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भारतीय चित्रकला: प्रागैतिहासिक धरोहर से आधुनिक संवेदना तक

भारतीय चित्रकला: प्रागैतिहासिक धरोहर से आधुनिक संवेदना तक

मनुष्य के आरंभिक अस्तित्व के उन क्षणों में, जब जीवन और प्रकृति के बीच कोई विभाजन-रेखा नहीं थी, कला ने पहली बार आकार लिया। वन, पर्वत, नदी, चाँद और सूरज- ये सब मानव लिए केवल प्राकृतिक तत्व नहीं थे, बल्कि देवत्व के रूप थे, और यह स्वरुप आज भी हमारी परमपरम्पराओं में विद्यमान है विशेषकर जनजातीय समुदाय में यह विशुद्ध स्वरुप में दिखलाई देता है । जीवन के अनेक घटकों में से अभिव्यक्ति वह तत्व है जिसने मनुष्य को अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाया और इस देवत्व के प्रति उनके भाव धीरे-धीरे चित्रों में ढलने लगे।

खोजी मानव प्रवृत्ति के चलते प्रागैतिहासिक गुफाओं में जब पहली बार आग की लौ झिलमिलाई होगी, तब उन दीवारों पर उभरती आकृतियाँ शायद स्वयं आधुनिक मानव के लिए भी विस्मय का कारण बनी होंगी। वे चित्र मात्र रेखाएँ नहीं थीं बल्कि एक संपूर्ण सभ्यता की धड़कन थी जो अपने समय की अनुभूतियों को सहेजते हुए चुपचाप बोलते चले आ रहे हैं।

भीमबेटका, सिंघनपुर और कबरा पहाड़ की प्राचीन गुफाओं से लेकर आज की जनजातीय दीवार-चित्रण परंपराओं तक, यह कला निरंतर प्रवाहित होती हुई एक ऐसी अमूल्य विरासत बन गई है, जिसे जनजातीय समुदाय आज भी सबसे जीवित और सबसे सजीव स्वरूप में संजोए हुए हैं। यही चित्र हमारे अतीत का वह विश्वसनीय इतिहास लिखते हैं, जिसे शब्दों ने कभी नहीं लिख पाया।
जनजातीय समाज मानव सभ्यता की वह प्राचीन शाखा है जो पृथ्वी पर उसी क्षण से विद्यमान है, जिस क्षण मानव अस्तित्व ने पहली बार आकार लिया, और अभिव्यक्ति के उसी स्वाभाविक विकास में चित्रकला एक ऐसा माध्यम बनकर उभरी जिसने मनुष्य के मनोभावों, अनुभूतियों और कौशल को सबसे सहज रूप में बाहरी दुनिया तक पहुँचाया।

भारतीय जनजातीय समुदाय न केवल विश्व के सबसे प्राचीन समाजों में से एक है, बल्कि भारतीय कला-संस्कृति का मूल आधार भी है। आज जिन आधुनिक कलाओं का परिष्कृत स्वरूप हम देखते हैं, उनका बीज कहीं न कहीं इन्हीं जनजातीय परंपराओं में निहित है। अतः इस आलेख का उद्देश्य इन पुरातन कलाओं को उनका समुचित सम्मान प्रदान करते हुए उनके मौलिक स्वरूप को समझने का एक विनम्र प्रयास है।

समय का पहिया मनुष्य के आरंभ से लेकर वर्तमान तक निरंतर घूमता रहा और इसी यात्रा में समाज ने आरण्यक, ग्राम्य, नगरीय और अंततः महानगरीय स्वरूप धारण किए। मनुष्य जैसे-जैसे जंगलों से दूर गया, प्रकृति से उसका सान्निध्य क्षीण होता गया; किंतु जनजातीय समाज आज भी प्रकृति के साथ अपने अद्वैत संबंध को उसी दृढ़ता से निभा रहा है। यही कारण है कि उनकी कलाओं में प्रकृति, विश्वास और धर्म की झलक अत्यंत स्पष्ट दिखाई देती है।

