फाग का लोकरंग
February 27, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

भारतीय लोक संस्कृति सर्वाधिक आभामय और विविध रंगी है। लोक केवल गाँव में ही नहीं बसता, बल्कि शहरों में भी बसता है। यह वह लोक है जिसे शहरी जीवन और सुविधाओं ने जड़ से काटने की कोशिश की, पर अलग नहीं कर पाया। लोक का प्रभाव ही है जो उसे अपनी माटी, प्रकृति और संस्कृति से जोड़े रखता है। जीवन-यापन के लिए लोग अपना गाँव, अपनी माटी छोड़ तो देते हैं, किन्तु वे अपनी संस्कृति से प्राणपन से जुड़े रहते हैं। यह संस्कृति उन्हें जीने के लिए ऊर्जा देती है। अपने गीतों के माध्यम से माटी और प्रकृति के प्यार और दुलार को तीज-त्योहारों में गुनगुनाने के लिए प्रेरित करती है। लोक के तीज-त्योहार रंग-रंगीले होते हैं। यदि बात होली की हो तो यह और भी ज्यादा रंग-रंगीली तथा मस्ती भरी है।
होली पर गाये जाने वाले फाग गीतों की मादकता मन-प्राण को मुदित कर देती है। जाड़ा काल बीतने के बाद हवा थोड़ी रंग बदलती है, बासंती आहट देती है। धूप गुनगुनी हो जाती है। कोयल कुकने लगती है। आम्र मंजरी से बिखरती गंध साँसों में समाने लगती है। फूलों का रंग निखरने लगता है। खेतों में गेहूँ, सरसों और चने के पौधे थिरकने लगते हैं। माघ महीने की बसंत पंचमी से फाग गीतों की स्वर लहरी गाँवों में गूंजने लगती हैं।
पिंवरी पहिर सरसों झूमे,
तितली-भौंरा गाल चूमें.....
लोक के प्रत्येक तीज-त्योहार प्रकृति और कृषि संस्कृति से सम्बंधित हैं। गाँवों में होली की शुरुआत बसंत पंचमी से हो जाती है। इस दिन होले डांड (होलिका जलाने का स्थान) पर विधि-विधान से पूजन कर अंडी (येरंड) की डाली गाड़ कर की जाती है। बच्चे इसी दिन से होली के लिए लकड़ी इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं। इन बच्चों को होलहार कहा जाता है। इसी दिन से फाग का गायन प्रारंभ होता है। नंगारा, तासक और झाँझ के साथ शुरू होती है फाग गीतों की स्वर लहरी। क्या बच्चे, क्या युवा और क्या बूढ़े, सब मस्ती में झूमने लगते हैं-
फागुन महिना पहुना बन आज आयें
पहुना बन आज आये हो फागुन महिना.....
वाचिक परम्परा की लोक धारा अनेक कंठों से निकल कर लोकमानस को अभिसिंचित कर उर्जस्वित करती है। फाग गीत बड़े सहज, सरस और सरल होते हैं।
फाग गीतों पर लोक नाचता है, गाता है और अपने विविध मनोभावों को प्रकट करता है। इन फाग गीतों में भगवान राम व कृष्ण से संबंधित विषयों की अधिकता होती है।
होलिका दहन मुहूर्त देखकर सम्पन्न होता है। इधर छत्तीसगढ़ में होली जलाने की परम्परा बड़ी निराली है। यूँ तो प्रत्येक गाँव, नगर में कई स्थानों पर होली जलाई जाती है, इनमें एक स्थान प्रमुख होता है- जहाँ पर चकमक पत्थर व सेम्हरा फल के रेशे से अग्नि उत्पन्न की जाती है, जिसे 'कुँवारी अग्नि' कहा जाता है, यह अग्नि मानव की आदिम अवस्था और इतिहास की ओर इंगित करती है। फिर उसके बाद इसी कुँवारी अग्नि से जले होलिका डांड की आग से अन्य स्थानों की होली जलती है। फाग गीतों में लोक परम्परानुसार पहले गणपतिजी की वंदना की जाती है।
गणपति को मनाँव, गणपति को मनाव
प्रथम सुमर गणपति को...
