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पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

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राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो

राजस्थान में प्रकृति से जुड़ा लोकोत्सव है- गाँव बारो

भारतीय जीवन दर्शन में प्रकृति का अपना विशेष महत्त्व है। राष्ट्र वन्दना का वैदिक सूक्त ईश्वर से राष्ट्र के पंच-महाभूतों की शुद्धता एवं संरक्षण की प्रार्थना भी करता है। भारत का वृहद क्षेत्र राजस्थान वीर प्रसूता भूमि है जो अपनी आन-बान-शान के साथ अपने रंग-बिरंगे लोकोत्सव के कारण भी विशिष्ट पहचान रखता है। राजस्थान के ग्रामीण अंचल का लोकोत्सव गाँव बारो या गाँव बारणे (गाँव की सीमा के बाहर सहभोज)| इस लोकोत्सव का आयोजन वर्षा ऋतु(श्रावण,भाद्रपद मास) के समय ग्रामीण बड़े- बुजुर्गों की सलाह मशविरा एवं सर्वसम्मति के अनुसार दिन-वार तय कर किया जाता है। 

मुख्य उद्देश्य-यह लोक संस्कृति से जुड़ा पर्व अपने ग्राम एवं पशुधन की सुरक्षा लोक देवताओं के प्रति आस्था का संगम भी है।  इस लोकोत्सव का मुख्य उद्देश्य ऋतु परिवर्तन के साथ उत्पन्न बीमारियों से पशुधन एवं फसलों की सुरक्षा भी है। 


लोकोत्सव गाँव बारो

गाँव बारणे विधान- तय दिवस के अनुसार पूर्व संध्या को गाँव का संवादिया गाँव बारो मनाने के लिए क्षेत्र में एकत्र हो सूचित करता है। रात्रि के समय सभी अपने घरों में किसी भी तरह का प्रकाश करना वर्जित माना गया है |किसी भी तरह का कामकाज एवं ग्राम सीमा पार करना निषेध है। प्रात:काल दुहारी(पशु दुहना), साफ़- सफाई लोक देवी-देवता की पूजा- अर्चना के पश्चात की जाती है |विशेष दिन समस्त ग्रामीण लोक देवी-देवता के थान एकत्र हो पूजा अर्चना करते है एवं देवता की ज्योत के साथ जन समूह अपने पशुधन के साथ ग्राम की सीमा पर जाते है जहाँ धूप- ध्यान एवं सम्पूर्ण क्षेत्र को बांधकर गोमूत्र एवं गोबर से लिपाई-पुताई से परिसर का शुद्धिकरण करने के पश्चात दैनिक गतिविधियों को प्रारम्भ किया जाता है। 

ग्रामीण अपने द्वारा तैयार सामग्री को गाँव के देवी- देवता को अर्पित कर सुख समृद्धि की प्रार्थना करते है। इस लोकोत्सव में प्रसाद (भोजन) में विशेष रूप से राजस्थान का प्रसिद्ध भोजनदाल-बाटी-चूरमा (लड्डू-बाटी )तैयार कर सहभोज का आयोजन करता है। 


लड्डू बाटी चूरमा -भोजन प्रसादी तैयारी

आयोजन के दिन क्षेत्र परिसर में चूल्हा नही जलाया जाता है। सभी ग्रामीण गाँव की सीमा के बाहर किसी देवस्थान, प्राकृतिक स्थान पर सहभोज करते है। अनेक स्थानों पर भोजन प्रसादी के लिए सामग्री सहयोग से जुटाई जाती है। 

हमारे शास्त्रों में भी वर्षा ऋतु के दौरान सहभोज के प्रसंग दृष्टव्य है। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के प्रसंग एवं प्राचीन चित्रांकन परम्परा में भी इसका उल्लेख देखा जा सकता है। केकड़ी क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में यह लोकोत्सव बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन घर-परिवार की बेटियाँ भी ससुराल से सहभोज के कार्यक्रम में शरीक होती है।  इस दिन ग्रामीण क्षेत्रों में उत्साह का माहौल देखते ही बनता है। 


शुद्धिकरण

गाँव बारणे भोज राजस्थान की लोक संस्कृति का एक अनोखा पर्व है, जो ग्राम देवताओं के प्रति श्रद्धा, विश्वास और प्रकृति के प्रति आदर भाव को दर्शाता है। इसे प्रकृति का आभार व्यक्त करने का लोकोत्सव कहा जा सकता जो जन समुदाय में एकता एवं सद्भावना को भी जागृत करने में अहम भूमिका का निर्वाहन करता है। 

-पुष्पा शर्मा
अजमेर, राजस्थान  

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