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प्रकृति, लोककला और संस्कार: जनजातीय जीवन में सनातन की शाश्वत उपस्थिति

प्रकृति, लोककला और संस्कार: जनजातीय जीवन में सनातन की शाश्वत उपस्थिति

जनजातीय समाज भारत का अभिन्न अंग तो है ही अद्भुत् भी है ! अद्भुत् इसलिए कि यही वह समाज है जिसने सनातन परंपरा के सभी पहलुओं को आज भी मूल स्वरुप में जीवंत रखा है । गीत,संगीत नृत्य और नाट्य कला के  यह सभी आयाम पुरातन काल से  भारत में विद्यमान विविधता को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम रहे हैं...
हम सभी को यह अच्छी तरह पता है कि मानव अस्तित्व का इतिहास श्रुति ग्रंथों से पुराना है और जनजातीय समाज ही है जो पुरातन काल से इस वर्तमान काल तक विकास के हर चरण का साक्षी बने रहते हुए अपनी मूल परम्पराओं और सहज जीवन शैली से जुड़ा हुआ है, हालाँकि टेक्नोलॉजी और आधुनिकता की इस आंधी से यह समाज भी अछूता नहीं है परन्तु फिर भी पुरानी पीढ़ी आज भी अपने मूल और सहज जीवन शैली में ही ज्यादा विश्वास रखती है और प्रकृति के सानिध्य में शांति और सामंजस्यपूर्ण जीवन आनंद  के साथ बिता रही है।

और चूँकि इनके पास मनोरंजन के साधन बहुत सीमित है इसलिए नृत्य-गान इनके जीवन का अभिन्न अंग हैं जिनके माध्यम से  यह समाज  जन्म-मृत्यु, विवाह, और शिशु के जन्म सभी अवसर पर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करता है।यहाँ हम उनके गीतों के माध्यम से उनके संस्कारों पर भी दृष्टि डालेंगे और जैसे जैसे इसकी गहराई में जायेंगे हमे स्वतः ही इस तथ्य का पता चल जायेगा कि कैसे यही समाज हमारी भारतीय संस्कृति का मूल है । इस माध्यम से केवल मनोरंजन का पक्ष ही सम्बंधित नहीं है इनसे  सम्बंधित समाज के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्ष भी उजागर होते हैं ।
भारत संस्कारों का देश है और इसलिए हमारे देश में संस्कारों को केवल  एक समारोह (सेरेमनी ) आयोजन का अवसर के रूप में नहीं देखा जाता हैं बल्कि हमारे जीवन में तेजस्विता, प्रताप व उचित मार्गदर्शन और दिशानिर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले घटक के रूप में देखा जाता है । दार्शनिक दृष्टिकोण से जन्म-मरण एक बहुत ही जटिल विषय है परन्तु आम जन की सहूलियत के लिए इन जटिल अवधारणाओं को लोक कथा, लोक गीत, नृत्य, नाटक आदि लौकिक कलाओं के माध्यम से सहज रूप में प्रस्तुत किया जाता है बिलकुल ठीक यही पद्धति जनजातीय समाज में भी दिखाई पड़ती है ।


