चंद्र कलाओं पर आधारित हिन्दू त्यौहार : छेरछेरा पुन्नी विशेष
April 28, 2025
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | शनिवार
नक्षत्र: हस्त | योग: शुभ | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 12 सितंबर 2026

भारत के महान योद्धा राजा, रणनीतिकार, कुशल प्रबुद्ध सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित वीर सपूत एवं भारतीय गणराज्य के महानायक शिवा जी का जन्म 19 फरवरी को मराठा परिवार में हुआ था। माता जीजा जी बाई धार्मिक स्वभाव की कुशल व्यवहार की वीरांगना नारी थीं। उन्होंने बालक शिवा जी का पालन- पोषण रामायण, महाभारत की राम, कृष्ण, अर्जुन, वीर हनुमान की शौर्य गाथाएँ और अन्य भारतीय वीरात्माओं की कथाएँ सुना कर और शिक्षा देकर किया।
जिसमें शिवाजी को महान सम्राट शेर के दाँत गिनने वाले दुष्यंत के पुत्र भारत, आचार्य चाणक्य, चंद्रगुप्त, रानी अहिल्या बाई आदि का जीवन चरित्र विशेष प्रभावित किया। युवावस्था में आते ही शत्रुओं पर आक्रमण कर उनके किले जीतने लगे। पुरंदर और तोरण के किलों पर अधिकार जमाते ही उनके नाम और काम का डंका बजने लगा। पूरे दक्षिण में धूम मचने के साथ यह खबर आगरा और दिल्ली तक पहुँची। वीर शिवाजी का नाम सुनते ही अत्याचारी यवन और उनके सभी शासक भयभीत होकर बगलें झांकने लगे।
शिवजी महाराज ने 1674 में मराठा साम्राज्य की नींव रखी और कई वर्षों तक औरंगजेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया।1674 तक उन सभी प्रदेशों में अधिकार कर लिया जो पुरन्दर की सन्धि के अंतर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे।
पश्चिम महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवा जी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा परन्तु मुस्लिम सैनिकों द्वारा उन ब्राह्मणों को जान से मार दिए जाने की धमकी दी गई। शिवाजी के सचिव बाला जी ने अपने तीन दूतों को काशी भेजा, ब्राह्मण अति प्रसन्न हुए पर काशी उस समय मुगलों के अधीन था।
मुगल सैनिकों द्वारा पकड़े जाने पर उन्होंने तीर्थ यात्रा का बहाना बनाते हुये कहा कि शिवाजी के वंश की पूरी जानकारी जाने बिना काशी का कोई ब्राह्मण राज्याभिषेक नहीं करेगा। यह सुन मुगल सरदार ने ब्राह्मणों को छोड़ दिया। इसके ठीक दो दिन बाद शिवाजी का राज्याभिषेक किया गया।
इस समारोह में शिवाजी ने विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों एवं विदेशी व्यापारियों को भी आमंत्रित किया। राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही इनकी माता जी का स्वर्गवास हो गया। 4 अक्टूबर1674 को शिवाजी ने दूसरी बार छत्रपति की उपाधि ग्रहण की। इस समारोह में हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का उदघोष करते हुए स्वतंत्र शासक के रूप में अपने नाम का सिक्का भी चलाया। शिवाजी ने अनुशासित सेना व सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों के सहयोग से सुव्यवस्थित प्रशासन की स्थापना की।
शत्रुओं के दमन के लिए समर विद्या में नवाचार किया और गोरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) की नई शैली विकसित की। भारत में सर्वप्रथम शिवाजी ने ही इस शैली को आरंभ किया। गोरिल्ला युद्ध एक प्रकार का छापामार युद्ध है जिसमें अर्ध सैनिकों की टुकड़ियां अथवा अनियमित सैनिकों द्वारा शत्रु सेना के पीछे या पार्श्व से आक्रमण कर लड़ा जाता है। इस युद्ध का वर्णन उस काल में रचित शिवसूत्र में मिलता है।
