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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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प्राचीन मथुरा में गज लक्ष्मी

प्राचीन मथुरा में गज लक्ष्मी

मथुरा में मित्र और दत्त नामक स्थानीय राजवंशों की समाप्ति के बाद ईसा पूर्व प्रथम सदी के अन्तिम दौर में शक क्षत्रपों  का राज्यकाल प्रारम्भ होता है। महाक्षत्रप रजुबल पहला शक शासक था जिस ने मथुरा पर अपना राज्य स्थापित किया। शकों की आस्था  बौद्ध धर्म में थी जैसा कि मथुरा से प्राप्त उनके सिंहशीर्ष अभिलेख से ज्ञात होता है, किंतु मथुरा समन्वय की भूमि थीI  यहाँ भागवत, शैव, शाक्त, जैन एवं बौद्ध परंपराएँ समान रूप से फल -फूल रही थीं।


शक शासकों की वंशावली 

शकों ने मथुरा के इस वातावरण को शीघ्र ही समझ लियाI उन्होंने मथुरा के सिक्कों पर निरन्तर चले आ रहे पहले के प्रतीक यमुना एवं वृक्ष को अपने सिक्कों पर भी अग्रभाग में कुछ बदलावों के साथ यथावत् अंकित किया ,लेकिन पृष्ठभाग के लिए एक ऐसे प्रतीक का चयन किया जो मथुरा के समन्वयकारी वातावरण के अनुरूप था। वह  प्रतीक था 'गज लक्ष्मी'! गज लक्ष्मी मूलतः भागवतों का प्रतीक है,पर यह शाक्त,बौद्ध और जैन संप्रदायों में भी समान रूप से लोकप्रिय रहा है।


गजलक्ष्मी,भरहुत, सतना (मप्र)

हम शुंगकाल में वैदिक और पौराणिक देवताओं का प्रस्तर प्रतिमाओं के रूप में अंकन देखते हैंI यह तत्कालीन शिल्पकला में एक नई परम्परा का उदय थाI इसी युग में समृद्धि की वैदिक देवी 'श्री' का अंकन प्रथमबार गज लक्ष्मी के रूप में आकार ले रहा था जिसे भरहुत और साँची के मूर्तिशिल्पों में देखा जा सकता है।


साँची की शिल्पकला में अंकित गजलक्ष्मी 

जब मैं गजलक्ष्मी की अवधारणा को समझने का प्रयास कर रहा था ,तब मेरा ध्यान प्रिय शाश्वत ने 'श्रीसूक्त' के एक विशेष शब्द की ओर आकर्षित किया। ऋग्वेद के ( दशम् मण्डल , परिशिष्ट ) 'श्रीसूक्त' में लक्ष्मी के लिए शब्द आया है - 'हस्तिनादप्रमोदिनीम्' जो हाथियों के नाद से प्रसन्न होतीं हैं ! संभवतः इसी से मूर्तिशिल्प में गजलक्ष्मी का आधार तैयार हुआ।प्रारम्भिक मूर्ति शिल्पों में लक्ष्मी के दोनों ओर खड़े हाथी नाद करते हुए या अभिषेक करते हुए दर्शित होते हैंI

मौर्यकाल तक आते - आते वस्तु विनिमय प्रणाली कमज़ोर हो गई, जिसका स्थान मुद्राओं ने ले लिया। अब भौतिक समृद्धि के लिए मुद्रा को भी लक्ष्मी का प्रत्यक्ष प्रतीक माना जाने लगा, इस लिए भारतीय सिक्कों पर सर्वाधिक लक्ष्मी की छवि का अंकन प्राप्त होता है। ईसा पूर्व की सदियों के सिक्कों पर तो मानो 'गजलक्ष्मी' छायी हुईं हैं । सर्वप्रथम और सुन्दरतम गजलक्ष्मी हमें शक शासक अयलिश द्वारा ज़ारी चाँदी के सिक्के पर दिखलाई देतीं हैं।


गजलक्ष्मी का सिक्का 

मथुरा के शासक महाक्षत्रप रजुबल  के इस सिक्के पर अंकित प्रतीकों से प्राचीन मथुरा के समन्वयकारी भाव को हम अच्छी तरह से समझ सकते हैं जिस के अग्रभाग में पूर्व परम्परा के संगम के रूप में ' यमुना ' और पृष्ठभाग में समन्वयक प्रतीक के रूप में ' गजलक्ष्मी ' दोनों का अंकन है। इस सिक्के में साँचे की गलत ढाल के चलते लक्ष्मी के पास मात्र एक हाथी ही अंकित हो सका है, पर अन्य सिक्कों में दोनों ओर हाथी स्पष्ट देखे जा सकते हैं।


महाक्षत्रप रजुबल का सिक्का 

मथुरा के सिक्कों पर गज लक्ष्मी के अंकन की परम्परा को महाक्षत्रप रजुबल के पुत्र महाक्षत्रप शोडास ने भी ज़ारी रखा Iमथुरा से अनेक गजलक्ष्मी की प्राचीन मूर्तियाँ प्राप्त हुईं हैं,यह विश्वभर के संग्रहालयों की शोभा हैं I मथुरा के राजकीय संग्रहालय में शोडासकालीन एक सुन्दर शिलालेख संगृहीत है जिस में लक्ष्मी ' श्री ' की मूर्ति स्थापित करने का उल्लेख है ,जो आज भी प्राचीन मथुरा वासियों की लक्ष्मी के प्रति आस्था का यशोगान कर रहा है I

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वर्तमान में प्रचलित 'गजलक्ष्मी' की छवि

(महाक्षत्रप रजुबल के सिक्के के लिए हम वरिष्ठ मुद्राविद् श्री Jan Lingen के प्रति विशेष आभार व्यक्त करते हैं )

लेख-
लक्ष्मीनारायण तिवारी
सचिव :ब्रज संस्कृति शोध संस्थान
श्रीधाम गोदा विहार मन्दिर,
वृन्दावन

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