आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

भारतीय संस्कृति में अरण्य

भारतीय संस्कृति में अरण्य

 


आज 21 मार्च को सम्पूर्ण विश्व 'विश्व वानिकी दिवस' मना रहा है। इस उपलक्ष्य पर जब हम भारत की सुदीर्घ और पावन विरासत का अवलोकन करते हैं, तो यह निर्विवाद सत्य उद्घाटित होता है कि हमारी भारतीय संस्कृति मूलतः 'आरण्यक संस्कृति' ही है। इसी कारण भारत सदैव से एक अध्यात्म-प्रधान देश भी रहा है, जहाँ हमारे ऋषि-मुनियों ने भौतिक जगत के समस्त अंगीभूत घटकों में तादात्म्य साक्षात्कार किया। उन्होंने इस सत्य का उद्घोष किया कि जिस प्रकार मनुष्य उस विराट चेतना की स्थूल अभिव्यक्ति है, ठीक उसी प्रकार यह सम्पूर्ण अरण्य-नद-पर्वत समेत सृष्टि के अन्य सभी घटक भी उसी विराट सत्ता की स्थूल अभिव्यक्ति है। तो आइये अरण्य में उपजी एकात्म दृष्टि से सम्पन्न हमारी महान् संस्कृति में अरण्यों के महत्त्व पर थोड़ी चर्चा करें!


विश्व वानिकी दिवस पर विशेष
हमारी महान् आरण्यक संस्कृति में अरण्य

आरम्भिक काल से अरण्य न केवल मानव के आश्रयस्थल रहे हैं, वरन् तब से ही वे मानव की दार्शनिक चेतना के भी स्रोत रहे हैं। ये अरण्य ही हमारे ऋषियों की तपोभूमि रहे हैं और इसलिए यह स्वाभाविक है कि  आज जिसे प्रकृतिपूजक कहा जाता है, हमारे उस भारतीय समाज में वनों के प्रति श्रद्धा भाव व्यक्त करने हमारी विभिन्न लोक परम्पराओं में एक सुदृढ़ परम्परा रही है। ऋग्वेद के माध्यम से श्रुति यह कहकर वनों का माहात्म्य बताती हैं कि ग्राम और नगर में तो जीवनदायिनी वनस्पतियों का रोपण करना पड़ता है, किन्तु निर्जन वनों, पर्वतों और कन्दराओं में वे स्वतः ही प्रादुर्भूत होती हैं।

ऋग्वेद के 'अरण्यानी सूक्त' (ऋ० १०|१४६) की देवता देवी अरण्यानी है। उनकी स्तुति करते हुए ऋषि कहते हैं कि वन (अरण्यानी) किसी को दुःख नहीं देते, किसी पर आक्रमण नहीं करते और यहाँ से खाने के लिए स्वादिष्ट फल प्राप्त होते हैं। इस सूक्त में कवि वन्य जीवों की आश्रयस्थली तथा समेत लोक को सुख देने वाली अरण्यानी देवी को प्रणाम करते हैं। भारतीय वाङ्मय में वन कोई भय का स्थान नहीं है, अपितु एक सुन्दर और निवास योग्य स्थान है। इस सूक्त की दूसरी ऋचा में वानप्रस्थ संन्यासिनी कहती है कि वन में बिना वीणा के ही संगीत सुनने को मिलता है, जब वृषारव नामक झींगुर अपने तीव्र स्वर की तान छेड़ता है और चिक्-चिक् शब्द करने वाला दूसरी जाती का झींगुर उसके पास आकर बैठकर ताल देता है। तब ऐसा प्रतीत होता है, वन में संगीत की संगति चल रही हो। यदि यजुर्वेद की बात करें, तो वहाँ श्रुति "मौष॑धीर्हिँसी॒" (यजु० ६.२२) कहकर वनस्पतियों के विनाश को पूर्णतया वर्जित करते हुए उनके प्रति की हिंसा न करने का स्पष्ट आदेश देती है। वह "नमो वृक्षेभ्यः" कहकर वनों को हमारा आदरणीय बताती है। (यजु० १६.१७)

देवी अरण्यानी का प्रतीकात्मक चित्रण, शांत वन और वन्य जीवों के साथ अरण्य संस्कृति का दृश्य
देवी अरण्यानी का प्रतीकात्मक चित्रण, शांत वन और वन्य जीवों के साथ अरण्य संस्कृति का दृश्य