सनातन धर्म में वर्णित षोडश संस्कार
 

जब हम इन लोक कलाओं  के विभिन्न स्वरूपों की तुलना अन्य वैदिक ग्रंथों, पुराणों या प्रचलित परम्परों आदि से करते है तब पातें है कि यदि  कुछ आमूलचूल परिवर्तनों की अनदेखी कर दें तो इनमे कोई अंतर है ही नहीं, केवल समानताएं ही हैं । उदाहरणार्थ महाभारत में कुंती पुत्र कर्ण की कथा से हम सब भली-भांति परिचित हैं कुछ इसी तरह की कथा बिंझवार जनजाति की वाचिक परंपरा में विधमान है जिसके अनुसार  जंगल में एक कुंवारी कन्या के अकेले वास करने और प्यास से व्याकुल भटकते हुए एक पत्ते पर चमकती पानी की एक बूँद से प्यास बुझाने की कथा मिलती है जिसमे आगे बताया जाता है कि कन्या उसी जल की बूँद से गर्भवती  हो जाती है और समाज में अपनी बदनामी के डर से उसे आम के पेड़ के नीचे रखकर चली जाती है और बाद में इसे राजा के सैनिकों ने देखा और फिर उस बालक का राजा द्वारा पालन पोषण किया गया ।
क्या यह कथा माता कुंती की कथा से कही अलग है ? इसी तरह हमारे प्राचीन भारत के श्रृंगी ऋषि के जन्म की कथा के बारे जानेंगे तो पता चलता है कि उनका जन्म उस हिरनी  के गर्भ से हुआ था जिसने विभान्डक ऋषि के स्नान करते समय उसी सरोवर का जल पिया था । इन कथाओं के उल्लेख का उद्देश्य मात्र इतना है कि  हम प्रकृति से हमारे इस अटूट और गहरे अंतर्संबंध को समझ सकें जिसकी झलक आज भी इस जनजातीय समाज की जीवनशैली में परिलक्षित होती है ।
परन्तु हमारे द्वारा इस गठजोड़ को भुला दिए जाने का भरपूर फायदा उठाकर विखंडनकारी  शक्तियों ने हमारे इस मूल समाज को हमसे, सफलतापूर्वक  अलग सिद्ध कर दिया। जन्म से जुड़ी अवधारणा से आगे बढ़कर हम जन्म संस्कारों पर चर्चा करेंगे... जिसे जनजातीय समाज में टुंडा कहकर संबोधित किया जाता है । किसी स्त्री के गर्भवती होने पर हम शहरी या ग्रामीण क्षेत्र में गोद भराई की परंपरा देखते है जो दिनों-दिन खर्चीली और आडम्बरपूर्ण होती जा रही है! इस रस्म में गर्भवती स्त्री के मायके से उपहार और खाने पीने की चीज़ें आती है जिसके पीछे मान्यता है कि यदि महिला को अपने घर के स्वाद की याद आये तो उसकी इच्छा पूर्ती हो ।

Elegant Baby Shower Decoration - Florist Chain - Near Me Florist
गोद भराई का आधुनिक स्वरुप- बेबी शावर


चूँकि जनजातीय समाज बहुत सहज-सरल है इसलिए उन्हें गर्भवती स्त्री के पैरों की सूजन से यह समझ आ जाता है की उसे मायके की याद आ रही है इस तरह इतने सरल तरीके इस समाज में गर्भधारण संस्कार सम्पादित हो जाता है । यह समाज प्रकृति से मानवीय सम्बन्ध की इतनी गहरी समझ रखता है कि नवजात शिशु की नाल झड़ने के बाद उसे घर में किसी पवित्र स्थान पर गाड़ दिया जाता है जिसके पीछे की अवधारणा यह है कि घर में नाल गाड़ने से वंश वृद्धि अच्छी तरह से होती है ।
जन्म संस्कार में सम्मिलित अनेक नेग उनकी इस विचारधारा की द्योतक हैं की माँ और धरती दोनों का गर्भ एक सामान है और इसलिए गर्भधारण को मिटटी में सकुशल बोने की दृष्टि से देखा जाता है और अन्य रीति-रिवाजों  को भी उसी तरह सकुशल अंकुरण के साथ सम्बद्ध किया जाता है । सफल जन्म के लिए परम परमेश्वर सिंग बोंगा, ग्राम्य देवी-देवता एवं पूर्वजों को साधुवाद दिया जाता है । इस प्रकार इस समाज द्वारा प्रकृति के सहज गुण, सहज व्यवहार और सहज परिवर्तन के अपने नेंग में सम्मिलित करना इस समाज के प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान को प्रदर्शित करता है ।


