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उड़िया लोक साहित्य

उड़िया लोक साहित्य

उड़िया भाषा का उद्भव पूर्वमागधी अपभ्रंश से हुआ और इसका विकास 1000 ई. से माना जाता है। उर्जाम शिलालेख प्राचीन उड़िया भाषा का प्रमाण है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री द्वारा संगृहीत चर्यागीतिका की भाषा प्राचीन उड़िया भाषा का प्रथम उपलब्ध उदाहरण है। 1249 ई. में भुवनेश्वर के द्विभाषिक शिलालेखों में उड़िया भाषा की उत्तरोत्तर समृद्धि और विकास के संकेत प्राप्त होते हैं। पंद्रहवीं शती में सालारादास कृत महाभारत में हमें उड़ि‌या भाषा के पूर्ण विकास का प्रमाण मिलता है।

अभी तक प्राप्त उड़िया लोकसाहित्य को सात वर्गों के अंतर्गत विभक्त किया जा सकता है -

(क) गीत (ख) पहेलियां (ग) मुहावरे (म) लोकोक्ति (ड) ढंग (च) छटा (छ) मंत्र (ज) लोककथा (झ) लोकनाटक

उड़िया लोकगीत विविध रूपों में उपलब्ध हैं- गाथा, गीति, श्रमदीति, क्रीडागीति, बालगीत आदि। सामाजिक रीतिरिवाजों, व्रत, उपवास आदि से संबंद्ध कथाएं गाथा कही जाती हैं। पूजा, अर्चना के विधि-विधान किसी विशिष्ट देवी-देवता की उपासना से मनोकामना की पूर्ति या देवी-देवता की निंदा के परिणामस्वरूप जीवन में दुःखों का आगमन अंततः देवता संबंधी भ्रम का निवारण और पुनः स्तुति द्वारा सुखी जीवन की प्राप्ति इन गाथाओं का कथ्य है।

इन गाथाओं का उद्देश्य जनता में धार्मिक चेतना का प्रसार है, कुछ गाथाएं सामाजिक विषय वस्तु पर भी आधारित रहीं-इनमें संतान की मृत्यु, विवाहित द्वारा आत्महत्या, सास द्वारा नववधू को यंत्रणा देना, दहेज प्रताड़ना आदि अनेक विषय रहे। नाक चरित में पत्नी का अनुसरण करने वाले पति की दुखद परिणत्ति का चित्रण किया गया है। इस गाथा का उद्देश्य संयुक्त परिवार की व्यवस्था की श्रेष्ठता को स्थापित करना है।

सती गाथा पति के साथ सती हो जाने की प्रथा पर आधारित मार्मिक गाथा है। ऐतिहासिक गाथाओं के अन्तगर्त रानी का शोक एक महत्वपूर्ण लोकगाथा है। इसमें पुरी के राजा दिव्यसिंघ देव की रानी के शोक का वर्णन है- जिसके पति पर गलत आरोप लगाकर अंग्रेजों द्वारा काले पानी की सजा दी गई। मंदिर निर्माण गाथा में पुरी के मंदिर के निर्माण संबंधी किवदन्ती मिलती है।

गीति

उड़िया समाज में गीतों के अनेक प्रकार हैं। विदागीत पतिगृह जाते हुए कन्या के दुःख और आवेग का गीतिमय रूप है। विदाबेला में कन्या अपने आत्मीय जनों के पांव पर गिरकर अत्यंत करुण स्वर में गीतिमय विलाप करती है। प्रौढ़ महिलाओं से सुनकर, अल्प वयस्काएं इन गीतों को स्मरण कर लेती हैं। करुण रस के साथ अनेक उपमाएं और रूपक इन गीतों के आकर्षण को बढ़ाते हैं। इन गीतों में नारी उत्पीड़न, नारी की असहायता के मार्मिक चित्र मिलते हैं।

