देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य
September 04, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल अष्टमी | रविवार
नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा | योग: सुकर्मा | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

करुणा सागर पण्डा जी अपने इस आलेख में अत्यन्त भावपूर्ण और दार्शनिक शैली में यह स्पष्ट कर रहे हैं कि किस प्रकार परमेश्वर ने स्वयं अपने लिए माता पिता का चयन किया और देवता से मनुष्य बनने की कठिन प्रक्रिया को स्वीकारा। दक्षिण कोसल के 'भांचा राम' से लेकर रामनामी सम्प्रदाय की निर्गुण उपासना और विदेशी आक्रान्ताओं के घोर अन्धकार में प्रज्ज्वलित भक्ति आन्दोलन की लौ तक, यह लेख रामकथा के उन अनछुए और अद्भुत पहलुओं को उजागर करता है जहाँ ईश्वर भी लोक की परम्पराओं में पूरी तरह से ढल जाता है।
अपने हर अवतार में जगतपिता बनकर ही अवतरित होने वाले ईश्वर को जब पहली बार इस धरती पर किसी का पुत्र बनकर जन्म लेना पड़ा, तो उन्होंने अपने जन्म के लिए उस गर्भ को चुना जो दक्षिण कोसल (आज का छत्तीसगढ़) की पुत्री कौशल्या का गर्भ था। इसलिए कौशल्यानन्दन राम भले ही किसी योगी के लिए परमतत्त्व और किसी साधक के लिए सम्बल क्यों न हों, छत्तीसगढ़ के निवासियों के हृदय में वे ईश्वर के अतिरिक्त एक परम स्नेही भांजा भी हैं। राम छत्तीसगढ़ के लिए 'राजा राम' नहीं अपितु 'भांचा राम' हैं। तभी तो छत्तीसगढ़ का लोक इस गीत को सदियों से गाता आ रहा है:
"कौशल्या के दुलरवा लइका, ओला राम कहिथें गा।
भांचा बछरु ए ओहर हमर, जम्मो परान कहिथें गा॥"

छत्तीसगढ़ में राम को भांजे का दर्जा प्राप्त है
मनुष्य अपने माता-पिता नहीं चुन सकता, उसे माता-पिता प्रारब्ध से ही मिलते हैं। परन्तु ईश्वर? वह स्वायत्त है, उसकी अपनी सत्ता है। वह हमेशा धर्म को धारण कर सकने वाले पिता का और पोषण के अतिरिक्त संस्कार दे सकने वाली माता का ही चयन करता है। प्रभु राम ने भी तो वही किया था। देखिए न! दीनदयाल राम जब प्रकट हुए तो हर्षित होकर महतारी कौशल्या उन्हें कहती हैं कि हे पुत्र! इस चतुर्भुज रूप को अब त्याग भी दो। यह समय शंख, चक्र, गदा, पद्म दिखाने का नहीं अपितु अत्यन्त ऊँचे स्वर में रोने का है। अपनी शिशु लीला को अब आरम्भ करो पुत्र! प्रजा बाहर ढोल नगाड़े के साथ तुम्हारे रोने की ही प्रतीक्षा कर रही है।
परन्तु मैं क्यों रोऊँ माँ? मैं रोने थोड़ी न आया हूँ, मैं तो लोगों के आंसू पोंछने आया हूँ। लोक में एक रोते हुए व्यक्ति को दूसरा रोता हुआ व्यक्ति ही अपना लगता है पुत्र! एक मुस्कुराता मनुष्य भला रोने वाले का दुःख क्या ही जानेगा? इसलिए रोओ पुत्र! तुम रोओ! माता कौशल्या देवता राम को मनुष्य राम बनने की शिक्षा दे रहीं थीं।
माँ की बात को समझकर राम रोना आरम्भ करते हैं। राम को रोता सुन समूची अयोध्या मुस्कुरा उठती है और मुस्कुरा उठता है समूचा दक्षिण कोसल। दक्षिण कोसल ने तो अपनी मुस्कान के साथ उस वर्ष की लहलहाती फसल को ही राम के नाम कर दिया था। फसल को राम के नाम करने की वह परम्परा आज तक मुरझाई नहीं है। आज भी छत्तीसगढ़ के बहुतायत किसान अनाज की पहली बोरी अपने भांजे राम के नाम पर ही तौलते हैं।
राम धर्म विग्रह थे। वे जानते थे कि उन्हें इस प्रेम का आभार चुकाना है, इसलिए जब अवसर आया तो उन्होंने अपने वनवास के कुछ वर्ष छत्तीसगढ़ में उत्तर के कोरिया से दक्षिण के सुकमा तक गुजार कर ननिहाल के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की। रामायण काल में राम छत्तीसगढ़ के सीतामढ़ी हरचौका, शबरी आश्रम, तुरतुरिया, रामगढ़, सिहावा और रामाराम हर स्थान में दिखते हैं।
यह कहना कदापि अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राम छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं लोकजीवन का अभिन्न अंग हैं। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में "राम से बड़ा राम का नाम" वाले भाव को देखना है तो आप छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज को देखिए। आप उनकी देह में, वस्त्र में, बातचीत, बोली और व्यवहार में तथा उनके अभिवादन से लेकर सम्बोधन तक सभी जगह राम का नाम ही देखेंगे। यह राम के निराकार रूप का उपासक समाज है। इन्होंने मूर्तिमान राम को देवस्थल से उठाकर उन्हें पूरा का पूरा अपने जीवन में ही उतार लिया है। ये लोग यथार्थ में राम नाम को जी रहे हैं।

राम का नाम है रामनामी समुदाय का जीवन
परन्तु क्या आप इस रामनामी समाज को जानते हैं? नहीं! तो इन्हें जानने और समझने के लिए आपको तनिक भक्ति आन्दोलन को समझना पड़ेगा। सुदूर मरुस्थल से आए असभ्य और बर्बर आक्रान्ता यह जानते थे कि वे अपने साम्राज्य और पन्थ का विस्तार भारत के गर्व और आत्मसम्मान का दमन करके ही कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक स्थलों का विध्वंस कर भारतवर्ष की ऊर्जा, उत्साह और ज्ञान के केन्द्रों को भरपूर तरीके से नष्ट करना आरम्भ कर दिया। उन अशिष्ट लुटेरों ने अधर्म को उसी तरह चरम पर पहुँचा दिया जिस प्रकार बीते युगों में राक्षसों ने पहुँचाया था।
ऐसे समय में धर्मदीप की लौ को अखंड बनाए रखने के लिए कुछ ऐसे पन्थ बने जिन्हें अधर्म के उस कालखंड में भी धर्म को जनमानस में सजीव बनाए रखना था। बस यही था भक्ति आन्दोलन, जो आज भी भक्ति की अनेक धाराओं में देखने को मिलता है। लगभग 1890 में स्थापित छत्तीसगढ़ का यह रामनामी समाज उसी भक्ति आन्दोलन की एक आध्यात्मिक धारा है जो आज भी पूस की पूर्णिमा पर आयोजित होने वाले भजन मेले में राम के गुणों को और राम की महिमा को "राम नाम ला जी ले रे संगी" गाकर लोकचेतना में प्रवाहित कर रहा है।
जय राम जी की! हमर भांचा राम!
- करुणासागर पण्डा
(लेखक लोक-परंपराओं के प्रखर व्याख्याता हैं, जो अपनी लेखनी से सोशल मीडिया पर भारतीयता व सांस्कृतिक मूल्यों के प्रसार हेतु कार्यरत हैं।)
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