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लोकसाहित्य में लोकसंस्कृति

लोकसाहित्य में लोकसंस्कृति

लोक शब्द अत्यंत व्यापक एवं विस्तार लिए हुए है जिसके अंतर्गत अनेक समाज समाहित होते हैं। साहित्य को हम समाज को दर्पण कहते हैं। इसी रूप में यदि हम लोक साहित्य को देखें तो उसे समाज का, संस्कृति का और लोकमानस का आईना कहा जा सकता है। इसके द्वारा हम किसी भी धरती, क्षेत्र, समुदाय या लोक के मन की गहराइयों में पहुंच कर संस्कारों की सलोनी सुगंध पा सकते हैं, माटी की महक महसूस कर सकते हैं और इस प्रकार संस्कृति की सलोनी सुगंध पा सकते हैं।

समाज लोक परम्परा का वाहक है। वहां लोक के विश्वास, रीति-रिवाज, जीवन-मूल्य, मान्यताएं और परम्परागत जीवन पद्धति के साथ-साथ चारित्रिक विशेषताएं, नैतिक मान्यताएं और मूल्य तथा मूल सामाजिक संरचना में समाहित वैचारिक संजीवनी समाहित होती है।

लोक साहित्य के अंतर्गत हम लोकगीतों, लोक कथाओं, गाथाओं, लोकोक्तियों, कहावतों, मुहावरो, पहेलियों आदि को संजोया हुआ पाते हैं। लोकनाट्‌यों की छटा भी इसी में विद्यमान रहती है। इन सब का अध्ययन हमें किसी समाज विशेष के मूल तक ले जाता है। उसके स्वरूप का साक्षात्कार संभव हो जाता है।

हम उसके संस्कारों की खुशबू पा लेते हैं और वहीं से उस संस्कृति विशेष की थाह पा लेने में सफल हो जाते हैं जो लोक विशेष की गोद में पनपती, पलती, बढ़ती और विकसित होती आती है। लोक संस्कृति बहते हुए नीर के समान है जिसका स्वरूप नैसर्गिक रूप से किसी समाज, क्षेत्र या प्रदेश के लोकमानस में समाहित सस्कारों को आत्मसात करते हुए यहां की धरती के रंग, माटी की महक, जीवन का दर्शन, रीति-रिवाजों की सुन्दरता, लोक-विश्वासों के जादू, पर्वों-उत्सवों और मेलों की मिठास, गीतों का संगीत तथा लोकमानस की सहजता के साथ निखर कर सामने आता है। लोक साहित्य इस प्रकार लोक संस्कृति की इन्द्रधनुषी आभा को न जाने कब से सुरक्षित रखे हुए है।

मानव जिस धरती पर रहता है, जिस लोक से उसका जीवन जुड़ा होता है, उससे उसका लगाव बहुत स्वाभाविक है। वहां धरती का बिछौना है। आकाश का ओढ़ना है। नदिया उसे चलना सिखाती है। झरने उसके लिए गाते हैं। बादल उसके संदेशवाहक होते हैं। पशु-पक्षी उसके दुख-दर्द के साथी होते हैं। वह पेड-पौधों से बतियाता है। सूरज, चाँद, सितारों को अपने जीवन की कहानी सुनाता है। पत्थरों में उसके हृदय की धड़कन सुनाई देती है। पवन उसके साथ संवेदना प्रकट करता है। बदलती हुई ऋतुएं उसे जीवन दर्शन का पाठ पढ़ाती है।

पर्वों, उत्सवों, मेलों और त्योहारों में उसके विश्वास और संस्कार रूपायित होते हैं। ऐसे वातावरण में जब जीवन पलता है तो मानवीय संवेदनाओं के विविध चित्र सामने आते हैं। जीवन के मीठे कडुवे अनुभव दिखाई पड़ते हैं। मानव के दुःख सुख बंटने लगते हैं।

कहीं माँ की ममता है, कहीं पिता का दुलार है। कहीं पति-पत्नी का संसार है, बहू पर सास के अत्याचार हैं, कहीं भाई बहिन का स्नेह है, कहीं देवर-भाभी की चुहल है. जीजा-साली के संवाद है, तो कहीं सची सहेलियां है। कहीं पनघट है, कहीं कुआं है, कहीं चौपाल है। कहीं शादी की शहनाई है, मंगलगीत हैं, पूजन अर्चन है. ढोल-मंजीरे हैं, गीतों की गूंज है और थिरकते पग हैं। जीवन का उल्लास, हर्ष-विषाद, सुख-दुःख, आंसू मुस्कान, मिलन-विरह, हास-परिहास आदि के चित्र हैं।

