीं कर पाते, यदि वे स्वयं सामान्यजन न बन गए होते। वे बैरिस्टर थे, लेकिन सामान्यजन के बीच घुलमिल जाने के लिए उन्होंने सिर के बाल हटा दिए, आधी धोती पहन ली और आधे से शरीर ढक लिया। पैरों में चप्पल डाल ली।
सामान्यजन की वह असामान्यता गोलमेज सम्मेलन के दौरान भी दिखाई दी। सम्मेलन असफल हो गया, किन्तु उस दौरान सम्राट पंचम जार्ज ने बकिंघम पैलेस में विशाल भोज दिया। दो हजार मेहमान थे। उनमें राजनयिक, लार्ड तथा भारत के राजा, महाराजा और नवाब थे। वे बड़े ठाट बाट से सजे हुए हीरे और जवाहरातों की नुमाइश कर रहे थे।
उस वैभवशाली समारोह में सभी ने देखा: घुटनों तक धोती बाँधे ,सफेद दुपट्टा डाले बड़े गौरव के साथ एक सामान्य आदमी आ रहा है ।

गोलमेज सम्मेलन के दौरान लैंकाशायर में गांधी जी (सितंबर1931)
सभी की नजर उस धोती वाले पर जा टिकी। थोड़ी देर में पंचम जार्ज आए। उन्होंने चारों ओर देखा और उस सामान्यजन के पास आकर खड़े हो गए। सम्राट कुछ देर तक उन्हें देखते रहे, फिर बोले: आप अफ्रीका में तो हमारे मित्र थे , मैं नहीं समझ पाया कि अब आप हमारे विरुद्ध कैसे हो गये ?
बापू ने उन्हें देखा और मुसका दिए। सम्राट फिर बोले: मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि आपने भारत में गड़बड़ी की और मेरी सरकार के साथ सहयोग नहीं किया तो वहाँ मेरी सेना उपद्रवियों को उड़ा देगी ।
यह बात इतनी धीरे से कही गई थी कि वहाँ खड़ी सरोजिनी नायडू ने ही सुनी। गांधी उस समय तो मुसका दिए, किन्तु जब प्रतिनिधियों की सबसे बड़ी समिति की बैठक हुई तो वे बोले: भारत में मेरे बच्चे ब्रिटिश बमों को केवल पटाखे समझते हैं ।
बापू के समस्त लेखन और सम्पूर्ण वक्तृता में सर्वजन और सामान्यजन का भाव है। गांधी साहित्य का हम जितना अध्ययन करेंगे, यह बात उतने ही व्यापक रूप में स्पष्ट होगी। उन्होंने चरखे को अपने आन्दोलन का केन्द्र क्यों बनाया? वह चरखा भारत के लोकमानस की इतनी गहराई में क्यों उतर गया कि देश के विभिन्न जनपदों में हजारों लोकगीत चरखे से जुड़ गए?

गांधी जी और चरखा का दृश्य
भारत की विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं के लोकगीतों में गांधी मौजूद हैं। गांधी स्वयं लोकगीतों की महिमा समझते थे। देवेन्द्र सत्यार्थी से उन्होंने कहा था: लोकगीतों में धरती गाती है ,पहाड़ गाते हैं ! उन्होंने देवेन्द्र सत्यार्थी को लोकगीतों के संकलन के लिए भारत भ्रमण की प्रेरणा दी थी। गांधी का चिन्तन स्वदेशी पर आधारित था। दरिद्र नारायण या उस अन्तिम व्यक्ति की सुध लेना उनके चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष था। बापू के प्रिय भजन की मूल चेतना भी दायरों का अस्वीकार है: रघुपति राघव राजाराम ,पतित-पावन सीताराम। ईश्वर-अल्ला तेरे नाम .सबको सन्मति दे भगवान !