नामकरण संस्कार- उरांव जनजाति

प्रसवकाल में पत्नी और बच्चे से सम्बंधित सभी कार्य पुरुष करता है । आज के इस आधुनिक युग में जहाँ तथाकथित  सुशिक्षित समाज में भी लैंगिक भेदभाव दिखलाई देता है वही इस समाज में बेटा-बेटी के मध्य कोई भेदभाव नहीं है दोनों का नामकरण संस्कार एक सामान उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। शायद यही कारण है जनजातीय क्षेत्र का लिंगानुपात शहरी क्षेत्र से हमेशा कहीं अधिक ही पाया गया है।
नामकरण के पश्चात मुंडन संस्कार किया जाता है । जन्म के समय गाया जाने वाला एक बड़ा सुन्दर गीत मिलता है जो कुछ इस प्रकार है - सबय सेवा के करेंदे आया रे, तेचोय काजे इलेगो आया रे अर्थात सभी सेवा को करूंगा माता इसलिए मैं आया हूँ । ध्यातव्य है कि यह गीत संतान के जन्म पर गाया जाता है संतान बेटा है या बेटी इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है ।
मुट्ठी बाँध के आय हंसा धरती मा पधारे अच्छी-अच्छी काम करबी अच्छी नाम कमाबी.......  
उपरोक्त अंश बैगा जनजाति द्वारा छठी के अवसर गए जाने वाले गीत से लिया गाय है जिसका  भावार्थ है वह नेक काम करेगा और माँ-बाप का नाम रोशन करेगा। इस जनजाति में बच्चे के छठी नेग पर महिलाएं बच्चे द्वारा अपने जीवन में क्या-क्या किया जायेगा, किस प्रकार से किया जायेगा के संबंध में लोक-गीत के द्वारा बताया जाता है ।
जन्म के समय सूतक माना जाता है इसलिए छठी का कार्यक्रम पांचवें दिन नाल झड़ने के बाद किया जाता है । जच्चा-बच्चा को स्नान कराकर शुद्धीकरण किया जाता है और माता को काले धागे की बनी पांच लड़ वाली करधन पहनायी जाती है जिसके पीछे पञ्च तत्वों का आशीर्वाद पाने की कामना छुपी होती है ।
जब हम गोंड समुदाय के नामकरण संस्कार को देखते है तो पाते हैं बच्चे के हाथ में सियाड़ी लता की एक कमची थोड़ा पका चांवल चिपकाकर थमा दी जाती है और एक-एक करके अपने पूर्वजों का नाम लेते हैं जिनका नाम सुनते ही बच्चा उस कमची को ऊपर की तरफ ले जाता है बच्चे का नाम उन्हीं के नाम पर रख दिया जाता है ।
पहाड़ी कोरवाओं में बच्चे के जन्म के समय कांसे की थाली बजाने की परंपरा है जिससे अन्य लोगों को ये पता चल जाता है कि समाज में किसी शिशु का आगमन हुआ है और ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में यह परंपरा उन घरों में आज भी निर्वहन की जाती है जिन घरों में बुज़ुर्ग निवास करते हैं यानि हम और जनजातीय समाज एक ही हैं कोई अंतर नहीं है जैसा की राष्ट्र विरोधी तत्वों द्वारा स्थापित किया गया है  हम उपरोक्त वर्णित पंचतत्वों की बात करें या नामकरण संस्कार में निहित पुनर्जन्म का सिद्धांत वैदिक दर्शन की संपूर्ण झलक इस समाज में परिलक्षित होती है और इससे यह स्वतः प्रमाणित हो जाता है कि जनजातीय समाज हमसे किसी भी प्रकार से अलग नहीं है या दुसरे शब्दों में कहें तो  जनजातीय समाज ही भारतीय समाज अर्थात हम सबका का मूल है ।
जन्म संस्कार की झलकियाँ तो हमने देख ली अब थोड़ा  वैवाहिक संस्कारों पर भी दृष्टि डालते हैं – इस समाज में जन्म और विवाह दोनों का ही भरपूर उत्साह से अभिवादन किया जाता है क्योंकि यह उत्पत्ति के कारक हैं । जनजातीय समाज में बहुपति, बहुपत्नी, ममेरे-फुफेरे विवाह को मान्यता प्राप्त है गोंडों में जब निकट रिश्तेदारी में होने के कारण बहु ननंद या भाई की बेटी होती है जब रिश्ते की बात चलायी जाती है तो कहा जाता है -आपके घर में एक फूल खिला है जिसे मैं अपनी पगड़ी में स्थान देना चाहता हूँ इन सुन्दर पंक्तियों से हम समझ सकते हैं की नारी को कितना उच्च और सम्मानीय स्थान दिया गया है जिसका  तथाकथित शिक्षित समाज में,आज के आधुनिक दौर में भी कहीं न कहीं आभाव नज़र आता है ।