चित्रकला, शिल्पकला, गोदना आदि जनजातीय कला के प्रमुख आयाम हैं। अब तक हुई पुरातात्विक खोजों के आधार पर यह निर्विवाद रूप से माना जाता है कि कला का सबसे प्रथम स्वरूप चित्रकला ही था। यह भाषा के विकास से भी अधिक प्राचीन है और इसी माध्यम से इतिहासकारों ने प्रागैतिहासिक मानव के जीवन, रहन-सहन और प्रवृत्तियों के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कीं।
हममें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने मध्यप्रदेश के भीमबेटका या छत्तीसगढ़ के सिंघनपुर और कबरा पहाड़ की उन प्रसिद्ध गुफाओं के बारे में न सुना हो जहाँ असंख्य प्राचीन शैलचित्र पाए गए हैं। पुरापाषाण और मध्यपाषाण काल से संबंधित ये चित्र आज भी हमारी सांस्कृतिक चेतना को जीवंत करते हैं। लोकचित्रों के यही स्वरूप डंडा चौक, बिहाई चौक, भित्ति-द्वार सज्जा, सवनाही, वारली, मधुबनी आदि नामों से पहचाने जाते हैं। आगे हम इन प्रमुख चित्रकारी परंपराओं को क्रमवार समझने का प्रयास करते हैं।

भित्ति चित्र-भित्ति चित्र सभी जनजातियों में लोकप्रिय हैं, किंतु विशेष पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवा अपने घरों को सजाने हेतु इन्हें विशेष प्रेम से बनाती है। उनकी चित्रवस्तु में पशु-पक्षी, पत्तियाँ, लताएँ और ज्यामितीय आकृतियाँ प्रमुख हैं। चूँकि ये समुदाय आज भी प्रकृति के अत्यंत समीप और सीमित संसाधनों के मध्य जीवन जी रहा है, इसलिए उनकी कला में वही संसार झलकता है जो वे प्रतिदिन देखते-जीते हैं। दीवारें, चौखट, रोशनदान सब इनका कैनवास हैं। इनके पेड़-पौधों के चित्र सदैव ऊपर की ओर विस्तृत होते हैं, मानो यह संदेश देते हों कि मनुष्य का लक्ष्य सदैव उत्थान की ओर होना चाहिए। कलियाँ या आधे-अधूरे फूल यहाँ कम ही मिलते हैं; प्रायः पूर्ण-विकसित पुष्प ही दिखते हैं  यह इस बात का सुन्दर संकेत है कि संघर्षपूर्ण जीवन के बावजूद उनका दृष्टिकोण अत्यंत सकारात्मक है। यह तो केवल उस विराट जनजातीय कला-संसार की एक छोटी सी झलक है। आधुनिकता की चकाचौंध में हम भूल गए हैं कि हमारे सांस्कृतिक मूल्य, कलात्मक परंपराएँ और जीवन-दर्शन जिस भूमि पर खड़े हैं, वह भूमि इन्हीं जनजातीय समुदायों ने अपने श्रम और संस्कारों से सिंचित की है।


भित्तिचित्र- भीमबेटका 

गोंड चित्रकला-गोंड जनजातीय समुदाय में प्रचलित यह कला प्रकृति को अपना मूल विषय मानती है। प्रथम दृष्टि में यह चित्र देवी दुर्गा का प्रतीत होता है, परंतु ध्यान से देखने पर पता चलता है कि अष्टभुजाओं में पक्षी, पैरों में मछली और आभामंडल के स्थान पर एक सघन वृक्ष अंकित है। इससे स्पष्ट है कि गोंड समाज भौतिक जीवन और प्रकृति में कोई भेद नहीं करता, बल्कि दोनों को एकात्म तत्व के रूप में देखता है।


गोंड चित्रकला

यह कला गोंड और उसकी 45 से अधिक उपजातियों, विशेषतः पारधियों, में आज भी अपने मूल रूप में विद्यमान है। दीवारों और जमीन पर चित्रांकन इनके दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नवगृह निर्माण हो या पुनर्निर्माण, प्रत्येक घर में इनका चित्रण अनिवार्य रूप से किया जाता है। स्थानीय रंग जैसे चारकोल, रंगीन मिट्टी, पौधों व पत्तियों का रस, गोबर, चूना-पत्थर पाउडर आदि इनकी प्रमुख सामग्री है। गोंडी कला को देश-विदेश में प्रसिद्ध करने में जनगढ़ सिंह श्याम का योगदान अद्भुत और अविस्मरणीय है।