गांधी स्वयं ही सामान्यजन और समष्टिजन बन गए। उन्होंने चरखे को अपने आन्दोलन का केन्द्र क्यों बनाया और चरखा भारत के लोकमानस में इतनी गहराई में क्यों रच बस गया? भारत के विभिन्न जनपदों के हजारों गीतों में चरखा चलता दिखाई देता है। भारत के हजारों लोकगीतों में महात्मा गांधी उपस्थित हैं।
गांधी स्वयं भी लोकगीतों की महिमा समझते थे। देवेन्द्र सत्यार्थी को उन्होंने लोकगीतों की अभ्यर्थना के लिए भारत भ्रमण की प्रेरणा दी थी। जब देवेन्द्र सत्यार्थी का लोकगीत संग्रह तैयार हो गया तो बोले: लोकगीतों में धरती गाती है ,पहाड़ गाते हैं ।
उस संकलन का नाम बन गया, ‘धरती गाती है’।
मोरे चरखा कै टूटे न तार चरखा चालू रहै
गांधी महतमा दूलहु बने हैं , दुलहिन बनी सरकार , चरखा चालू रहै ।
चन्दन काठ के बना है म्याना ,खादी पड़ी है ओहार ,चरखा चालू रहै ।
सगरे सुराजी बने हैं बराती ,पुलिस बनी है कहार ,चरखा चालू रहै ।
यदि हम महात्मा गांधी के सत्याग्रह दर्शन के सूत्रों को लोकवार्ता, लोककथा और लोकगीतों में देखने का प्रयास करें, तो ऐसे अनेक सूत्र मिल जाएँगे। उदाहरण के लिए सुरही गीत है। कजरीवन से चलकर सुरही नन्दनवन में चरने चली गई। वहाँ ऊँची पूँठरी पर सिंह बैठा था। वह बोला: री गाय ! तैने मेरे द्वारा संरक्षित वन में प्रवेश किया है , अब मै तुझे नहीं छोडूंगा !
सुरही बोली: खिरक रंभावें मेरे बाछरा हो माय !एक बच दो बच तीन बच भरि जांउ ! बचनन की बींधी सुरही ना रहे हो माय ! रे सिंह! खिरक में मेरा छोटा सा बछड़ा रंभा रहा होगा। मैं तुझे वचन देती हूँ, उसे एक बार दूध पिलाकर मैं लौट आऊँगी। तू मुझे खा लेना। सिंह ने सोचा: सुना है कि गाय बडी सरल और सच्ची होती है , परमार्थी होती है । एक बार गाय की परीक्षा ही सही ! गाय खिरक में आई। उसने अपने बछड़े से कहा कि आ वत्स, अन्त में एक बार तू मेरा दूध पी ले, मैं सिंह को लौटने का वचन दे चुकी हूँ, तो लौटना तो है।

सुरही गाय, बछड़े और शेर की लोक कहानी
बछड़ा बोला: बचनन कौ बींधौ दूधा ना पियें हो माय ! आगें आगें बालक बछरे पीछें सुरही गाय !बचनन की बींधी सुरही आई है हो माय ! सिंह ने देखा तो अचरज में डूब गया। सुरही बोली: रे सिंह , अब तू मुझे खा ले ! तभी बछड़ा बोला: आओ रे मेरे सिंह मामा पहलें भक्खो मोय , ता पीछे माऐ बिनासिये हो माय । सिंह मामा, माँ को बाद में खाना, पहले मुझे खा जाओ। सिंह का मन बदल गया। वह उन्हें लेकर अपनी रानी के पास गया: आओ री मेरी सिंहिन रानी पूजौ इनके पांय !यह तौ बहन मेरौ भानजौ हो माय !