यह तो हुई वैदिक साहित्य की बात! परन्तु ऐसा नहीं है कि श्रुति के ये श्रद्धाभाव केवल वेदमन्त्रों के रूप में ही अभिव्यक्त होते है। वास्तव में भारत की लोक-परम्पराएँ और शास्त्रीय-सिद्धान्त, दोनों ही, वनों के विषय में सदैव परस्पर अनुस्यूत रहे हैं। हमारी परम्परा में वृक्षों को साक्षात् पुत्र के समान स्वीकार किया गया है। बघेलखण्ड और उससे लगे बुन्देलखण्ड के कई भागों में आज भी पुत्र-जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आम के वृक्ष को रोपित कर उसका पुत्र की ही भाँति उपनयन संस्कार करने की पावन परम्परा दृष्टिगोचर होती है। पुत्र के विवाह से पूर्व आम के वृक्ष के विवाह की परम्परा भी हमारी अरण्योद्भवा संस्कृति का ही अप्रतिम अंग है, जहाँ आम के वृक्ष की ओट से माता को यह वचन दिया जाता है कि हे माता! में तुम्हारी सदा रक्षा करूंगा। इस क्षेत्र में आम के वृक्ष का विवाह होने के बाद ही उसके फलों को खाया जा सकता है। ये तो आज भी दिखलाई पड़ने वाली लोक परम्परा है। पर यदि हम इसे हमारे अतीत में खोजने निकले तो महाकवि कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' में ऐसी ही परम्परा का उल्लेख आता है। इसमें महर्षि कण्व द्वारा शकुन्तला की विदाई के समय 'वनज्योत्स्ना' नामक लता और 'सहकार' (आम का वृक्ष) के विवाह का प्रसंग (अभि० अंक ४) यह सिद्ध करता है कि हमारी दृष्टि में वनस्पति और सन्तान का स्थान एक समान आसन पर ही प्रतिष्ठित है। 

भारतीय परम्परा में वृक्ष पूजा और संरक्षण का दृश्य
भारतीय परम्परा में वृक्ष पूजा और संरक्षण का दृश्य

यहाँ तक हमने लोक की चर्चा की। अब हम शास्त्र की चर्चा करते हैं। तो हमारे शास्त्रों का यह स्पष्ट कहना है कि जो व्यक्ति वृक्ष लगाता है, वह स्वयं तीर्थस्वरूप हो जाता है और सदैव दान तथा यज्ञ करने वाले व्यक्ति के समान ही पुण्य का भागी बनता है। पुराण कहते हैं, "अपुत्रस्य हि पुत्रत्व पादपा इह कुर्वते।" अर्थात् वृक्ष पुत्रहीन को भी पुत्रवान् बना देते हैं। यहाँ वृक्षों को साक्षात् पुत्र का स्थान दिया गया है। मत्स्यपुराण में तो एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान मानकर वृक्षारोपण को असीम गौरव प्रदान किया गया है (मत्स्य० १५४.१९२), 

प्रकृति के प्रति अहिंसा और श्रद्धा को दर्शाता हुआ
प्रकृति के प्रति अहिंसा और श्रद्धा को दर्शाते हुए

दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।
दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः ।"

इसी श्लोक को आधार बनाकर वर्तमान पर्यावरण मंत्रालय ने "एक वृक्ष दस पुत्र समान" का घोषवाक्य निर्मित किया है। 

हमारे पूर्वज अरण्यों के संरक्षण हेतु अत्यन्त सजग थे। भारतीय परम्परा अनादिकाल से वृक्षों को प्राणवान मानती रही है। मनु ने मनुस्मृति में यह घोषणा की है कि "अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः" (म०स्मृ० १.४९) अर्थात् वृक्षों में आन्तरिक चेतना होती है और ये सुख-दुःख का भली-भाँति अनुभव करते हैं। मनु की इस घोषणा को लगभग दो-तीन सहस्र वर्षों पश्चात् महान भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस ने इसे आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में भी प्रमाणित किया। इसी संवेदनशीलता के कारण मनुस्मृति और मत्स्यपुराण में वृक्षों को काटने या उन्हें तनिक भी हानि पहुँचाने वालों के लिए कठोर दण्ड का विधान किया गया है। स्मृतिग्नथों व धर्मशास्त्रों में फलदार वृक्ष को काटने पर सुवर्ण दण्ड, तथा मार्ग, सीमा या जलाशय के समीप के वृक्ष को काटने पर दोगुना दण्ड विहित है। यहाँ तक कि एक तिनके को भी व्यर्थ काटने पर भी कार्षापण के दण्ड का शास्त्रीय विधान है।

परन्तु अरण्य संरक्षण का सबसे जाज्वल्यमान और व्यावहारिक दृष्टान्त हमें द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन-दर्शन में प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को वृक्षों की परोपकारिता का बोध कराते हुए कहते हैं कि ये वृक्ष इतने महान हैं कि ये केवल परोपकार के लिए ही जीवित रहते हैं। आँधी, वर्षा, और शीत को ये स्वयं सहन करते हैं और सम्पूर्ण प्राणियों को आश्रय देते हैं। ये अरण्य हमें पत्र, पुष्प, फल, छाया, मूल, वल्कल, काष्ठ, सुगन्ध, भस्म, गुठली और अंकुर प्रदान करके हमारी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। (भाग० १०.२२.३२-३५)

श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को वृक्षों की परोपकारिता का बोध कराते हुए
श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को वृक्षों की परोपकारिता का बोध कराते हुए