छत्रपति शिवाजी ने हिन्दू पद पादशाही की स्थापना उस समय की जब पूरे भारत में हिन्दू राजाओं की संख्या नहीं के बराबर थी। उत्तर एवं मध्य भारत में मुगलों का आतंक फैला था और दक्षिण में अदिलशाही थी। ऐसे में एक किले को जीतकर मुगलिया सल्तनत को समाप्त कर हिंदुओं को गौरवपूर्ण स्थान प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तर भारत के कवि भूषण ने शिवाबावनी में शिवाजी का गौरवगान करते हुए लिखा है-
'कासी हू की कला गई मथुरा मसित भई
शिवाजी न होतो तो सुनति होती सबकी'
विनायक दामोदर सावरकर ने इन्हीं शिवाजी महाराज का जीवन चरित्र अपनी पुस्तक हिंदू पद पादशाही में किया है. और हिंदुत्व की वास्तविक प्रेरणा का स्रोत भी वही बना है। सावरकर लिखते हैं कि हिंदू मुस्लिम एकता उस दिन से थोड़ा बहुत सम्भव होने लगी जिस दिन सन् 1761 में हिंदू राष्ट्र के वीरों ने दिल्ली में विजय पताका फहराई और मुग़लों का तख़्त ताज और झंडा वीर सेनानी भाऊराव और नवयुवक विश्वास राव के चरणों में टुकड़े-टुकड़े हो कर धूल में मिल गया।
क्योंकि उस दिन हिन्दुओं ने अपनी खोई हुई स्वतंत्रता प्राप्त की और इस विश्व के रंग मंच पर एक जीवित राष्ट्र के रूप में खड़े रहने के अधिकार का प्रमाण दिया. उन्होंने एक विजेता पर विजय पाई और तब वह समय था जब यदि मुग़ल चाहता तो देशवासी और मित्र के नाते उसे गले लगाया जा सकता था. इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो मराठों का इतिहास हिंदू मुस्लिम एकता की राह में बाधा होने के स्थान पर चिरस्थायी एकता के मार्ग का निर्देश करता है जो कि इससे पहले दुर्गम था।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने शासन में किसी भी जाति, धर्म मत,पंथ,सम्प्रदाय के साथ मतभेद नहीं किया। राज्य
संचालन से लेकर नौ सेना निर्माण और युद्ध नीति सुसंगठित थी। इन्ही को आधार बना हिंदी साम्राज्य की सेना दिल्ली और सिंधु तक पहुंची थी।
संस्कृति के चार अध्याय में रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि “देश में हिंदू मुस्लिम एकता तभी सम्भव है जब मुसलमान विजेता और हिंदू विज़ित का भाव त्याग दें।” शायद 1761 मे इसी भाव का कुछ मात्रा में परिमार्जन हुआ था।
सावरकर आगे लिखते हैं, “यह हिंदू पद पादशाही अर्थात् स्वतंत्र हिंदू साम्राज्य की स्थापना का उच्च आदर्श ही था जिसने हिंदू स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले नेताओं को दृढ़ विश्वास के साथ उभारा और उसमें अपार शक्ति भर दी, और मराठों को पीढ़ी दर पीढ़ी इसके लिए प्रयत्नशील रखा।”
शिवाजी पर मुस्लिम विरोधी होने का दोषारोपण किया जाता रहा है परंतु सत्यता यह है कि उनकी सेना में अनेक
मुस्लिम नायक, सेनानियों, सरदार और सूबेदार जैसे लोग भी थे। शिवाजी का संघर्ष औरंगजेब और उसकी छत्रछाया में पलने वाले लोगों की कट्टरता और उद्दंडता के विरूद्ध था।
शिवाजी ने प्राचीन भारतीय हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं और दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया उनका मानना था कि भाषा की गुलामी विचारों की गुलामी है। फलस्वरूप उन्होंने मुगलों की फ़ारसी भाषा का बहिष्कार किया जो सर्वत्र थोपी जा रही थी। वे अपना देश अपनी भाषा के पक्षधर थे।
