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आंवला नवमी: भारतीय समाज में प्रकृति पूजन का पर्व

आंवला नवमी: भारतीय समाज में  प्रकृति पूजन का पर्व

अमला नवमी, जिसे अक्षय नवमी के नाम से भी जाना जाता है, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से आंवले के वृक्ष की पूजा के लिए प्रसिद्ध है। अमला नवमी भारत की सांस्कृतिक एकता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो यह दर्शाता है कि कैसे भारत के ब्राह्मण समाज से लेकर गोंड, उरांव, यादव, साहू, बैगा आदि विविध समुदायों में ऐतिहासिक रूप से वृक्षों की पूजा कर प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

Amla Navami today: Amla tree will be worshiped for eternal virtue, in  Puranas Shivji described this tree as the form of Lord Vishnu. | आंवला नवमी  आज: अक्षय पुण्य के लिए होगी
आंवले के वृक्ष की पूजा करते ग्रामीण

वैदिक और पौराणिक महत्व
वेदों में अनेक सूक्त वृक्षों की प्रशंसा में हैं। पुराणों में कल्पवृक्ष और पारिजात जैसे सर्व सिद्धि और निधि दायक वृक्षों का उल्लेख है। स्कंद और पद्म पुराण में उल्लेख है कि आंवले के वृक्ष की जड़ में भगवान विष्णु, शाखाओं में देवता और ऋषिगण तथा शीर्ष पर पूर्वज निवास करते हैं। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। माना जाता है कि कार्तिक मास की नवमी से पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आंवले के पेड़ में निवास करते हैं। इस दिन किए गए दान-पुण्य, स्नान-पूजा का फल अक्षय होता है, अर्थात कभी समाप्त नहीं होता।

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आंवले का वृक्ष

सनातन हिन्दू परंपरा में अमला नवमी को "अक्षय नवमी" भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन किए गए पुण्य कार्यों का फल कभी समाप्त नहीं होता। वनांचलों में भी यही मान्यता है कि प्रकृति की पूजा और संरक्षण करने से जीवनभर और आने वाली पीढ़ियों को लाभ मिलता है। धार्मिक महत्व के साथ-साथ, अमला नवमी का वैज्ञानिक महत्व भी है।

आंवला विटामिन सी का असाधारण स्रोत है जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है, हृदय स्वास्थ्य में सुधार करता है, त्वचा और बालों को स्वस्थ बनाता है, नेत्र स्वास्थ्य को बढ़ाता है, तनाव कम करता है, कैंसर से बचाव में मददगार है तथा एंटी-एजिंग और एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर है। यह स्वास्थ्यवर्धक, रोग निवारक और दीर्घायु प्रदान करने वाला अद्भुत औषधीय वृक्ष है। अमला नवमी मनाने का मूल उद्देश्य प्रकृति द्वारा दिए गए उपहारों के लिए कृतज्ञता व्यक्त करना है। 

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आंवले के फायदे

प्रकृति पूजन: भारतीय संस्कृति की परंपरा
प्रकृति पूजन भारतीय संस्कृति की सबसे प्राचीन और मौलिक परंपरा है। मनुष्य ने आदिकाल से ही प्रकृति को देवता के रूप में पूजा है क्योंकि वह प्रकृति के महत्व और प्राणी जगत के लिए इसकी आवश्यकता को समझता था। अग्नि, सूर्य, जल, वायु, पर्वत और वृक्ष ये सभी प्राकृतिक तत्व सदियों से पूजे जाते रहे हैं।

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पंच तत्व की पूजा का विधान

पुरातात्विक प्रमाण: सिंधु सभ्यता से लेकर आज तक जीवंत परंपरा
हड़प्पा सभ्यता में भी वृक्ष पूजा का महत्व था। सिंधु घाटी सभ्यता में मोहरों और चित्रलिपियों में वृक्ष-प्रतीक अंकित मिलते हैं, साथ ही अभिलेखों में चित्राक्षर मिलते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि वृक्ष पूजा हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है।