श्रमलाघव पर आधारित गीत सभी कृषकसमाजों में प्रचलित हैं। कृषि, पशुपालन, जल-स्थल, पथ को यात्रा, कला-कर्म, यंत्र संचालन के अवसरों पर ये गीत सुने जा सकते हैं। उड़िया श्रमगीतियों में फसलों की जुताई और बुवाई के समय गाए जाने वाले गीत विशिष्ट स्थान रखते हैं। देवी-देवता, शिव-पार्वती, राधा-कृष्ण का लौकिकीकरण इन गीतों का वैशिष्ट्य है। इन गीतों में राम हलवाहे के रूप में, लक्ष्मण बुआई के लिए जमीन समतल करते हुए और सीता बुआई करने वाली कृषक स्त्री के रूप में उपस्थित है।

इसी प्रकार शिव खेत जोतते हैं और पार्वती उनका भोजन पहुंचने में जब देर हो जाती है, तो पार्वती, जो सिर पर भोजन उठा कर शिव के पास जाती है-उसके केश पकड़ कर शिव उन्हें प्रताड़ित भी करते हैं। ये गीत हलवाहों की संपूर्ण जीवन शैली और चिंतनधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

लोककला से संबद्ध गीतों में गोदना गुदवाने की प्रक्रिया से संबंधित गीत मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त पुरी की रथ यात्रा के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों को दाहुक गीत, कहा जाता है। दाहुक गीतों के गायक पवित्र आचरण करते हैं, और पवित्र मन से इन गीतों को गाते हैं।

शारीरिक श्रम प्रधान गीत क्रीड़ागीत के अंतर्गत आते हैं। डॉ. कुंजबिहारी दास ने बागड़ी (कबड्डी), चका-चका भंवरी, बहु चोरी (दुल्हन की चोरी), लुच काली (छुपन छपैया), पूची खेल आदि खेलों से संबंधित गीतों को संकलित एवं समीक्षित किया है।

झूला गीत

प्रश्नोत्तर शैली के गीत हैं जिन्हें लड़के-लड़कियां झूला झूलते समय गाते हैं। सामान्यतः तीन पंक्तियों वाले इन तीनों की प्रथम पंक्ति सिर्फ लय के काम आती है। झूले के आलोड़न के साथ-साथ इन गीतों की  लय उठती गिरती रहती है। इनकी विषय-वस्तु प्रेम-विरह, पुराण, परिवार आदि कुछ भी हो सकती है-जैसे

गोड़ो मुद्दि अगुआली

कोथाय दी कथा कहियान्ति

संगे-गंगे जगुआली

अर्थात् पैरों का बिछुआ उंगली के अगले भाग में है। मैं तुमसे कुछ बात कह सकता था, लेकिन वहां हमेशा चौकीदार रहता है। ये गीत रजपर्व के अवसर पर गाए जाते हैं।

शिशुगीत बच्चों को लौरियों के रूप में सुनाए जाते हैं तथा बच्चों द्वारा भी गाए जाते हैं। ये गीत छोटे तथा विविध विषयी होते हैं।

बारहमासा गीत वर्ष के बारह महीनों में प्रकृति के निरंतर परिवर्तन तथा मानव-हृदय पर उसका प्रभाव का वर्णन इन गीतों में किया जाता है। डॉ. कुंजबिहारी दास ने बारहमासा गीतों को पांच भागों में विभक्त किया है- (क) पुत्र के विरह में माता का दुःख (ख) स्वी वियोग गीत (ग) स्त्री-पुरुष दोनों के विरह के गीत (च) पद्मतुला बारहमासा (ङ) खाद्य बारहमासा- इन सभी बारहमासा गीतों में विरह भाव की ही प्रधानता है।