शिवाजी कहते थे कि दुश्मन से निपटने की नीतियाँ अपनी मौलिक भाषा में होने से आपकी कामयाबी की संभावनाएं बढ़ जाती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी उन्होंने दिया। जब औरंगजेब ने संधि के बहाने शिवजी को आगरा बुलाकर नजरबंद किया तो वे बड़ी चतुराई से उनकी कैद से भाग निकले। वे अपनी सेवा में लगे सभी लोगों से संस्कृत और मराठी में संवाद करते थे जिन्हें मुगलों के विश्वासपात्र समझ पाए और उनकी रणनीति की गोपनीयता बनी रहती थी।
शिवाजी ने पारंपरिक हिन्दू मूल्यों तथा शिक्षा पर विशेष बल दिया। वे भारतीय इतिहास और राजनीति से परिचित थे तथा शुक्राचार्य व कौटिल्य को आदर्श मानकर कुटनीति का सहारा लेना उचित समझा। शिवाजी दुश्मन पर त्वरित कार्यवाही के पक्षधर नही थे। उनका कहना था कि 'ज्यादातर युद्ध विचारों की पृष्ठभूमि में उपजते हैं,उन्हें विचार पूर्व ही करना चाहिए।'
प्रमाण स्वरूप जब बीजापुर के सुल्तान ने औरंगजेब की शह पर शिवाजी के पिता शाहजी राजे को छलपूर्वक बंदी बना लिया तो उन्होंने कूटनीति का सहारा लेकर बीजापुर के सुल्तान से संधि करके बाद में बीजापुर पर हमला कर किले पर कब्जा कर सुल्तान को मौत के घाट उतार दिया।
मुगलों की नीति थी कि पुत्र सम्राट बनने के लिए अपने पिता को या तो बन्दी बनाते थे या कत्ल कर देते थे। परंतु शिवाजी ने 1674 में अपने पिता जी के बाद ही अपना राज्याभिषेक किया। शिवाजी ने अन्य क्षेत्रों के राजाओं को एकजुट होने का आह्वान किया। उस समय पाकिस्तान, अफगानिस्तान, वर्मा, श्रीलंका, नेपाल, भुटान, बांग्लादेश, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जकार्ता आदि का भू- भाग वृहद भारतीय साम्राज्य के ही अंग थे। यदि उनकी बात मान ली जाती तो 500 वर्षों तक स्वतंत्रता की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।
कुछ राजाओं के तर्क थे कि मुगल देश का विकास कर रहे हैं, तब शिवाजी का कहना था कि आपको लूटकर आपकी अस्मिता को भ्रष्ट करके आपको मज़दूरी में लगाकर जो विकास हो रहा है वह आपकी सभ्यता और संस्कृति को मटियामेट कर देगा। वे कहते थे कि देश को छलपूर्वक विभाजित करके यहां की संपदा इस्लामिक देशों को भेजी जा रही है।
बीजापुर के शासक ने शिवाजी को जीवित अथवा मुर्दा पकड़ लाने का आदेश देकर अपने मक्कार सेनापति अफजल खां को भेजा. उसने भाईचारे व सुलह का झूठा नाटक रचकर शिवाजी को अपनी बांहों के घेरे में लेकर मारना चाहा, पर समझदार शिवाजी के हाथ में छिपे बघनख का शिकार होकर वह स्वयं मारा गया। इससे उसकी सेनाएं अपने सेनापति को मरा पाकर वहां से दुम दबाकर भाग गईं।
शिवाजी की इस वीरता के कारण ही उन्हें एक आदर्श एवं महान राष्ट्रपुरुष के रूप में स्वीकारा जाता है। इसी के चलते छत्रपति शिवाजी महाराज का 3 अप्रैल 1680 ई. में तीन सप्ताह की बीमारी के बाद रायगढ़ में स्वर्गवास हो गया। छत्रपति शिवाजी महाराज बहुमुखी प्रतिभा एक भारतीय शासक थे जिन्हें अमर वीर स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्वीकारा जाता है। वे राष्ट्रीयता के जीवंत प्रतीक और परिचायक थे।
आलेख
श्रीमती रेखा पाण्डेय (लिपि) हिन्दी व्याख्याता अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़
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