हो जनजाति के युवक को मंडप की ओर ले जाती महिलाएं 

विवाह में कन्या की सहमति आवश्यक है और विवाह में होने वाले अधिकांश व्यय का वहन वर पक्ष द्वारा किया जाता है जिससे कन्या के घर वालों पर आर्थिक बोझ न पड़े इसमें निहित एक अन्य अवधारणा यह है की चूँकि इस समाज में महिलाओं की आर्थिक योगदान में सामान भूमिका रहती है अतः खर्ची के माध्यम से कृतज्ञता  व्यक्त की जाती है । सन्निकट रिश्तेदारी में विवाह करने का कारण है कि चिर-परिचित घर में विवाह होने से कन्या का सुखद और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित हो जाता है ।
विवाह में जहाँ मंडप (मड़वा) गाड़ा जाता है वहां तीन, पांच और सात आड़ी रेखाएं खिचीं जाती हैं तीन लकीरें रंगों को (मुख्यतः काला, लाल, सफ़ेद ), पांच लकीरें पंचतत्व ( पृथ्वी, आकाश,  अग्नि,  वायु,  जल ) और सात लकीरें प्राकृतिक रंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं । इनके जीवन के हर आयोजन का केंद्र बिंदु है प्रकृति और भारतीय संस्कृति में भी यही दीखता है । विवाह में प्रयुक्त  हल्दी - को माता का रूप माना जाता है,  क्योंकि हल्दी धरती के कोख में पली-बढ़ी होती है। सुपारी को पिता का स्वरूप माना जाता है, क्योंकि सुपारी आसमान में फलती है व छत के समान छांव देती है। चांवल को जीवन यापन का प्रमुख आधार माना जाता हैं,  क्योंकि यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है । विवाह के अवसर पर गया जाने वाला एक गीत -
रेरे लोयो, रेलो रेला रेरे लोयो रेला......... डीडा राजो,राजो हेलो डीडां राजो, राजो रोय टेकाड आकीगं पापे जोरे जनम दिया जोडी रोय
इसका अर्थ है कि युवा काल में तुम स्वतंत्र थे, उस समय तुम अपने माता-पिता के छाव में राज किये जिधर इच्छा होती थी उधर चले जाते थे, लेकिन अब विवाह के पश्चात सब बदल जायेगा । इसमें भविष्य में आने वाले  पारिवारिक दायित्वों को बहुत ही सरल और सहज भाव से समझाया गया है और संभवतः यही लोक गीतों की सुन्दरता है । ऐसी ही एक मान्यता विवाह के समय लिए जाने वाले सात फेरों में दिखाई देती है जो दायें से बाएं दिशा में लिए जाते हैं और मानते है कि प्राकृतिक संवृधि में भी इसी दिशा में होती है जैसे लता का चढ़ना, पृथ्वी का घुमना, बवंडर का घुमना, पानी में भंवर पड़ना ये सभी दांये से बांये चलता है अतः ऐसी मान्यता है कि प्रकृति के अनुकूल चलने से लाभ होगा ।
इस समाज में मृतक संस्कार में बहुत अनोखे है जिनमे मृत्यु से सम्बंधित भारतीय दर्शन में जिसमे पुनर्जन्म की अवधारणा वह स्पष्ट झलकती है जैसे गोंड जनजाति में मृत-देह को दफनाने के बाद उनकी "गुड़ी” बनाकर उनके गोत्र के अनुसार टोटम चिन्ह उकेरने या उनके पसंद की चीजों को प्रत्येक परब या तिहार में रखकर सम्मान देते हैं। यह, मृतक जो बाद में पुर्नजन्म लेंगे, उन्हें सम्मान देने का प्रतीकात्मक स्वरूप है। शावाधन की इस प्रक्रिया में बीज के धरती में रोपण और फिर उसके अनुकरण से लेकर अंतिम तक फलने फूलने की प्रक्रिया के रूप में मानव जीवन को देखा गया है इसलिए शव को दफ़न करके मनुष्य को पुनः धरती माँ की गोद में सौंप दिया जाता है ।