लोकमानस में यह सत्य की शक्ति है, जो हिंसक के मन को भी बदल सकती है और उसे परास्त कर सकती है। यह सुरही गाथा केवल ब्रज में ही नहीं, हरियाणा, बुन्देली, राजस्थानी, गुजराती, मगही, भोजपुरी से होते हुए कर्नाटक तक गाई जाती है। श्री देवेन्द्र सत्यार्थी ने इसे अहिंसा का राष्ट्रगान कहा था।
महात्मा गांधी के लिए लोकतन्त्र का क्या अर्थ था, इसे उनके जीवन की एक घटना से समझा जा सकता है। महात्मा गांधी से पहले से समय लेकर गाँव के दो किसान मिलने आए थे। महात्माजी उन्हें कुछ समझा रहे थे कि इसी बीच वायसराय के यहाँ से कोई अंग्रेज अफसर गांधीजी से मिलने आ गया। थोड़ी देर उसने किसानों से महात्माजी की बातें सुनीं, फिर बोला: मुझे आपसे बात करनी है । महात्मा गांधी ने कहा: ठीक है , कहिये !
वह अफसर उन किसानों को वक्र दृष्टि से देखते हुए बोला: मुझे राज्य के संबंध में ख़ुफ़िया बातें करनी है । महात्मा गांधी बोले: ठीक है , करिये !
उसने फिर से उन किसानों की ओर देखा। महात्मा गांधी बोले: हाँ , वे तो उस राज्य के मालिक हैं , जिसके संबंध में आप confidential बात करना चाहते हैं । राज्य के मालिक से छिप कर क्या बात करनी है? राज्य के मालिक से दुराव - छिपाव क्यों ? ? महात्मा गांधी का चिन्तन भारत की अविच्छिन्न सन्त परम्परा के चिन्तन का नवनीत है। महात्मा गांधी ने कृष्ण और गीता, बुद्ध और महावीर से लेकर भारत की समूची सन्त परम्परा के गहन रहस्य को आत्मसात किया था। उनके चिन्तन में भारतवर्ष की निरन्तर और अविच्छिन्न चिन्तन परम्परा की अन्तर्भुक्ति दिखाई देती है। यह परम्परा में से निकला परिवर्तन और उसी परम्परा से निकली प्रगति की आवाज थी।
महात्मा गांधी का जीवनदर्शन किताबी नहीं था। वह भारत की लोकचेतना का जीवनदर्शन था, विश्वमंगल चेतना का दर्शन था, भारत की सन्त परम्परा और सामान्यजन का जीवनदर्शन था। उनका चिन्तन देशज चिन्तन है। वह अविच्छिन्न परम्परा का दाय और लोकमन के भरोसे की बात है।

शांतिनिकेतन में महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर
भारत की सन्त परम्परा और भारत की लोकचेतना अभिन्न हैं। सन्त परम्परा लोकजीवन में रची बसी है। वह लोकमन की अभिव्यक्ति और लोकजीवन की शक्ति है। महात्मा गांधी ने कृष्ण और गीता, बुद्ध और महावीर से लेकर भारत की समूची सन्त परम्परा के गहन रहस्य को आत्मसात किया था।
महात्मा गांधी ने लोकजीवन की शक्ति के रूप में राम को पहचाना था। लोकजीवन में लोकमंगल का सबसे बड़ा प्रतीक राम है। उनकी संवेदना दरिद्र नारायण और उस अन्तिम व्यक्ति से जुड़ी है, जिसकी सुध लेना सन्त परम्परा का मूल भाव रहा है। गांधी वाङ्मय का हम जितना अध्ययन करेंगे, उतना ही स्पष्ट होगा कि वहाँ सर्वजन मंगल की चेतना, समष्टिहित का चिन्तन और सामान्यजन की पीड़ा है। मजहबी भेद वहाँ है ही नहीं। बापू का भजन कोई साधारण शब्द संयोजन नहीं है: रघुपतिराघव राजाराम , पतितपावन सीताराम ! ईश्वर अल्ला तेरौ नाम , सबको सन्मति दे भगवान !
एक ओर पतित को पावन करने का सन्देश है, दूसरी ओर नाम और रूप के भेद की वही पुरानी बात है:
नमो भगवते तस्मै कृष्णायाद्भुतकर्मणे नाम-रूप विभेदेन जगति क्रीडति यो यत: !