पहेली गीत: प्राचीन काल में कृषि कार्य, विवाह संस्कार, अंत्येष्टि संस्कारों के अवसर पर पहेलियां कहे जाने की प्रथा थी। उसी परंपरा के पहेली गीत छोटे-छोटे होते हैं। कभी-कभी इनमें अभूतपूर्व काल्पनिकता के दर्शन होते हैं जैसे श्यामसुंदर के पास चार चौगनी आंखें और पंद्रह जीभें इसका उत्तर है-नागफनी। नागफनी के गुल्म की तुलना कृष्ण से की जाती है।

कहावत गीति

कहावत गीतियां परंपरागत अनुभवों पर आधारित होती हैं जो रूढ़ होकर उपदेश बन गई हैं। ये कहावतें जो कहानी पर आधारित हैं, उन्हें प्रवाद कहा जाता है। प्रवाद प्रवचन लोक समाज के ज्ञान का भंडार है। फिर भी इनमें उच्च नैतिक आदर्शों के प्रचार का अभाव है। ये अधिकतर दैनन्दिन जीवन की समस्याओं से संबंधित हैं। ये आकार में बहुत छोटी परन्तु अत्यंत प्रभावशाली होती हैं। विरोधाभास, अनुप्रास, लयबद्धता, पुनरावृत्ति आदि इसके शैलीगत वैशिष्ठय् हैं।

ओड़िया प्रवचनों का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। ईश्वर विश्वास, जीवन दर्शन, लामाजिक रीति-गीति, पारिवारिक संबंध, खेल प्रवृत्ति, उचित अनुचित व्यवहार, कृषि वाणिज्य, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि नाना विषयों पर प्रवाद-प्रवचन प्रचलित हैं। कृषि प्रधान राज्य होने के कारण यहां कृषि विषयक प्रवचन ही सर्वाधिक हैं। मौसम-भविष्यवाणी, पशु-लक्षण, कृषि योग्य भूमि, जुताई, लुवाई, कटाई आदि नाना विषयों के प्रवचनों को किसानों द्वारा अनुकृत किया जाता है।

लोकोक्ति गीत

सामाजिक जीवन में लोकोक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। इनका उद्देश्य व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के गुण-दोषों पर टिप्पणी करना और सुधार करना होता है। मुहावरे जहां उपदेशात्मक होते हैं वहीं ये लोकोक्तियां टिप्पणी से परिपूर्ण होती है। उदाहरणार्थ:

(1) घर में नींबू-नमक नहीं और सभा में विविध व्यंजनों की चर्चा करना।

(2) जिसको फीलपांव हो उसे दूसरे के बारे में कहने का क्या अधिकार है।

छटा गीत

वे गीत होते हैं, जिनमें व्यंग्य-विद्रूप नहीं होता। ये महिला समाज में केवल हास्य और मनोरंजन के लिए गाए जाते हैं।

छिः छिः रे समधिन

धू धू रे समधित

मैंने सूखी मछली और अरबी बनाई तुम्हें नहीं तो किसको दूंगी

मुझे बेटी के बदले बेटा मिला।

मंत्र गीति

उड़िया लोकमत में जादू-टोनों पर बहुत पहले से विश्वास किया जाता रहा है। भूत-पिशाच, विभिन्न अपदेवताओं के चंगुल से रक्षा करने, व्याधि मुक्त करने में, तंत्र शक्ति और असाध्य कार्य करने में, मंत्र सहायक होते हैं।

गुनिया अपनी सफलता के लिए विभिन्न देवी-देवताओं के नाम लेता है। कुछ रीति-रिवाज भी इससे संबंधित हैं। जैसे पश्चिमोन्मुख होकर मंत्रोच्चारण, शनिवार को संध्या को कार्यानुष्ठान करना और प्रक्रिया समाप्त होने तक सामने देखते हुए चलना मुड़कर न देखना। इस प्रक्रिया के कारण जन साधारण में मंत्रों के प्रति असाधारण विश्वास है। यह विश्वास लोगों के मनोबल में वृद्धि करता है और कर्मसाधन में सहायक सिद्ध होता है। यह परम्परा गुरु शिष्य के बीच चली आती है और समाज द्वारा कोई परिवर्तन नहीं आता, इसलिए कुछ विद्वान इसे लोक साहित्य के अंतर्गत नहीं रखते।