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सिंधु घाटी सभ्यता के मुहरों में वृक्षों का अंकन

पंचमार्क कार्षापण सिक्के, जो 600-200 ईसापूर्व तक प्रचलन में थे, उनमें भी वृक्षों (पारिजात, कल्पतरु) का अंकन मिलता है। यह स्पष्ट करता है कि प्राचीन भारत में वृक्षों को न केवल पूजनीय माना जाता था, बल्कि उन्हें आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता था। बेसनगर में लक्ष्मी जी के प्रतीक स्वरूप कल्पतरु वृक्ष की प्रतिमा मिली है, जो 200 ईसापूर्व की है।

Post-Mauryan coinage of Gandhara - Bharatpedia
तक्षशिला से प्राप्त सिक्का. (220-185 ईसा पूर्व)

समस्त हिन्दू समाज में प्रकृति पूजा की परंपरा
यह एक स्थापित भ्रम है कि केवल अनुसूचित जनजाति वर्ग मूलतः प्रकृति पूजक है, जबकि समस्त हिन्दू समाज प्रकृति की आराधना करता है। सभी सनातन समुदाय अपने देवी-देवताओं का वास पेड़-पौधों पर मानते हैं और उनकी पूजा करके अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
भारत में गोत्र परंपरा की अवधारणा है। इस अवधारणा में भारत के कई समुदाय जैसे छत्तीसगढ़ का साहू समाज, गोंड समाज, बैगा समाज में प्रकृति के अनेक जीव-जंतुओं के साथ-साथ पेड़ों के नाम से गोत्र प्रचलित हैं। बस्तर क्षेत्र के कई समुदायों में गोत्र का नाम पेड़ों और पशु-पक्षियों के नाम पर रखने की अनोखी परंपरा है।

हिन्दू धर्म में पीपल, बरगद, तुलसी, नीम, आम, बेल और आंवला जैसे वृक्षों की पूजा की जाती है। इन्हीं वृक्षों की पूजा प्रत्येक हिन्दू समाज में भी होती है। अमला नवमी पर हिन्दू समाज में आंवले के पेड़ की जड़ों में जल चढ़ाना, पेड़ के तने के चारों ओर कलावा (पवित्र धागा) बांधना, फूल-धूप-दीप से पूजा करना और पेड़ की परिक्रमा करना प्रमुख विधि है। उरांव समाज में भी करम पूजा और सरना पूजा में इसी प्रकार की विधि अपनाई जाती है, वृक्ष को जल चढ़ाना, उसके चारों ओर धागा बांधना, फूल-प्रसाद चढ़ाना और परिक्रमा करना।

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सरना पूजा स्थल, झारखण्ड

अमला नवमी पर आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है। इसी प्रकार, करम पूजा के दौरान करम वृक्ष की शाखा के नीचे सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। भारत में धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के कारण भी वृक्षों का संरक्षण होता रहा है। कई वनों में शिकार और वृक्षों की कटाई पूर्णतः निषिद्ध है। स्थानीय समुदाय इन वनों की रक्षा करते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि देवता इनमें निवास करते हैं। यह धार्मिक विश्वास प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण संरक्षण में योगदान देता है।

अमला नवमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय समाज में सदियों से विद्यमान प्रकृति पूजन की प्राचीन परंपरा का प्रतीक है। यह पर्व हिन्दू समाज में वृक्ष उपासना की सांस्कृतिक एकता प्रदर्शित करता है और प्रमाणित करता है कि भारत के विविध समुदायों की सांस्कृतिक जड़ें एक ही स्रोत से जुड़ी हैं। ऐसे पर्वों को मनाकर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देते हैं। यह हमारा सामूहिक दायित्व है कि इस प्राचीन ज्ञान को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाएं और भारत की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करें।


लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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