होली को छत्तीसगढ़ में 'फागुन तिहार' भी कहा जाता है। इसकी लोकरंगी आभा हमारे लोकाचार को भी प्रकट करती है। होले डांड में होली दहन से पूर्व गाँव के प्रत्येक लोग जाकर पाँच-पाँच कंडे डालते हैं। साथ ही चावल के दाने छिड़क कर होले डांड की परिक्रमा करते हैं। ये पाँच कंडे पाँच लकड़ियों के प्रतीक हैं। होलिका दहन की राख को एक-दूसरे के माथे पर टीका के रूप में लगाते हैं और यथायोग्य अभिवादन करते हैं। होली की यह राख पवित्रता का प्रतीक है, जिसमें असत्य को जलाकर राख कर दिया गया है। यह सत्य और पवित्रता की राख है। इस राख की छोटी गठरी बनाकर लोग अपनी कोठी में भी रखते हैं। ऐसी लोक मान्यता है कि इससे धन-धान्य की वृद्धि होती है। फाग गीतों में राधा-कृष्ण और सीता राम आदर्श जोड़ी के रूप में उपस्थित होते हैं।
फाग गीतों में जहाँ मनोरंजन है, मस्ती और उमंग है, वहीं सामाजिक चेतना की लौ भी दिखाई देती है। जब लोग सुबह होली में पाँच कंडे डालने के लिए जाते हैं, तब घरों में होने वाले ढेकना (खटमल), किरनी (पशुओं का खून चूसने वाला कीट) तथा खसु (खुजली) के छिलके को अलग-अलग गोबर की गोली में डालकर लाते हैं और होली में डाल देते हैं। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि इससे डेकना, किरनी और खुजली समाप्त हो जाती है। यह सामाजिक चेतना का प्रतीक ही तो है, जो शोषक और अन्यायी को खत्म करने का भाव है। फाग इससे अछूता नहीं है
अरे हाँ रे देकना.... कहाँ लुकाए खटिया म
अरे कहाँ लुकाए खटिया म रे ढेकना
फाग गीतों में लोक के खान-पान का वर्णन मिलता है। होली पर गाँव में नेऊज चढ़ाने की परम्परा है, जिसे नवाखाई भी कहा जाता है। नेऊज यानी नवान्न। इस दिन गेहूँ की नई बाली के कुछ दाने आटा में मिलाकर व्यंजन बनाये जाते हैं, जिन्हें कुल देवता को अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही नए गेहूँ के आटे का उपयोग रोटी के लिए किया जाता है। छत्तीसगढ़ में नए धान के चावल का नेऊज नवरात्रि या दशहरा के दिन चढ़ाया जाता है।
फाग गीत की लोक रंगी आभा का एक और मजेदार पक्ष चिंगरी मछरी को लेकर है-
अरे हाँ रे चिंगरी मछरी
चिंग-चिंग कूदे तरिया में
फाग गीतों में केवल मनोरंजन और मस्ती ही नहीं हैं। इसमें राष्ट्रप्रेम और आजादी की बातें भी शामिल हैं।
अरे हाँ गाँधी तिरंगा फहरा दिए भारत में
भारत में, भारत में, भारत में
खादी और गाँधी का गुणगान भी फाग गीतों में आता है । जैसे-जैसे हम लोक सरिता में अवगाहन करते हैं, वैसे-वैसे ही लोकगीतों के मोती हमें मिलते जाते हैं।
फाग में संयोग और वियोग का भी रंग बिखरा है। लोक गीतों में समूह की अभिव्यक्ति होती है, इसलिए यह ज्यादा प्रभावी और संप्रेषणीय होता है। किसी भी विधा के गीत को फाग में ढाल देना लोक गायन की विशेषता होती है। यह रंग लोक संपदा की समृद्धि का सूचक है।
इसी तरह से देवर जब गवन लेने के लिए आता है, तो नायिका देवर के साथ जाने से इंकार करती है, किन्तु जब सैंया जी गवन ले जाने के लिए आते हैं, तो वह सहज तैयार हो जाती है।
फाग गीत में इतिहास का भी रंग समाहित है। आल्हा उदल लोक के प्रमुख पात्र हैं। आल्हा गायन में ये लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं। अपनी वीरता और चतुराई के कारण इन्हें पाँडवों का अवतार माना जाता है। उदल की वीरता का बखान इस फाग गीत में दृष्टव्य है-
उदल बांधे तलवार, उदल बंधे तलवार
एक रानी सोनवा के कारण......
अध्यात्म और दर्शन में भी फाग रंगा हुआ है-
बही जात एक नंदिया धारा
बही जात एक नंदिया बहत हे..
फाग गीतों में स्वाँग भी खूब रचाया जाता है-
बन-बन बाजे बांसरी, के बन बने नाचे मोर।
बन-बन ढूंढे राधिका, कोई देखे नंदकिशोर..
फाग के लोकरंग की ये लाली, सबको दे खुशहाली, यही कामना है।
ये फागुन बीत न जाये, मन-गागर रीत न जाये
आओ खिले पलाश बन, मन में हम प्रीत सजाये।
इस प्रकार फाग गीतों में लोक जीवन के वे सारे रंग मिलते हैं, जो लोक की अनुभूतियों से उपजे हैं। चाहे लोक का सांस्कृतिक पक्ष हो या सामाजिक या राजनैतिक या ऐतिहासिक पक्ष। फाग होली के त्यौहार की आत्मा तो है ही पर इसके गीतों में वाचिक परम्परा का संरक्षण भी निहित है जो आधुनिक युग में कहीं विलुप्त होता जा रहा है ।
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