लोक कथाएं

भारत में लोककथाओं की परंपरा बहुत पुरानी है। संयुक्त परिवारों में बड़े बुजुर्गों द्वारा छोटे-छोटे बच्चों को कहानी सुनान्स दिनचर्या का एक अंग है। इसके अतिरिक्त खाली समय में मनोरंजन, विश्रांति के रूप में, धार्मिक अनुष्ठानों के अंग के रूप में कहानियों कही जाती हैं। लोककथा के प्रारम्भ और अन्त में कथनी कही जाती है। स्टीथ थॉमसन ने लोक कथाओं को दो भागों में बाय है (क) किंवदंती और अन्य विश्वास मूलक कथाएं (ख) कल्पना प्रधान कथाएं।

(क) के अंतर्गत स्थान विशेष के बारे में किंवदंती एवं विश्लेषणात्मक कथाएं आती हैं। दूसरे भाग में परी, दैत्य-दानव, भूत प्रेत आदि अद्भूत लोक से संबंधित कहानियां आती हैं। इसके अतिरिक्त जीव-जन्तु की कहानियां, ठगी की कहानियां, हास्य रस एवं अलौकिक कथाएं भी लोक में प्रचलित हैं।

उड़िया में इन सभी प्रकार की लोककथाएं मिलती हैं। ये विश्व की अन्य भाषाओं में प्रचलित लोककथाओं से प्रकार और अभिप्राय के स्तर पर समानता रखती हैं साथ ही मिथक और कथ्य की विशिष्ट शैली के कारण अपनी अलग पहचान रखती हैं। उड़िया समाज में प्रचलित एक किंवदंती के अनुसार बारह सौ शिल्पी मिलकर भी कोणार्क मंदिर के ऊपरी भाग को निर्मित नहीं कर पाए। अंततः एक बारह वर्षीय लड़‌के से, जो शिल्पी-पुत्र था, यह संभव हो पाया। लेकिन राजा द्वारा दण्ड दिए जाने के भय से वह लड़का मंदिर से कूदा और समुद्र में डूब कर मर गया।

जगन्नाथपुरी मंदिर के बारे में प्रचलित एक मिथक के अनुसार लकड़ी के एक लड्ढे को कोई भी बढ़ई नहीं काट पाया, जिससे जगन्नाथ की प्रतिमा गढ़ी जाती। अंततः स्वयं ब्रह्मा एक बूढ़े बढ़ई के रूप में अवतरित हुए। परंपरानुसार उन्हें 21 दिनों तक मंदिर से बाहर नहीं जाना था। लेकिन कुछ दिनों बाद जब मंदिर के भीतर से लकड़ी काटने की कोई भी आवाज नहीं सुनाई दी, तो रानी ने सोचा कि बढ़ई मर चुका है। रानी के बार-बार कहने पर राजा को मंदिर के द्वार खोलने पड़े। अंदर कोई बढ़ई न था, वह लुप्त हो गया था और प्रतिमा अधबन थी। आज भी जगन्नाथ के हाथ-पैर नहीं हैं।

ये कहानियां सर्वप्रचलित हैं। लोक कथाओं और मिथकों के अतिरिका हमें इन कहानियों में कुछ वैशिष्ट्य भी दिखाई देता है- चरित्रों के खान-पान, वेश-भूषा, चालचलन, मेला उत्सव तथा अन्य सांस्कृतिक तत्व के आधार पर।

