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उत्तर से दक्षिण तक प्रेम समरसता और लोकमंगल की यात्रा

उत्तर से दक्षिण तक प्रेम समरसता और लोकमंगल की यात्रा


भगवान श्रीराम का वनवास केवल किसी निर्वासित राजकुमार की भौगोलिक यात्रा भर नहीं था, अपितु यह भारतवर्ष को सांस्कृतिक और भावात्मक एकता के सूत्र में पिरोने का एक महाभियान था। डॉ. श्रद्धा सिंह यादव जी का यह लेख श्रीराम की उसी उत्तर से दक्षिण तक की यात्रा का अत्यन्त सजीव और मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। निषादराज गुह से उनकी आत्मीय मैत्री, केवट की निश्छल श्रद्धा और माता शबरी के अगाध प्रेम के प्रसंग यह सिद्ध करते हैं कि श्रीराम के लिए जाति या वैभव का कोई महत्त्व नहीं था। यह लेख हमें समझाता है कि प्रेम, समरसता और करुणा ही वह शाश्वत शक्ति है जो एक आदर्श समाज का निर्माण कर सकती है।


भारतीय संस्कृति के विराट आलोक में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का व्यक्तित्व केवल एक पौराणिक चरित्र या धार्मिक प्रतीक भर नहीं है। वे मर्यादा, करुणा और लोककल्याण की पुनीत भावना से दीप्त एक ऐसा सर्वोच्च आदर्श हैं जिसने सहस्राब्दियों से भारतीय जनमानस को दिशा प्रदान की है। श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन अनेक प्रेरणादायी प्रसंगों से आलोकित है, परन्तु उनका चौदह वर्ष का वनवास काल विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

पिता की आज्ञा के पालन हेतु अयोध्या से प्रस्थान
पिता की आज्ञा के पालन हेतु अयोध्या से प्रस्थान

यह वनवास केवल किन्हीं राजकीय परिस्थितियों का परिणाम मात्र नहीं था। वस्तुतः यह एक ऐसी महान् सांस्कृतिक और मानवीय यात्रा थी जिसमें श्रीराम ने उत्तर से दक्षिण तक चलते हुए असंख्य वनवासियों के हृदय में प्रेम, विश्वास और आत्मीयता का अखंड दीप प्रज्ज्वलित किया।अयोध्या के राजमहलों से लेकर दंडकारण्य की नीरव पगडंडियों तक का यह दुर्गम मार्ग श्रीराम के असीम त्याग, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा की अद्भुत गाथा है।

जब पिता की आज्ञा और रघुकुल की मर्यादा की रक्षा के लिए श्रीराम ने वनवास सहर्ष स्वीकार किया, तब उन्होंने अपने मुखमंडल पर किसी भी प्रकार का क्षोभ प्रकट नहीं किया। उनके लिए धर्म का पालन ही सर्वोपरि लक्ष्य था। अपनी सहचरी माता सीता और अनुज भ्राता लक्ष्मण के साथ उन्होंने अत्यन्त सहज भाव से वन की ओर प्रस्थान किया। इस प्रकार उस सुदीर्घ यात्रा का आरम्भ हुआ, जिसने सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक चेतना को एक अटूट सूत्र में बांधने का ऐतिहासिक कार्य किया।

वनगमन के प्रारम्भिक चरण में जब श्रीराम गंगा नदी के तट पर पहुँचे, तब उनकी भेंट निषादराज गुह से हुई। निषादराज गुह वनवासी समुदाय के एक सम्मानित प्रधान थे। यदि सामाजिक दृष्टि से विचार किया जाए, तो वे अयोध्या के राजपरिवार से सर्वथा भिन्न स्थिति में थे। किन्तु भगवान राम ने उनके साथ जिस अगाध आत्मीयता का व्यवहार किया, वह आज भी मानवता के लिए अत्यन्त प्रेरक है।

राम-गूह मैत्री: गूढ़ मित्रता का अनुपम उदाहरण
राम-गूह मैत्री: गूढ़ मित्रता का अनुपम उदाहरण

उनका संवाद यह प्रमाणित करता है कि श्रीराम का विशाल हृदय सामाजिक विभाजन में बंधा हुआ नहीं था। उन्होंने निषादराज को अपना अत्यन्त प्रिय मित्र माना और उनके निश्छल प्रेम को गरिमा के साथ स्वीकार किया। गंगा नदी के पावन तट पर एक और अत्यन्त विलक्षण घटना घटित होती है जिसे हम केवट के प्रसंग के रूप में जानते हैं। जब श्रीराम को गंगा नदी के पार जाना था, तब केवट अपनी नाव लेकर उपस्थित हुआ।

परन्तु उसने प्रभु को नाव पर बैठाने के स्थान पर अत्यन्त विनम्रतापूर्वक यह निवेदन किया कि वह सबसे पहले अपने प्रभु के श्रीचरणों को धोना चाहता है। केवट के मन में यह अत्यन्त सरल विश्वास था कि जिन ईश्वरीय चरणों की पावन धूलि से पत्थर भी चेतन स्त्री बन सकता है, कहीं उसकी काठ की नाव भी कोई नारी न बन जाए। करुणानिधान श्रीराम ने अपने उस अनन्य भक्त की इस भावपूर्ण प्रार्थना को मुसकान के साथ स्वीकार कर लिया।