अथवा गजेन्द्रमोक्ष का वाक्य है: नामरूप विभेदेन फ़ल्ग्व्या च कलया कृताः || २२ !!
सन्मति की बात है, समन्वय की बात है। स्वराज रामराज का सन्देश है: वैष्णवजन तौ तेणें कहिये जे पीर परायी जाणे रे ! सोचने की बात है कि नरसी भगत गांधी के स्वर में अवतरित हुए। वही नरसी, जिनकी गाथा ‘नरसी का भात’ भारत के विभिन्न जनपदों में बड़ी श्रद्धा के साथ गाई जाती है। आश्रम भजनावली का अध्ययन करने पर सामान्यजन, समष्टिजन और सर्वजन की जीवन परम्परा और उसकी निरन्तरता दिखाई देती है।
भारत की सनातन लोकचेतना में प्राणिमात्र के प्रति संवेदना है। गांधी की स्वदेशी की अवधारणा वास्तव में लोकजीवन से तादात्म्य की अवधारणा है। स्वदेशी वस्त्र, वेशभूषा, स्वदेशी भाषा, स्वदेशी विचार प्रणाली और स्वदेशी जीवन प्रणाली उसी चिन्तन से जुड़ते हैं। धर्म का सारतत्त्व यही है कि वह सर्वजन मंगल का प्रतिपादन करे, समष्टिहित से प्रेरित हो और सामान्यजन के पक्ष में खड़ा हो। सच तो यह है कि लोकचेतना अध्यात्म है। सत्ता के तर्कशास्त्री जो कहना चाहें कहते रहें, आस्था के बिना लोकचेतना जगती भी नहीं। सर्व के प्रति आस्था, समष्टि के प्रति आस्था और सामान्य के प्रति आस्था इसका आधार हैं।

बिरला हाउस और गांधी जी
अध्यात्म का अर्थ संकीर्ण नहीं हो सकता। खण्डित अहम् का नाम आत्म नहीं है। आत्म व्यापक है, जिसमें सर्व और पूर्ण समाया हुआ है। आजादी की लोकचेतना सत्य के आग्रह के साथ जगी थी। सत्य के आग्रह से बड़ा कौन सा अध्यात्म हो सकता है? यही कारण है कि संविधान का सूत्रवाक्य बना, ‘सत्यमेव जयते’। सत्यमेव जयते अध्यात्म का ही सूत्र है। लोकचेतना की नैतिक सत्ता सर्वजन, समष्टिजन और सामान्यजन के हित की सत्ता होती है। यही कारण है कि उसने राज्य को भी नीति का निर्देश दिया और नीतिनिर्देशक तत्त्व संविधान में समाविष्ट हुए। संविधान में स्वतन्त्रता, समानता और न्याय के दर्शन की प्रतिष्ठा लोकचेतना की ही प्रतिष्ठा है। इसी में लोककल्याणकारी राज्य की स्वीकृति निहित है।
आत्मा एक अवधारणा है, जिसके भिन्न भिन्न विचार प्रणालियों ने अपने अपने अर्थ किए हैं। व्यष्टि चेतना का वह सूत्र, जो विराट चेतना से जुड़ता है, किन्हीं विचारकों के मत में आत्मा है। इसके स्वरूप पर बहुत व्यापक चर्चा हुई है। भारत की अवधारणा में आत्मा नित्य और कालातीत है।
आजादी का आन्दोलन केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित न रहे, इसके लिए महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज, सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक स्वावलम्बन को हमेशा आजादी से जोड़कर देखा था। इसमें किसी को संशय नहीं है कि सरदार भगतसिंह जैसे सशस्त्र क्रान्तिकारियों, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज तथा नौसेना के विद्रोहियों ने ब्रिटिश साम्राज्य का मनोबल तोड़ने में भूमिका निभाई। आजादी की लड़ाई में उन सबकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके साथ ही स्वतन्त्रता के लिए बड़ी लड़ाई निहत्थे लोगों ने भी लड़ी और उसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया।