लोकनाटक

कथा एवं गीतों की तरह ही ओड़िया में लोकनाटक भी प्रसिद्ध हैं। इन नाटकों को चार भागों में बांटा जा सकता है (क) अभिनय प्रधान (ख) नृत्य प्रधान (ग) संगीत प्रधान (घ) वाद्य प्रधान। अभिनव प्रधान नाटकों के अंतर्गत रामलीला, कृष्णलीला, भरतलीला, मुगलतामसा तथा कठपुतली नाटक उल्लेखनीय हैं। मुगल तमाशा  नाटक मुगलों का हास्य-व्यंग्य प्रधान चित्र प्रस्तुत करता है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही इन नाटकों में भाग लेते हैं। मूलतः भद्रक जिले में इसे मंचित किया जाता है।

कृष्ण की गोप लीला और कंस वध पर आधारित पश्चिमी उड़ीसा में एक लोकनाटक उल्लेखनीय है। इसमें बरगद और धेनुपालि को मथुरा पुरी और गोपपुर के रूप में क्रमशः कल्पित  किया गया है। इन दोनों गांवों के बीच बहने वाली जीरा नदी को यमुना नदी माना गया है। कृष्ण और बलराम की  कुछ लीलाओं का मंचन धेनुपालि में होता है और कंसवध को बरगद गांव में खेला जाता है। इस प्रकार मंच लगभग तीन कि.मी. के क्षेत्र में फैला रहता है। दक्षिण उड़ीसा में प्रचलित प्रहलाद नाटक में भी इसी प्रकार का मंच उपयोग में लाया जाता है। इन गांवों के विभिन्न दृश्य ही मंचीय पृष्ठभूमि का कार्य करते हैं।

नृत्याधृत नाटकों में छऊ,, दंडनाटक, करमानाटक, देसिया आदि उल्लेखनीय हैं। छऊ नृत्य एक युद्धक नृत्य है, जो मयूरभंज का वैशिष्ट्य है। इसकी कथावस्तु में वैविध्य होता है। शिकार, मछली पकड़ना, भालू नृत्य, शेर द्वारा जल पीना जैसे अनेक देवता और प्रकृति आदि विषयों का संयोजन छऊ नृत्य में होता है। सरकारी अनुदान के कारण इस नृत्य को पुनः जीवन मिला है।

इसकी कथावस्तु को प्रोफेसर कुंवर ने तीन भागों में बांटा है (क) रामायण, महाभारत तथा पुराणों से ग्रहण की गई कथावस्तु जैसे तामुड़िया कृष्ण, गरुड़ वाहन, कैलाशपति, समुद्र मंथन, अहल्या उद्धार, पवनपुत्र हनुमान, नटराज एवं परशुराम (ख) डारण्य, प्रकृति एवं जीव-जंतु संबंधी जैसे मयूर नृत्य, तितली नृत्य, हरिणनृत्य, काल्पनिक विषय-वस्तु में समन्वित नृत्य जैसे मरुमाया, अकल सलामी अयमण्ड जुबली आदि। विभिन्न जातियों और वर्गों के लोग इन नृत्यों में भाग लेते हैं। इनमें अरण्य, ग्राम एवं नगर-संस्कृति का समन्वय देखने को मिलता है।

शैव धर्म पर आधारित दण्डनाटक को चैत्र पर्व के दौरान मंचित किया जाता है। इसमें जाति-धर्म के भेदभाव को भुलाकर लोग भाग लेते हैं। मान्यता मानने वाले लोगों को भक्ता कहा जाता है। बारह अनुयायी, एक गायक, एक ढोलक बजाने वाला घर-घर घूमकर धार्मिक नृत्य करते हैं। इसके अतिरिक्त आग पर चलना, गर्म रेत पर लुढ़कना जैसी आत्मतान की क्रियाओं द्वारा देवताओं को प्रसन्न करते हैं। यह आयोजन चैत्र की 13वीं तिथि से 21वीं तिथि तक चलता है। इसका समापन संक्रांति के दिन होता है। नाटक के अंत में चढ़ेया (शिकारी) सोरा, कंध नाच के बाद रामायण और महाभारत के अंश मंचित होते हैं।