केवट ने अत्यन्त श्रद्धा से चरण पखारे और ससम्मान गंगा पार पहुँचाया। श्रीराम ने अपने आचरण से सिद्ध कर दिया कि महानता का आकलन ऊँचे पद से नहीं, अपितु हृदय की निष्ठा से ही किया जाना चाहिए। श्रीराम की यह वनवास यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, उसका सांस्कृतिक प्रभाव भी विस्तृत होता जाता है। घने वनों, दुर्गम पर्वतों और शान्त आश्रमों से होकर श्रीराम निरन्तर दक्षिण दिशा की ओर अग्रसर होते हैं।

केवट के प्रेम का मान बढ़ाते हुए श्री राम
केवट के प्रेम का मान बढ़ाते हुए श्री राम 

इस यात्रा में वे ऋषि मुनियों को धर्म का उपदेश देते हैं और जनसाधारण के त्रस्त जीवन में नई आशा का संचार करते हैं। इसी यात्रा का एक अन्य अत्यन्त भावपूर्ण प्रसंग माता शबरी का है। पम्पा सरोवर के तट पर निवास करने वाली शबरी एक वयोवृद्ध भील स्त्री थी। तत्कालीन समाज की दृष्टि में वह उपेक्षित थी, किन्तु उसके हृदय में श्रीराम की भक्ति का अनन्त सागर उमड़ता रहता था।

अपने गुरु के वचन पर विश्वास रखते हुए शबरी प्रतिदिन अपने आराध्य के स्वागत की नित्य नई तैयारियाँ करती रहती थी। वर्षों की प्रतीक्षा के पश्चात जब अन्ततः श्रीराम उसकी कुटिया में पधारे, तब शबरी के आनन्द का कोई ठिकाना नहीं रहा। उसने अत्यन्त वात्सल्य के साथ अपने प्रभु को खाने के लिए जंगली बेर प्रस्तुत किए। शबरी प्रत्येक बेर को पहले स्वयं चखकर देखती थी कि कहीं वह खट्टा तो नहीं है।

सामान्य मानदंडों के अनुसार किसी का जूठा फल खिलाना सर्वथा अनुचित था, किन्तु भक्तवत्सल श्रीराम ने शबरी के उन जूठे बेरों को अत्यन्त प्रेम और आदर के साथ स्वीकार किया। इस प्रसंग में यह दार्शनिक सन्देश निहित है कि ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए बाह्य आडम्बरों का कोई महत्त्व नहीं होता। शबरी की निश्छल भक्ति ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची श्रद्धा सामाजिक सीमाओं की मोहताज नहीं होती।

माता शबरी की निश्छल भक्ति और लम्बी प्रतीक्षा का प्रतिफल
माता शबरी की निश्छल भक्ति और लम्बी प्रतीक्षा का प्रतिफल

वनवासी राम की यह सुदीर्घ यात्रा वास्तव में भारतीय समाज की सांस्कृतिक एकता का परम पावन प्रतीक है। उत्तर भारत के गंगातट से लेकर सुदूर दक्षिण के पम्पा सरोवर तक फैली इस महायात्रा में भारत की विविध जनजातियाँ और जीवन पद्धतियाँ एक ही भावधारा में प्रवाहित होती दिखाई देती हैं। श्रीराम जहाँ-जहाँ से गुजरे, वहाँ-वहाँ उन्होंने अपनी अपार करुणा से असंख्य वनवासियों के हृदयों को जीत लिया।

चरण-रज के प्रभाव से पावन हुए स्थल
चरण-रज के प्रभाव से पावन हुए स्थल 

यही कारण है कि भगवान श्रीराम सम्पूर्ण भारतवर्ष के सर्वमान्य लोकनायक और जन-जन के आराध्य बन गए। उनकी कथा में जो समरसता और मानवीयता का सन्देश निहित है, वह आज भी प्रासंगिक है। आधुनिक युग में जब हमारा समाज अनेक प्रकार के वैचारिक विभाजनों और संघर्षों से जूझता हुआ दिखाई देता है, तब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की यह वनवासी यात्रा हमें स्मरण कराती है कि सच्चा धर्म मानवता की निस्वार्थ रक्षा में ही निहित है।

समाज में व्याप्त भेदों को मिटाकर प्रेम और आपसी विश्वास की स्थापना करना ही वह अजेय शक्ति है जो राष्ट्र को समृद्ध बना सकती है। निषादराज गुह का निश्छल स्नेह, केवट की अपार श्रद्धा और माता शबरी की प्रतीक्षा ये पावन प्रसंग इस ध्रुव सत्य को उजागर करते हैं कि जब हृदय में प्रेम उत्पन्न होता है, तब संसार की कोई दूरी मनुष्यों को अलग नहीं कर सकती। श्रीराम का यह वनवासी रूप आज भी भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता और लोकमंगल का एक अमर और शाश्वत प्रतीक है।

-डॉ. श्रद्धा सिंह यादव
(लेखिका गत 11 वर्षों से ‘मध्य प्रदेश संकेत’ नामक मासिक पत्रिका की संपादक हैं। साथ-साथ वे आर्टव्यू कंपनी, भोपाल में वरिष्ठ शोधकर्ता और अखिल भारतीय साहित्य परिषद् भोपाल की कार्यकारिणी सदस्य हैं।)

 

 

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