असहयोग आन्दोलन और सत्याग्रह ने ब्रिटिश साम्राज्य को खुली चुनौती दी थी। गांधी ने पहचान लिया था कि राजसत्ता का आधार लोकस्वीकृति है। सत्ता तभी तक है, जब तक जनता उसे स्वीकार कर रही है। जिस दिन जनमानस ने तय कर लिया कि अब आपकी सत्ता को नहीं मानते, उसी दिन से स्वतन्त्रता का आगमन आरम्भ हो जाता है। सत्ता जनता के पास आ जाती है।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गांधी जी
इसीलिए 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में आयोजित कांग्रेस के महाधिवेशन में खादी धारण करने वाले लगभग 20 हजार स्वराजियों को सम्बोधित करते हुए गांधीजी बोले: गुलामी की बेड़ियाँ उसी समय टूट जाती हैं , जब हम अपने आप को आजाद समझने लगते हैं , इसी क्षण से अपने आप को आजाद समझ लीजिये ! मैं आपको धोखा देने के लिए यह नहीं कह रहा हूँ , यह सचाई है कि पहले आजादी अपने मन की होती है , बाद में वह आजादी भी अपने आप चली आती है ! अब आप इस प्रकार का आचरण करने लगिये कि आप साम्राज्यवाद के शिकंजे से छूट गये हैं ! अब मैं आपको एक मन्त्र देता हूँ , जिसका आप हर साँस के साथ जाप करिये ! वह मन्त्र है करो या मरो । भारत को आजाद करने के लिए प्राण चले जाँय तो चले जाँय !मैं रहूँ या चला जाऊँ , अब भारत स्वाधीन हो कर रहेगा !
‘पूर्णाहुति’ में श्री प्यारेलाल ने अपना संस्मरण लिखा है: उन्तीस-जनवरी की ही संध्या थी , जब बापू को खांसी हो रही थी ,उनसे दवाई की गोली चूसने को कहा गया था, किन्तु वे बोले अब मैने निश्चय कर लिया है कि मैं रामनामकी शक्ति से ही ठीक हो सकूंगा ।
एक स्वयंसेवक उनके सिर में तेल मालिश करने लगा, तो वे उससे कहने लगे: देखो, तुमको मैं एक काम सोंपना चाहता हूं , देखो , यदि मैं लंबी बीमारी के बाद मरूं या फोडे-फुन्सी से मरूं , तो मेरे मरने के बाद तुम साफ-साफ यह कहना कि जैसा ईश्वर-परायण होने की बात मैं करता था , वैसा मैं था ही नहीं ! भले ही लोग तुमसे नाराज हो जांय ! ध्यान रखना , तुम ऐसा करोगे तो मेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी! हां, जैसे उस दिन किसी ने बम फेंका था, उसी तरह यदि कोई गोली मार कर मेरे प्राण ले ले, मैं कराहूं भी नहीं , रामनाम लेते हुए मेरे प्राण निकल जांय , तो ईश्वर-परायण होने की मेरी बात सामने आ जायगी।

आश्रम में गांधी जी
महात्मा गांधी नन्दी, बंगलूर में प्रवास कर रहे थे। बहुत से लोग मिलने आए। उनमें पोलैंड का एक नवयुवक भी था। जब सब चले गए तब उसने अपना फोटो निकाला। वह चाहता था कि बापू उस पर अपने हस्ताक्षर कर दें। वह बापू से बोला: मैं कुछ कैथोलिक पादरियों के साथ एक स्कूल चला रहा हूं , इस फोटो के बेचने से जो राशि मिलेगी , वह स्कूल में लगा दूंगा।
गांधीजी ने फोटो लौटाते हुए कहा: तुम मुझसे यह आशा न करो कि मैं उन पादरियों को धर्मपरिवर्तन के काम में कुछ भी सहायता करूंगा ,मुझे मालूम है, उन्होंने किस प्रकार वहां एक हिन्दूमन्दिर नष्ट किया था। मैंने अन्तराष्ट्रीय-धर्मसंघ वालों को शिकायत की थी ,मैं लिखना चाहता था किन्तु लोग भडक न जांय , इस लिये मैं चुप रहा !