चैतीघोड़ा नाटक नृत्यप्रधान होता है। यह साधारणतः मछुआरों द्वारा खेला जाता है। सर्वप्रथम, एक पैरविहीन घोड़े का कंकाल निर्मित किया जाता है। फिर एक आदमी उस घोड़े के अंदर घुसकर स्वयं को कमर तक छुपा लेता है। ऐसा लगता है कि घोड़ा अपने सवार के साथ-साथ नृत्य कर रहा है। ढोलक एवं शहनाई से संगीत उत्पन्न किया जाता है। पुरुष हो या स्त्री का वेश धारण कर पुरुष के साथ नृत्य करता है। बीच-बीच में विदूषक दर्शकों का मनोरंजन करता है।

गीत प्रधान नाटकों में पहला एवं दासकठिया का नाम प्रमुख है। पहले पहला नाटक में सत्यनारायण की कथा प्रस्तुत की जाती थी, इसके बैठकी पूजा भी कहा जाता था। आधुनिक युग में इसका विकास हुआ है। नृत्य और अभिनय समन्वित नाटक की इस विधा को ठिया पाला कहते हैं। दो लकड़ियों से बने वाद्य यंत्र को दस कठिया कहते हैं जिसका वादन पुराण संबंधी गीतों के गान के साथ किया जाता है।

घणकोइला और घुड़की नाटक वाद्य पर आधारित होते हैं। धणकोइला नाटक के लिए नवनिर्मित निट्टी का बर्तन, एक कटोरी एवं धनुष की आवश्यकता होती है। इस नाटक में धनुष का एक सिरा बर्तन में और दूसरा धरती पर टिका दिया जाता है। काजल की डिबिया के स्पर्श से एक अत्यंत सुन्दर ध्वनि निकलती है। धनुष एवं काजल की डिबिया से संबंध होने के कारण इसे धणकोइला वाद्य कहते हैं। इस बाह्य से देवी मंगला का गुणगान किया जाता है। प्रमुख गायक गाता है तथा चार-पांच सहायक उसका अनुकरण करते हैं।

पालिया अर्थात् सहगायक अपने गीतों द्वारा हास्य उत्पन्न करते हैं। भक्त, प्रभु की  कृपा से अभिभूत हो जाते हैं जिसे देवी आना कहते हैं। विभिन्न देवी-देवता उस भक्त विशेष पर आते हैं एवं दर्शकों के प्रश्नों का उत्तर देते हैं।धुणुकी नाटक धुणुकी नामक संगीत वाद्य पर आधारित है। यह भारत में सब जगह प्रचलित है। हिन्दी में इसे धुनधुनैया या प्रेमताल कहते हैं। अन्य जगहों पर इसे यंत्र के रूप में बजाते हुए देखा जा सकता है, लेकिन उड़िसा में एक नाटक ही इस पर आधारित हैं।

इसकी कथावस्तु मुख्यतः पौराणिक है। धुणुकिया और घुणुकियानी के अतिरिक्त चार-पांच लड़कों का समूह जिसे गोटी पिला कहते हैं- इसमें भाग लेता है। धुणुकिया सूत्रधार होता है और नाटक में गीतों की भरमार होती है। इन नाटकों का वैशिष्ट्य युक्ति गीत हैं जो दो पात्रों के बीच में व्यवहत होते हैं। सभागीत विषय प्रवर्तन का कार्य करता है।

भारतीय लोकसाहित्य का सशक्त प्रतिस्प उड़िया लोक गीतों, नृत्य में विद्यमान है। अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक, भौगोलिक, एवं सामाजिक वैषम्य के कारण इसका अपना वैशिष्ट्‌य है।

डॉ. गरिमा श्रीवास्तव
उड़िया लोक साहित्य 
"संस्कृति: अंक-03"

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