संस्कृति का संबध सरकारों से है। लोक का चिंतन, जीवन-दर्शन, परम्पराओं की झलक, मानवीय संबंधों एवं रिश्तों की मिठास आदि पीढ़ी दर पीढ़ी लोक-साहित्य में सुरक्षित रहकर सरकारों की छटा से संस्कृति के रूप और रंग को निखारते रहते हैं। लोकगीत, लोक कथाएं या लोकगाथाएं हमें किसी क्षेत्र विशेष की सभ्यता और संस्कृति से साक्षात्कार कराते हैं। उनमें लोक बोलता है।

पात्रों के और चरित्रों के माध्यम से लोकमानस को वाणी मिलती है। लोगों की सोच का पता चलता है। अनेक संस्कार, उनका आचरण, प्रथा-परम्परा और समाज का पूरा चित्र सामने आ जाता है। लोक गीतों को ही ले उनमें नारी जीवन की व्यथा, पुरुष का श्रम, दलित-पीड़ित और शोषण की पीड़ा, सामाजिक विसंगतियों के चित्र, जातीय समीकरण, वर्ग भेद, अमीरी-गरीबी के ताने बाने, झोपड़ी से लेकर महलों तक की गाथा होती है। मानव और मानवेतर जगत के सामंजस्य की कहानी उनमें विद्यमान रहती है।

तभी तो देवेन्द्र सत्यार्थी कहते हैं लोकगीत हृदय की खेती में उगते हैं। सुख के गीत उमंग के जोर से जनम लेते हैं और दुःख के गीत तो खौलते हुए लहू से पनपते हैं और आंसुओं के साथी बनते हैं। हृदय और संस्कारों का परस्पर घनिष्ट संबंध होता है। संस्कार संस्कृति के पोषक होते हैं। जीवन के अनुभवों और संस्कारों का भी संबंध होता है। अनुभवों की पाठशाला है घर-परिवार, खेत-खलिहान, मानवीय संबंध, सामाजिक जीवन और व्यवहार, जीवन की विभिन्न घटनाएं, प्रकृति के विभिन्न रूप, परिस्थितियों की विविधता, मानव के क्रियाकलाप, पारस्परिक संबंध और हृदय की दशा आदि। लोकजीवन का हर पहलू लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ रहता है। जन-जन की रग-रग में रमी हुई रुढ़ियां संस्कृति की रीढ़ होती है।

इसीलिए लोकसाहित्य में हमारे धर्म और संस्कृति के स्वरूप का संरक्षण होता है। इन सांस्कृतिक तत्त्वों को एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सौंपती हुई चली जाती है। आचार-विचार, पहनावा, विश्वास, आस्था, दान-पुण्य, दया, परोपकार, करुणा, प्रेम, सदभाव, वैर-विरोध, ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, अपने पराये का भाव, हमारा रहन-सहन, हमारी सोच-समझ, धर्म-कर्म, आहार व्यवहार सब कुछ आदिकाल से अब तक एक सतत प्रक्रिया के रूप में अनवरत रूप में समाज को प्रभावित करते आए हैं।

इनसे हमारी संस्कृति का निर्माण हुआ है ओर सांस्कृतिक मूल्य और मान्यताएं सुरक्षित हैं। कहा भी गया है कि "चिंतन द्वारा अपने जीवन को सरस, सुन्दर, कल्याणमय बनाने के लिए मनुष्य ने धर्म का जो विकास किया, दर्शन शास्त्र के रूप में जो चिंतन किया, साहित्य, संगीत और कला का जो सृजन किया, सामूहिक जीवन को सुखी बनाने के लिए जिन प्रथाओं और संस्थाओं को विकसित किया उन सबका समावेश हम संस्कृति में करते है।

लोक साहित्य में लोकजीवन की मूल-चेतना प्रतिबिम्बित होती है। लोक साहित्य हमें अतीत से जोड़ता है, हमारे वर्तमान को आनन्दित करता है और भविष्य के लिए प्रेरणा देता है। लोकगीतों में मन को वाणी मिलती है और सामाजिक मूल्य अभिव्यक्त होते हैं। इनमें वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक जीवन के मूल्य सम्मिलित होते हैं। लोक कथाओं में समाज की मान्यताएं, चारित्रिक विशेषताएं और जीवन-मूल्यों के चित्र मिलते है।

गाथाओं में विश्वास, मनोवृत्ति, विचार और मान्यताएं झलकती हैं। लोकोक्तियों और मुहावरों में लोकानुभूमि को वाणी मिलती है और अनुभव बोलता है। यही वह भावभूमि है जिसे हम सांस्कृतिक तत्त्वों के पनपने, पल्लवित और विकसित होने के लिए उर्वर भूमि मानते हैं। यही जीवन की उदात्त वृत्तियों की धरती है, जिसकी संस्कृति के विकास में महती भूमिका है। संस्कृति जीवन के पथ को आलोकित करती है। यह जीवन को उत्कर्ष की ओर उन्मुख करने का महत्त्वपूर्ण साधन है।