पोलैंड के युवक ने कई तर्क दिए। बापू बोले: तुम जिस बौद्धिकस्तर पर हो , उस बौद्धिकस्तर पर यहां का सामान्य-आदमी हो ,तो मैं उसे स्वेच्छासे ईसाई- धर्म अपनाने के लिये आशीर्वाद दे सकता हूं ,पर उन्हें पता ही नहीं कि तुम जो कर रहे हो ,उसका मतलब क्या है?मेरे बेटे को जिस तरह भडका कर इस्लामधर्म ग्रहण कराया गया ,उस पर मैं अखबारों में इतना लिख चुका हूं ,क्या तुमने उसे पढा नहीं ?उसकी कमजोरियों का अनुचित फायदा उठाने वाले क्या सच्चे मुसलमान हो सकते हैं ?मैंने मुस्लिमसमाज के मित्रों को खत लिखा है,वह अपने खून में कलम डुबो कर लिखा है!

धर्मांतरण ही राष्ट्रांतरण है - महात्मा गांधी
वह युवक बापू की बात की गहराई समझ गया और फोटो लेकर प्रणाम करके चला गया। जिस समय महात्माजी कांग्रेस से त्यागपत्र देने का मन बना चुके थे, वह उनके अन्तर्मन्थन का अवसर था। उसी समय वर्धा में उन्होंने 19 सितम्बर 1934 को यह कविता लिखी थी: हे नम्रता के सागर ! दीन की हीन कुटिया के निवासी ! गंगा यमुना और ब्रह्मपुत्र से सिंचित इस सुन्दर देश में तुझे सब जगह खोजने में मुझे मदद दे ! मुझे खुला दिल और ग्रहणशीलता दे इस देश की जनता से एकरूप होने की इस देश की जनता से एकरूप होने की शक्ति और उत्कंठा दे।
लोकचेतना की तरह ही महात्मा गांधी सामान्यजन के बीच खींची जाने वाली किसी भी रेखा या दायरे के अस्वीकार थे। जीवन भर वे दायरों को तोड़ते रहे। गांधी अपने आप में वर्ग चेतना, वर्ण चेतना और मजहबी चेतना का निषेध थे। वहाँ कोई परिधि हो ही नहीं सकती थी। वे किसी भी दायरे का अस्वीकार हैं। यदि चेतना विभक्त है तो वह जाति चेतना, मजहबी चेतना, पन्थ चेतना, वर्ग चेतना, क्षेत्र चेतना या संकीर्ण भाषा चेतना हो सकती है, लोकचेतना नहीं। विभक्त चेतना में जाति, वर्ग, वर्ण, मजहब, पन्थ, क्षेत्रीयता और दलों के हित या स्वार्थ का आग्रह होता है। लोकचेतना सर्वचेतना और अविभक्त चेतना होती है।
स्वतन्त्रता संग्राम में लोकचेतना जागृत थी। भारत की जनता अंग्रेजों के सामने एक सशक्त और समन्वित इकाई के रूप में संघर्ष कर रही थी। स्वराज का सरोकार सर्वजन, सामान्यजन, समष्टिजन और मनुष्यता का सरोकार था। वह व्यापकता का सरोकार था।
स्वराज की चेतना विभक्त चेतना नहीं थी। वे भिन्नताएँ और रेखाएँ, जो आज इतनी गहरी हो गई हैं, उस समय भी थीं। किन्तु स्वराज की चेतना के सामने वे उसी प्रकार दब गई थीं, जैसे सूर्य के प्रकाश में ग्रह नक्षत्रों का अस्तित्व दिखाई नहीं देता। सत्ता का सरोकार लोकमानस को विभक्त करता है। इसलिए जब स्वराज आता दिखाई देने लगा, तब जाति, पन्थ, भाषागत संकीर्णता, संकीर्ण प्रान्तीयता और दलगत स्वार्थ के भेद उभरे और उभारे गए।