वारली चित्रकला- महाराष्ट्र और सह्याद्री पर्वतमाला की उत्तरी श्रेणी में निवास करने वाली वारली जनजाति द्वारा निर्मित होने के कारण इसे वारली चित्रकला कहा जाता है। इन जनजातियों का संकेन्द्रण गुजरात, दादरा-नगर हवेली और दमन-दीव में भी है। लगभग 2500 वर्ष पुरानी यह कला दैनिक जीवन की गतिविधियों को केंद्र में रखती है। ग्रामीणजन, खेतों में कार्यरत किसान, पानी भरती महिलाएँ, चरवाहे - इन सभी का चित्रांकन अत्यंत सौंदर्यपूर्ण ढंग से किया जाता है।इस कला का सबसे रोचक पक्ष इसका सीमित रंग-प्रयोग है: प्रायः काला-सफेद या गेरुआ-सफेद। इतनी सरल पैलेट के बावजूद यह कला ग्रामीणों से लेकर शहरी कला-प्रेमियों तक समान रूप से लोकप्रिय है।


वारली चित्रकला

वारली चित्रों में चावल के पेस्ट से मिट्टी की दीवारों पर ज्यामितीय आकृतियाँ उकेरी जाती हैं। वेदों में वर्णित यज्ञीय ज्यामिति की स्मृति यहाँ सजीव प्रतीत होती है। वृत्त का प्रयोग इनकी दार्शनिक दृष्टि को दर्शाता है कि जीवन एक बिंदु से आरंभ होकर उसी पर समाप्त होता है और समस्त जीवन इसी चक्र के चारों ओर घूमता रहता है।आज घरों की दीवारों, कपड़ों और शोपीस के रूप में वारली भारत की सबसे लोकप्रिय जनजातीय कलाओं में से एक है।

कोहबर चित्रकला (सोहराई कला)-  झारखंड के हजारीबाग जिले से उपजी यह कला कोहबर चित्रकला या सोहराई कला के नाम से जानी जाती है। “कोह” अर्थात खोह यानी गुफा, और “बर” अर्थात दूल्हा- इस प्रकार कोहबर का अर्थ हुआ दूल्हे का कमरा। यह चित्रकला झारखंड की प्राचीन गुफा-कला का आधुनिक रूप है और आज भी उत्तरप्रदेश व बिहार में पारंपरिक विवाहों में प्रयुक्त होती है। विवाह के पश्चात जब वर-वधु को देवी-देवताओं के कक्ष में ले जाया जाता है, तब उस पूजाघर में कोहबर का अंकन अनिवार्य माना जाता है। यह परंपरा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भले समाज के स्वरूप बदलते गए हों, किंतु संस्कारों का मूल भाव शाश्वत है।


कोहबर कला 

यह चित्रण मिट्टी की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से किया जाता है और इसे बनाने की पात्रता मुख्यतः उन महिलाओं को होती है जिन्होंने गृहस्थ जीवन के कुछ वर्ष पूरे कर लिए हों। कोहबर में पूजा की दिशा आग्नेय कोण ही मानी जाती है, जो वैदिक परंपरा का अनुगमन है। चारों कोनों में केले का रोपण कदली वन की साधना-परंपरा का प्रतीक है। 2024 में बिहार में इसकी पहली प्रदर्शन-शाला आयोजित होने के बाद यह कला पुनः चर्चाओं में आई। इसकी प्राचीनता के बारे में मान्यता है कि राम-सीता विवाह के पश्चात सीता जी का कोहबर माता पार्वती ने स्वयं बनाया था।

आज हम जिन परिष्कृत कलाओं का आनंद लेते हैं, वे इनके ही पुराने बीजों से विकसित हुई हैं। जनजातीय समाज हमारे सांस्कृतिक इतिहास के न केवल पुरोधा हैं, बल्कि उस मूल स्वरूप के सर्वोत्तम संरक्षक भी हैं जिसे हमने आधुनिकता की दौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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