मरणोपरांत किये जाने वाले विभिन्न विधान 

मृत्यु के बाद उनके पूर्वजों का निवास घर-कुरिया में माना जाता है और जैसे हम अपने किसी भी शुभ कार्यारम्भ से पहले अपने पितरों का आशीर्वाद आवश्यक मानते हैं वैसे ही यह समाज भी किसी भी शुभोत्सव और तेज -त्यौहार में सर्वप्रथम इष्ट देव और पुर्वजों  के सेवा, पूजा- अर्चना से ही आरम्भ करते हैं । हल्बा समाज में मृत्यु होने पर दफनाने या जलाने का रिवाज है, दफ़नाने पर मृतक तक का सर पूर्व दिशा में रखा जाता है,पगड़ी बांधकर सुदेश (पगड़ी रस्म) मृत्यु संस्कार में तीन दिवस या पाँच दिवस में नाहनी होता है ।
वास्तुशास्त्र में पूर्व दिशा अत्यन्य शुभ मानी जाती है इसलिए मृतात्मा को असीम  शांति मिले इसलिए पूर्व दिशा में सिर रखकर शवाधन किया जाता है गोंडों में शव का सर दक्षिण और पैर उत्तर दिशा में रखकर शावाधन किया जाता है क्योंकि यह अपने पूर्वजों की उत्पत्ति और पुरखा देवों का निवास दक्षिण दिशा में मानते है इसलिए पैर उस दिशा में नहीं रखे जाते । मान्यता कुछ भी हो इससे उनके  वास्तुशास्त्र  सबंधी ज्ञान का पता चलता है । मुरिया जनजाति में सगे-सम्बन्धी शव पर तेल-हल्दी से सिर से पैर तक लेपन करते है । शव को उठाकर शमशान की ओर जाते समय परिवार की महिलायें  सूपा मे लाई, चांवल तथा पैसा मिलाकर शव के ऊपर बिखरते हुए चलते हैं बचा हुआ चांवल लाई धान को शव के चारो कोना में डालकर सूपा को तोड़कर फेंक दिया जाता है ।
इन संस्कारों की संक्षिप्त चर्चा से समझ आता है जन्म से लेकर मरण तक आरण्यक , ग्राम्य औए शहरी समाज के संस्कारों में जो अंतर दिखाई देता है वास्तव में वह केवल स्वरुप में परिवर्तन है न की सामाजिक भेद जैसा कि शताब्दियों से प्रसारित किया जा रहा है । जनजातीय समाज के गीत मौलिक तो अवश्य हैं लेकिन मौखिक और अलिखित होने के कारण लोग अकारण ही इन अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर पर बड़ी ही सहजता से प्रश्न चिन्ह लगा कर मनचाहा तमगा लगा देते हैं..परिवर्तन एक ऐसा नियम है जो अपरिहार्य है लेकिन जब परिवर्तन इतना हावी होने लगे कि उसके कारण किसी भी समाज के धार्मिक और सामाजिक आदि पक्ष विलुप्ति की चौखट तक पहुँच जायें तब उन परिवर्तनों के कारणों पर चिंतन मनन आवश्यक हो जाता है ।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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