विभाजन के समय जब पंजाब जल रहा था, उस समय बापू बंगाल में थे। कलकत्ते में बापू अनशन पर बैठ गए। उनका कथन था: कलकत्ते में या तो शान्ति होगी,नहीं तो मैं न रहूंगा। इसके बाद 30 हिंसक लोग अपने हथियारों के साथ बापू के सामने आकर समर्पित हो गए।

एकांत में गांधी जी
माउंटबेटन ने पत्र लिखा था: पंजाब में ५५ हजार सशस्त्रसैनिक हैं, हिंसा को नहीं रोक पा रहे, बंगाल में हमारी सेना में केवल एक ही व्यक्ति है , वहां कोई उपद्रव नहीं है, मुझे अपनी एक व्यक्ति-वाली सीमासुरक्षा-सेना को सेल्यूट करने का आदेश दें! इस विभक्त चेतना को तत्कालीन सत्ता से ऊर्जा मिली और उसका परिणाम देश के विभाजन के रूप में सामने आया। लेखक के अनुसार तत्कालीन सत्ता ने विभक्त चेतनाओं को बल दिया। जाति और पन्थ की विभक्त चेतनाओं को सर्वजन चेतना पर प्रहार का अवसर मिला। विभक्त चेतनाएँ मजबूत हुईं और सर्वजन चेतना निर्बल हुई।
गांधी पर जो प्रहार हुआ, उसे इस दृष्टि से विभाजित चेतना का लोकचेतना, सर्वजन चेतना और समष्टिजन चेतना पर प्रहार माना गया। वह राजसत्ता पर प्रहार नहीं था। वह उस सामान्यजन पर प्रहार था, जो बिना सुरक्षा तन्त्र के रह रहा था। बापू की हत्या के बाद कविवर श्री बालकृष्ण शर्मा नवीन ने एक बड़ी कविता लिखी थी। उसका सार यह था कि ऐसे सन्त पुरुष के मरने का दुःख नहीं है, दुःख मनुष्य और मनुष्यता के मर जाने का है। ऐसे रामभरोसे रहने वाले आदमी पर जिन हाथों से गोली चली, क्या वह मनुष्य था? क्या उसकी मनुष्यता मर गई थी?
लोककवि ने लिखा था:
महत्मा को अपना निसाना बनाके किया अंग छलनी तमंचा चला के।
रहे हाथ जोडे खडे वो सभा में महत्मा को अपना निसाना बनाके ।
किया अंग छलनी तमंचा चला के रहे हाथ जोडे खडे वो सभा में हरेराम हेराम की रट लगा के।
हिला न जालिम का किसलिये दिल हुए न टुकडे रिवालवर के। न टूटे क्यों हाथ वो सितमगर चलाई थीं गोलियां जी-भर के।"
लोकनायक पर प्रहार का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि आजादी की लड़ाई के समय हुंकार भरने वाली लोकचेतना धीरे धीरे निष्क्रिय होती गई और बाजार के रूप में व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना पर हावी होती गई।
लेख-

श्री राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी
पानीपत, हरियाणा
(लेखक ब्रज परंपरा व लोकसंस्कृति के शीर्षस्थ मर्मज्ञ हैं, जो गहन लोक-अध्ययन के माध्यम से सांस्कृतिक प्रसंगों को समकालीन दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं; वे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व विद्यानिवास मिश्र सम्मान से अलंकृत हैं।)
गांधी जी और भारत की लोकचेतना
October 02, 2026