इतना ही नहीं श्रीकृष्ण का शैशवकाल वृन्दावन के सघन वनों में व्यतीत हुआ था। उस कालखण्ड में वृन्दावन में निवास करने वाले गोप-बालक अज्ञानतावश वनों को निरन्तर काट रहे थे और लकड़ियाँ बेच रहे थे, जिसके परिणामस्वरूप वृन्दावन वनों से विहीन होकर एक नगर का रूप धारण करता जा रहा था। जब श्रीकृष्ण ने वनों के इस अन्धाधुन्ध विनाश को देखा, तो यह उनके लिए अत्यन्त चिन्ता का विषय बन गया। अरण्यों के महत्त्व को पुनर्स्थापित करने हेतु उन्होंने अपने सखाओं और गोप बालकों के साथ एक अत्यन्त मार्मिक और युगांतरकारी संवाद किया, जो आज के युग में भी अत्यन्त प्रासंगिक है।

श्रीकृष्ण ने गोपों को समझाते हुए कहा कि "वयं वनचरा गोपा गोपा गोधनजीविनः। गावोऽस्मद्‌दैवतं विद्धि गिरयश्च वनानि च॥" अर्थात् हम वनवासी गोप हैं, गाएँ ही हमारा धन हैं, और हम उन्हीं पर आश्रित हैं। और ये गौएँ वनों पर आश्रित हैं। इसलिए ये हमारे देवता है। (हरिवंश पु० ५९.२०) यहाँ श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि ये अरण्य और पर्वत ही हमारा पालन-पोषण करते हैं, यहाँ शेर और व्याघ्र वन की रक्षा करते हैं और वृक्ष काटने वालों को भयभीत करते हैं। जो लोग वन पर आश्रित रहकर भी वन का विनाश करते हैं, वन उन्हें नष्ट कर देता है। इसी संवाद के माध्यम से श्रीकृष्ण ने देवराज इन्द्र की परम्परागत पूजा का खण्डन किया और गोवर्धन पर्वत तथा अरण्यों की पूजा का उपदेश दिया। यह पौराणिक कथा आज भी समाज को वन-संरक्षण का व्यावहारिक पाठ पढ़ा रही है। 

वृन्दावन के सघन वनों में गौओं के साथ श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप, प्रकृति और जीवन के संतुलन का प्रतीक
वृन्दावन के सघन वनों में गौओं के साथ श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप, प्रकृति और जीवन के संतुलन का प्रतीक

इसके अलावा हमारी संस्कृति में वृक्षों को पूर्वजों का स्वरूप भी मानता है। भारतीय परम्परा में मृतक की अन्त्येष्टि के समय ऋग्वेद के मृत्यु-सूक्त (मण्डल १०|सूक्त १६) का उच्चारण किया जाता है। इसमें तीसरी ऋचा में ऋषि एक मृतक को सम्बोधित करते हुए यह श्रेष्ठ कामना करता है कि वह अपने पुण्यों के प्रताप से पुनः वनस्पतियों और वृक्षों के रूप में इस धरा पर जन्म ले, "हितमोषधीषु प्रति तिष्ठा शरीरैः"। आज भी लोक में पूर्वजों के स्वरूप में कुलवृक्षों का महत्त्व हमें हमारी संस्कृति की निरन्तरता का बोध कराने के साथ-साथ वनों के प्रति हमारे उस उच्च श्रद्धाभाव का भी द्योतक है कि हम अपने मृत पूर्वजों के वृक्ष शरीर में आने की कामना करते हैं।

इस प्रकार हमने देखा कि जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त और मृत्यूपरान्त भी हमारी संस्कृति में वनों का क्या महत्त्व रहा है। और तो और हमारी संस्कृति के मेरूदण्ड कहे जाने वाले ग्रन्थ भी अरण्यों में रचे जाने के कारण आरण्यक कहलाते हैं। इसलिए आज की निरा जड़वादी विचारधाराओं के कोलाहल में हमें चाहिए कि हम पुनः अपनी संस्कृति के उन चिन्तन मूल्यों की ओर लौटें, जो हमें "सर्वभूतहितेरताः" की शिक्षा देती है। हम यह समझें कि वनों की रक्षा करना केवल शासन का दायित्व नहीं है, अपितु यह सम्पूर्ण मानव समाज का पुनीत कर्त्तव्य है। तो आइये विश्व वानिकी दिवस के इस पावन अवसर पर हम अपनी संस्कृति के मूलस्वरूप को, उसके सनातन मूल्यों को जानकर, समझकर उन्हें अपने जीवन में आत्मसात् करें। और सब मिलकर वनों के संवर्धन का पावन संकल्प लें, ताकि हमारी आज की पर्यावरणीय समस्याओं एक चिरन्तन समाधान मिले और वह युगों-युगों तक अक्षुण्ण रहे।

लोगों द्वारा सामूहिक वृक्षारोपण करते हुए दृश्य, वन संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता का आधुनिक प्रयास
लोगों द्वारा सामूहिक वृक्षारोपण करते हुए दृश्य

Follow us on social media and share!