यह हमें जीवन के शाश्वत और चिरंतन सत्य से पहचान कराती है। लोकजीवन में हमारे विश्वास, पूजा-अर्चना की पद्धति, टोने-टोटके, रीति-रिवाज, प्रकृति-पूजा, कुआं पूजना, मुहूर्त निकालना, लग्न में विश्वास करना, फूलों का महत्त्व, नारियल से पूजा, तंत्र-मंत्र संबंधी विश्वास, अनेक प्रकार के विधि-विधान सूर्य-चंद्रमा की पूजा, व्रत-पर्व और त्योहारों का महत्त्व, स्नान ध्यान की और दान-पुण्य की महिमा, भक्ति भाव और साधना, देवी-देवताओं में विश्वारा, मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य, रिश्तों की मिठास, संबंधों का महत्त्व, मैत्री, करुणा, परोपकार और सद्भाव का विचार आदि सभी बातें हमारी सोच और लोक चेतना से संबद्ध हैं।

इन सभी का संबंध लोक जीवन से भी है और लोक मानस से भी लोक साहित्य और लोक संस्कृति का यही मूल भाव हमारे संस्कारों का ऊर्जा स्रोत है।समय के साथ सांस्कृतिक परिवेश और सोच में थोड़ा बहुत परिवर्तन स्वाभाविक है। परंतु आज चिन्ता का विषय है अपसंस्कृति का प्रभाव। हम अपने मूल से, अपनी जड़ों से कट रहे हैं।

हमारे लोकगीत लुप्त होते जा रहे हैं। लोककथाओं और गाथाओं को अतीत का विषय मानकर पिछड़ेपन की निशानी माना जा रहा है। लोकोक्तियों, कहावतों और मुहावरों को लोग भूलते जा रहे हैं। लोकनाट्य हेय दृष्टि से देखे जा रहे हैं। आज तथाकथित सभ्य समाज इसे पाश्चात्य संस्कृति के काले चश्मे के कारण पिछड़ों, ग्रामीणों, अनपढों, दलित-शोषित वर्ग और मजदूरों एवं श्रमिकों की ही थाती मानता है। यह एक बड़ी विडम्बना है।

इस मानसिकता को बदलकर आज लोकसाहित्य के महत्त्व को समझने की आवश्यकता है। इसके गौरव और गरिमा की पहचान ही नहीं वरन् रक्षा की भी आवश्यकता है। यहां पर डॉ. रामविलास शर्मा के विचार उल्लेखनीय है। वह कहते हैं- 'संस्कृति के सबसे मूल्यावान तत्त्व वे हैं जो शोषक वर्ग के हितों का विरोध करते हैं और शोषित वर्ग के हितों की रक्षा में सहायक होते हैं। ये तत्त्व शोषित वर्ग को बहुधा वर्गहीन आदिम समाजों से प्राप्त होते हैं। यह बात हमारी संस्कृति के आदिम स्वरूप और मूल तत्त्वों की ओर संकेत करती है।

प्राचीन होते हुए भी लोक साहित्य नित नवीन रहता है। इसमें व्यक्त लोकमानस काल के प्रवाह में बहता नहीं है। भले ही अपने आदिम स्वरूप में कुछ भी हो पर उसका स्वरूप सार्वकालिक और सार्वजनीन रहता है। हमारी मर्यादाएं, आदर्श, जीवन मूल्य और स‌वृत्तियां लोक साहित्य के माध्यम से हमारी विरासत बनकर हमारे संस्कारों का परिष्कार करते हैं। हमारी यह संस्कृति, हमारा, जीवन के चिरतन सत्य से साक्षात्कार कराते हुए, हमारी सोच को नए आयाम देती है।

जीवन में अनुभवों, अनुभूतियाँ और संस्कारों की सृष्टि का मूल लोक में निहित है। लोक साहित्य और संस्कृति पररपर इसी तत्त्व को सजीव और मुखर करने में सहायक होते हैं। आज हमें इसी सोच के पोषण के लिए अपने मूल से जुड़कर भौतिकतावादी मनोवृत्ति वाले वैश्वीकरण के इस युग में सांस्कृतिक प्रदूषण से बचते हुए अपनी जड़ों से जुड़ना है और अपने लोकसाहित्य और लोक संरकृति के संरक्षण के प्रति जागरूकता का परिचय देना है।

श्री नारायणदत्त पालीवाल
लोकसाहित्य में लोकसंस्कृति
"संस्कृति :अंक-01"

         

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